सोमवार, मार्च 06, 2023

👸 अबला सी नारी मैं 👸










अबला सी नारी मैं फिर से मुस्कुराना सीख रही हूँ।

तन्हाइयों में खुद को गुनगुनाना सीख रही हूँ।


जो खुशियाँ कतरा कर निकल जाती थी करीब से,

अब उनको अपने दामन में छुपाना सीख रही हूँ।


तितलियों पर सवार होके जो उड़ जाते थे फुर्र से,

उन रंगों को जिन्दगी में सजाना सीख रही हूँ।


जो जज्बात गुजर गये दिल पर दस्तक दिये बगैर,

उन्हें फिर से दिल के आँगन में बुलाना सीख रही हूँ।


जो लम्हे निगल रहे थे मुझको न जाने कब से,

उन लम्हों में ही खुद को बचाना सीख रही हूँ।


भर भर के झोलियाँ बाँटती रही तमाम उम्र,

अपने लिये भी कुछ उनमें से चुराना सीख रही हूँ।


मुठ्ठी से सरक रही थी रेत की मानिन्द जिन्दगी,

अब फिर से जिन्दगी से भर जाना सीख रही हूँ।


✍️ शशि सिंह ( शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश )

रविवार, मार्च 05, 2023

👸 स्त्री मन का वो अनछुआ कोना 👸










स्त्री मन का वो कोना 

अनछुआ रह गया

जहाँ की हर दीवार

पर लिखावट थी 

अहसासों की

वो सारी गांठे 

बंधी रह गयी

जिनको बांधा था

मन्नतों के धागों से

वो तिमिर मिटा 

ही नही जिनकों

खिड़कियों ने कैद

कर लिया रोशनी 

से बचा कर

आज भी किसी

दस्तक के इंतजार में

अक्सर मन उसका

बेचैन चौखट पर

बैठ सोचता रहता है

क्या कभी वो रोशनी 

उतरेगी उन सीली सी

दीवारों पर और कोई 

पढ़ लेगा उन अहसासों

को जो अब मुरझाने

लगें हैं परत दर परत

अंधेरों की ओट में


✍️ सीमा मोटवानी ( अयोध्या, उत्तर प्रदेश )

शनिवार, मार्च 04, 2023

👸 सास-बहू का अनूठा रिश्ता 👸

सासू माँ अर्थात सास जो माँ जैसी हो। क्या हम सासुएँ इसे शब्दशः चरितार्थ करने में सफल हो पाती हैं ?
हम सभी चिरकाल से यह देखते आए हैं कि मानवीय रिश्तों में सास-बहू का रिश्ता सबसे कलुषित, कुपित व तिख्त रिश्ता माना जाता रहा है और यह मानसिकता हमारे समाज में कहीं डीप रूटेड है। सास युवतियों के मानस पटल पर एक खलनायिका की तरह अंकित हो जाती हैं और वे इस पूर्वधारणा के साथ ससुराल में कदम रखती हैं कि सास को प्लीज़ करना सिर्फ मुश्किल ही नही वरन असंभव है वगैरह वगैरह..... 
वहीं दूसरी तरफ सास आने वाली बहू को एक प्रतिद्वंदी के रूप में देखती हैं। आज तक जिस साम्राज्य पर उसका एकाधिकार था आज वह उसे छिनता हुआ नज़र आता है। ये वही हैं जिन्हें कल तक हम यह कहते सुनते थे कि - “मैं घर की इन नेवर एण्डिंग जिम्मेदारियों से तंग आ गई हूँ। बहू आए तो सब उसे संभलाकर मैं निश्चिंत होऊँ।
आप सभी मन ही मन सोच रहे होंगे कि मैडम आप किस ज़माने की बात कर रही हैं ? आज तो हम सासुएँ ही बहुओं से दबी रहती हैं। 
गौर किजिए कि क्या यह एक स्वाभाविक स्थिति है या एक असुरक्षित मन की प्रतिक्रिया, जो कि हम इस डर के फल स्वरूप करते हैं कि कहीं बेटे से हाथ ना धो बैठें।
आखिर क्यों हमारे नेक इरादों व सतत प्रयास के बावज़ूद भी हम एक अच्छी सास नही साबित हो पाती।
बहू के आने के पूर्व हम सभी एक आदर्श रिश्ते की परिकल्पना करते हैं जैसे कि - हम उसे खूब प्यार देंगे, बेटी की तरह रखेंगे आदि-आदि पर वास्तविक जीवन में क्रियान्वित नही कर पाती।
हमारे मन में प्रश्न उठता है कि आखिर हमसे कहाँ चूक हो जाती है ? क्या इसे हम सचमुच एक आदर्श रिश्ते में परिवर्तित नही कर सकते ?
सर्वप्रथम हमें सदियों से चली आ रही अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। हम आने वाली बहू से एक सुपर वूमेन होने की अपेक्षा रखते हैं और जब अपेक्षाओं पर वह खरी नही उतरती तब शुरू होती है ‘इगो टसल्स’ जिसके फलस्वरूप रिश्तों में दरारें आने लगती हैं।
हम बहू को एक इंडिविजुअल एंटिटी के रूप में देखें ना कि खुद की परछाई के रूप में। वह एक भिन्न परिवेश में, डिफ्रेंट वैल्यू सिस्टम में पली बढ़ी है अतः उसे हमारे परिवार के साथ तालमेल बैठाने के लिए कुछ वक्त देना होगा। 
यह तो हुई कुछ मोटी बातें जो सब पर लागू होती है पर यह भी ध्यान रखिए कि -“वन साइज डज़ंट फिट ऑल” क्योंकि हम सभी का व्यक्तित्व भिन्न है और जीवन के प्रति अप्रोच भी अलग-अलग।
हमें यह समझना होगा कि वे अपना सर्वस्व छोड़कर एक नए वातावरण में आती है और वे भी ससुराल से बहुत सारी अपेक्षाएँ रखती हैं। अतः हमें जजमेंटल न होकर खुले मन से उनका स्वागत करना होगा ताकि वे ऐट होम फील कर सकें। आइए इस तथाकथित कटु रिश्ते में हम मिठास भर दें -

“सभी रिश्तों में अनमोल हमारा-तुम्हारा रिश्ता।
 आओ इसे बनाएँ हम, एक आदर्श रिश्ता।”

✍️ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )

शुक्रवार, मार्च 03, 2023

🍁 मोह 🍁










मोह ने बांधी एक डोर 

जिसमें मैं उलझती ही चली गई 

ना जान सकी सच्ची मोहब्बत 

क्या और कैसे होती है


हर वक्त रहा मेरी आंखों पर

उस मोह का पहरा 

ना देख सकी क्या है कोई 

इससे परे भी कोई सच 


हम बहते ही चले गए 

उन भावनाओं में 

जो एक झूठ भर थी 

क्या थी सच्चाई 

ये हम क्यों ना जान सके


मोह की डोरी ने बांधा 

कुछ यूं मेरे मन को 

मैं उस ओर ही 

खिंचती ही चली गई


ठुकरा कर सच्ची मोहब्बत 

ये मैने क्या किया 

अब होता है अफ़सोस 

मगर अब उससे क्या होगा 


मोह पाश ने बांधा ही कुछ यूं 

कि हम चाह कर भी 

सही और गलत की

परख कर न सके 


अब मान कर नियति

इसी मोह को समझ कर प्यार 

जीते हैं और उसी में मरते हैं 

सच ही कहा है लोगों ने 


कि बड़ी ही आसानी से 

बांध लेता है मोह अपने बंधन में 

प्यार क्या है ये जानने में 


बीत जाती हैं कई सदियां

कहां है आसान इतना 

कि हम कुछ पल में ही 

मोह और प्यार में

भेद को जान सके


✍️ पूजा गुप्ता ( सीतापुर, उत्तर प्रदेश )

गुरुवार, मार्च 02, 2023

🍁 बचपन की वह घड़ी 🍁










सोचती हूँ मिल जाये कभी वह जादू की छ्ड़ी,

तो माँग लूँ उससे बचपन की वह घड़ी।

वह निर्मल मन, वह निश्चल पल,

वह विस्तृत नभ, वह नन्हे पर।

उड़ जाऊँ एक बार फिर से खुले आसमान में।


निकल पड़ूँ ढूँढने नयी दिशाएँ।

हो जाये शिथिल जब नन्हे पर मेरे,

सो जाऊँ निश्चिंत हो माँ की गोद में।

और खो जाऊँ मधुर सपनों के देश में।


याद आता है वह बचपन,

जब जीवन सुंदर वसंत था।

हर पल था कोमल सुरभित पुष्प सा।

तब अनजान थी पतझड़ के,

सूखे पल्लवों के धराशायी हो,

पैरों तले रौंदे जाने के मर्म से।


जब अल्ह्ड़ नदी सी बलखाती, इठलाती,

बहा करती थी अपनी मौज में।

तब अनजान थी सागर की गहराइयों से।

सोचती हूँ इस जीवन की कहानी भी अगर

उन परियों की कहानी जैसी होती,

तो मुझे भी मिल जाती वह जादू की छ्ड़ी।

माँग लेती उससे बचपन की वह घड़ी।   

                                                                           ✍️ कविता कोठारी‌ ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )

बुधवार, मार्च 01, 2023

🍁 मोह ना कर 🍁










खाली हाथ आया था और खाली ही जायेगा। 

जितना धन-दौलत कमा धरा ही रह  जायेगा।


सबके कर्मों की गति होती है यहाँ न्यारी-न्यारी।

जिसके होते हैं जैसे कर्म वैसा ही फल पायेगा।


संसार में रहकर यहाँ की खुशी-गम को जी ले।

मौत के बाद सब का अर्थ तुझे समझ आयेगा। 


ये तो परम सत्य है मानव तन का जीवन का।

जिस मिट्टी से तू है बना उसी में फिर समायेगा।


मोह ना कर, ना उलझ रिश्ते और नातों में अब।

इन सबको तू अपने साथ नही ले जा पायेगा।


सबने बहाये आंसू अर्थी को कांधा भी दिया। 

श्मशान से आने के बाद जग तुझे भूल जायेगा।


चाहे लगा ले अमीर-गरीब, जात-पात का बंधन।

जलने के बाद तू किस जात का  कहलायेगा।


नादान इंसान अब तो भज ले भगवत का नाम।

"दीप" बिना उनके तेरा कोई वजूद ना रह जायेगा।


✍️ दीप्ति शर्मा दीप ( जटनी, उड़ीसा )

🍁 दर्द में खुद के सिवा कोई नही 🍁










कितनी पीड़ा होती मन को

जब किसी पर

निर्भर होना पड़ता है

अपनी मर्जी से जिंदगी जीना

घर के सारे काम 

दौड़-दौड़ के करना

एक पैर यहां तो एक वहां

अपने मन मुताबिक

सब कुछ करके

कितना सुकून मिलता


पर क्या करें इन्सान

कुछ हाथ नही उसके

दर्द के ये दिन भी 

जल्दी नही बीतते

बहुत बेचारगी सी लगती

आंखों से आंसू भी आते

जब खुद के 

कामों के लिए भी

निर्भर होना पड़ता किसी पर


दर्द से मन भर जाता 

देखकर बेबसी

जिंदगी भर करते रहे 

जिस घर परिवार के लिए 

कोई नही साथ होता दर्द में

सिर्फ दर्द के सिवा

सारे रिश्ते सिर्फ 

खुशी में ही साथ होते है

दर्द में खुद के सिवा कोई नही


✍️ मधु श्रीवास्तव ( प्रयागराज, उत्तर प्रदेश )

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित ऑनलाइन ‘सावन सृजन महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा सावन आगमन के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन ‘सावन सृजन महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को सावन ...