सुनो....
जब लाओगे दिए
तो ले आना
उम्मीदें और आशाएँ भी साथ
और
उनकी बना पोटली
टांग लेना मन के कोने में।
हाँ...
जब बांधोगे वो पोटली
आशा और उम्मीदों की
तो ले लेना नाम मेरा भी चुपके से
जब कभी खोल वो पोटली बैठोगे दे
तो क्षण भर को ही सही
पर चमक जाएगा नाम मेरा
महसूस कराते मेरी मौजूदगी....।
फिर..
धुल लेना उन दियों को
साथ में धुल डालना
वो कड़वी स्मृतियाँ भी
जो मिली होंगी तुम्हें कभी मु
जाने या अनजाने..
ख़ाली रखना कोना
प्रेम संचय को...।
अच्छा..
बाती तो बनाओगे ही...
बनाना मनोयोग से
मुस्कुराहट रख चेहरे पर
ऐसे, जैसे बुन रहे हो ताना बाना
चलने वाले अनवरत जीवन का
जिसमें कुछ पल ही सही
पर हो वो पल हमारा
पूरी तरह से
जिसमें होंगे हम दोनों
सजाए आँखों में एक ही स्वप्न..।
जलाने को दिया
जब रखोगे बाती दिए में
तो रख देना बात अपने मन की
साथ ही उसके
और
उड़ेल देना अपने सारे जज़्बात
उसमें उड़ेलते हुए घी के साथ
फिर देखना..
उस की लौ
मचलती हुई ना जले तो कहना...।
जब जलाओगे वो दिया
तो जला देना मन के अहंकार,
क्रोध, लोभ, लालसा सब उसके साथ
फिर देखना...
कितना सुंदर है ये जीवन
हमारे सुंदर मन के जैसे...।
पर हाँ...
सुनो
जला कर वो दिया,
रख लेना हथेली पर क्षण भर को
मानो रखा हो तुमने एहसास मेरे म
और देख लेना आँखों में भरे स्ने
उड़ेल देना सारा भाव
सारा स्नेह…
और
रख देना वो दिया
मंदिर के कोने में
जलने देना उसे
जैसे भी वो चाहे जलना
उसकी मर्ज़ी...
उसके मन से...
✍️ भारती राय ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )






