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सोमवार, सितंबर 04, 2023

🏵️ आदर्श शिक्षक 🏵️

डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को हुआ था। इस महान व्यक्तित्व ने अपने जीवन के चालीस वर्ष एक शिक्षक के रूप में भारत के भविष्य को बेहतर बनाने में लगाए। एक बार जब डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने तो कुछ मित्र और पूर्व छात्र उनसे मिलने आये, उन्होंने डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन से उनका जन्मदिन भव्य तरीके से मनाने की अनुमति मांगी। इस पर वह बोले कि मेरे जन्मदिन को अलग तरीके से मनाने की जगह यदि इस दिन को शिक्षकों द्वारा किये गए शिक्षा के क्षेत्र में कार्य, समर्पण और उनकी लगन मेहनत को सम्मानित करते हुए मनाये तो मुझे और अधिक खुशी होगी और गर्व होगा। तब से शिक्षकों को सम्मान देने के लिए 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की प्रथा शुरू हुई। भारत के महान शिक्षाविद डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार "शिक्षा महज किताबी ज्ञान नही है बल्कि शिक्षा मानव निर्माण और जीवन निर्माण के लिए मूल्य और विचारों को आत्मसात करना है।"

डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस पर सभी शिक्षकों को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर एक आदर्श शिक्षक के गुण को आत्मसात करने का प्रयास करना चाहिए। आजाद भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति के रूप में होने के साथ ही वह भारतीय दर्शन शास्त्र के प्रसिद्ध शिक्षक रहे। एक लोकप्रिय राजनीतिज्ञ होने के बावजूद भी उन्होंने हमेशा शिक्षा को महत्व दिया। हमेशा कुछ नया सीखने पढ़ने की उनकी आतुरता ने उन्हें ज्ञानी विद्वान बनाया। जिस तरह से उन्होंने अपने विषय का गहन अध्ययन किया और अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से समूचे विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराने का प्रयास किया। हम सभी शिक्षकों को भी अपने विषय के शिक्षण के साथ नए-नए प्रयोग करने चाहिए और अपने रचनात्मक विचारों को, प्रयोग को लिखकर या किसी भी मीडिया के माध्यम से जनसाधारण तक पहुंचाने का प्रयास अवश्य करना चाहिए।

डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन कहा करते थे की शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ सके। कहते हैं शिक्षा में सबसे ज्यादा ताकत होती है, जिससे पूरी दुनिया को बदला जा सकता है शिक्षा का उजियारा फैलाने वाला होता है शिक्षक।

वर्तमान में शिक्षा के स्वरूप में व्यापक बदलाव आया है साथी शिक्षक की भूमिका में भी परिवर्तन आया है उसकी जिम्मेदारी महज सिलेबस को पूरा कराना और विद्यार्थी को प्रथम श्रेणी में पास करना नही है अपितु उसके सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करना है। दरअसल शिक्षक वह सीढ़ी है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक शिक्षा को ले जाता है।

हालांकि वर्तमान में शिक्षक के समक्ष बहुत सी चुनौतियां हैं परंतु एक कर्मठ शिक्षक जो अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण के इस कार्य में संलग्न है उसकी भूमिका अपने विद्यालय तक ही सीमित ना हो। उसकी महानता इसी में है कि वह अपने कार्य और व्यवहार से एक आदर्श व्यक्तित्व गढ़ समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करता रहे।

 

✍️ शैली भागवत 'आस' ( इंदौर, मध्य प्रदेश )

रविवार, जून 04, 2023

⛲ स्वयं सिद्धा माँ ⛲

माँ होना अपने आप में गौरवपूर्ण है पर साथ ही बहुत ही जिम्मेदारी और चुनौतियों से पूर्ण भी है। पारंपरिक रूप से स्त्री व पुरुष की भूमिका विभाजित थी। वर्तमान में यह विभाजन रेखा विलीन हो गई है। आज की नारी सशक्त, जागृत, शिक्षित एवं स्वयं सिद्धा है। संस्कृति की नींव डालने का दायित्व उसी पर है। गर्भ संस्कार ही बालक के भविष्य का दिशा निर्देशन करता है। समय तेजी से बदल रहा है और साथ ही जीवन शैली। प्रौद्योगिक संतृप्त वातावरण, आधुनिकरण और वैश्वीकरण में बच्चे को बड़ा करना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। एकल परिवार में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। ऐसे समय एक माँ की जिम्मेदारी दोगुनी हो गई है। परंतु माँ के संकल्प के आगे हर चुनौती छोटी पड़ जाती है। 21वीं सदी में कामकाजी माँ के लिए मातृत्व और कैरियर के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। इनमें समय का अभाव सबसे बड़ी चुनौती है। बच्चों को समय ना दे पाने के कारण वे मानसिक संत्रास से गुजरती हैं। आत्मनिर्भरता का रास्ता भी अपने परिवार को सुदृढ़ बनाने के लिए चुनती हैं परंतु दुर्भाग्यवश अनवरत कार्य करके भी उन्हें निष्ठुरता का सामना करना पड़ता है। उन्हें कैरियर उन्मुख, गैर जिम्मेदार तथा बच्चों के व्यवहार संबंधी समस्याओं के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जाता है जबकि देखा गया है कि कामकाजी महिला के बच्चे आत्मनिर्भर एवं आत्मविश्वास से पूर्ण होते हैं। नमन है उन माताओं को जो अद्भुत कौशल के साथ दोनों भूमिकाएँ निभा रही हैं और ‘स्वयं सिद्धा माँ’ को शब्दशः‌ चरितार्थ कर रही हैं। 

✍️ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )

मंगलवार, मई 16, 2023

💞 …...आखिर पुरुष भी इंसान हैं 💞

स्त्री पुरुष दोनों ही ईश्वर की रचना है और मनुष्य होने के कारण दोनो स्वाभाविक रूप से गलतियां भी करते हैं। आज कल माता-पिता भी लड़किया ही चाहते हैं, लड़कों की जिम्मेदारी नही उठाना चाहते। उन्हें लगता है कि लड़को को संभालना बहुत मुश्किल होता है। कईयों का मानना है कि पुरुष अच्छे नही होते पर क्या समस्त पुरुष जाति ही खराब हैं ? क्या एक भी पुरुष अच्छा नही है ? तो क्या सभी स्त्रियां अच्छी होती हैं ? क्या स्त्रियों से कभी गलतियां नही होती ? सच तो यह है कि हम सब गलती के पुतले हैं। गलती किसी से भी हो सकती है। यदि किसी स्त्री या पुरुष से भूलवश कोई गलती हो जाती है तो वह उस एक स्त्री या पुरुष की गलती माननी चाहिए ना कि उस सम्पूर्ण जाति की जिससे वह स्त्री या पुरुष सम्बन्ध रखता हैं। स्त्रियों और पुरुषों के गलतियों के प्रकार अलग-अलग हो सकते है पर क्या हमेशा पुरुष गलत होते है ? और स्त्रियां हमेशा सही होती हैं ? कई बार घर टूटने का कारण स्त्रियां ही होती है। स्त्रियां आपस में सामंजस्य नही बैठा पाती हैं खुद के आगे दूसरी स्त्री को कुछ नही समझती हैं, और आपस में ही लड़ जाती हैं। और भी बहुत सी खामियां स्त्रियों में भी होती हैं। फिर भी स्त्रियों को देवी स्वरूप माना जाता है और पुरुषो को अक्सर गलत ही समझा जाता है। स्त्रियों पर जैसा विश्वास किया जाता है वैसा विश्वास पुरुष जाति पर नही किया जाता। कारण बहुत से है जैसे बलात्कार, धोखा देना, प्रेम का झांसा देकर शारीरिक शोषण करना और भी बहुत से कारण हो सकते हैं। किंतु हर पुरुष को गलत समझना भी गलत है। आखिर जो पुरुष चाहे युवक हो, चाहे बेटा, पति, पिता, भाई, दोस्त कोई भी हो यदि वे अच्छे हैं तो वे अंदर से टूटते हैं। भले ही सही होने का कोई भी प्रमाण उनके पास नही होगा। स्त्रियां रो कर दिल का हाल कह देती हैं, खुद के लिए लड़ लेती हैं लेकिन पुरुष हर समय चुप्पी साधे हुए रहते है, क्या पुरुषो को खुद को साबित करना पसंद नही, क्या वे लड़ नही सकते, लेकिन वे कई बार मौन ही रहते है, उन्हे भी बहुत बार चिल्लाकर रोने लड़ने अपनी बात रखने की इच्छा भी होती होगी लेकिन वे क्यों मौन को चुनते है चाहे कितना भी दुख का सामना करे। पुरुष की प्रकृति ही कुछ ऐसी ही है वे आंसुओं के सागर को दोनो आखों में समेट लेता है। फिर भी कई पुरुष पर्वत की तरह शांत होते है, शायद उन्हें पता होता है कुछ पुरुषों की गलतियों को उन्हे पीढ़ी दर पीढ़ी ढोना है। क्या उन्हे अपनी अच्छाई बयान करने का हक नही। खुद को अच्छा साबित करने का भी अधिकार नही और अपने अधिकार हेतु लड़ने का अधिकार नही है। शायद इसलिए या तो पुरुष मौन होते है या फिर हमेशा गुस्से में होते हैं। वे अपनी बौखलाहट को हृदय से कैसे निकाले। उनके हृदय में जो अपमान, पीड़ा, दुख, निराशा, असफलता का बोझ, नकारात्मकता और जो भी वे झेलते है क्या उनका हृदय उन्हे नही कचोटता क्या उनके अंतर्मन उनसे सवाल भी नहीं करते होंगे। उनके हृदय में ढेरो द्वंद का हश्र क्या होता होगा क्या होता होगा उसका परिणाम। कभी भी चाहे कोई स्त्री हो या पुरुष सभी खराब नही होते इनके अपवाद भी होते है। भले ही परखना हमे ही पड़ता है कि कौन खराब है या कौन अच्छा। कोई भी स्त्री या पुरुष खराब हो सकता हैं लेकिन सिक्के के दो पहलू भी होते हैं। कभी कोई पिता, भाई, पति,‌ दादा, नाना, चाचा, मामा और मुंहबोले भाई, दोस्त या कोई पुरुष परिचित भी बहुत सभ्य, सुसंस्कृत, बहुत प्रेम लुटाने वाले और स्त्रियों का सम्मान करने वाले होते हैं और साथ ही वे स्त्रियों, बच्चो और परिवार के पोषक, संभालने वाले और सुरक्षा करने वाले भी होते हैं। भले ही कभी-कभी अपवाद के रूप में कोई मौका परस्त हो सकते हैं। कभी एक भाई भी पिता की जगह ले लेता है तो दोस्त भी सच्चा सलाहकार और हितेषी होता है, कभी कोई अपरिचित पुरुष भी निस्वार्थ आपकी मदद कर देता है। कभी-कभी स्त्रियों से अधिक हमे पुरुषो से सहायता मिल जाती हैं, कभी-कभी स्त्री ही स्त्री को समझ नही पाती लेकिन पुरुष समझ जाते है। भले ही एक मछली पूरे तलाब को गंदा कर देती हैं लेकिन ये कथन पूरी पुरुष जाति पर चरितार्थ नही होता। मैंने भी अपने जीवन में देखा है की पुरुष में स्त्रियों से अधिक सुरक्षा, सम्मान, देखभाल, त्याग और सहनशीलता उनमें भी कूट कूट कर भरा होता है। कोई बिगड़ैल व्यक्ति में भी ये सभी गुण विद्यमान होते है, जो परिस्थितिवश बिगड़ जाते और भटक जाते है सही साथ, सलाह, प्रेम, समझाने, प्रोत्साहन की उन्हे आवश्यकता होती है। फिर बिगड़ैल पुरुष भी बहुत सभ्य और सुसंस्कृत बन जाते है। अच्छा साथ भी कई बार उनके व्यक्तित्व को निखार देता है। पुरुषो के शरीर में भी एक सुंदर, प्रेमी हृदय होता है बस एक बार विश्वास करने की जरूरत है। पुरुष भी सम्मान के हकदार होते है, पुरुष जो ईश्वरीय तत्वों से युक्त होता है उनमें भी अच्छा व्यक्तित्व होता है। आखिर पुरुष भी इंसान होता है। आज भी कई पुरुष है जो अच्छाई के उदाहरण है। इतिहास में भी पुरूषों की महानता के कई उदाहरण समाहित है।


( मेरी रचना का उद्देश्य पुरुष की अच्छाइयों की ओर ध्यान केंद्रित करना मात्र है, हालाकि यह तुलनात्मक है लेकिन किसी भी जाति विशेष को आहत करने हेतु नही है सिर्फ उद्देश्य की मांग है )


✍️ प्रेममनी बासिल पीटर ( कोरबा, छत्तीसगढ़ )

💞 परिवार जीवन की अमूल्य निधि 💞

परिवार जीवन की वह प्रथम इकाई है जहाँ शिशु मां के गर्भ में नौ महीने अपना अस्तित्व पाकर माँ की गोद से परिवार का हिस्सा बनता है। या यूं कहें कि माँ की कोख से गोद में आकर सर्वप्रथम वह परिवार का ही सानिध्य पाता है। पिता, भाई, बहन, दादा, दादी या अन्य जो भी परिवार के सदस्य हैं के रूप में। परिवार चाहे छोटे हो या बड़े, शहरों में हों या गांव में, जीवन को जीने के साथ-साथ जीवन में प्रेम, त्याग, सौहार्दय, सहयोग, जिम्मेदारी, अनुशासन, मान-सम्मान और आगे बढ़ना सिखाते हैं। रही बात पारिवारिक जीवन की सुखमयता, परिवार के प्रत्येक सदस्य का परिवार के प्रति समर्पण होना अति आवश्यक है। एक दूसरे की भावनाओ को समझना और नातेनुसार उनका सम्मान परिवार को मजबूती प्रदान करता है। सुखी परिवार का यह प्रथम मंत्र भी है। परिवार में जितने भी सदस्य चाहे वे कमाऊ हैं या कामकाजी न हों, सबका समान आदर सम्मान हो, क्योंकि जो काम सुई का होता है वह काम तलवार नही कर सकती। अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति का काम महत्वपूर्ण होता है। ऐसा करने से परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे का आदर सत्कार करते है और एक दूसरे से प्रेम भाव रखते हैं। साथ ही बच्चो में भी अच्छे संस्कारों का जन्म होता है जिसे वे अपने जीवन में अनुकरण कर आने वाली पीढ़ी को भी सुखी और संस्कारवान बनाने की भूमिका में अग्रसर रहते हैं। आज व्यस्तता के जीवन मे परिवार छोटे होते जा रहे हैं। अधिकांश परिवारों में सभी कामकाजी है। ऐसा समय की मांग भी है। ऐसे में चाहिए कि पति-पत्नी एक दूसरे का सहयोग करें। चाहे बच्चों की देख भाल हो या घरेलू काम हो। छोटी-छोटी खुशियों को परिवार में बांटकर हर दिन को सुखमय बनाया जा सकता है। हर तीज त्योहार को अपनी सामर्थ्यानुसार धूमधाम से मनाने से पारिवारिक प्रेम बढ़ता है। बच्चों सहित एक दूसरे को समय देना, एक दूसरे की बातों को सुनना और अच्छे कार्य के लिए प्रोत्साहन करना, छोटी-छोटी खुशियों में खुश होना। किसी भी परिवार की नींव को मजबूत तो करता है साथ ही आनंद की पराकाष्ठा तक पहुंचाता है। घर एक मंदिर की तरह होना चाहिए। जहाँ की हर चीज पूजनीय हो। जीवन का आनंद तभी है जब हम सबकी खुशियों को लेकर आगे बढ़ते और बढ़ाते हैं। किसी की कमियों पर उसे नीचा नही दिखाते है। छोटी-छोटी गलतियों को नजर अंदाज करना, तभी पारिवारिक जीवन सुखमय बनता है। तानाशाही तो परिवार के साये पर भी नही होनी चाहिए। एक ही सदस्य का हुक्मनामा परिवार की नींव कमजोर करता है। जिससे परिवार बिखर भी सकता है और एक दूसरे का भरोसा टूटने लगता है। परिवार भी जीवन की अमूल्य निधि है हर कोशिश करनी चाहिए कि हमारा परिवार सुखमय हो, आनंद की सम्पूर्ण पराकाष्ठा हो।

           

             परिवार हमारी निधि है,

             जीवन जीने की विधि है।

             सुखमय हो जब परिवार,

             मिलते तब रिद्धि सिद्धि है।


✍️ सन्नू नेगी ( चमोली, उत्तराखंड )

शुक्रवार, मई 05, 2023

🦚 माहवारी जागरूकता की पहल 🦚

माहवारी, मासिक धर्म या पीरियड लड़कियों के शरीर में घटने वाली एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसके विषय में अज्ञानता पसरी है या कहे की जानबूझकर भी खुलकर बाते करने में सभी झिझक महसूस करते है, लेकिन माहवारी कोई छिपाने और झिझक का विषय नही बल्कि जागरूकता व कुछ मायने में सतर्कता का विषय है, जिसमें नवयुवती पहली बार किसी नई बात जो सब लड़कियों पर गुजरती है, उस पर भी गुजरने वाली अनोखी घटना है, वास्तव में एक बेटी के संबंध में यह परिवार के लिए खुशी की बात होनी चाहिए।

        लेकिन अब माता-पिता बेटी हेतु डरते और ज्यादा सतर्क रहते हैं क्योंकि असमाजिक तत्वों के चपेट में आने पर बेटी के गर्भधारण की चिंता भी है, ऐसे में अब एक बेटी पर अनावश्यक दबाव आ जाता है और प्रतिबंधों का तांता सा लग जाता है, और बेटी ने अब इस दुनिया में कुछ असहयोग, डर, संकोच, झिझक और बहुत कुछ अलग सा चारो और देखना शुरू किया है।

     यह कोई बीमारी तो नहीं बल्कि शारीरिक, प्राकृतिक, क्रिया है, हर माता-पिता अपने बच्चे को बड़ा होता देखना चाहते है, उनके लिए यह खुशी की बात है की बेटी ने एक दौर पार कर लिया है, फिर इसके विषय में हमारी सोच इतनी संकीर्ण और नीरस क्यों है ? क्यों एक बेटी अलग सा महसूस करे और अपनी अवस्था के बारे खुलकर बाते न करे यह प्रश्नचिन्ह है।

      अतः हर बेटी और महिला इस बात को छिपाने को मजबूर है इन्हे कौन मजबूर बनाता है, कोई नही सिर्फ हमारी सोच और कुछ नही। हमारे देश में इस विषय पर पर्याप्त गोपनीयता बरती जाती है, पहले भी आज से अधिक गोपनीयता थी और आज भी इस विषय पर बात करना अभद्र ही माना जाता है कारण अज्ञानता है और जागरूकता की कमी।

माहवारी के विषय मे बहुत से मिथक और भ्रांतियां -

भ्रांतियां -

* लड़किया और महिलाओं का धार्मिक कार्यों करने पर प्रतिबंध होता है।

* इस समय लड़कियों व महिलाओं को अशुद्ध माना माना जाता है।

* पूजा स्थलो, रसोई घरों में जाना निषेध होता है।

* 7 दिनों के बाद ही उन्हें प्रवेश दिया जाता है।

* पूजा करना, पूजा स्थल, पूजा के समान, धर्मग्रंथों चूल्हे छूना यहां तक की खाना बनाना भी अशुभ माना जाता है और वर्जित भी है।


मिथक -

* खाने की कुछ चीजों के सेवन पर प्रतिबंध जैसे दही, अचार, मांसाहार भोजन, खट्टी चीजें

* कुछ खाद्य पदार्थों को बनाने में भी प्रतिबंध होता है जैसे

 अचार, बड़ी, अनरसा आदि

* सूती कपड़े का प्रयोग सही माना जाता है।

* माहवारी के कपड़े को मवेशियों द्वारा खाने से    लड़किया और महिलाएं गर्भ धारण नही कर सकती और श्रापित हो जाती है।

* कपड़े को उपयोग के बाद गाड़ा जाना चाहिए।

* माहवारी के कपड़े को सूखते कोई देखे और खुले में सूखाने को अभद्र और असभ्य माना जाता है।

* माहवारी के कपड़े को जादू टोने के लिए उपयोग      किया जाता है।

* बड़ो का मानना है कि इस अवस्था में शैतानी ताकतें जल्दी लड़कियों व महिलाओं पर हावी होती है।

* साथ ही माहवारी के कपड़े जलाने से महिलाए गर्भ धारण नही कर सकती।


   ये सब मिथक और भ्रांतियों का हमने भी स्वयं सामना किया है और माहवारी की इसमें उल्लेखित सभी मजबूरियों से खुद भी हम गुजर चुके है और आज भी लोग इन बातो का सामना करते है। हद तो तब हो जाती है जब आज भी ये भ्रांतियां ओर मिथक प्रचलित है हालांकि शिक्षित परिवारो में इस तरह के मिथक की जगह ग्रामीण इलाको से कुछ कम ही होती है।

          लेकिन आज के युग में एक लड़की को इसकी पूरी जानकारी होना बहुत जरूरी है जबकि आजकल बलात्कार कुछ अधिक होते है

और छोटे बच्चे जो माहवारी के शुरुवाती दौर में होते हैं उन्हें असामाजिक तत्वों के गतिविधियों का उनकी बुरी चाल का बेड टच और गुड टच का ज्ञान नही होता न ही उसके दुष्परिणामों का ज्ञान होता है।

            माहवारी के शुरुवाती दौर मे खुद को संभालना और माहवारी के चुनौतियों का सामना करना व हरेक अटकलों से निपटने में एक नवयुवती को सक्षम होना चाहिए। ऐसे समय में डरने और झिझकने के बजाए किसी स्त्री से और विपरीत परिस्थितियों में किसी विश्वासपात्र पुरुष से भी सहयोग लेना स्वीकार करना चाहिए बिल्कुल किसी टीवी के एड की तरह, ताकि माहवारी के समय विपरीत परिस्थितियों का कैसे सामना करना चाहिए जब बड़े उनके साथ या आस पास न हो।

               इस लेख का उद्देश्य माहवारी के विषय में प्रचलित मिथक और भ्रांतियों को झुठलाना है और महिलाओं पर पड़ने वाले प्रभाव साथ ही माहवारी के विषय में जागरूकता की ओर एक कदम है। ये मिथक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी गलत है। ताकि इस विषय को अन्य स्वाभाविक क्रियाओ की तरह ही स्वाभाविक माना जाए जैसे की पाचन क्रिया, श्वसन क्रिया वैसी ही माहवारी प्रजनन क्रिया है।

                 पूर्व में माहवारी हेतु सूती कपड़े का उपयोग किया जाता था। अब इस हेतु सेनेटरी का उपयोग किया जाता है सैनेटरी को पैड भी कहा जाता है। आज सभी क्षेत्रों में पूर्ण जागरूकता है फिर भी आज भी दुकानों में सेनेटरी खरीदते समय और दुकानदारों द्वारा सेनेटरी देते समय झिझक और गोपनीयता देखने को मिलती है इसे हम अन्य सामान की तरह सामान्य क्यों नही मान सकते ?

                 

* माहवारी, मासिक चक्र पीरियड का शूरु होना -

   मासिक धर्म की क्रिया वह है जब कोई लड़की किशोरावस्था में प्रवेश करती है लगभग 11 से 14 वर्ष की लड़कियो में उनके अंडाशय इस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रॉन नामक हार्मोंस उत्पन्न करने लगते जैसी हार्मोंस की वजह से हर महीने के कुछ कालखंड में गर्भाशय की परत मोटी होने लगती है कुछ अन्य हार्मोंस अंडाशय को एक अनिषेचित डिंब उत्पन्न करने और उत्सर्जित करने का संकेत देता हैं। महीने के इस कालखंड में जब कोई लड़की या महिला यौन संबंध नही बनाती हैं तब गर्भाशय की वह परत मोटी होकर जो गर्भावस्था के लिए तैयार हो रही थी टूट कर रक्त स्राव के रूप में रक्त और टिश्यू के साथ गर्भाशय से होकर योनि से उत्सर्जित होती है माहवारी सामान्यतः 5 से 7 दिनों तक चलती है। इस प्रक्रिया के शुरुवात में और प्रक्रिया के दौरान लड़कियो व महिलाओं को शारीरिक हार्मोनल बदलाव से गुजरना पड़ता है,


* आम तौर पर होने वाली परेशानियां निम्न है-

      

* कमर, पैर में दर्द

       * पेट में ऐंठन 

       * उल्टी, चक्कर आना

       * कमजोरी चिड़चिड़ापन

       * सिरदर्द

       * गैस, पेट साफ न होना

       * कुछ लड़कियो व महिलाओं को रक्तस्राव            ज्यादा कुछ को कम होता है

वस्तुतः मासिक चक्र 28 दिनों का होता है लेकिन यह 21 से 35 दिनों के बीच कभी भी हो सकता है।

माहवारी हर महीने पिछली तारीख को ही आती हैं, भिन्न कारणों से तारीख में बदलाव की संभावना होती है।

* मासिक चक्र 16 साल तक न आने पर डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए।

* कहीं शरीर के अंदरूनी स्थानों में खून का जमाव तो नही हो रहा या जनन अंगो में या हार्मोन ग्रंथि में कोई समस्या तो नही है।


* माहवारी के लाभ -

* माहवारी से उत्पन हार्मोंस शरीर को स्वस्थ रखते हैं।

* हर महीने ये हार्मोनस शरीर को गर्भधारण हेतु तैयार करते है।

* शुरुवाती दिनों में एस्ट्रोजन नमक हार्मोन बढ़ना शुरू होता है जो हड्डियों को मजबूत बनाने में सहायक होता है।

* इस हार्मोंस के कारण गर्भाशय की अंदरूनी दीवार पर रक्त और टिश्यू की परत बनती है।

* कारण वहा भूर्ण पोषित हो कर तेजी से विकास कर सके।

*ये परत रक्त व टिश्यू से बनती है।

* यही रक्त और टिश्यू खराब रक्त के रूप में शरीर से उत्सर्जित होते है।

माहवारी या मासिक धर्म की जानकारी देना -

बेवजह लड़कियो और महिलाओं को डराया जाता है। जिससे वे असहज महसूस करती है। जबकि इस समय लड़कियों और महिलाओं को पर्याप्त सहायता की और जागरूकता की आवश्यकता होती हैं।

   इस समय लड़कियों और औरतों को बहुत शारीरिक और मानसिक समस्या होती है। रक्तस्राव होता है जिसका सामना करने हेतु वे मानसिक रूप से तैयार भी नही होती है।

   इस समय उन्हे पोष्टिक आहार, शांति, प्रेम, सहयोग की भी आवश्यकता होती हैं, बजाए इसके की उन्हे सहयोग करे भिन्न-भिन्न भ्रांतियों, मिथकों और मान्यताओं से जोड़ते और उन्हे तरह-तरह से परेशान करते और अनावश्यक प्रतिबंधित करते है। जो कि वैज्ञानिक दृष्टि के अंतर्गत नहीं है।

    कई बार ऐसे में संकोचवश लड़किया घर से बाहर नही जाती, स्कूल नही जाती है जिससे पाठयक्रम पूरा करने में शिक्षको और विद्यार्थियो को परेशानी होती है, ग्रामीण इलाको में आज भी बच्चे बाहर पढ़ने जाते है, ऐसे में माहवारी के विषय में जागरूक न होने के कारण नित्यकार्य और बाहरी गतिविधियों में बाधा डाली जाती है। आज भी लोग सेनेटरी के बदले कपड़े के प्रयोग पर बल देते है।


आवश्यक कदम -


* बेवजह के मिथकों को त्यागकर माहवारी के विषय में जागरूक होने की आवश्यकता है।

* स्कूलों में बच्चे इस विषय में पर्याप्त जानकारी देना व शिक्षित करना चाहिए।

* स्कूलों मन विषय में शिक्षा पाते वक्त संकोच करते है अतः जागरूक नही हो पाते है।

          अब माहवारी की जागरूकता के पक्ष में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण सभी भ्रांतियों और मिथकों को रद्द करती हैं। जागरूकता के प्रयास में विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया जाता है ताकि सभी जागरूक हो सके।


विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस -


* माहवारी एक प्राकृतिक प्रजनन क्रिया है जिससे हर महिला को गुजरना होता है।

* माहवारी का चक्र सामान्यतः 28 दिनों का होता है जो 5 से 7 दिनों तक चलता है

* इसी कारण पांचवे महीने के 28 तारीख को अर्थात 28 मई को वर्ल्ड मेंसटुवल हाइजीन डे अर्थात विश्व स्वच्छता दिवस मनाया जाता है।

* जो की 2014 से शुरु किया गया।


* माहवारी के ओर जागरूक कदम -


प्रथम बार लड़की के किशोरावस्था का शुभ आगमन ही माहवारी है।

* ऐसे में हमें उन्हे प्रेम से सतर्क और जागरूक करे।

* बेटियो को इस बारे कुछ पहले ही जानकारी दे दे। ताकि बेटियां इस अवस्था को निपटने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाए और इस अवस्था को निपटने को तैयार रहे।

* बेटियां इस संबंध में कोई भी जानकारी भविष्य में अपनी बड़ो को जरूर अवगत कर सके।

* उन्हे यौन संबंध के विपरीत परिणाम के बारे जैसे गर्भ ठहरने के बारे खुलकर बाते करे।

* ताकि शादी के पहले कम उम्र में किसी झांसे में न फंसे।

* यह अवस्था कोई पाप या बीमारी नही कोई अशुद्धता नही कोई अपवित्रता नही की हेय की दृष्टि से देखा जाए

* असामाजिक तत्वों के झांसे से बचने के बारे बताए।


सेनेटरी और कपड़े के प्रयोग में अंतर और सेनेटरी का प्रयोग -

* सेनेटरी का प्रयोग करना सिखाए।

* अन्यथा त्वचा में जलन और इन्फेक्शन की संभावना रहती हैं।

*  कपड़े का प्रयोग चिकित्सीय दृष्टि से सही नही है।

*  फिर भी विपरीत परिस्थितियों में उपयोग किए जाने पर स्वच्छ, सूती,कपड़े का उपयोग करना चाहिए।

*  पुनः उपयोग की दशा में अच्छे से धोकर, अच्छी तरह धूप में सुखाकर फिर उपयोग करे।

* कपड़े के प्रयोग से जीवाणुओ की संभावनाएं बढ़ती है साथ ही वे आसनी से गर्भाशय में प्रवेश कर जाती है।

 

माहवारी में शरीर की स्वच्छता का ध्यान -

 

* खुद को एक्टिव रखे खेल खेले रस्सी कूदे।

*  योगा करे

* दर्द आदि होने पर डॉक्टरी सलाह पर ही दवाइयों का सेवन करे।

* सेनेटरी या पैड पर्याप्त शुष्कता देती है।

* इंफेक्शन और रेसेस की समस्या भी कम होती है।

* दैनिक गतिविधियों में कोई रुकावट नही आती।

*  इसका उपयोग आसान है और नष्ट करना भी।

* 3 से 4 घंटे के अंतराल में सेनेटरी बदलना चाहिए।

* प्रतिदिन नहाना चाहिए।

* शौचालय उपयोग के बाद साफ करना चाहिए।

* योनि के भीतर अन्य उत्पाद का प्रयोग खतरनाक है

* स्वच्छ वस्त्र पहने ।

* पोष्टिक आहार लें।

* नियमित गतिविधियां करे।

* पानी 7 से 8 ग्लास पिए।

* सेनेटरी उपयोग के बाद संभाल कर फेंके या नष्ट करे।

आप को डरने, घबराने, शर्माने, साथ ही गुप्त रखने की जरूरत नही अपने बड़ो को अवगत कराएं स्कूल में हो तो शिक्षक या महिला स्टाफ को अवगत कराएं। और उनकी मदद लेने में नही झिझके साथ ही उनकी सलाह माने।

जो आपको रोक-टोक करे उन्हे प्रेम से जागरूक करें 

ताकि अज्ञानता वश किसी को अनावश्यक परेशानी न हो।

मासिक धर्म शुरू होने के बाद व पहले एक या दो साल तक मासिक चक्र में कुछ अंतर हो भी जाते है अपने बड़ो से आप जानकारी लेने में न झिझके


नोट - मेरी यह रचना किताबी जानकारी व बतौर प्रैक्टिस नर्स एवम् गहन अध्ययन का परिणाम है, जिसका उद्देश्य महिलाओं और लड़कियों को माहवारी के संबंध में‌ जागरूक करना है। इसके प्रत्येक शब्द की मौलिक सार्थकता है। इसका उद्देश्य सटीक हैं। किसी जाति, धर्म, समुदाय, देश या किसी अन्य को आघात पहुंचाना नही है। यह मिथक भ्रांतियों का वैज्ञानिक दृष्टि से सामान्य रूप से अवलोकन है व माहवारी की चुनौतियों से निपटने का उपाय और इस विषय में जागरूकता मात्र है। मैं त्रुटियों हेतु क्षमा प्रार्थी हूँ। आशा है सभी उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करें।

( धन्यवाद )


✍️ प्रेममनी बासिल पीटर ( कोरबा, छत्तीसगढ़ )

शनिवार, मार्च 04, 2023

👸 सास-बहू का अनूठा रिश्ता 👸

सासू माँ अर्थात सास जो माँ जैसी हो। क्या हम सासुएँ इसे शब्दशः चरितार्थ करने में सफल हो पाती हैं ?
हम सभी चिरकाल से यह देखते आए हैं कि मानवीय रिश्तों में सास-बहू का रिश्ता सबसे कलुषित, कुपित व तिख्त रिश्ता माना जाता रहा है और यह मानसिकता हमारे समाज में कहीं डीप रूटेड है। सास युवतियों के मानस पटल पर एक खलनायिका की तरह अंकित हो जाती हैं और वे इस पूर्वधारणा के साथ ससुराल में कदम रखती हैं कि सास को प्लीज़ करना सिर्फ मुश्किल ही नही वरन असंभव है वगैरह वगैरह..... 
वहीं दूसरी तरफ सास आने वाली बहू को एक प्रतिद्वंदी के रूप में देखती हैं। आज तक जिस साम्राज्य पर उसका एकाधिकार था आज वह उसे छिनता हुआ नज़र आता है। ये वही हैं जिन्हें कल तक हम यह कहते सुनते थे कि - “मैं घर की इन नेवर एण्डिंग जिम्मेदारियों से तंग आ गई हूँ। बहू आए तो सब उसे संभलाकर मैं निश्चिंत होऊँ।
आप सभी मन ही मन सोच रहे होंगे कि मैडम आप किस ज़माने की बात कर रही हैं ? आज तो हम सासुएँ ही बहुओं से दबी रहती हैं। 
गौर किजिए कि क्या यह एक स्वाभाविक स्थिति है या एक असुरक्षित मन की प्रतिक्रिया, जो कि हम इस डर के फल स्वरूप करते हैं कि कहीं बेटे से हाथ ना धो बैठें।
आखिर क्यों हमारे नेक इरादों व सतत प्रयास के बावज़ूद भी हम एक अच्छी सास नही साबित हो पाती।
बहू के आने के पूर्व हम सभी एक आदर्श रिश्ते की परिकल्पना करते हैं जैसे कि - हम उसे खूब प्यार देंगे, बेटी की तरह रखेंगे आदि-आदि पर वास्तविक जीवन में क्रियान्वित नही कर पाती।
हमारे मन में प्रश्न उठता है कि आखिर हमसे कहाँ चूक हो जाती है ? क्या इसे हम सचमुच एक आदर्श रिश्ते में परिवर्तित नही कर सकते ?
सर्वप्रथम हमें सदियों से चली आ रही अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। हम आने वाली बहू से एक सुपर वूमेन होने की अपेक्षा रखते हैं और जब अपेक्षाओं पर वह खरी नही उतरती तब शुरू होती है ‘इगो टसल्स’ जिसके फलस्वरूप रिश्तों में दरारें आने लगती हैं।
हम बहू को एक इंडिविजुअल एंटिटी के रूप में देखें ना कि खुद की परछाई के रूप में। वह एक भिन्न परिवेश में, डिफ्रेंट वैल्यू सिस्टम में पली बढ़ी है अतः उसे हमारे परिवार के साथ तालमेल बैठाने के लिए कुछ वक्त देना होगा। 
यह तो हुई कुछ मोटी बातें जो सब पर लागू होती है पर यह भी ध्यान रखिए कि -“वन साइज डज़ंट फिट ऑल” क्योंकि हम सभी का व्यक्तित्व भिन्न है और जीवन के प्रति अप्रोच भी अलग-अलग।
हमें यह समझना होगा कि वे अपना सर्वस्व छोड़कर एक नए वातावरण में आती है और वे भी ससुराल से बहुत सारी अपेक्षाएँ रखती हैं। अतः हमें जजमेंटल न होकर खुले मन से उनका स्वागत करना होगा ताकि वे ऐट होम फील कर सकें। आइए इस तथाकथित कटु रिश्ते में हम मिठास भर दें -

“सभी रिश्तों में अनमोल हमारा-तुम्हारा रिश्ता।
 आओ इसे बनाएँ हम, एक आदर्श रिश्ता।”

✍️ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )

शनिवार, जनवरी 21, 2023

🎻 दोस्ती बहुत खास होती है 🎻

दोस्ती क्या है ? दोस्ती जिन्दगी है। बिना किसी दोस्त, मित्र या सहेली के हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। एक विशेष व्यक्ति जिसकी बातें, जिसके विचार हमें पसंद आतें हैं या फिर जिनके विचार हमसे मिलतें हैं हम उन्हें ही चुनते हैं अपने दोस्त, मित्र या सहेली के रूप में।दोस्ती में लड़का-लड़की नही होते। दोस्ती में सिर्फ दोस्त होते हैं। दोस्ती किसी भी उम्र में किसी के भी साथ हो सकती है । यह आप पर निर्भर करता है कि आप किसे अपना सच्चा दोस्त बनाते हैं। एक सच्चा दोस्त वो होता है, जो आपके हर ग़म और खुशी के मौके पर आपका साथ दे।एक बार जो दोस्ती कर ली तो उम्र भर निभाते हैं। दोस्ती वो रिश्ता है। जिसे हम खुद चुनते हैं भगवान नही। कहते हैं कि भगवान जिसे खून के रिश्तों में बाँधना भूल जाते हैं वो दोस्ती के रिश्तों में बंध जाते हैं‌। दोस्त आपकी होंठों की हंसी में ग़म ढूंढ लेते हैं पागल दोस्त कुछ ऐसे ही होते हैं। कुछ दोस्त बहुत खास जगह बनाते हैं हमारे दिल में। ऐसे दोस्त होते ही बहुत खास हैं। जिससे हम अपना हर दुःख सुख साझा करते हैं और वह हमें हर सही ग़लत को बताते हैं। ऐसे दोस्तों से हमारा सिर्फ दिल का ही नही रूह या आत्मा का रिश्ता होता है। जिसे हम कभी भी खोना नहीं चाहते। दोस्ती में कोई भी बड़ा छोटा नहीं होता। सब बराबर होते हैं। जैसे कि कृष्ण और सुदामा की दोस्ती एक मिसाल है सच्ची और अच्छी दोस्ती की। दोस्त से बात करने से पहले कभी भी सोचना नहीं पड़ता और जिससे कुछ भी बात करने से पहले हमें सोचना पड़े वो दोस्त ही नही होता। आप अपनी दोस्ती बनाए रखने के लिए कभी भी अपने दोस्त से किसी गलती पर माफ़ी मांग सकते हैं और वो अगर आपका सच्चा और अच्छा दोस्त होगा तो जरूर आपको माफ़ कर देगा। तो आप सब हमेशा अपने दोस्तों के संपर्क में रहें और इस सच्ची और अच्छी दोस्ती का आनंद उठाइए।

परवाह के महीन‌ धागों से बनते है रिश्तेेेे
दुनिया की भीड़ में से एक को हम है चुनते

वो सारी दुनिया से अलग और जुदा होता है
सच्ची दोस्ती में दोस्त ही हमारा खुदा होता है

चाहे सारी दुनिया हमें कभी भी ना समझ पाए
दोस्त हमेशा बिना बोले मन का हाल जान जाए

✍️ मोना चंद्राकर मोनालिसा ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

बुधवार, नवंबर 16, 2022

⏲️ वक्त की पहचान ⏲️

"मैं समय हूँ "यह पंक्ति आप सब ने महाभारत धारावाहिक में सुनी होगी। वक्त का हम सब के जीवन में बहुत महत्त्व है। कभी अच्छा तो कभी बुरा वक्त भी आता है, पर हमेशा एक सा नही रहता। बस हमें उस की कद्र करनी चाहिए। हम हमेशा सुनते आए हैं कि वक्त कभी किसी के लिए नही रुकता इसलिए उसका सही उपयोग कर लो वरना उसके गुजरने के बाद आप बस अफ़सोस ही करते रह जाओगे। इस इक्कीसवीं सदी में लोगों को लगने लगा था कि वह वक्त को काबू में कर सकतें हैं, उसे अपने अनुरूप चला सकते हैं। हम सब अपने आने वाले वक्त को अच्छा बनाने के लिए, जिसका यह भी नही पता कि हम उसको देख भी पाएँगे कि नही अपना आज का वक्त खो रहे हैं। और इस का अहसास हमें अभी आई कोरोना महामारी ने करा दिया। कल का किसी को नही पता इसलिए अपने किसी भी कार्य को कल पर ना डालें, उसी वक्त में कर लें, चाहें वह किसी अपने से मिलना हो या दिल की बात कहनी हो । कबीर जी का एक दोहा है,
 "काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, 
  पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब"।
तो वक्त रहते वक्त का महत्व पहचानिए वरना वक्त आप को नही पहचानेगा।
        
          ✍️ स्मिता चौहान ( गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश )

रविवार, अक्टूबर 09, 2022

🌸 मौन 🌸

मौन होने का अर्थ यह नहीं कि शब्दकोष शून्य है या मन आहत नही बस हमारी परवरिश हमारी बेड़ियां हैं जो पाबंदी लगाती हैं शब्दों की ऐसी अभिव्यक्ति पर जो प्रश्नात्मक हो, मौन सर्वोत्तम चिकित्सा के पाठ रोज़ रटाए जाते हैं पर मौन सर्वोत्तम चिकित्सा का अर्थ स्थिर, आवेशरहित, निरोगी चित क्यों नहीं बताया जाता ? अगर मनुष्य अलग तो मन भी अलग ? मन अलग तो व्यवहार भी अलग, फिर पाठ एक और पाठ्यक्रम एक जैसा क्यों ? मौन पीड़ा से आहत मन असंख्य प्रश्नों की तलहटी में निरुत्तर समाधि लेता है परंतु चीत्कार लगाती रूह निःशब्दता के हर आवरण को भेदना चाहती हैं वह स्वतंत्रता आलिंगन कर नए पाठ्यक्रम भी जोड़ना चाहती है और चेतना सागर के हर अध्याय पर एक ऐसी यात्रा करना चाहती है जहाँ मौन निःशब्द न हो


             ✍️ सीमा मोटवानी ( अयोध्या, उत्तर प्रदेश )

शुक्रवार, सितंबर 23, 2022

🦚 परिवार की नींव पूर्वज 🦚

आश्विन माह के कृष्ण पक्ष मे पन्द्रह दिन को पितृ पक्ष कहा जाता है। इस समय प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक लोग अपने पूर्वजों का तर्पण और श्राद्ध करते हैं। परिवार के जिस व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि को होती है। उस दिन उसका श्राद्ध कर्म किया जाता है। भारतीय दर्शन की मान्यता के अनुसार मृत्यु से मात्र शरीर नष्ट होता है। आत्मा नष्ट नही होती। मरने के बाद जीवात्मा दुबारा जन्म लेकर कर्मो के अनुसार सुख या दुख भोगती है। इसी का अनुकरण करते हुए श्राद्ध का विधान बना। श्राद्ध के द्वारा हम अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। जिनकी वंशावली मे शामिल होने का हमें सौभाग्य मिला होता है। साथ ही श्राद्ध हमे अपने पूर्वजों व बुजुर्गों के दिशा-निर्देश मानने, उनकी बातों पर अमल करने व उनका सम्मान करने का अवसर देता है। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव का अर्थ यह है कि दिवगंत हो चुके अपने लोगों के साथ-साथ हम जीवित बुजुर्गों को भी पूरा सम्मान दें, उनकी शिक्षा पर अमल करें और उनके गुणों को सहेज कर रखें। 

             परिवार की नींव हैं पूर्वज और संस्कारों के दाता हैं।
             पूर्वज ही सुगंध बन पारिवारिक बगिया महकाता है।।
             श्रद्धा भाव रख उनको श्रद्धा सुमन चढ़ाएं हम।
           भाव सुमन अर्पित करके आओ उन्हें शीश नवाएँ हम।।

                 ✍️ सावित्री  मिश्रा ( झारसुगुड़ा, ओड़िशा )

रविवार, सितंबर 04, 2022

👩‍🏫 जीवन सबसे बड़ा शिक्षक 👩‍🏫

जीवन से प्राप्त हुए अनुभव हमें बहुत कुछ सिखाते है। हमारा मार्गदर्शन करते हैं और यह अनुभव हर किसी के जीवन मे सार्थक भूमिका निभाते हैं। पग-पग पर नए अनुभव जीवन को नए आयाम देते हैं। स्कूल-कॉलेज में मिलने वाला ज्ञान बहुत कुछ सिखाता है पर व्यवहारिक तौर पर अपूर्ण होता है। हम अपने अनुभवों से जीवन पर्यन्त कुछ नया प्राप्त करते हैं। हम जब अपने कदम कठिनाइयों की सीढ़ी पर रखते हैं तो सफलता तथा विफलता दोनों ही हमारे गुरु बनते हैं। सफल व्यक्ति दूसरों को अपने अनुभव से सिखाता है और विफल व्यक्ति हर बार एक नए अध्याय से जुड़ जाता है। जीवन की प्रथम श्वास से अंतिम क्षण तक की यात्रा हमारी शिक्षक बनती हैं इसलिए मेरे लिए जीवन से बड़ा कोई शिक्षक नही है। मेरी तरफ़ से इस अनमोल "जीवन" को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। जो हमें रोज़ नये-नये अनुभव करवाकर बेहतर से भी बेहतर साँचे में ढाल रहा है।


                         ✍️ सीमा मोटवानी ( अयोध्या, उत्तर प्रदेश )

बुधवार, अगस्त 31, 2022

👩‍🏫 आदर्श शिक्षक 👩‍🏫

जो ज्ञानी, विद्वान, बुद्धिमान शिक्षक हमें साक्षर बनाकर आत्मविश्वास से जीवनयापन करने की सीख दे, विद्या-धन भर-भर बांटे, गलती करने पर डांटे, सजा सुनाये, जरुरत पड़ने पर लताड़े भी, प्यार से गले भी लगाए, वही सच्चे गुरु, शिक्षक। अपने विद्यार्थी से सुधार की कोशिश लगातार करवाए, विषय को सहज, सरल कर समझाए। अपने विद्यार्थी की प्रगति के लिए कठिन परिश्रम करे, उनके यश, कीर्ति, प्रतिष्ठा से अति हर्षित हो, उनकी कामयाबी के लिए जो अथक प्रयास करे। असंभव को संभव करने का साहस मन में जगाये। अंधियारे में दीप  जलाना  सिखाये, ऐसे महामहिम, जीवन के सशक्त स्तंभ होते हैं शिक्षक, हमारे अध्यापक। अपने विद्यार्थियों से जो प्रेम, स्नेह, अपनेपन, आत्मीयता भाव से जुड़ा हो, वे ही आदरणीय गुरु, सम्माननीय शिक्षक। ज्ञान और शिक्षा से जो अपने विद्यार्थी का जीवन गढ़ता हैं, ऐसे महान, कुशल शिल्पकार। शिक्षक जीवनमूल्यों को, संस्कार-धर्म को बालमन पर बिंबित कर धर्मानुरागी,  संस्कृति प्रिय व्यक्तित्व विकास की जिम्मेदारी निभाते हैं। मेहनत, लगन, परिश्रम की महत्ता से रूबरू कराते हैं। सही गलत की पहचान करना सिखाते हैं। कोई भी विषय हो, यथाशक्ति ज्ञान प्रदान कर अपने विद्यार्थी के उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं। नित नए शोध, अनुसंधान के लिए प्रेरित करते हैं। अज्ञान तम हटाकर ज्ञान ज्योति जलाते हैं। राह पथरीली हो या, कंटीली आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करते हैं। नवचैतन्य, नव उल्लास से जीवन में सफलता पाने का गुरु मंत्र देते हैं शिक्षक। हमारे जीवन के महान शिल्पकार शिक्षक। हमारे लिए सदैव आदरणीय, सम्माननीय रहेंगे। हम सदा उनके ऋणी रहेंगे। हमारे पंखों में हौसले का संबल भर ऊँची उड़ान का साहस देने वाले हमारे शिक्षकों को हमारा शत-शत नमन। हमारे गुरुजनों का मार्गदर्शन, आशीर्वाद हमें मिलते रहे। उनकी प्रेरणा, प्रोत्साहन से हम सफलता का परचम लहरा पाये, यही हमारी मंगल कामना हैं। अपनी उन्नति, अपने विकास के लिए हमारे शिक्षक अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। हमारे सम्मानीय गुरुजनों को, आदरणीय शिक्षकों को हमारा सादर प्रणाम। हम सदैव आपके ऋणी रहेंगे। शिक्षक का मार्गदर्शन हमारे जीवन में अति महत्वपूर्ण हैं। गुरु बिना संभव या कहो सहज नहीं ज्ञान पाना। अपने गुणों का संपूर्ण विकास करने के लिए हमें जरूरत होती हैं ऐसे ज्ञानी, कर्मठ शिक्षक की जो हमारी गलतियों को सुधार कर, हमारे गुणों को निखारें।  हमारे व्यक्तित्व को तराशे। जैसे शिल्पकार पत्थर को तराश कर सुन्दर शिल्प बनाते हैं, आदरणीय गुरुजन अपने मार्गदर्शन, प्रेरणा, प्रोत्साहन से हमारे जीवन को सुन्दर आकार देते हैं। ज्ञान भंडार से कला-कौशल का ज्ञान देकर हमारे जीवन को सुचारू बनाते हैं।  हम अपने जीवन में अर्थार्जन करने में सक्षम बन अपने उत्तरदायित्व का निभाव भली-भांति कर पाते हैं।  सफलता का परचम लहराना हैं, तो गुरुवर्य के आदेशों का पालन करते हुए, उनके बताये मार्ग पर निःशंक आगे बढ़े। अपने व्यक्तित्व विकास में उनका सहयोग लें, उनके दिशा दर्शन अनुसार अपने विकास और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करे। हमारे पंखों में हौंसले का संबल भर ऊँची उड़ान का साहस देने वाले हमारे शिक्षकों को हमारा शत-शत नमन। हमारे गुरुजनों का मार्गदर्शन, आशीर्वाद हमें मिलते रहे। उनकी प्रेरणा, प्रोत्साहन से हम सफलता का परचम लहरा पाये, यही हमारी मंगल कामना हैं। आज के भौतिक चकाचौंध, पाश्चिमात्य संस्कृति का अंधानुकरण, आपाधापी, और तनाव भरे जीवन में हम हमारे जीवन मूल्य खोते जा रहे हैं। ऐसे कलुषित, प्रदूषित व्यवस्था को आदर्श शिक्षक की सही दिशा प्रदान कर सकते हैं। अच्छे शिक्षक का पाना, हमारा परम सौभाग्य हैं। अपने गुरुजनों का यथोचित सम्मान करना, हमारा अहम कर्तव्य है।

                          ✍️ चंचल जैन ( मुंबई, महाराष्ट्र )

बुधवार, अगस्त 24, 2022

👨‍👩‍👧‍👦 दोस्ती का रिश्ता 👨‍👩‍👧‍👦

कुछ रिश्तों से जन्म के साथ ही हम जुड़ जाते हैं और कुछ रिश्ते हमारे खुद के बनाये होते हैं। जिस तरह हरे-भरे पेड़ से बगिया सुशोभित होती है। वैसे ही रिश्तों से हमारी जिंदगी। सभी रिश्तों मे एक दोस्ती का रिश्ता ऐसा है, जो उम्र के हर मोड़ पर कायम रहता है। हमारे सुख-दुख में हमारे दोस्त हमारे कांधे से कांधा मिलाकर चलते हैं। कभी जो राह भटक जाये तो एक सच्चा दोस्त ही हमें सही राह दिखाता है। दोस्ती ऐसा रिश्ता है जिसे हम खुद बनाते हैं। दोस्त ही है जो हमें प्यार और फटकार दोनों से समझाता है। और हमारा सही मार्गदर्शन करता है। अगर किसी को सही मार्गदर्शक मिल जाये, जैसे :- कृष्ण मिले थे अर्जुन को तो जीवन के कुरुक्षेत्र में जीत निश्चित है। दोस्त उस सारथी की तरह होता है, जो हमारे जीवन रथ को हर उबड़-खाबड़ रास्तों से सही सलामत निकाल लाता है। अगर हर रिश्ते में दोस्ती हो तो वो मिसाल बन जाती है। रिश्ता चाहे कोई भी हो पति-पत्नी, माँ-बेटी, सास-बहु, ननद-भाभी या पिता-पुत्र दोस्ती होना चाहिए। हमारी मुश्किल परिस्थितियों में भी जो हमारे साथ खड़ा रहे वही सच्चा दोस्त है। दोस्ती की कई मिसालें हैं जैसे कृष्ण-सुदामा, करण-दुर्योधन। एक अच्छा दोस्त हमारे धूल समान अवगुणों को दूर कर हीरे जैसा चमका सकता है। तो एक बुरा दोस्त हमें मार्ग भटका कर दलदल में गिरा भी सकता है। इसलिए दोस्ती सदैव सोच-विचार कर हमेशा सही और सच्चे इंसान से करना चाहिए 
         
                     ✍️ सविता 'सुमन' ( सहरसा, बिहार )

शनिवार, अगस्त 13, 2022

🇮🇳 आजादी का महत्व 🇮🇳

हमारा देश भारतवर्ष काफी समय तक परतंत्र रहा। अपने ही देश में हमपर जुल्म और ज्यादतियां होती रही लेकिन यूरोपियन के आने के बाद खास कर ब्रिटिश संपूर्ण भारत और धीरे-धीरे सम्पूर्ण दुनिया ही गुलाम हो गई और हमें गुलामी का असली रूप देखने को मिला। जिस भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था उसे लोहे के पिंजरे में धकेल दिया गया। कभी विश्वगुरु भारत जिसका मलमल, काली मिर्च, सोना, हीरे और अन्य रत्न दुनिया में लोहा मनवाते थे, अब नील की खेती करने को विवश था। खेत के खेत बंजर हो रहे थे। अंग्रेजों ने ना केवल आर्थिक रूप से लूटा बल्कि हमें हमारी ही संस्कृति के खिलाफ कर दिया। 200 सालों के बाद हमे मुक्ति मिली। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों की पकड़ उनके सम्पूर्ण साम्राज्य से छूट गई। लेकिन इस गुलामी के बाद मिली स्वतंत्रता को यहां के लोग समझ नही पाए। आज भी छुआ-छूत, भेदभाव, आरक्षण के नाम पे राजनेताओं के हाथों की कठपुतली हैं सभी। धर्म के नाम पे, जाति के नाम पे वोट लेने के लिए मूर्ख बना रहे हैं सब जनता को। आजादी के बाद हमें यही सिखाया गया कि जो अंग्रेजी है वही बढ़िया और उत्तम है। चाहे उनके वस्त्र हों, खान-पान या फिर शिक्षा और उनकी ही भाषा। जहां दूसरे देश अंग्रेजों के बनाए कानून और नीतियों को रद्द करके आगे बढ़े वहां भारत अभी तक अंग्रेजों का मानसिक गुलाम बना बैठा है। जब हम देशवासियों को एक विदेशी भाषा सिखाई जा रही थी तो क्यों नही उसी समय देश में बोली जाने वाली संस्कृत या हिंदी को राज भाषा घोषित कर दिया गया। कितने ही देश जो भारत की ही तरह गुलाम थे उन्होंने अपनी नीतियां, अपने देश और संस्कृति के आधार पर कानून बनाए न की अंग्रेजों के थोपे गए कानून नियम और नीतियों का अंधानुकरण किया। जैसा कि भारत में होता आया है। हम विदेशी शिक्षा के कारण अपने देश के सही इतिहास से वाकिफ नही है और अपने देश की हर चीज़ का मजाक उड़ाते हैं। ये कैसी आजादी है ? समय पर अगर हमने आजादी का महत्व नही समझा तो हम सदैव के लिए मानसिक और आर्थिक गुलाम बने रह जायेंगे।


                             ✍️ प्राप्ति सिंह ( हैदराबाद, तेलंगाना )

गुरुवार, जुलाई 21, 2022

🦚 सिनेमा और हम 🦚

भारतीय समाज और जीवन पर फिल्मी दुनिया ने आइडियल की तरह रोल अदा किया है। लोगों की जीवन शैली पूरी तरह सिनेमा से प्रभावित हुई है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनो पहलू हैं। जिस तरह साहित्य समाज का दर्पण होता है उसी तरह सिनेमा भी समाज को प्रतिबिंबित करता है। इसका मूल उद्देश्य मनोरंजन होने के बावजूद इसका समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कुछ लोग कहते हैं कि सिनेमा बुराई फैलाता है। पर यह हमारे देखने के नजरिए पर निर्भर करता है फिल्म 'हकीकत' सन् 1962 के चीन-भारत के युद्ध पर आधारित है। चीनी सैनिक हमारे देश की तरफ बढ़ते आ रहे थे। भारतीय सैनिक वीरता के साथ युद्ध कर रहे थे। इस फिल्म में कैफी आज़मी का लिखा हुआ गीत कर चले हम फिदा बहुत प्रसिद्ध हुआ है। इसे सुनकर  हजारो लोग सेना मे शामिल होने निकल पड़े। ऐसी फिल्मे लोगों को प्रेरणा देती है। उनमे देशभक्ति का जज्बा कायम रखती हैं। यह फिल्म समाज के युवाओं को देश के लिए मर मिटने को प्रेरित करती है। कर चले हम फिदा गीत सुन कर रगों मे वीरता का जोश भर जाता है। मुझे यह फिल्म और इसका गीत बहुत पसंद है। ऐसी फिल्में समाज में सकारात्मक प्रभाव डालती है।

                 ✍️ सावित्री मिश्रा ( झारसुगुड़ा, ओड़िशा )




💠 हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी 💠

    चाहे हों हम हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई। भारत माता की संतानें, हम सब हैं भाई-भाई।  एक हमारी रगों में बहता खून, और एक हैं हमारे रंग रूप। ...