शुक्रवार, अगस्त 28, 2026

🪅 ख़्वाहिशें 🪅

ख़्वाहिश की क्या बात कहूँ,
पूरी कब होती मन की ख़्वाहिश ?
कभी बन जाती है सपना कोई,
कभी आँखों में पलती ख़्वाहिश।

ख़्वाहिश हो या हो अभिलाषा,
चाहत हो या फिर हो कामना,
सब एक ही डोर से बँधे हैं,
मन की सुंदर भावनाओं से।

मन में छोटी-छोटी ख़्वाहिशें ही तो,
जीवन को देती हैं नई दिशा,
इन्ही के सहारे इंसान,
पहुँचता है अपनी मंज़िल तक।

हर इंसान के मन में होती,
कुछ अनकही-सी ख़्वाहिशें,
कुछ पूरी होकर मुस्काती हैं,
कुछ बन जाती हैं यादें।

मैं ख़ुद की ख़्वाहिश जता न पाई,
मन की बातें कह न पाई,
कुछ सपने आँखों में रखकर,
जीवन-पथ पर चलती ही रही।

ख़्वाहिशें मेरी अधूरी सही,
पर कोशिशें अधूरी न रही,
हर ठोकर से सीख लिया मैंने,
हर मुश्किल में राह नई।

कभी कामना का आँचल छोटा न रखना,
सपनों को सीमाओं में मत बाँधना,
जितना बड़ा होगा ख़्वाहिशों का आँचल,
उड़ान उतनी ही ऊँची होगी।

ख़्वाहिशों को पंख लगाकर,
आसमान छूने की चाह रखो,
राह कठिन हो, चाहे जितनी,
दिल में आगे बढ़ने की राह रखो।

कुछ ख़्वाहिशें पूरी होंगी,
कुछ शायद अधूरी रह जाएँगी,
पर कोशिशों की राह पर चलकर,
ज़िंदगी फिर भी मुस्कुराएगी।

क्योंकि ख़्वाहिश केवल पाने का नाम नही,
यह तो जीने का एक बहाना है,
जो सपनों को सच करने निकले,
वही जीवन का सच्चा दीवाना है।

मेरी ख़्वाहिशें मेरी अपनी हैं,
कुछ अनकही, कुछ अनजानी,
पूरी हों या अधूरी रहें,
इनसे ही तो है मेरी कहानी।

✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

🦚 तुम्हारे बिना 🦚

दर्द की चादर,

सुबह रो-रो के आसमां ने,

आंखें लाल कर ली थी,

समंदर भी रात भर रोया था,

सुबह जो उसकी रेत गीली थी,

सच है रात ने भी आंसू बहाए थे,

सुबह फूलों पर ओस की बूंदे पड़ी थी,

चांद तारे भी रोए थे,

धरती जो गीली थी,

सुबह पेड़ों के झुरमुट से सूरज ने झांक कर देखा,

पूछा क्या बात है खामोश क्यों हो ?

क्यों सूनी है आंखे मायूस क्यों हो ?

मैंने कहा पूछो इन पेड़ों से जो रात भर आंसू बहाते रहे,

पूछो इन पहाड़ों से जो रात भर मेरे आंसू पोछते रहे,

इन नजारों से भी पूछ लेना जो मुझसे नजरें न मिला पाए,

इन बहारों से भी पूछ लेना क्यूं ये इतना मुझको रुलाए,

दिनकर बोला नजर को बदलो फिर नजारे भी बदल जाएंगे,

सोच को बदलो समंदर जमीन,

चांद तारे खूबसूरत नजर आएंगे,

तुमने दर्द की चादर लपेट रखी है,

जरा उसे उतारकर तुम फेको, 

मुझे रोज डूबना पड़ता है-क्या मैं रोता हूँ मुझे देखो,

मैंने गौर से देखा सूरज भू पर सिंदूरी रंग बिखेर रहा था,

लाल रंग और कूची से मानो,

चित्र उकेर रहा था,

मैं क्षणभर सब कुछ भूल कर,

उन सिंदूरी चित्रों को निहारने लगी,

सचमुच ही धरती अब मुझे सुंदर नजर आने लगी,

मुझे सुंदर नजर आने लगी।


  ✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )



🪅 ख़्वाहिशें 🪅

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