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शुक्रवार, अगस्त 28, 2026
🪅 ख़्वाहिशें 🪅
🦚 तुम्हारे बिना 🦚
दर्द की चादर,
सुबह रो-रो के आसमां ने,
आंखें लाल कर ली थी,
समंदर भी रात भर रोया था,
सुबह जो उसकी रेत गीली थी,
सच है रात ने भी आंसू बहाए थे,
सुबह फूलों पर ओस की बूंदे पड़ी थी,
चांद तारे भी रोए थे,
धरती जो गीली थी,
सुबह पेड़ों के झुरमुट से सूरज ने झांक कर देखा,
पूछा क्या बात है खामोश क्यों हो ?
क्यों सूनी है आंखे मायूस क्यों हो ?
मैंने कहा पूछो इन पेड़ों से जो रात भर आंसू बहाते रहे,
पूछो इन पहाड़ों से जो रात भर मेरे आंसू पोछते रहे,
इन नजारों से भी पूछ लेना जो मुझसे नजरें न मिला पाए,
इन बहारों से भी पूछ लेना क्यूं ये इतना मुझको रुलाए,
दिनकर बोला नजर को बदलो फिर नजारे भी बदल जाएंगे,
सोच को बदलो समंदर जमीन,
चांद तारे खूबसूरत नजर आएंगे,
तुमने दर्द की चादर लपेट रखी है,
जरा उसे उतारकर तुम फेको,
मुझे रोज डूबना पड़ता है-क्या मैं रोता हूँ मुझे देखो,
मैंने गौर से देखा सूरज भू पर सिंदूरी रंग बिखेर रहा था,
लाल रंग और कूची से मानो,
चित्र उकेर रहा था,
मैं क्षणभर सब कुछ भूल कर,
उन सिंदूरी चित्रों को निहारने लगी,
सचमुच ही धरती अब मुझे सुंदर नजर आने लगी,
मुझे सुंदर नजर आने लगी।
✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )
🪅 ख़्वाहिशें 🪅
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