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गुरुवार, सितंबर 22, 2022

🦚 दादी की सीख 🦚

बात उस समय की है जब मैं बांका जिले के राजकीय कन्या मध्य विद्यालय वर्ग छह की छात्रा थी और माँ पिताजी तथा दो छोटे भाई-बहनों के साथ पिताजी को मिले सरकारी आवास में रहती थी। आस-पास करीब 20 और सरकारी आवास थे। जिनमे और अधिकारी अपने परिवार के साथ रहा करते थे। वहीं बगल के आवास में रहने वाले वर्मा अंकल की बेटी सुनीता जो न सिर्फ मेरी हमउम्र थी बल्कि मेरे ही कक्षा और विद्यालय में भी थी। हमदोनों की दोस्ती की मिसाल कॉलोनी में और बच्चों को दी जाती थी। दिन बीत रहे थे। गर्मियों की एक शाम जब विद्यालय से आई तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा कारण मेरे दादा-दादी गाँव से हमारे यहां शहर आए हुए थे। साथ ही ढेरों घर की बनी मिठाइयाँ जैसे- मीठी मठरियां, पेड़े इत्यादि के साथ रात सोने से पहले सुनाने के लिए कहानियाँ की सौगात भी लेकर आए थे। एक शाम हम सभी बच्चे वहीं पास मैदान जहाँ आम के कुछ पेड़ लगे थे और उन आम के पेड़ों में टिकोरे लग चुके थे। खेल रहे थे, तभी कुछ शरारत से तो कुछ नादानी में हम सभी टिकोरे तोड़ने के लिए कंकड़ पेड़ की ओर उछालने लगे और सौभाग्य वश कुछ टिकोरे टूट नीचे भी आ गिरे। हम अब उन टिकोरो को बांटने में लग गए। जिसमें हमारा झगड़ा हो गया खास कर मेरा और सुनीता का। ज्यादा शाम होने के कारण मैं घर आकर चुपचाप एक कोने मे मुँह फूला कर बैठ गई तभी मेरी दादी जी मेरे पास आई और मनुहार करने लगीं। मैंने सुनीता की सैकड़ों कमियाँ बताते हुए पूरी घटना बता दी। उस वक्त तो दादी जी ने कुछ नहीं कहा बस मुझे हाथ मुँह धो कर पढ़ाई करने को कहकर कॉलोनी में ही स्थित मंदिर चली गईं। रात्रि भोजन के बाद हम सभी भाई बहन आँगन में दादी को घेर कहानी सुनने को बैठ गए। दादी ने उस दिन एक राजा जो एक पैर से लंगड़ा तथा काना था एवं एक चित्रकार की कहानी सुनाई। वो कहानी आज भी मुझे अक्षरश: याद है कि कैसे चित्रकार ने राजा की कमी को छिपाते हुए राजा को एक पांव मोड़ एक पांव पर बैठकर एक आँख से शिकार करने के लिए निशाना लगाते हुए उस राजा का चित्र बनाया। जिस पर राजा ने प्रसन्न होकर उस चित्रकार को गले लगाकर अपने राज्य का चित्रकार घोषित कर दिया व उसे अपना परम मित्र बना लिया। कहानी के अंत मे मुझसे मुखातिब होते हुए वह बोलीं अगर किसी में कमियाँ निकालना हो हजार निकल आयेंगी लेकिन दोस्त वही अच्छे होते हैं। जो अपने बीच मन मुटाव नही होने देते और एक-दूसरे के अवगुणों को दूर कर गुणों को संसार के सामने लाते हैं। आज मेरी दादी मेरे पास नही हैं। लेकिन उनकी सीख हमेशा मेरे पास है। जो मुझे हर व्यक्ति में सिर्फ अच्छाईयों को देखने और उनकी अच्छाईयों से कुछ सीखने के लिए प्रेरित करती है।  

                         ✍️ सुषमा पांडे ( बोकारो, झारखंड )

रविवार, जून 12, 2022

🏆 आशा और निराशा 🏆

वह लाइलाज आशावादी थी, उसका इलाज वें घोर निराशावादी पैसे वाली महिलाएं नही करा पाई। आशावादी के पास सिर्फ पैसे की ही कमी रही, उन निराशावादियों को अपनी कमियों का ठींकरा भी आशावादी के सिर ही फोड़ना होता था। अपने-अपने पतियों को सिखाकर और पतियों का फिर घर भर में बुराई फैलाकर, भद्द पीटने का मेन उद्देश्य होता था। यहां तक कि आशावादी के पीहर में भी बुराई निकाला करते थे। बस उन सबमें से एक था जो सही और गलत की पहचान कर लेता था। शुरु में एकाध बार आशावादी की हिमायत में बोलकर वह बुरा ही बना। यह सोचकर वह अपनी अच्छी सोच के साथ मौन हो गया। होने दिया फिर जो होना हो जिसके साथ। उन सबकी मिलीभगत और वो अकेली एक तरफ यहां तक कि उसके तो पति भी उसकी सिफारिश नही करते थे। बल्कि निल बटा सन्नाटा रहते थे। इतनी आँधी उतारी उन सब ने मिलकर कि जिंदगी के तीस साल नरक बनाकर रखे आशावादी के। सास-ससुर भी जानते थे कि ये जो सच्ची है, बस इक कमी पैसों की है। ये सब मक्कार कामचोर महत्वाकांक्षी निराशावादी महिलाएं अपना उल्लू सीधा कर रही है। वे बुजुर्ग भी जिस बेटे को अपने घर मे रखे थे 15 साल तक। बस दो वक़्त की रोटी खाने के लालच में या बेटे का पैसा बचवाने के लालच में उसी बेटे के हवाले सब कर दिया या उसने रोटी खिलाने की एवज में माँ बाप को खाली कर दिया ...जो भी हो। सास-ससुर भी उस घोर निराशावादी जोडे से ड़रने लगे। सही-गलत का अनुमान लगाना भी अब भूल चुके। फिर एक दिन अचानक सास इस दुनिया से विदा कर गयी। सास से करीब 25 साल बाद ससुर भी चल बसे। बहुत बड़ा परिवर्तन आया फिर सबसे पीड़ित महिला की जिंदगी जैसे फिर जीरो से शुरू हुई और अब पटरी पर आ रही है धीरे-धीरे इस उम्मीद में सकारात्मक भूमिका निभाते हुए जीवन जी रही है वो भी अब बुजुर्ग हो चली। बस जब कभी अपने किस्से बताने बैठती है तो जीवन का कोई सा भी अध्याय खोले सबमें अन्याय ही देखती है और बताने की कोशिश करती है ....! पैसा ना कल था ना आज है।
                   
               ✍️ सुनीता सोलंकी 'मीना' ( मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश )

गुरुवार, अप्रैल 28, 2022

👨‍👩‍👧‍👧 फरिश्ते जैसे नाना जी 👨‍👩‍👧‍👧

कुछ फरिश्ते जीवन में रिश्ते बन के आते हैं। हमें पता भी नही होता और वो हमारे आस-पास होकर हमे बुरी बलाओं से बचाते रहते हैं। ऐसी ही एक घटना याद आती है । हम हर रविवार नाना जी के घर जाया करते थे। नाना जी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक थे। उनको कैंपस में ही घर मिला था। आगे से लेकर पीछे तक बगीचा ही बगीचा था। आम, अमरूद, अनार, शरीफा, बेल, केला, जामुन, कटहल, सहजन, कितने ही किस्म के तो पेड़ थे। हम दोनो बहनों के लिए नाना जी ने बगीचे में ही झूला डाल रखा था। जब हम वहां जाते हमारा अधिकांश समय बगीचे में ही गुजरता। नाना जी के घर में सामने की तरफ लॉन में बड़े ही मनमोहक फूल खिले रहते थे। जिनमें मेरा पसंदीदा था हजारी बेला। जब भी नानी जी फूलों को चुन के माला बनाया करती थी, मैं उनके पास ही बैठती थी। एक वाकया याद आता है, मैं और मेरी बहन दोनों नाना जी के बगीचे में खेल रहे थे। मैं मात्र 2 वर्ष की थी और मेरी बहन मुझसे डेढ़ वर्ष बड़ी। मेरी बहन ने खेल-खेल में मेरे दोनों नाक के छेद में बेला की कली घुसेड़ दी और वह कली नासिका द्वार में फंस गई। मुझसे सांस लेना भी नही हो रहा था। घर के सभी लोग परेशान हो गए। जितना प्रयत्न किया जाता कली उतनी ही भीतर घुसती जाती। मेरे मामा जो स्वयं डॉक्टर थे, ने इंजेक्शन सीरिंज से निकालने का प्रयास किया वह भी बेकार हो गया। मेरी आँख से लगातार आँसू बह रहे थे। मैं रो रही थी। नाना जी सोफे पर बैठे सब देख रहे थे। सब मुझेअस्पताल ले जाने की तैयारी करने लगे। सब घबरा रहे थे, कि, पता नहीं डॉक्टर लोग ऑपरेशन करेंगे या कैसे निकालेंगे। सब लोग डर रहे थे। उसी समय नाना जी उठ कर बोले, रो मत लाडो मैं अभी ठीक करता हूँ। उन्होंने मुझे गोद में ले लिया हाथ में ढेर सारी सुरती मलकर मेरी नाक में भर दिया और मेरा मुँह कस कर बंद कर दिया। फिर उन्होंने कहा ज़ोर से सांस लो। सांस लेते ही सुरती की तेज गन्ध नाक में गई और बड़ी जोर की छींक आई। दो या तीन छींकों में खून के साथ कलियां बाहर निकल गई । मेरी नाक और मुँह ठंडे पानी से धुलवाए गए। मुझे ठंडा शरबत पिलाया गया। और नाक पर ठंडी पट्टी रख दी गई। जब मैं बड़ी हुई माँ बनी तो सबने मुझे ये कहानी बताई। कभी-कभी मैं सोचती हूँ। उस समय मेरे नाना जी फरिश्ता बनकर आए थे, वो नहीं होते तो मैं भी नहीं होती। नाना जी ने सदैव मेरा मार्गदर्शन किया। वह मुझे बहुत प्यार करते थे। मैं उनकी लाडो थी। जब मैं बड़ी हुई मुझे नाना जी ने जीवन के आदर्शों के बारे में बताया। मुझे नाना जी से काफी कुछ सीखने को मिला। नाना जी हमेशा ही लड़कियों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने का प्रयत्न किया करते थे आज मैं जो भी हूँ और जैसी हूूँ उसमें मेरे फरिश्ते जैसे नाना जी का अविस्मरणीय योगदान है।

                       ✍️ प्राप्ति सिंह ( हैदराबाद, तेलंगाना )




सोमवार, अप्रैल 11, 2022

🛩️ चाह से मिली राह 🛩️

बात उस समय की है जब मैं नौकरी कोलकाता में कर रही थी, तब मेरी शादी नहीं हुई थी, क्यूंकि पढ़ाई मैंने वेस्ट बंगाल से की थी इसलिए मेरी नौकरी भी उधर की कम्पनी में लग गई थी। दिन बीतता गया, मैं, जॉब और काम बस यही था मेरे उस वक्त की दिनचर्या। फिर एक दिन माँ का कॉल आया कि अब तुम्हारी शादी की बात चल रही, तुम्हे अब वापस आना चाहिए ..पहले तो मैं शादी के लिए टालती रही। पर कब तक टालती, कभी न कभी तो करनी ही थी। लेकिन नौकरी छोड़ कर आना मुझे तब भी सही नहीं लगा था ...पर पुराने ख्यालात वाले माता-पिता को ये बात समझाना मुश्किल होता है। क्यूंकि बेटी है मतलब जल्दी से उसकी शादी कर देना ...नहीं माँ-पापा को मेरे काम करने से कभी एतराज नहीं हुआ, वो बस चाहते थे की मैं भी अब शादी कर लूँ..हुआ भी वही, हो गई शादी ..मैं ससुराल में आई। शुरुआत के दिन तो काफी सही थे मेरे लिए, लेकिन मेरे काम करने की आदत से मैं थोड़ा मायूस हो चुकी थी, क्यूंकि मैंने अपनी जॉब छोड़कर शादी कर ली थी। धीरे-धीरे वक्त बीता। मैं एक प्यारी सी बिटिया की माँ बनी, अब वो बिटिया के बड़े होने का इंतजार करने लग गई थी मैं ..तभी मेरे हसबैंड की पोस्टिंग हो गई एक ऐसी जगह जहाँ आज भी एक सिनेमा घर नहीं है, जरूरत की सामान वाली दुकाने थी लेकिन एक फैमली रेस्ट्रा तक नही था, न ही वहाँ कोई ऐसी कम्पनियाँ जिसमे मैं नौकरी कर पाती, लिहाजा मेरे हाथ निराशा ही लगी, पर मेरे हसबैंड ने मुझे बहुत सपोर्ट किया ..उन्होंने कहा :- "स्मिता तुम नौकरी करने वाली महिला हो, जिंदगी में ऐसे कब तक बैठी रहोगी ? चलो कुछ सर्च करो शायद कोई नौकरी तुम्हे मिल जाए .." मैंने उनकी बात मानी और अपने सेक्टर के वर्क फ्रॉम होम जॉब सर्च करनी शुरू की, कुछ ही महीनो में मुझे एक कॉल आया और मुझे कम्पलायलर की पोस्ट के लिए अप्रोच किया गया, मैंने सहज ही उसे स्वीकार कर ली .. क्यूंकि कोई भी वर्क छोटा या बड़ा नही होता..मैंने अपना काम शुरू किया और करती रही, कुछ ही हफ्तों में उसी ऑफिस से मुझे "प्रूफ रीडर" की पोस्ट के लिए भी अप्रोच आ गई, मेरी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा ..सोचा नही था कि मुझे वर्क फ्रॉम होम में इतनी अच्छी पोस्ट मिलेगी ...सच ही कहा गया है, जहाँ चाह होती है वहां राह मिल ही जाती है। अब मैं घर पर अपने ऑफिस का भी वर्क करती हूँ और अपनी बिटिया रानी को भी संभालती हूँ। मैं अपनो इस उपलब्धि का सारा श्रेय अपने पतिदेव 'संगम सिन्हा' को देती हूँ।

                                       ✍️ स्मिता सिन्हा ( कोडरमा, झारखंड )






गुरुवार, फ़रवरी 17, 2022

🦜मेरे सपने🦜








सपने तो सभी देखते हैं। ये और बात है कि किसी का सपना साकार हो जाता है तो किसी का सपना टूट कर बिखर जाता है। किसी को खुशियाँ मिलती हैं तो कोई गम के आँसुओं मे डूब जाता है। मेरे साथ तो भगवान और किस्मत दोनो ने ही खेल खेला है। मेरे सारे सपने अधूरे ही रहे। बचपन से एक सपना था डॉक्टर बनने का। उस समय लड़कियाँ गृह विज्ञान लेकत पढ़ती थी पर मैने गणित लेकर मैट्रिक किया। नवीं कक्षा से ही घर की सारी जिम्मेदारी निभाती घर के सारे काम कर स्कूल जाती और आने के बाद भी सारे काम कर पढ़ाई करती। मैट्रिक अच्छे अंक से पास होने पर भी जब ये कहकर आगे पढ़ाने से इन्कार कर दिया गया कि लड़की है पढ़ कर क्या करेगी तो सारे सपने टूट गए।18 वर्ष की उम्र में शादी और मिली हुई यातनाओं के कारण डिप्रेसन मे जाना फिर शिक्षिकाओं के कहने पर भी कॉलेज ना भेजना। बस सपने टूटकर बिखरते रहे। उन्हीं हालातों में किसी तरह घर से पढ़ाई कर इंटर, बी.ए.और एम. ए. किया। एल.एल.बी. कर वकालत करना चाहा पर नही कर पाई क्योंकि लड़की थी। फिर नया सपना देखा IAS का प्री पास भी कर गई बिना किसी कोचिंग के पर फाइनल का फार्म ही नहीं भर पाई। शिक्षिका भी शायद किस्मत ने बना दिया क्योंकि इसके लिये भी कोई तैयार नहीं था। केंद्रीय विद्यालय से नौकरी छोड़ने के लिए भी घर से मजबूर कर दी गई। बस हर बार सपने टूटकर बिखरते और माँ की प्रेरणा फिर एक नए हौंसले के साथ खड़ा कर देती। दो माह के बेटे और टूटे हर सपनो के साथ नई जिन्दगी और संघर्षों के बाद फिर नौकरी। आज एक सफल और लोकप्रिय शिक्षिका होने के बाद भी वो टूटे हर सपने दिल के किसी कोने में टीस देते हैं। लोगों का सपना असफल होने पर टूटता है पर मेरी तो सफलता ही मेरे लिए असफलता बन गई। आज भी दिल रोता है और होंठ मुस्कुराते हैं। अपने आप से सवाल करती हूँ कि मेरी गलती यही थी कि मैं एक लड़की थी। आज जब बेटा IPS  की तैयारी कर रहा है, तो लगता है। शायद मेरा सपना पूरा होगा। आज मैं सबसे यही कहती हूूँ कि बेटियों को संस्कार के साथ उन्मुक्त गगन दो ताकि उनके सपने पूरे हो। उन्हें पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाओ ताकि वे हर मुसीबत का सामना कर पायेें। 
वास्तव मे सपने वो नहीं होते,
जो हम नींद में देखते हैं।
सपने वो होते हैं, जो हमें सोने ना दें।
अब ना पाने की चाहत ना कोई उम्मीद,
बस अधूरे सपने और पूरा करने की जिद।
देखा था कभी एक प्यारा सपना,
वो भी अब रहा ना मेरा अपना।
ईश्वर से यही दुआ है कि,
किसी का सपना ना टूटे।
सब के सपने पूरे हो।
 
                             ✍️ सावित्री मिश्रा ( झारसुगुड़ा, ओड़िशा )

💠 हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी 💠

    चाहे हों हम हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई। भारत माता की संतानें, हम सब हैं भाई-भाई।  एक हमारी रगों में बहता खून, और एक हैं हमारे रंग रूप। ...