बात उस समय की है जब मैं बांका जिले के राजकीय कन्या मध्य विद्यालय वर्ग छह की छात्रा थी और माँ पिताजी तथा दो छोटे भाई-बहनों के साथ पिताजी को मिले सरकारी आवास में रहती थी। आस-पास करीब 20 और सरकारी आवास थे। जिनमे और अधिकारी अपने परिवार के साथ रहा करते थे। वहीं बगल के आवास में रहने वाले वर्मा अंकल की बेटी सुनीता जो न सिर्फ मेरी हमउम्र थी बल्कि मेरे ही कक्षा और विद्यालय में भी थी। हमदोनों की दोस्ती की मिसाल कॉलोनी में और बच्चों को दी जाती थी। दिन बीत रहे थे। गर्मियों की एक शाम जब विद्यालय से आई तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा कारण मेरे दादा-दादी गाँव से हमारे यहां शहर आए हुए थे। साथ ही ढेरों घर की बनी मिठाइयाँ जैसे- मीठी मठरियां, पेड़े इत्यादि के साथ रात सोने से पहले सुनाने के लिए कहानियाँ की सौगात भी लेकर आए थे। एक शाम हम सभी बच्चे वहीं पास मैदान जहाँ आम के कुछ पेड़ लगे थे और उन आम के पेड़ों में टिकोरे लग चुके थे। खेल रहे थे, तभी कुछ शरारत से तो कुछ नादानी में हम सभी टिकोरे तोड़ने के लिए कंकड़ पेड़ की ओर उछालने लगे और सौभाग्य वश कुछ टिकोरे टूट नीचे भी आ गिरे। हम अब उन टिकोरो को बांटने में लग गए। जिसमें हमारा झगड़ा हो गया खास कर मेरा और सुनीता का। ज्यादा शाम होने के कारण मैं घर आकर चुपचाप एक कोने मे मुँह फूला कर बैठ गई तभी मेरी दादी जी मेरे पास आई और मनुहार करने लगीं। मैंने सुनीता की सैकड़ों कमियाँ बताते हुए पूरी घटना बता दी। उस वक्त तो दादी जी ने कुछ नहीं कहा बस मुझे हाथ मुँह धो कर पढ़ाई करने को कहकर कॉलोनी में ही स्थित मंदिर चली गईं। रात्रि भोजन के बाद हम सभी भाई बहन आँगन में दादी को घेर कहानी सुनने को बैठ गए। दादी ने उस दिन एक राजा जो एक पैर से लंगड़ा तथा काना था एवं एक चित्रकार की कहानी सुनाई। वो कहानी आज भी मुझे अक्षरश: याद है कि कैसे चित्रकार ने राजा की कमी को छिपाते हुए राजा को एक पांव मोड़ एक पांव पर बैठकर एक आँख से शिकार करने के लिए निशाना लगाते हुए उस राजा का चित्र बनाया। जिस पर राजा ने प्रसन्न होकर उस चित्रकार को गले लगाकर अपने राज्य का चित्रकार घोषित कर दिया व उसे अपना परम मित्र बना लिया। कहानी के अंत मे मुझसे मुखातिब होते हुए वह बोलीं अगर किसी में कमियाँ निकालना हो हजार निकल आयेंगी लेकिन दोस्त वही अच्छे होते हैं। जो अपने बीच मन मुटाव नही होने देते और एक-दूसरे के अवगुणों को दूर कर गुणों को संसार के सामने लाते हैं। आज मेरी दादी मेरे पास नही हैं। लेकिन उनकी सीख हमेशा मेरे पास है। जो मुझे हर व्यक्ति में सिर्फ अच्छाईयों को देखने और उनकी अच्छाईयों से कुछ सीखने के लिए प्रेरित करती है।
✍️ सुषमा पांडे ( बोकारो, झारखंड )



