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सोमवार, सितंबर 14, 2026

💠 हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी 💠



   






चाहे हों हम हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई।

भारत माता की संतानें, हम सब हैं भाई-भाई। 


एक हमारी रगों में बहता खून, और एक हैं हमारे रंग रूप।

चांद देता बराबर चांदनी, सूरज भी देता सबको समान धूप। 


सब कुछ देने वाले ईश्वर, जब वो हममें अंतर नहीं करते हैं।

जाति-धर्म भाषा-बोली के भेदभाव रख, फिर हम क्यों जलते हैं। 


अलगाववादी सोचों को त्यागकर, एकता की मिसाल धरो। 

भारत के विकास के लिए, मिल जुलकर निरंतर प्रयास करो।


होंगे भले हम कहीं के भी वासी, सबसे पहले हैं भारत वासी। 

इसलिए हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा, और हम सब हैं हिन्दी भाषी। 


सीखो सीखने को सारी भाषाएं, पर राष्ट्रभाषा का सम्मान करो। 

घर में बोलो अपनी भाषा, पर समूहों में हिन्दी वार्तालाप करो। 


जाति धर्म और समुदायों की, सांप्रदायिक सोच को भुला दो। 

देश के नागरिक ही नही, पूरी दुनिया को हिन्दी में बुलवा दो।। 


✍️ मुकेश कुमार सोनकर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

💠 हिंदी मेरी पहचान 💠








हिंदी मेरी आन है, हिंदी मेरा मान है।

हिंदी से ही जुड़ी हुई मेरी पहचान है।।

माँ की ममता, पिता का आशीष है इसमें।

भारत की मिट्टी की सोंधी सी महक है इसमें।।


हिंदी में बचपन की वो मीठी सी बोली।

हिंदी में माँ की सुनाई हर एक कहानी।।

हिंदी में रिश्तों का अपनापन मिलता है।

हिंदी में मन का हर भाव सरलता से खिलता है।।


तुलसी की चौपाई, कबीर के दोहे हैं।

हिंदी में कितने अनमोल शब्द संजोए हैं।।

प्रेमचंद की कलम ने समाज को आईना दिखाया।

महादेवी के शब्दों ने संवेदनाओं को स्वर दिया।।


यह भाषा केवल शब्दों का संसार नही।

यह हमारी संस्कृति और संस्कार है।।

पीढ़ियों से जो हमें जोड़ती आई ।

वह हमारी विरासत, हमारा अधिकार है।।


दुनिया की भाषाएँ सीखना भी जरूरी है।

ज्ञान के हर द्वार को खोलना जरूरी है।।

पर अपनी भाषा को कभी भूल न जाना ।

अपनी जड़ों से रिश्ता कभी मत मिटाना।।


आओ हिंदी को दिल से सम्मान दें।

इसके अस्तित्व को नई पहचान दें।।

अपने व्यवहार और विचारों में इसे अपनाएँ।

हर दिन हिंदी का उत्सव मनाएँ।।


हिंदी हमारी शान रहे ।

हिंदी का सदा सम्मान रहे।।

जब तक साँस रहे इस जीवन में।

हिंदी से अपना प्रेम अमर रहे।।


✍️ अंजू मल्लिक ( पटना, बिहार )

शुक्रवार, सितंबर 11, 2026

💠 कविता - अधूरापन 💠








विस्मृति के आगोश में, खुद को छोड़ आई थी मैं,

तुमसे मिलकर, अपनी हस्ती मोड़ आई थी मैं।


वो निस्तब्ध रातों का, फोन पर चुपके से बतियाना,

स्मरण है क्या तुम्हें ? या धुंधला गया है वो अफ़साना ?


वो पल, वो क्षण, जैसे स्वप्निल कोई मंज़र था,

मैं और तुम थे बस, बाकी सब मंज़र से बाहर था।


अजीब था हमारे मिलन का वो मौन व्याकरण,

मिले नही कभी, पर बातों में बिताया हर क्षण।


देह की दूरियाँ थी, पर रूहें साथ रहती थी,

धड़कनें शहरों के पार भी, एक-दूजे से बहती थी।


तुमने कहा था— "बिछड़कर मैं भी मरुस्थल हो जाऊँगा,"

"उस नायक की तरह, अपनी हस्ती खो जाऊँगा।"


आज युग बीत गए, नियति की दीवारें खड़ी हैं,

पर न जाने तुम्हारी स्मृतियाँ, किस कोने में पड़ी हैं।


वो अफ़साना ज़माने की नज़रों में, तब भी दफ़न था,

आज भी वह राज, खामोशियों का कफ़न था।


मगर सीने में वो आग, वो तपिश आज भी शेष है,

तुम्हारा वो अधिकार, वो मोह, आज भी विशेष है।


मिट जाने की कसमों से, मैं बहुत डरती थी,

तुम्हें खोने के खौफ में, मैं रोज़ मरती थी।


पर विधि का विधान देखो, कैसा ये न्याय हुआ,

बिछड़ना ही अंततः, हमारा अध्याय हुआ।


मैं तुम्हारी न हो सकी, न अपनी रह पाई,

एक अधूरी प्यास थी, जो समंदर तक ले आई।


वह प्रेम आज भी ज़िंदा है, बस मुकम्मल न हो सका,

अधूरापन ही हमारा, सबसे परम पूज्य सच रहा।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

🌟 कविता - हिंदी से गौरवमय भारत का सम्मान 🌟








हिंदी हमारी शान है,

है हिंदी हमारा मान,

हिंदी से गौरवमय हुआ,

भारत का सम्मान।


हिंदी गीतों का मधुर स्वर,

हिंदी रस की धार,

हिंदी बिन यह जीवन जैसे,

सूना हो संसार।


हिंदी ने अपना रूप सँवारा,

फिर भी रही वही,

समय बदलता रहा मगर,

अपनी पहचान न खोई।


हिंदी है वह सरल भाषा,

जो सबको अपनाती,

विविध भाव और बोलियों को,

अपने में समाती।


संस्कृत इसकी जननी है,

तत्सम-तद्भव श्रृंगार,

देशज और विदेशी शब्दों से,

सजता इसका संसार।


मीरा की भक्ति हिंदी में,

तुलसी की अमर वाणी,

रसखान की कृष्ण-प्रेम धारा,

कबीर की सच्ची बानी।


फिल्मों में हिंदी, गीतों में हिंदी,

कविता में इसका मान,

जन-जन के मन को जोड़ रही,

यह अपनी हिंदुस्तानी जान।


मातृभाषा का मान है हिंदी,

हिंदी मेरा अभिमान,

अन्य भाषाओं का भी सम्मान,

पर हिंदी का ऊँचा स्थान।


केवल हिंदी दिवस पर ही,

नही करें इसका सम्मान,

हर दिन हिंदी को अपनाएं,

यही हो अपना प्रण महान।


हिंदी भाषा के हर शब्द पर,

ज्ञान-दीप हम जलाएँ,

नई पीढ़ी के मन में फिर,

हिंदी का गौरव जगाएं।


✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

🌟 प्यारी हिन्दी 🌟








हिन्दी से हिन्दुस्तान है

हिन्दी हिन्दुस्तान की आत्मा है

तुलसी, कबीर, बिहारी, केशव, भूषण सबने

हिन्दी का मान बढ़ाया है 

हिन्दी का महत्व सबको समझाया है।


जनता की यह भाषा है 

गौतम बुद्ध की रचना का भी

इसी भाषा में ज्ञान है 

हिन्दी भाषा में ही गाया जाता राष्ट्र गान है

देश के संचार माध्यमों की यह जान है

भारत माता का यह गहना है

हिन्दी हमारी शान है 

हम सबकी पहचान है।


यह सहज सरल आसान है 

यह करोड़ों भारतीयों की आवाज है 

यह देश का अभिमान है 

यह गुणों की खान है

इसके ‘अ से ज्ञ’ तक के सफर में

बड़ा ही गूढ़ ज्ञान है।


सुन्दर भाषा लिपि सुघड़ है

इसमें हमारी संस्कृति झलकती है 

यह मिश्री सी मीठी है

माँ की ममता इसमें है 

हिन्दी हमारी प्रेरणा है 

आओ ! हम हिन्दी का सम्मान करें।


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

शुक्रवार, सितंबर 04, 2026

🏡 आशियाना 🏡








लोगों के सपनों का महल हमने तैयार किया,

किन्तु जुटा न पाये अपने लिये एक आशियां।


उन्होंने कुंज, घरोंदा और आशियाने से,

उस घर का नामकरण किया।


हमने अपने घर को,

नीली छतरी नाम दिया।


नींव पर पड़े हर नये पत्थर के साथ,

उनकी आशाओं को अपनी मेहनत से खड़ा किया।


जब तक घर पत्थरों का खण्डहर था,

तब तक ही उस पर हमारा आधिपत्य था।


किन्तु सपनों का महल पूरा होते ही,

उसके कर्णधार को उससे बाहर जाना पड़ा।


माना घर, जमीन और भी सब कुछ उन्हीं का था,

किन्तु मत भूलो उनके सपनों को,

हकीकत में हमने ही तासीर किया।


गुजरता हूँ जब कभी अपने ही बनाये दुर्ग से,

सौ बार सोचता हूँ—क्या मैं ही इसका कर्णधार हूँ ?


क्योंकि हर वर्ष की बरसात की तरह,

इस वर्ष भी टपकती रही हमारी छत।


और इतने लोगों के घरों को छत देने वाला,

बदल न सका अपने घर का टूटा छप्पर।


✍️ डॉ० सुनीता डंडरियाल (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड)

❤️ प्रेम और विश्वास ❤️








प्रेम कोई शब्द नहीं,

जो होंठों से कहा जाए,

प्रेम तो वह एहसास है,

जो ख़ामोशी में भी समझा जाए।


प्रेम है किसी की मुस्कान में

अपनी खुशी तलाश लेना,

उसकी आँखों में छिपे आँसू,

बिन कहे पढ़ लेना।


प्रेम है दूर रहकर भी,

दिल के पास बने रहना,

रिश्तों की भीड़ में,

किसी एक का ख़ास बने रहना।


न वादों की ज़रूरत,

न कसमें, न कोई शर्त,

जहाँ मन निःस्वार्थ हो जाए,

वहीं जन्म लेता है प्रेम।


प्रेम तो वह दीप है

जो आँधियों में भी जलता है,

और सच्चा हो अगर,

तो उम्र भर साथ चलता है।


✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

गुरुवार, सितंबर 03, 2026

🧩 भाग्य और संघर्ष 🧩







भाग्य प्रत्येक का,

यहाँ भिन्न-भिन्न है। 

जिसने जन्म लिया,

इस पृथ्वी पर, 

उसे स्वयं ही ज्ञात नही,

उसके भाग्य में क्या है ? 

परंतु प्रत्येक जीव-प्राणी,

यहाँ जीवन जीता है।


भाग्य में आने वाली विपत्तियों पर,

कोई शीघ्र ही विजय प्राप्त करता है। 

तो कोई नियति से युद्ध करते-करते,

जीवन की कालरात्रि में जीता है।

नियति का यह खेल,

किसी को भी समझ नही आया। 

परंतु फिर भी जुझारू,

साहसी व्यक्ति ने,

'भाग्य' को कभी कोसा नही।


✍️ पुजा हरिश्चंद्र धनू ( पालघर, महाराष्ट्र )

🌺 माँ, ममता का दर्पण 🌺









माँ तो ममता का दर्पण है,
इस पर मेरा जीवन अर्पण है।

माँ तो मूर्त त्याग की है,
सीधे सच्चे अनुराग की है।

माँ शब्द इतना निर्मल है,
जितना स्वच्छ गंगाजल है।

यह एक शब्द है इतना पावन,
ज्यों मंदिर में भगवान है।

इस एक शब्द की महिमा देखो,
अगणित जीवन बलिदान है।

माँ शब्द में इतनी भक्ति है,
तपस्वी की जैसे भक्ति।

माँ तो प्रतीक है प्यार की,
सीधे सच्चे अनुराग की।

माँ ही देती वह ज्ञान है,
जिससे रहते हम अनजान हैं।

माँ शब्द का निष्कर्ष यही है,
मानव का उत्कर्ष यही है।

यह महिमा है उस एक शब्द की,
जो कि अपरम्पार है।

इसी शब्द के कारण देखो,
धरती बनता हर एक परिवार है।


✍️ डॉ० सुनीता डंडरियाल ( पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड )

मंगलवार, सितंबर 01, 2026

🎋 जख्म फिर हरा हुआ है 🎋


 


दिल को जाने आज क्या हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है,

किसी के हाथ पर तुम्हारा,

नाम लिखा हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है।


दर्द में दर्द का एहसास कब हुआ है,

तुम्हारे दिए हुए दर्द से. 

दिल भरा हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है।


मत पूछ उदासी का सबब हमसे,

दबी चिंगारी के भड़कने से,

दिल जला हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है,


बीते हुए लम्हों को हम भुला न पाए,

यादों का बड़ा वह गट्ठर,

दिल में पड़ा हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है,


भींगती नही है अब कभी भी आंखें,

यूँ आंखों का सारा पानी,

अंदर भरा हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है।


✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )

👸 गृहिणी की कहानी 👸

एक नारी के अनेक रूप होते हैं,
हर रूप में वह विशेष होती है,
पर गृहिणी के रूप में,
वह सबसे अव्वल होती है।

सुबह की पहली किरण से पहले उठती,
सबकी जरूरतों का ध्यान रखती,
किसी की माँ, किसी की पत्नी,
किसी की बेटी बनकर रहती।

सबके साथ होते हुए भी,
कभी-कभी स्वयं में अकेली होती है,
सबके चेहरे पर मुस्कान देखकर,
मन ही मन मुस्कुराती है।

कभी गुनगुनाती, कभी चहकती,
घर को अपना संसार समझती,
पर किसी कोने में उसके मन के कुछ 
अधूरे सपने भी पलते हैं।

कभी थी अपनी एक पहचान,
अपने सपनों की उड़ान,
अपने स्वाभिमान का अभिमान,
अपने अस्तित्व की अलग पहचान।

फिर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता गया,
समय धीरे-धीरे हाथ से फिसलता गया,
सबको सँवारते-सँवारते वह,
खुद को ही भूलती चली गई।

माँ बनकर ममता लुटाई,
पत्नी बनकर साथ निभाया,
बहू बनकर घर को अपनाया,
हर रिश्ते को दिल से निभाया।

जो देखा, जो सीखा,
उसे अपने जीवन में उतारा,
अपनों की खुशियों के लिए
हर पल खुद को ही सँवारा।

पर कभी किसी ने पूछा —
“तुम्हारी भी कोई चाहत है ?”
कभी किसी ने जानना चाहा —
“तुम्हारे मन की भी कोई आहट है ?”

सबको खुश करने की चाह में,
वह खुद से दूर होती गई,
अपने सपनों की डोर थामे,
चुपचाप कहीं खोती गई।

पर गृहिणी केवल घर की चारदीवारी नही,
वह घर की नींव होती है।
उसके त्याग से घर सँवरता है,
उसकी ममता से हर धड़कन जुड़ी होती है।

अब समय है कि वह अपने सपनों को 
फिर से पहचाने,
अपने अस्तित्व को सम्मान दे,
अपनी पहचान फिर से बनाए।

घर भी उसका, सपने भी उसके,
उड़ान भी उसकी, आसमान भी उसका,
वह केवल किसी की माँ या पत्नी नही,
वह स्वयं भी एक संपूर्ण व्यक्तित्व है।

गृहिणी होना उसकी सीमा नही,
यह तो उसके सामर्थ्य की पहचान है,
जो घर को स्वर्ग बना दे,
वह नारी सच में महान है।

✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

शनिवार, अगस्त 29, 2026

🧩 गृहिणी की भावनाएँ 🧩

दिनभर घर में रहती हो, भला तुम्हें क्या काम है ? 
सतत सुनाते रहते मुझको, तुम ऐसा पैगाम है।             
तथापि इस गृह की खातिर और हर सदस्य के निमित्त,
प्राण दांव पर रख करती हूँ, कर्तव्यों को अमित ॥१॥

मुझे नहीं चाहिए कोई, मास का पारिश्रमिक-वेतन, 
पर वर्षभर के गृह-कर्मों का, कर लेना तुम संचेतन।
बदले में बस सादर मुझ पर, शब्द-प्रशंसा के सुमन बिखेरना,
मेरी निश्चल सेवा को तुम, अपनी कृतज्ञता से घेरना ॥२॥ 

मैं न मांगती बहुमूल्य साड़ी, और न कोई रत्नहार,
किंतु कदापि समाज सम्मुख, करना न मेरा तिरस्कार।
चार जनों के बीच न करना, कभी मेरा मानमर्दन,
पराजित न करना मुझको, न दुखाना मेरा मन ॥३॥

मुझे गृहस्वामिनी कहलाने में, आता परम आनंद है,
क्योंकि मुझे स्व-अस्तित्व पर, अभिमान अमंद है।
स्व-सामर्थ्य से चौबीसों घंटे, इस संसार को पुष्पित करती हूँ,
बिना किसी प्रतिफल के मैं, यह घर-आँगन खुशियों से भरती हूँ ॥४॥

✍️ पुजा हरिश्चंद्र धनू ( पालघर, महाराष्ट्र )




शुक्रवार, अगस्त 28, 2026

🪅 ख़्वाहिशें 🪅

ख़्वाहिश की क्या बात कहूँ,
पूरी कब होती मन की ख़्वाहिश ?
कभी बन जाती है सपना कोई,
कभी आँखों में पलती ख़्वाहिश।

ख़्वाहिश हो या हो अभिलाषा,
चाहत हो या फिर हो कामना,
सब एक ही डोर से बँधे हैं,
मन की सुंदर भावनाओं से।

मन में छोटी-छोटी ख़्वाहिशें ही तो,
जीवन को देती हैं नई दिशा,
इन्ही के सहारे इंसान,
पहुँचता है अपनी मंज़िल तक।

हर इंसान के मन में होती,
कुछ अनकही-सी ख़्वाहिशें,
कुछ पूरी होकर मुस्काती हैं,
कुछ बन जाती हैं यादें।

मैं ख़ुद की ख़्वाहिश जता न पाई,
मन की बातें कह न पाई,
कुछ सपने आँखों में रखकर,
जीवन-पथ पर चलती ही रही।

ख़्वाहिशें मेरी अधूरी सही,
पर कोशिशें अधूरी न रही,
हर ठोकर से सीख लिया मैंने,
हर मुश्किल में राह नई।

कभी कामना का आँचल छोटा न रखना,
सपनों को सीमाओं में मत बाँधना,
जितना बड़ा होगा ख़्वाहिशों का आँचल,
उड़ान उतनी ही ऊँची होगी।

ख़्वाहिशों को पंख लगाकर,
आसमान छूने की चाह रखो,
राह कठिन हो, चाहे जितनी,
दिल में आगे बढ़ने की राह रखो।

कुछ ख़्वाहिशें पूरी होंगी,
कुछ शायद अधूरी रह जाएँगी,
पर कोशिशों की राह पर चलकर,
ज़िंदगी फिर भी मुस्कुराएगी।

क्योंकि ख़्वाहिश केवल पाने का नाम नही,
यह तो जीने का एक बहाना है,
जो सपनों को सच करने निकले,
वही जीवन का सच्चा दीवाना है।

मेरी ख़्वाहिशें मेरी अपनी हैं,
कुछ अनकही, कुछ अनजानी,
पूरी हों या अधूरी रहें,
इनसे ही तो है मेरी कहानी।

✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

🦚 तुम्हारे बिना 🦚

दर्द की चादर,

सुबह रो-रो के आसमां ने,

आंखें लाल कर ली थी,

समंदर भी रात भर रोया था,

सुबह जो उसकी रेत गीली थी,

सच है रात ने भी आंसू बहाए थे,

सुबह फूलों पर ओस की बूंदे पड़ी थी,

चांद तारे भी रोए थे,

धरती जो गीली थी,

सुबह पेड़ों के झुरमुट से सूरज ने झांक कर देखा,

पूछा क्या बात है खामोश क्यों हो ?

क्यों सूनी है आंखे मायूस क्यों हो ?

मैंने कहा पूछो इन पेड़ों से जो रात भर आंसू बहाते रहे,

पूछो इन पहाड़ों से जो रात भर मेरे आंसू पोछते रहे,

इन नजारों से भी पूछ लेना जो मुझसे नजरें न मिला पाए,

इन बहारों से भी पूछ लेना क्यूं ये इतना मुझको रुलाए,

दिनकर बोला नजर को बदलो फिर नजारे भी बदल जाएंगे,

सोच को बदलो समंदर जमीन,

चांद तारे खूबसूरत नजर आएंगे,

तुमने दर्द की चादर लपेट रखी है,

जरा उसे उतारकर तुम फेको, 

मुझे रोज डूबना पड़ता है-क्या मैं रोता हूँ मुझे देखो,

मैंने गौर से देखा सूरज भू पर सिंदूरी रंग बिखेर रहा था,

लाल रंग और कूची से मानो,

चित्र उकेर रहा था,

मैं क्षणभर सब कुछ भूल कर,

उन सिंदूरी चित्रों को निहारने लगी,

सचमुच ही धरती अब मुझे सुंदर नजर आने लगी,

मुझे सुंदर नजर आने लगी।


  ✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )



शनिवार, मार्च 02, 2024

🍥 कुछ रिश्ते ऐसे भी…. 🍥









बन जाते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी

जो बांध देते हैं, हमें किसी से भी

कुछ रिश्ते ईश्वर की देन होते हैं

कुछ रिश्ते हम स्वयं बनाते हैं।


बन जाते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी

जो अपनों से बढ़कर अपने होते हैं

स्नेह और विश्वास से जो बने

वह रिश्ते जीवन पर्यंत साथ निभाते हैं।


आ जाती है समझ जब अहमियत रिश्तो की

वह रिश्ते कई मक़ाम पार कर जाते हैं

होते हैं कुछ रिश्ते विश्वास के ऐसे भी

जो हमारे जीवन में सबसे खास बन जाते हैं।।


✍️ रुचि पारीक ( अजमेर, राजस्थान )

बुधवार, फ़रवरी 28, 2024

👨‍👩‍👧‍👧 रिश्ते 👨‍👩‍👧‍👧


   








जीवन में जरूरी हैं रिश्तों की छांव,

बिन रिश्ते जीवन बन जाए एक घाव।

रिश्ते होते हैं प्यार और अपनेपन के भूखे,

बिना ममता और स्नेह के रिश्ते लगे रूखे।


हर रिश्ते का हैं अपना एक महत्व,

बेनाम रिश्तों का ना हैं कोई अस्तित्व।

जीवन रूपी पेड़ की रिश्ते हैं अलग-अलग टहनी,

होती हैं इन टहनियों में कभी-कभी कहासुनी।


रिश्तों के बीच चलता हैं कभी-कभी मनमुटाव,

फिर भी होता हैं रिश्तों में अपनो के प्रति झुकाव।


✍️ करिश्मा नरेंद्र मल ( गढ़चिरौली, महाराष्ट्र )

मंगलवार, फ़रवरी 20, 2024

💞 आप हमारी जान हो गए 💞








अब तक थी जिंदगी मेरी अपनी

अब जिंदगी से बढ़कर आप हो गए

आपको तो यह पता भी नही चला

हम आपके इतने करीब और…..                         आप हमारे लिए सबसे खास हो गए

आए थे कुछ मोड़, अकेले जीवन में                

अब हर मोड़ पर आप हमारे साथ हो गए।


चल रहे थे अकेले कहीं अब तक

आपके प्यार और विश्वास से

हम और आपके पास हो गए

अब तक जीवन में था कुछ खालीपन

आपके आने से आया इसमें नयापन

भर गए नए रंग इसके हर पन्ने में

हर पल बन गया सुरीला इसके हर कोने में।


खींचे चले आए मन के इन धागों से

जो आपकी चाहत में बंध गए

कब से तलाश थी इन आंखों को आपकी

अब इनमें आप बस गए

जगह ही नही किसी और के आने की

होता क्या है प्यार इससे अनजान थे

आपकी मोहब्बत में अब यह जान गए।

       

जान गए हैं आपको इस कदर

कि खुद से भी अनजान हो गए

जानते ना थे कोई इतना चाहेगा

साथ ले जाएगा अपना बनाकर

अब तक थी जिंदगी मेरी अपनी

अब जिंदगी से बढ़कर आप हो गए

अब तक थे अनजान इस अहसास से कि

हम आपकी और आप हमारी जान हो गए।।

  

✍️ रुचि पारीक ( अजमेर, राजस्थान )

सोमवार, फ़रवरी 19, 2024

🥦 बसंत की बहार 🥦








बसंत की बहार हैं आई,

देकर शीत लहर को बिदाई।

खेतों में हैं नई फसले लहराई,

मौसम ने ली हैं अंगड़ाई।


भौर होते ही पंछी बोले,

सूरज अपने लालिमा में डोले।

पेड़ नई-नई शाखाएं खोले,

बेर, अमरूद से भर लो झोले।


सुनहरी धूप मन को भाए,

घर-घर में हरियाली छाए।

हुआ हैं देखो बसंत का आगमन,

करें सब माँ सरस्वती को वंदन।


✍️ करिश्मा नरेंद्र मल ( गढ़चिरौली, महाराष्ट्र )

शनिवार, फ़रवरी 03, 2024

💞 प्रेम 💞









हाँ यही प्रेम है

जिसकी कोई अभिलाषा नही

कुछ मन के एहसासों से पूर्ण

शब्द रूपी जिसकी कोई भाषा नही


राधा से कृष्ण का

संतान से माता-पिता का

बिरहा से विरहनी का

प्रकृति से जीवों का 

उत्पन्न हो जाए

जिस भी रूप में स्नेह


प्रीत, वात्सल्य और अधिकार में

जो उमड़ जाए 

हृदय के कई भावों और विचार में

छलक जाते हैं जो नाम

नैनों से बहके अश्रु धार में

वही सच्चा प्रेम है


जो स्वयं में परिपूर्ण है

रह जाता है अधूरा भी

फिर भी वह पूर्ण है

पाना नही पाना 

बस एक भाव है

वरना प्रेम जैसा तो

ना कोई भंडार है

 

हाँ यही वह प्रेम है

जिसकी कोई अभिलाषा नही

है स्वयं में परिपूर्ण

अन्य किसी से कोई आशा नही।


 ✍️ रुचि पारीक ( अजमेर, राजस्थान )

बुधवार, जनवरी 24, 2024

🎄श्रृंगार🎄



हे प्रियतम !

    आपसे मैं हूँ और आपसे ही मेरा श्रृंगार......।


    नही चाहिए मुझे कोई श्रृंगार-स्वर्ण

    मिल जाए बस आपका स्नेह..

    हो जाऊंगी मैं पूर्ण...,

    प्रियतम के प्रेम सा, नही कोई श्रृंगार

    आ जाए और भी निखार..

    हो जाए सब श्रृंगार...,

          

    आपके नाम का सिंदूर, काजल रहे..

    बिंदी, पायल, बिछिया..

    और मंगलसूत्र रहे...,

    हो जाएंगे मेरे सोलह श्रृंगार.,

    जीवन भर आपका स्नेह साथ रहे...,


    बस इसी आरजू के साथ..

    चहकती रहूँ, करती रहूँ..,

    जीवन पर्यंत आपके नाम का श्रृंगार..,


    क्योंकि हे प्रियतम !

    आपसे मैं हूँ और आपसे ही मेरा श्रृंगार......।


    ✍️ रुचि पारीक ( अजमेर, राजस्थान )

💠 हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी 💠

    चाहे हों हम हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई। भारत माता की संतानें, हम सब हैं भाई-भाई।  एक हमारी रगों में बहता खून, और एक हैं हमारे रंग रूप। ...