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रविवार, अगस्त 30, 2026

💠 तीज आधारित लघुकथाएं 💠

 1. ( माँ की हरी साड़ी )

शादी के बाद पहली तीज पर बेटी मायके नही जा पाती। माँ अपनी पुरानी हरी साड़ी काटकर उसके लिए एक छोटा-सा पोटली बैग सिलकर भेजती है, जिसमें चूड़ियाँ, मेहंदी और बचपन की एक तस्वीर होती है। बेटी समझती है कि माँ ने केवल सामान नही, अपना बचपन उसके पास भेजा है।

 2. ( भाई का इंतज़ार )

तीज के दिन बहन सुबह से दरवाज़े पर भाई की राह देखती है। शाम तक वह नही आता। रात को दरवाज़ा खुलता है—भाई बारिश में भीगा हुआ खड़ा है। नौकरी के कारण दूर था, लेकिन उसने कहा,
“तेरी तीज की पींघ बिना झुलाए मुझे नींद कैसे आती ?”

3. ( पहली तीज )

नई दुल्हन को ससुराल में तीज की परंपराएँ मालूम नहीं होती। सास उसे बेटी की तरह तैयार करती है और कहती है—
“बहू बनकर आई हो, लेकिन तीज के दिन तुम पहले मेरी बेटी हो।”
दो पीढ़ियों की स्त्रियों के बीच एक नया रिश्ता जन्म लेता है.... जो सास बहू के रिश्ते के परे होता है।

4. ( बंद संदूकची )

माँ के निधन के वर्षों बाद बेटी को तीज पर उनकी संदूकची मिलती है। उसमें हर साल की तीज के लिए रखी गई छोटी-छोटी चीज़ें—हरी चूड़ियाँ, मेहंदी के सूखे पत्ते और बेटी के नाम लिखे अधूरे पत्र।
अंतिम पत्र में केवल एक पंक्ति होती है—
“अगली तीज पर मुझे याद करके झूला ज़रूर झूलना।” उसने डबडबाई आंखों से सोचा कि सच है मां ने हमेशा उसे तीज मनाने को प्रोत्साहित किया है।

5. ( नीम का झूला )

गाँव का पुराना नीम का पेड़ कटने वाला है। उसी पेड़ पर हर साल तीज का झूला पड़ता था। गाँव की बेटियाँ मिलकर पेड़ बचाने की मुहिम शुरू करती हैं। अंततः पेड़ बच जाता है और उस वर्ष पहली पींघ सबसे बुज़ुर्ग दादी लगाती हैं।

6. ( वह तीज जो अधूरी रह गई )

एक महिला हर साल पति की लंबी उम्र के लिए तीज का व्रत रखती है। एक साल पति गंभीर रूप से बीमार पड़ जाता है। वह पहली बार महसूस करती है कि प्रेम केवल किसी की लंबी उम्र माँगना नही, बल्कि बीमारी और कठिनाई में उसके साथ खड़े रहना भी है।

 7. ( परदेस वाली बेटी )

बेटी विदेश में है और पहली बार तीज पर घर नही आ सकती। माँ वीडियो कॉल पर उसके लिए झूला सजाती है। अचानक भाई कैमरा घुमाता है—उसने घर की छत पर छोटा-सा झूला लगा रखा है। दोनों अलग-अलग देशों में होते हुए भी एक साथ तीज पर्व मनाते हैं।

 8. ( आखिरी पींघ )

अस्सी साल की दादी अपनी पोती से कहती हैं, “इस बार मुझे झूले पर बैठा दे।” पोती हँसते हुए उन्हें झूला झुलाती है। दादी कहती हैं,“अब मेरी पींघ छोटी हो गई है, पर मेरी यादें बहुत लंबी हैं।” कहानी उनके बचपन की तीज की स्मृतियों के साथ समाप्त होती है।

✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )
 



बुधवार, दिसंबर 07, 2022

🦋 भाग्यवान 🦋

अरे ! बेटा सुन वो कमली कहाँ मर गयी देख कर आ तो, माँ सुनो ना ! तुम कमला को ऐसे मत बोला करो, वो मेरी पत्नी है। सात फेरे और सात वचन देकर मैं उसे ब्याह कर लाया हूँ, वो मेरा भाग्य है। आप क्यों उसे जबरन बात-बात पर ताना मारती रहती है। का‌‌हे का भाग्य अभागी है वो जनमते ही अपने बाप को खा गयी।थोड़ी बड़ी हुई तो इकलौता भाई था वो भी नही रहा फिर जैसे ही ब्याह हुआ अपनी माँ को भी हजम कर गयी ऐसी औरत कहाँ से तेरा भाग्य बनायेगी। माँ उसमें उसका क्या दोष आप उसको काहे कोस रहे हो। मानव जितनी उमर लिखा कर आता है पूरी होते ही चला जाता है। हाँ बस मौत का कारण कोई न कोई बन जाता है। आपको पता है पत्नी को अर्द्धांगिनी क्यों कहते हैं, क्योंकि शादी होते ही पति-पत्नी शरीर से भले दो रहे पर जान एक रहती है और बताऊं पत्नी को भाग्यवान क्यों बुलाते हैं। क्योंकि एक औरत माँ बनकर बच्चों को संस्कारवान बनाती है, उनके कर्म से उनका भाग्य बनता है फिर बहन और बेटी बनकर कन्यादान करवाकार पुण्य कमाने का मौका देती है। ये मौका भी सौभाग्य से मिलता है, और फिर पत्नी बनकर उम्र भर पति के भाग्य को चमकाने के लिये प्रयत्न करती रहती है। भाग्य कोई लिखा कर नही लाता माँ, वो तो मानव अपने कर्मों से बनाता है। मैं ऐसे ही कमला को भाग्यवान नहीं बुलाता हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि वो सौभाग्य से मुझे मिली है।

                     ✍️ दीप्ति शर्मा दीप ( जटनी, उड़ीसा )

मंगलवार, नवंबर 15, 2022

🤹 बचपन मरने ना दो 🤹

"मेम साहब मुझे बुखार हो रहा है, एक दो दिन की छुट्टी चाहिए "राधिका ने कहा। कैसी बात कर रही है राधिका, तुझे पता है ना मेरे पास बिल्कुल भी समय नहीं होता है तू किसी और को बोल अपनी जगह काम करने को" सुधा बोली। "मेम साहब मैंने पूछा था पर कोई भी साथ की कामवाली तैयार नही है।" मुझे नही पता राधिका, तेरी बेटी भी तो है तू उसको भेज दे अपनी जगह।" "कैसी बात कर रही हैं मेम साहब वो तो अभी छोटी बच्ची है और स्कूल जाती है। वैसे भी मैं अपनी बच्ची का बचपन नही छीन सकती।" "देख राधिका मुझे कुछ नहीं पता या तो तू अपनी जगह बेटी को भेज नही तो मैं किसी और को रख लूंगी। मेरे पास समय नही होता घर के काम का और कल बाल दिवस है मेरे कल कई कार्यक्रम है।" कहकर सुधा ने फोन रख दिया। पास बैठे सुधा के पति जो सारी बातें सुन रहे थे बोले "क्या हुआ सुधा क्यों इतनी परेशान हो ?" अरे ! ये राधिका जरूरत के समय छुट्टी कर लेती है और अपनी बच्ची को भी नही भेज रही।" तुम परेशान ना हो कल मेरी और पीहू की छुट्टी है हम दोनों मिलकर सब संभाल लेंगे तुम अपने बाल दिवस के कार्यक्रम पर ध्यान दो जहां तुम मुख्य अतिथि हो"। "कैसी बात कर रहे हैं आप पीहू छोटी बच्ची है वो घर का काम कैसे करेगी।" " वैसे ही जैसे राधिका की बेटी करेगी, पीहू उसकी ही हम उम्र है ना तो हमारी बेटी भी तो कर सकती है ना" सुधा के पति ने कहा। सुधा को समझ आ गया कि वो क्या गलती कर रही थी। मुझे माफ कर दीजिए भूल गई थी कि अपने स्वार्थ में मैं किसी बच्चे का बचपन छीनने चली थी। मैं अभी राधिका को फोन कर के माफी मांगती हूँ।

                   ✍️ स्मिता चौहान ( गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश )

बुधवार, जुलाई 06, 2022

🍁 मजबूत पंख से ही ऊंची उड़ान 🍁

अजय और विजय दो भाई थे। विजय जितना समझदार और इरादों का पक्का था, अजय उतना ही लापरवाह। विजय जो भी करता पूरी तैयारी और लगन के साथ करता। अजय के सपने बहुत बड़े थे, लेकिन उन सपनो को हासिल करने के लिए अपने पंख मजबूत नही करता। वह ऊंची उड़ान के ख्वाब तो देखता, लेकिन आसमान में उड़ता रह जाता। विजय उसे लाख समझाता लेकिन अजय की अक्ल पर पत्थर पड़े थे। अपने आलस्य और हठधर्मी के कारण विजय अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच हँसी का पात्र बन गया था। उसकी शारीरिक बनावट खराब हो गई, उसे कई तरह की बीमारियों ने भी घेर लिया। हस्पताल में पड़े-पड़े उसकी आंखें खुली और उसने दृढ़ निश्चय किया, कि अब मुझे अपने पंख मजबूत करके ऊंची उड़ान भरनी ही होगी। हस्पताल से छुट्टी के बाद, उसने छोटे-छोटे कदम बढ़ाते हुए अपना लक्ष्य साधा। उसने डाइटीशियन की मदद से अपना अपने खाने-पीने पे ध्यान दिया, साथ ही योग करना भी शुरू किया। वह रोज सवेरे उठ के ध्यान करता और रात को सोने से पहले प्रभु से अपने लिए हिम्मत और साहस की प्रार्थना। वह नियम और समय सूची बना के पढ़ाई भी करने लगा। धीरे-धीरे सब उसकी सराहना करने लगे। उसके वो सभी सहपाठी जो उसका मजाक उड़ाते थे, नीचा दिखाते थे वो सभी ईर्ष्या से भर गए। वे सभी अजय को डराने-धमकाने लगे लेकिन अजय के हौसले पस्त नही हुए। जब उसका बारहवीं का परिणाम आया तो उसके सभी अध्यापकगण और प्राचार्य ने उसकी तारीफ की और कहा कि जो भी अपने पंख मजबूत करके ऊंची उड़ान भरने का साहस करता है। मंजिल उसे जरूर मिलती है। अजय इस बात का सबसे बढ़िया उदाहरण है, क्योंकि इसने ना सिर्फ अपनी नाकामी को दूर किया अपितु पूरे जिले में पांचवीं रैंक लाकर हमारे स्कूल का नाम भी रोशन किया है। 

                                    
                                 ✍️ प्राप्ति सिंह ( हैदराबाद, तेलंगाना )

सोमवार, अप्रैल 25, 2022

👨‍👩‍👧‍👧 अनजाना रिश्ता 👨‍👩‍👧‍👧

शर्मीली आसपास के घरों में छोटे बड़े काम कर अपना घर संभालती थी कुशल गृहिणी की तरह। अभी वह घर का काम निपटा रही थी। निक्की और चिंकी आंगन में खेल रहे थे। हल्की-हल्की रिमझिम बारिश का आनंद ले रहे थे। कागज की कश्तियां पानी में बहती देख झूम-झूम नाच रहे थे। राहत भरी ठंडक से खुश हो रहे थे। पड़ोस के बिल्डिंग में रहने वाले बच्चें भी साथ थे। प्यारी नन्ही गुंजन भी साथ खेल रही थी। कोई भेद नही था किसी के मन में। न कोई अमीर था, न गरीब। न ऊँच-नीच की दीवार। निर्मल प्रेमभरा दोस्ती का रिश्ता अनजाना जैसे बारिश तेज हुई, शर्मीली निक्की, चिंकी को घर के अंदर बुला लायी। तूफानी हवाएं तेज चलने लगी थी। काली आंधी से चारों ओर धूल ही धूल नजर आ रही थी। जोर-शोर से बिजली चमक रही थी। हल्का-हल्का अंधेरा छाने लगा था। गुंजन को शर्मीली घर छोड़ आई। गरज-गरज कर बादल बरसने लगे थे। और अनहोनी हुई। धड़ाड़ धूम। जोर से आवाज आयी और बाजूवाली बिल्डिंग की गैलरी लहलहाती गिर पड़ी। नन्ही गुंजन गैलरी में खड़ी, भयभीत हो आसपास देख रही थी। मलबा ही मलबा। भयाक्रांत चीखें। डरी-डरी, सहमी-सहमी, नन्ही गुंजन, निःशब्द खड़ी थी। शर्मीली का गुंजन के घर आना-जाना था। गुंजन की दादी जी उसे काम के लिए कई बार बुलाती थी। जब भी मेहमान आते, फुर्तीली शर्मीली के काम संभालने से वह निश्चिंत हो जाती। दादी जी भी उसका पूरा ख्याल रखती। खाना, बच्चों को कपड़े, उसे साड़ी देने के लिए कोइ न कोई  बहाना ढूंढती। मिठाई, बिस्कुट थैला भर-भर देती। हृदय से अमीर थे वे। सोच के भंवर से शर्मीली बाहर आई। मुसीबत में फंसे गुंजन के लिए उसने अपने आस-पास रहने वाले नौजवानों को पुकारा। भारी बारिश की परवाह किये बगैर दौड़े चले आये सब। बिल्डिंग के दूसरे माले पर ही था गुंजन का घर। नौजवानों ने गुंजन को आराम से सुरक्षित उतार लिया। दादा जी और दादी जी को भी। आज शर्मीली के घर गुंजन, उसके दादा जी, दादी जी की खूब आवभगत हो रही थी। साफ-सुथरी झोंपड़ी में शर्मीली प्यार से दाल भात खिला रही थी। पंच पकवानों से भी स्वाद। इंसानियत की महक से महकते इस रिश्तें में आत्मीयता का एहसास था। गुंजन को बचाने वाले फरिश्तों जैसे नौजवानों से जन्म-जन्म का स्नेहबंध बंध गया था।

                       

  ✍️ चंचल जैन ( मुंबई, महाराष्ट्र )



गुरुवार, अप्रैल 21, 2022

🦋 संस्कार और अनुशासन का महत्व 🦋

आज रिया बहुत खुश थी उसको स्कॉलरशिप मिली थी उसे बाहर जाने का मौका मिला था अपनी योग्यता के बल पर। उसने घर पर जैसे ही खबर दी उसकी माँ ने मना कर दिया। "क्यों मां क्यों मना कर रही हैं आप ? भईया के समय तो आप बहुत खुश हुई थी और उनको भेजने को राजी हो गई थी। "रिया ने अपनी माँ से आश्चर्य से पूछा। "बेकार की बातें मत करो रिया, तुम लड़की हो कैसे भेज दूँ तुम्हें लोग क्या कहेंगे कि कैसा परिवार है कैसी लड़की है संस्कारहीन। और बाहर हम तो तुम्हारे साथ नहीं होंगे रात-बिरात कहीं आना-जाना पड़ा तो कैसे होगा। "रिया जायेगी" बाहर खड़े रिया के पिता बोले, सुनीता हम अपने ही बच्चों के लिए संस्कार और अनुशासन के अलग-अलग मापदंड बना रहे हैं सिर्फ़ इसलिए कि एक लड़का है और एक लड़की। जो संस्कार और अनुशासन की शिक्षा हम अपनी बेटियों को देते हैं अगर हम बेटों को भी वही सिखाए तो शायद हमारे समाज में एक बदलाव आए। अगर बेटी का देर सा आना उसके संस्कार और अनुशासन पर सवाल खड़ा करता है तो वह बेटों के लिए सही कैसे हो सकता है। जिस दिन हमारे समाज में संस्कार और अनुशासन की परिभाषा दोनों के लिए एक समान हो जाए तो उस दिन हमें एक संतुलित समाज मिल जाएगा। मैं पूरे समाज को तो नही सुधार सकता पर इस कोशिश में योगदान तो दे सकता हूँ। मेरे घर में संस्कार और अनुशासन का महत्व लड़का और लड़की दोनों के लिए एक समान होगा।

                              ✍️ स्मिता चौहान 
                           ( गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश )





मंगलवार, अप्रैल 19, 2022

🌴 प्रकृति के दिए वरदान 🌴

पापा आप ने इतनी गर्मी में गाँव जाने का प्रोग्राम क्यों बनाया, मेरे दोस्त तो कह रहे थे कि गाँव में तो बिजली भी नही आती, "परेशान सा रोहन अपने पापा के गाँव चलने के निर्णय को लेकर उनसे सवाल पर सवाल कर रहा था। पापा वहां सब बिना टी०वी०, फ्रिज और ए०सी० के कैसे रहते हैं ? "अरे, अरे रुको बेटा ! आप के जितने सवाल हैं ना सब के उत्तर आप को वहां जाकर मिल जायेंगे। अभी तो चलने की तैयारी करो। जब रोहन गाँव अपने घर पहुंचा तो उसकी चाची पानी लायी तो उसको पीने में संकोच हुआ क्योंकि उसने सुना था कि गाँव में आर०ओ० नही होता पर पापा के कहने पर उसने पी लिया और पीते ही उसको पानी का स्वाद मिनरल पानी जैसा लगा और ठंडा भी पर कैसे गाँव में ना तो फिल्टर है और ना फ्रिज ?  रोहन को गाँव में दो दिन हो गए और उसके दिमाग में कई प्रश्न घूमने लगे तो उसके पापा जो इस बात को अच्छे से समझ रहे थे, शाम को उसको लेकर गाँव में घूमने निकले और बाग में आ गए। एक पेड़ के नीचे बैठ कर उन्होंने कहा, क्या हुआ रोहन तुम कुछ परेशान हो‌ ? हाँ पापा मैं देख रहा हूँ कि यहां तो बिजली भी नही आती फिर भी यहां गर्मी नही है ठंडा और शुद्ध पानी मिलता है जबकि हमारे शहर में ऐसा नहीं है। तुम्हें याद है रोहन मैंने तुमसे कहा था कि तुम्हारे सब जवाब मिल जायेंगे तुम्हें वहां। तो सुनो बेटा यहां पर हैंडपंप या कुएं से पानी मिलता है जिसे किसी फिल्टर की जरूरत नही है और वह ठंडा भी रहता है यह हमारी प्रकृति की देन है। गाँव में तुम को हर तरफ पेड़ दिख रहे होगें तभी यहां का वातावरण इतना शुद्ध और ठंडा है जबकि शहरों में हम पेड़ काट-काट कर ईट, कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहें हैं और ए०सी० से और प्रकृति को नुकसान कर रहे हैं।" "बेटा हम कितनी भी तरक्की कर ले प्रकृति से आगे नहीं निकल सकते। यह पेड़, नदियां प्रकृति के दिए हुए वरदान है हमें, पर हम उस की कद्र नही कर रहे और शायद जिसकी सजा हमें कोविड जैसी महामारी के रूप में मिली है। मैं तुम्हें इसलिए ही गाँव लाया कि तुम्हें बता पाऊं कि प्रकृति ने हमें कितने अनमोल वरदान दिए हैं उनका सही उपयोग करना हमारी जिम्मेदारी है। पापा आप बिल्कुल सही कह रहे हो मैं समझ गया। अब वापस जाकर अपने आस-पास पेड़ लगाऊंगा और अपने दोस्तों को भी प्रकृति के वरदान के बारे में बताऊंगा।
                            
                      ✍️ स्मिता चौहान ( गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश )




शनिवार, अप्रैल 09, 2022

🤱चैत्र नवरात्रि में नवपाद ओली🤱

चैत्र नवरात्रि का आगाज होते ही माँ के मन की पांखें खिल जाती थी। अंबा माँ में उसका अटूट विश्वास यूं ही नहीं था। देवी माँ ही थी जो उसकी पीड़ा हरने में उसका जी-जान से साथ देती थी।नवरात्र शुरू होते ही वह नवपद ओली की तैयारी में लग जाती। चैत्र शुक्ल सप्तमी से उसके आयंबिल शुरू हो जाते थे। उम्र के 82 वे पड़ाव पर कई बीमारियों से लड़ते-लड़ते उसका शरीर भले ही कमजोर हो गया था पर मन की दृढ़ता, लक्ष्य के प्रति दीवानगी और असीम,अटूट जिद्द वैसी ही थी जैसी एक नवयौवना षोडशी की। बुढ़ापे में आसान नही था उसके लिए यह सब सिर्फ एक वक्त खाना, वो भी बिना घी, तेल, दूध, दही के ...पीने को सिर्फ गर्म पानी...सूरज ढलने से पहले तक... नौ दिनों तक... लेकिन इरादों की पक्की माँ के लिए यह कांटों भरी पगदंडी नहीं बल्कि मुक्तिमार्ग बन चुका था। शरीर, मन, आत्मा के शुद्धिकरण, कर्म-निर्जरा का ऐसा अनुपम मौका मेरी धर्म परायण माँ कैसे हाथ से जाने देती ? लाख मना करने के बावजूद भी बेटे-बेटियों से लड़-झगड़कर कर, मान-मनुहार कर, आंसू बहा कर आखिर उन्हें मना ही लेती थी वह। पर इस बार हालात सामान्य नही थे। एक तरफ कोरोना वायरस का तांडव और दूसरी तरफ मां की ज़िद। बच्चों में और वयस्कों में शायद ज्यादा अंतर नहीं होता हैं। दोनों मासूम, दोनों हठीले। आखिर हम उसके आगे झुक ही गए। वह धर्म ध्यान में जुट गई पर नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। चैत्र नवरात्रि को कुछ ही दिन बाकी थे और लाख सावधानियां बरतने के बावजूद भी हमारा पूरा परिवार कोराेना की चपेट में आ गया। ऑक्सीजन, बेड, दवाइयां सब के लिए भाईयों ने कहां-कहां नहीं कोशिशें की पर बदकिस्मती हमारी कि हम मां को न तो बचा पाए, न अंगदान की उसकी अंतिम इच्छा पूरी कर पाए।सारी जिंदगी कभी नवपद ओली करने से न चूकने वाली माँ इस बार चूक गई थी। नवरात्र से कुछ दिन पहले ही वह इस मायाजाल को अलविदा कह कर देवी माँ की गोद में समा गई, हमें अनाथ बनाकर।                       

                          ✍️ कुसुम अशोक सुराणा ( मुंबई, महाराष्ट्र )






गुरुवार, मार्च 31, 2022

💞 दिल से दिल का मिलन 💞

रमा की बड़ी-बड़ी आँखियों में ख्वाब थे बड़े-बड़े। आशादीप प्रदीप। अंधकार को चीरने उतावले। खूब पढूंगी, अपना मुकाम हासिल करूंगी। अपने माँ-बापू का ख्याल रखूंगी। अपने छोटे भाई-बहन का पूरा ध्यान रखूंगी। ढेरों अरमान थे दिल में। फलते-फूलते कभी गुब्बारों से फटाक फूट जाते। दिल की सजी सजायी बाग उजाड़-सी प्रतीत होती। पतझड़ के बाद बहार का मौसम लौट आएगा ही। मन ही मन सपनों का शहर सज जाता। उम्मीदों के दीप जल जाते। रोशनी का आगाज होता। दिल क्यों धड़कता हैं धक-धक ? मन ही मन पड़ोस में रहने वाले राणा से नाता जोड़ लिया था उसने। सीधा-साधा, सरल स्वभाव। मीठी बोली, विवेकी, विनयी राणा उसे बहुत पसंद था। उसकी तरह ही टूटी-फूटी झोंपड़ी में बसेरा करता। दिल का बड़ा नेक। मानवता का पुजारी। स्वच्छता अभियान में साफ सफाई करते दोनों की मुलाकात हुई थी। साथ-साथ काम करते न जाने कब प्रेम अंकुरित हुआ, पता ही न चला। राणा को देखते ही रमा के दिल की कली खिल जाती। उसकी छुअन से रोम-रोम खिल जाता। नयन तीर चलते। अधर खामोश रहते। मौन ही प्रेम की अभिव्यक्ति थी। केवल नजरों से नजर मिलती, शर्म से नजरे झुक जाती। प्यार, मोहब्बत क्या यही हैं ? धीरे-धीरे बात झुग्गी झोपड़ी में फैल गयी। दोनों की प्रेम कहानी की महक दूर-दूर तक फैली। रमा के बापू के दोस्त का लड़का बौखला गया। "रमा मेरी हैं, मेरी ही रहेगी। किसी और की वह हो ही नहीं सकती। हमारी बचपन में ही सगाई पक्की हो गयी थी।" रमा के माँ-बापू के पास आकर रिश्ते की बात पक्की कर ली उसने। रमा और राणा की मोहब्बत को जैसे किसी की नजर लग गयी। रोमियो टाइप रोनित उसे जरा भी न सुहाता। पान चबा चबाकर दिन भर थूकता रहता। "मैं राणा से ब्याह करूंगी।" "आपने वचन दिया होगा। मेरा जीवन हैं। जिसे प्यार करती हूँ, वही मेरा जीवनसाथी होगा।" दिल की आवाज को बुलंद साज मिल गया हमदर्द सखियों से। माँ-बापू को राजी कर रमा को राणा से प्रणय बन्धन में बंधवा दिया। दिल से दिल के मिलन से जीवन बाग गुलजार हो गया। अपनी प्रिय सहेलियों के संबल से रमा-राणा का दाम्पत्य जीवन सदा सुखमय, हितकारी रहा। जीवन की महफ़िल में किलकारियों का मधुरिम संगीत गूंजने लगा।

                      ✍️ चंचल जैन ( मुंबई, महाराष्ट्र )




बुधवार, मार्च 16, 2022

💒 अनमोल उपहार 💒

मेधा बहुत ही मेधावी छात्रा थी। खेल कूद में भी बेहतरीन प्रदर्शन कर सबका मन जीत लेती। मीठी बोली, मृदुल व्यवहार। विनम्र स्वभाव से सबकी चहेती। वार्षिक महोत्सव में उसे बहुत सारे पुरस्कारों से पुरस्कृत किया जाना था। अध्यापिका जी ने उससे ही पूछ लिया "बोलो, क्या पुरस्कार स्वरूप उपहार पाकर खुशी होगी तुम्हे ?"
"जो आपको उचित लगे।" बड़ी विनम्रता के साथ उसने कहा। " फिर भी, कुछ तो ख्वाहिश होगी ?"
"मैं कहानी की किताबें लूंगी, कुछ नन्हे-नन्हे पौधों के गमले भी।" उसकी शालीनता के सब कायल थे। अध्यापिका जी ने मन ही मन कुछ सोच विचार किया, कह दिया, "ठीक हैं हम देख लेंगे क्या तोहफा उपहार पुरस्कार स्वरूप देना हैं।"
आज के समारोह में मेधा के प्रिय लेखक माननीय सुशील जी आनेवाले थे। मन अति उल्लसित था। प्रमुदित भी। उनको सुनने को बेताब थी वह। अपने पुरस्कार की बात भूल गयी थी वह। नियोजित समय पर दीप प्रज्ज्वलन हुआ। गणेश वंदना, मां सरस्वती वंदना हुई। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ अतिथि महोदय का स्वागत हुआ। उनके अपने जीवन के अनुभव, सुंदर संस्मरण मंत्रमुग्ध हो सभी सुनते रहे। अब पुरस्कार वितरण का समय आ गया। मेधा का नाम पुकारा गया। अति हर्षित मेधा मंच पर पहुंची। आदर के साथ उसने सबका अभिवादन किया। उसकी पसंदीदा किताबें पुरस्कार स्वरूप पाकर मेधा का मनमयूर झूम रहा था। बार-बार धन्यवाद देती वह मंच से नीचे आयी। अपनी प्रिय सहपाठियों के साथ अपना उपहार सांझा करने का वादा करते उसे परमानंद की अनुभूति हो रही थी। अनमोल उपहार से जीवन में बहार-सा मौसम आ गया था। खुशियां खिलखिला रही थी। 

                                   ✍️ चंचल जैन ( मुंबई, महाराष्ट्र )





सोमवार, मार्च 07, 2022

🌻वास्तविक सुंदरता🌻

"क्या हुआ बेटा, आज तुम कुछ उदास लग रही हो ?" "माँ, क्या मैं सुंदर नही हूँ ?" माँ के प्रश्न के बदले में वैष्णवी ने प्रश्न किया। वैष्णवी उस दिन बहुत उदास थी। स्कूल से लौटकर वो माँ के पास बैठकर घंटो बतियाया करती थी, पर उस दिन वो सीधे अपने कमरे में चली गई। माँ समझ गई थी की आज कुछ तो गड़बड़ है, पर माँ ने उसे कुछ देर अकेले छोड़ना उचित समझा। रात के खाने पर पूरा परिवार एक साथ बैठा था मगर वैष्णवी फिर से अपने ही ख्यालों में गुम थी। खाने के बाद जब सभी अपने-अपने कमरों में सोने चले गए तो माँ वैष्णवी के कमरे में गई, देखा की वो कुछ सोच में डूबी थी। आखिर माँ से रहा न गया और उन्होंने वैष्णवी से उसकी उदासी का कारण पूछ ही लिया। मगर ये क्या, माँ ने इस प्रश्न की उम्मीद तो नहीं की थी। "तुम ऐसा क्यों कह रही हो बेटा, क्या तुमसे किसी ने कुछ कहा ?" नहीं माँ, बस आज स्कूल में हमारी हिंदी की टीचर हमें विशेषण पढ़ा रही थी। उन्होंने मुझे सामने खड़ा किया और बाकी सभी से कहा कि वो लोग मेरी विशेषताएं बताएं। सभी ने कहा कि मैं बहुत मीठा बोलती हूँ, बहुत अच्छी हूँ, विदुषी हूँ। "वो तो तुम हो ही बेटा, इसमें उदास होने जैसा तो कुछ नहीं है।" कहते हुए माँ को अपनी बिटिया पर गर्व महसूस हुआ। परंतु, जब हमारी अध्यापिका ने मेरी विशेषता में सुंदर शब्द को भी जोड़ा तो कक्षा के बच्चे हंसने लगे। विशाल ने तो कह भी दिया कि मैडम ये तो इतनी काली है, ये सुंदर कैसे हो सकती है। कहते-कहते वैष्णवी रोने लगी। तुम बहुत सुंदर हो वैष्णवी, मगर तुम भी वही गलती कर रही हो जो दूसरे लोग करते हैं। अपनी खूबियों को नजरंदाज करके उन कमियों पर विचार करना जो कि तुम में है ही नही। इंसान वास्तव में दिल से सुंदर होता है चेहरे से नही, कहते-कहते माँ ने एक आह भरी और सोचने लगी कि आखिर कब तक ये रंगभेद बालमन को छलनी करता रहेगा।
                               ✍️ निरुपमा बिस्सा ( दुर्ग, छत्तीसगढ़ )




रविवार, फ़रवरी 13, 2022

💞 धागा मन्नतो वाला 💞








आज भी हर मंदिर में उसके नाम का मन्नतों वाला धागा बांध कर ही आती हूँ जाने क्यों, एक अनजाना सा बंधन बंध गया है उससे।
आप भी सोच रहे होगे की आखिर वो है कौन ? जिसका जिक्र मैं हर बार करती हूँ। आज आपको अपने इस स्नेह के बंधन के बारे में सब बताती हूँ।
उसका नाम है अभिजीत। एक प्यारा सा लड़का। कोरोना काल जब प्रारंभ हुआ तो एक दोपहर उसका फोन आया। मैने जैसे ही हैलो कहा उधर से एक चहकती सी आवाज आई "आप शालिनी जी बोल रही हैं ? "
मैने कहा "जी, कहिए मैं शालिनी ही हूँ।" मेरी आवाज सुनकर वो फोन पर जोर जोर से रोने लगा। मैं बार-बार पूछती रही कि क्यों रो रहे हो आप, मुझे क्यों फोन किया, कुछ तो कहिए। मगर जब तक उसका रोना नहीं रुका मुझे इंतजार करना पड़ा, जाने क्यों, मैं भी उसका जवाब सुनने के लिए रुकी रही, शायद मानवीयता के कारण या फिर कुछ और। कभी समझ ही नही पाई। खैर, जब उसका रोना कुछ थमा तो उसने अपने रूंधे गले से जो बोला वो दिल को छू गया। "क्या मैं आपको दीदी कह सकता हूँ ?" अभिजीत ने पूछा !
मैने हंस कर कहा ,"क्या ये कहने के लिए फोन किया था आपने ? " और कहती भी क्या, एक अनजान शख्स ये कहने के लिए तो फोन करेगा नही, तो फिर उसने फोन किया क्यों ? 
"दीदी, आज से ठीक दो महीने पहले आप ही के कारण मेरी जान बची थी। आपको तो याद भी नही होगा, मुझे कोविड हो गया था, मैं अस्पताल में भर्ती था तब मुझे वेंटीलेटर की सख्त आवश्यकता थी और वो कहीं मिल नही रहा था। ऐसे में मेरी माँ को किसी ने आपका नंबर दिया और आपने पूरी ताकत लगा दी मुझे वेंटीलेटर दिलवाने में। यदि उस दिन आप नही होती तो आज मैं भी नही होता, दीदी मैं अब पूरी तरह से ठीक हूँ बस आप जैसी एक दीदी मिल जाए तो और कुछ नही चाहिए, अब से मैं भी आपकी ही संस्था के साथ जुड़ना चाहता हूँ और लोगों की सेवा करना चाहता हूँ।"
वो बोलता गया और मैं अवाक सी सुनती गई। इस बार मेरे आंसू नहीं रोक रहे थे। बस एक ही बात समझ आ रही थी कि जीवन में मैने और कुछ कमाया या नही। पर कुछ, सच्चे रिश्ते जरूर कमाए हैं, जिन्हे मैं कभी खोना नही चाहती।
और इन्ही रिश्तों की डोर से बंधी मैं आज फिर मंदिर आई हूँ, अभिजीत के लिए मन्नतों का धागा बांधने।

                                     ✍️ निरुपमा बिस्सा ( दुर्ग, छत्तीसगढ़ )

शुक्रवार, जनवरी 28, 2022

🏆 हल्ला बोल 🏆








दरवाज़े पर लगी डोरबेल बजती हैं। सुधा टीवी की आवाज़ कम कर दरवाज़ा खोलती हैं। दरवाजा खुलने का इंतज़ार कर रही अज़नबी महिला को देख ठिठक जाती हैं और पुछती हैं।
'ज़ी कहिए किससे मिलना है आपकों..?'

ये सुनकर वो अज़नबी महिला उत्तर देती हैं। 'आप ही से..! क्या हम बात कर सकते हैं..? दरअसल, मुझें आपसे आपके पति के बारे में कुछ बात करनी हैं।'

'रमेश के बारे में बातचीत..! आईये अंदर आईये।' हैरानी जताते हुए सुधा उस महिला को अंदर ले जाती हैं। 

सुधा की जिज्ञासा को शान्त करते हुए वो अज़नबी महिला अपना परिचय देती हैं - 'मेरा नाम नीलिमा हैं आपके पति मेरे मित्र हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसका व्यवहार मेरे प्रति बदल गया हैं। वो मुझसे प्रेम निवेदन करता है।' 

'छी.! ये आप क्या कह रही हैं...? मेरे पति मेरे लिए ईश्वरतुल्य हैं वो किसी पराई स्त्री की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखते। और आप..!' ये कहते हुए सुधा परेशान हो जाती हैं।

'मैं जानती थी आप मेरी बातों पर भरोसा नहीं करेंगी। ये देखिए सोशल मीडिया पर भेजे गए आपके पति के मैसेज और बातचीत की रिकॉर्डिंग।' निर्भीकता से ये कहते हुए नीलिमा अपने सेलफोन पर सुधा को मैसेज दिखाती हैं। 

ये देखकर सुधा धक्क सी रह जाती हैं। फिर अपने आपको संभालते हुए कहती है- 'आमतौर पर महिलाएँ इस तरह की घटनाओं को किसी से साँझा नही करती। फ़िर आप मुझे ये सब ..!'

'वो महिलाए गलती करती हैं ज़ब तक हम महिलाए पुरुषों की करतूतों को उनके घर तक नही पहुँचाएगी तब तक पुरुष हम महिलाओँ का शोषण करता रहेगा। ये सिलसिला तभी टूट सकता है जब प्रत्येक महिला ये ठान ले कि वो दूसरी महिला का अहित कभी नही होने देगी।' नीलिमा ने दृढ़ता से कहा।

'आप ठीक कह रही हैं नीलिमा जी, तभी सही मायनों में एक महिला दूसरी महिला की हितैषी हो सकती हैं।'

'अ.. अ... मुझें लगता है कि मैंने आपका काफ़ी समय ले लिया हैं अच्छा अब मैं चलती हूँ।' ये कहते हुए नीलिमा हाथ जोड़ते हुए बाहर जाने के लिए उठ खड़ी होती है। कि तभी सुधा बोल बड़ती हैं- 'मैं भी ...!'  
नीलिमा बड़ी हैरानी से पुछती हैं -'ज़ी क्या कहा आपने..?'
तब सुधा बड़े इत्मीनान से उत्तर देती हैं। 'आपने जो ये "हल्ला बोल" जागरूकता की शुरूआत की हैं अब मुझे भी तो इसे आगे बढ़ाना हैं।' 

                                  ✍️ जया विनय तागड़े ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

बुधवार, अक्टूबर 13, 2021

👁️‍🗨️ नेत्रदान का महत्व 👁️‍🗨️


आज 'नैना' उसी जगह खड़ी है जहां वह अपने पिता रमाकांत जी के साथ बचपन में आया करती थी। समुद्र की लहरों के बीच बने पुल पर बैठ घंटों अपने पिता से वहां के नजारों को महसूस करती थी। नैना अपने पिता के साथ अकेली रहती थी, उसकी मां बचपन में ही गुजर गई थी। नैना की आंखें बड़ी-बड़ी और सुंदर थी उसे देखकर ही सब ने उसका नाम नैना रखा था, पर एक दिन नैना के साथ हादसा हो गया और उसकी आंखों की रोशनी चली गई। पिता रमाकांत अत्यंत चिंतित थे उसका बहुत ख्याल रखते थे उसके इलाज के लिए कई जगह गए किंतु निराशा ही हाथ लगी। एक दिन अचानक रमाकांत जी घर की सीढ़ियों से गिर गए उन्हें गंभीर चोटें आई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया किंतु होनी को कुछ और ही मंजूर था। रमाकांत जी अपनी बिलखती नैना को छोड़कर चले गए पर अपनी अंतिम सांस लेने से पहले वह नैना को अपने नेत्र दान कर गए थे। उनके बाद नैना उनकी आंखों से दुनिया देख सके यह उनकी अंतिम इच्छा थी। अपनी पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए नैना डाॅक्टर साहब के कहने पर आंखों की सर्जरी कराने के लिए तैयार हो गई। आज आंखों की सर्जरी सफल हो जाने पर नैना सबसे पहले उन्हीं लहरों के बीच बने पुल पर बैठकर अपने पिता को याद करना चाहती हैं जिनको वह पिता रमाकांत से सुना करती थी महसूस किया करती थी। आज वह घने काले बादलों के बीच एक रोशनी देख रही है जो उसके पिता ने जाते हुए आशीर्वाद स्वरुप उसे दी है। उसके मन में लोगों को नेत्रदान का महत्व बताने का विचार भी चल रहा है।


                                           ✍️ डॉ० ऋतु नागर ( मुंबई, महाराष्ट्र )

💠 हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी 💠

    चाहे हों हम हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई। भारत माता की संतानें, हम सब हैं भाई-भाई।  एक हमारी रगों में बहता खून, और एक हैं हमारे रंग रूप। ...