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रविवार, अगस्त 30, 2026
💠 तीज आधारित लघुकथाएं 💠
बुधवार, दिसंबर 07, 2022
🦋 भाग्यवान 🦋
अरे ! बेटा सुन वो कमली कहाँ मर गयी देख कर आ तो, माँ सुनो ना ! तुम कमला को ऐसे मत बोला करो, वो मेरी पत्नी है। सात फेरे और सात वचन देकर मैं उसे ब्याह कर लाया हूँ, वो मेरा भाग्य है। आप क्यों उसे जबरन बात-बात पर ताना मारती रहती है। काहे का भाग्य अभागी है वो जनमते ही अपने बाप को खा गयी।थोड़ी बड़ी हुई तो इकलौता भाई था वो भी नही रहा फिर जैसे ही ब्याह हुआ अपनी माँ को भी हजम कर गयी ऐसी औरत कहाँ से तेरा भाग्य बनायेगी। माँ उसमें उसका क्या दोष आप उसको काहे कोस रहे हो। मानव जितनी उमर लिखा कर आता है पूरी होते ही चला जाता है। हाँ बस मौत का कारण कोई न कोई बन जाता है। आपको पता है पत्नी को अर्द्धांगिनी क्यों कहते हैं, क्योंकि शादी होते ही पति-पत्नी शरीर से भले दो रहे पर जान एक रहती है और बताऊं पत्नी को भाग्यवान क्यों बुलाते हैं। क्योंकि एक औरत माँ बनकर बच्चों को संस्कारवान बनाती है, उनके कर्म से उनका भाग्य बनता है फिर बहन और बेटी बनकर कन्यादान करवाकार पुण्य कमाने का मौका देती है। ये मौका भी सौभाग्य से मिलता है, और फिर पत्नी बनकर उम्र भर पति के भाग्य को चमकाने के लिये प्रयत्न करती रहती है। भाग्य कोई लिखा कर नही लाता माँ, वो तो मानव अपने कर्मों से बनाता है। मैं ऐसे ही कमला को भाग्यवान नहीं बुलाता हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि वो सौभाग्य से मुझे मिली है।
मंगलवार, नवंबर 15, 2022
🤹 बचपन मरने ना दो 🤹
"मेम साहब मुझे बुखार हो रहा है, एक दो दिन की छुट्टी चाहिए "राधिका ने कहा। कैसी बात कर रही है राधिका, तुझे पता है ना मेरे पास बिल्कुल भी समय नहीं होता है तू किसी और को बोल अपनी जगह काम करने को" सुधा बोली। "मेम साहब मैंने पूछा था पर कोई भी साथ की कामवाली तैयार नही है।" मुझे नही पता राधिका, तेरी बेटी भी तो है तू उसको भेज दे अपनी जगह।" "कैसी बात कर रही हैं मेम साहब वो तो अभी छोटी बच्ची है और स्कूल जाती है। वैसे भी मैं अपनी बच्ची का बचपन नही छीन सकती।" "देख राधिका मुझे कुछ नहीं पता या तो तू अपनी जगह बेटी को भेज नही तो मैं किसी और को रख लूंगी। मेरे पास समय नही होता घर के काम का और कल बाल दिवस है मेरे कल कई कार्यक्रम है।" कहकर सुधा ने फोन रख दिया। पास बैठे सुधा के पति जो सारी बातें सुन रहे थे बोले "क्या हुआ सुधा क्यों इतनी परेशान हो ?" अरे ! ये राधिका जरूरत के समय छुट्टी कर लेती है और अपनी बच्ची को भी नही भेज रही।" तुम परेशान ना हो कल मेरी और पीहू की छुट्टी है हम दोनों मिलकर सब संभाल लेंगे तुम अपने बाल दिवस के कार्यक्रम पर ध्यान दो जहां तुम मुख्य अतिथि हो"। "कैसी बात कर रहे हैं आप पीहू छोटी बच्ची है वो घर का काम कैसे करेगी।" " वैसे ही जैसे राधिका की बेटी करेगी, पीहू उसकी ही हम उम्र है ना तो हमारी बेटी भी तो कर सकती है ना" सुधा के पति ने कहा। सुधा को समझ आ गया कि वो क्या गलती कर रही थी। मुझे माफ कर दीजिए भूल गई थी कि अपने स्वार्थ में मैं किसी बच्चे का बचपन छीनने चली थी। मैं अभी राधिका को फोन कर के माफी मांगती हूँ।
बुधवार, जुलाई 06, 2022
🍁 मजबूत पंख से ही ऊंची उड़ान 🍁
अजय और विजय दो भाई थे। विजय जितना समझदार और इरादों का पक्का था, अजय उतना ही लापरवाह। विजय जो भी करता पूरी तैयारी और लगन के साथ करता। अजय के सपने बहुत बड़े थे, लेकिन उन सपनो को हासिल करने के लिए अपने पंख मजबूत नही करता। वह ऊंची उड़ान के ख्वाब तो देखता, लेकिन आसमान में उड़ता रह जाता। विजय उसे लाख समझाता लेकिन अजय की अक्ल पर पत्थर पड़े थे। अपने आलस्य और हठधर्मी के कारण विजय अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच हँसी का पात्र बन गया था। उसकी शारीरिक बनावट खराब हो गई, उसे कई तरह की बीमारियों ने भी घेर लिया। हस्पताल में पड़े-पड़े उसकी आंखें खुली और उसने दृढ़ निश्चय किया, कि अब मुझे अपने पंख मजबूत करके ऊंची उड़ान भरनी ही होगी। हस्पताल से छुट्टी के बाद, उसने छोटे-छोटे कदम बढ़ाते हुए अपना लक्ष्य साधा। उसने डाइटीशियन की मदद से अपना अपने खाने-पीने पे ध्यान दिया, साथ ही योग करना भी शुरू किया। वह रोज सवेरे उठ के ध्यान करता और रात को सोने से पहले प्रभु से अपने लिए हिम्मत और साहस की प्रार्थना। वह नियम और समय सूची बना के पढ़ाई भी करने लगा। धीरे-धीरे सब उसकी सराहना करने लगे। उसके वो सभी सहपाठी जो उसका मजाक उड़ाते थे, नीचा दिखाते थे वो सभी ईर्ष्या से भर गए। वे सभी अजय को डराने-धमकाने लगे लेकिन अजय के हौसले पस्त नही हुए। जब उसका बारहवीं का परिणाम आया तो उसके सभी अध्यापकगण और प्राचार्य ने उसकी तारीफ की और कहा कि जो भी अपने पंख मजबूत करके ऊंची उड़ान भरने का साहस करता है। मंजिल उसे जरूर मिलती है। अजय इस बात का सबसे बढ़िया उदाहरण है, क्योंकि इसने ना सिर्फ अपनी नाकामी को दूर किया अपितु पूरे जिले में पांचवीं रैंक लाकर हमारे स्कूल का नाम भी रोशन किया है।
सोमवार, अप्रैल 25, 2022
👨👩👧👧 अनजाना रिश्ता 👨👩👧👧
शर्मीली आसपास के घरों में छोटे बड़े काम कर अपना घर संभालती थी कुशल गृहिणी की तरह। अभी वह घर का काम निपटा रही थी। निक्की और चिंकी आंगन में खेल रहे थे। हल्की-हल्की रिमझिम बारिश का आनंद ले रहे थे। कागज की कश्तियां पानी में बहती देख झूम-झूम नाच रहे थे। राहत भरी ठंडक से खुश हो रहे थे। पड़ोस के बिल्डिंग में रहने वाले बच्चें भी साथ थे। प्यारी नन्ही गुंजन भी साथ खेल रही थी। कोई भेद नही था किसी के मन में। न कोई अमीर था, न गरीब। न ऊँच-नीच की दीवार। निर्मल प्रेमभरा दोस्ती का रिश्ता अनजाना जैसे बारिश तेज हुई, शर्मीली निक्की, चिंकी को घर के अंदर बुला लायी। तूफानी हवाएं तेज चलने लगी थी। काली आंधी से चारों ओर धूल ही धूल नजर आ रही थी। जोर-शोर से बिजली चमक रही थी। हल्का-हल्का अंधेरा छाने लगा था। गुंजन को शर्मीली घर छोड़ आई। गरज-गरज कर बादल बरसने लगे थे। और अनहोनी हुई। धड़ाड़ धूम। जोर से आवाज आयी और बाजूवाली बिल्डिंग की गैलरी लहलहाती गिर पड़ी। नन्ही गुंजन गैलरी में खड़ी, भयभीत हो आसपास देख रही थी। मलबा ही मलबा। भयाक्रांत चीखें। डरी-डरी, सहमी-सहमी, नन्ही गुंजन, निःशब्द खड़ी थी। शर्मीली का गुंजन के घर आना-जाना था। गुंजन की दादी जी उसे काम के लिए कई बार बुलाती थी। जब भी मेहमान आते, फुर्तीली शर्मीली के काम संभालने से वह निश्चिंत हो जाती। दादी जी भी उसका पूरा ख्याल रखती। खाना, बच्चों को कपड़े, उसे साड़ी देने के लिए कोइ न कोई बहाना ढूंढती। मिठाई, बिस्कुट थैला भर-भर देती। हृदय से अमीर थे वे। सोच के भंवर से शर्मीली बाहर आई। मुसीबत में फंसे गुंजन के लिए उसने अपने आस-पास रहने वाले नौजवानों को पुकारा। भारी बारिश की परवाह किये बगैर दौड़े चले आये सब। बिल्डिंग के दूसरे माले पर ही था गुंजन का घर। नौजवानों ने गुंजन को आराम से सुरक्षित उतार लिया। दादा जी और दादी जी को भी। आज शर्मीली के घर गुंजन, उसके दादा जी, दादी जी की खूब आवभगत हो रही थी। साफ-सुथरी झोंपड़ी में शर्मीली प्यार से दाल भात खिला रही थी। पंच पकवानों से भी स्वाद। इंसानियत की महक से महकते इस रिश्तें में आत्मीयता का एहसास था। गुंजन को बचाने वाले फरिश्तों जैसे नौजवानों से जन्म-जन्म का स्नेहबंध बंध गया था।
✍️ चंचल जैन ( मुंबई, महाराष्ट्र )
गुरुवार, अप्रैल 21, 2022
🦋 संस्कार और अनुशासन का महत्व 🦋
मंगलवार, अप्रैल 19, 2022
🌴 प्रकृति के दिए वरदान 🌴
शनिवार, अप्रैल 09, 2022
🤱चैत्र नवरात्रि में नवपाद ओली🤱
गुरुवार, मार्च 31, 2022
💞 दिल से दिल का मिलन 💞
रमा की बड़ी-बड़ी आँखियों में ख्वाब थे बड़े-बड़े। आशादीप प्रदीप। अंधकार को चीरने उतावले। खूब पढूंगी, अपना मुकाम हासिल करूंगी। अपने माँ-बापू का ख्याल रखूंगी। अपने छोटे भाई-बहन का पूरा ध्यान रखूंगी। ढेरों अरमान थे दिल में। फलते-फूलते कभी गुब्बारों से फटाक फूट जाते। दिल की सजी सजायी बाग उजाड़-सी प्रतीत होती। पतझड़ के बाद बहार का मौसम लौट आएगा ही। मन ही मन सपनों का शहर सज जाता। उम्मीदों के दीप जल जाते। रोशनी का आगाज होता। दिल क्यों धड़कता हैं धक-धक ? मन ही मन पड़ोस में रहने वाले राणा से नाता जोड़ लिया था उसने। सीधा-साधा, सरल स्वभाव। मीठी बोली, विवेकी, विनयी राणा उसे बहुत पसंद था। उसकी तरह ही टूटी-फूटी झोंपड़ी में बसेरा करता। दिल का बड़ा नेक। मानवता का पुजारी। स्वच्छता अभियान में साफ सफाई करते दोनों की मुलाकात हुई थी। साथ-साथ काम करते न जाने कब प्रेम अंकुरित हुआ, पता ही न चला। राणा को देखते ही रमा के दिल की कली खिल जाती। उसकी छुअन से रोम-रोम खिल जाता। नयन तीर चलते। अधर खामोश रहते। मौन ही प्रेम की अभिव्यक्ति थी। केवल नजरों से नजर मिलती, शर्म से नजरे झुक जाती। प्यार, मोहब्बत क्या यही हैं ? धीरे-धीरे बात झुग्गी झोपड़ी में फैल गयी। दोनों की प्रेम कहानी की महक दूर-दूर तक फैली। रमा के बापू के दोस्त का लड़का बौखला गया। "रमा मेरी हैं, मेरी ही रहेगी। किसी और की वह हो ही नहीं सकती। हमारी बचपन में ही सगाई पक्की हो गयी थी।" रमा के माँ-बापू के पास आकर रिश्ते की बात पक्की कर ली उसने। रमा और राणा की मोहब्बत को जैसे किसी की नजर लग गयी। रोमियो टाइप रोनित उसे जरा भी न सुहाता। पान चबा चबाकर दिन भर थूकता रहता। "मैं राणा से ब्याह करूंगी।" "आपने वचन दिया होगा। मेरा जीवन हैं। जिसे प्यार करती हूँ, वही मेरा जीवनसाथी होगा।" दिल की आवाज को बुलंद साज मिल गया हमदर्द सखियों से। माँ-बापू को राजी कर रमा को राणा से प्रणय बन्धन में बंधवा दिया। दिल से दिल के मिलन से जीवन बाग गुलजार हो गया। अपनी प्रिय सहेलियों के संबल से रमा-राणा का दाम्पत्य जीवन सदा सुखमय, हितकारी रहा। जीवन की महफ़िल में किलकारियों का मधुरिम संगीत गूंजने लगा।
✍️ चंचल जैन ( मुंबई, महाराष्ट्र )
बुधवार, मार्च 16, 2022
💒 अनमोल उपहार 💒
"जो आपको उचित लगे।" बड़ी विनम्रता के साथ उसने कहा। " फिर भी, कुछ तो ख्वाहिश होगी ?"
सोमवार, मार्च 07, 2022
🌻वास्तविक सुंदरता🌻
रविवार, फ़रवरी 13, 2022
💞 धागा मन्नतो वाला 💞
शुक्रवार, जनवरी 28, 2022
🏆 हल्ला बोल 🏆
बुधवार, अक्टूबर 13, 2021
👁️🗨️ नेत्रदान का महत्व 👁️🗨️
💠 हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी 💠
चाहे हों हम हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई। भारत माता की संतानें, हम सब हैं भाई-भाई। एक हमारी रगों में बहता खून, और एक हैं हमारे रंग रूप। ...
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बन जाते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी जो बांध देते हैं, हमें किसी से भी कुछ रिश्ते ईश्वर की देन होते हैं कुछ रिश्ते हम स्वयं बनाते हैं। बन जाते हैं ...
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पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा लोगों को स्नेह के महत्व और विशेषता का अहसास करवाने के उद्देश्य से ऑनलाइन स्नेह ध्येय सृजन महोत्सव का आयोजन किया गया...
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जीवन में जरूरी हैं रिश्तों की छांव, बिन रिश्ते जीवन बन जाए एक घाव। रिश्ते होते हैं प्यार और अपनेपन के भूखे, बिना ममता और स्नेह के रिश्ते...








