रविवार, सितंबर 27, 2026

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय ऑनलाइन ‘नारी कल्याणकारी साहित्यिक महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा नारी महत्व को दर्शाने व नारी गुणों को नमन करने के उद्देश्य से ऑनलाइन ‘नारी कल्याणकारी साहित्यिक महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को नारी से संबंधित दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किन्हीं दो विषयों का चयन करके चयनित विषयों पर आधारित रचनाएं लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं के द्वारा नारी गुणों का गुणगान करते हुए महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस महोत्सव में एक ओर जहां वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी विशिष्ट साहित्यिक शैली का प्रदर्शन किया तो दूसरी ओर ग्रुप से जुड़े नवीन रचनाकारों ने भी अपनी अनूठी भावनाओं और विचारों से ग्रुप का ध्यान आकर्षित किया। महोत्सव में सम्मिलित होकर उत्कृष्ट रचनाएं प्रस्तुत करने वाले रचनाकारों को ऑनलाइन 'पुनीत साहित्य श्री' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने संसार की समस्त महिलाओं को कोटि-कोटि नमन करते हुए उनकी सांसारिक उपलब्धियों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनके निस्वार्थ सहयोग की सराहना की। उन्होंने महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया तथा सम्मान पाने वाली सभी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन साहित्यिक कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए रचनाकारों को सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम रागिनी ठाकुर, संध्या शर्मा, सुमित्रा कुमारी रजक, शिखा चंदेल, सुरिंदर अजनबी, रत्ना वाधवानी, मीनू शर्मा, श्रीजी जैन, प्रियंका पुष्करणा रचनाकारों के रहे।

शुक्रवार, सितंबर 25, 2026

🌸 नारी है विशेष 🌸

नारी केवल एक नाम नही, बल्कि ममता, शक्ति, त्याग, साहस और सृजन का अद्भुत संगम है। वह जीवन को जन्म देती है, परिवार को संस्कार देती है और समाज को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए कहा गया है—“नारी है तो सृष्टि है, नारी है तो संसार है।”

नारी के जीवन में अनेक भूमिकाएँ एक साथ जुड़ी होती हैं। वह बेटी बनकर घर में खुशियाँ लाती है, बहन बनकर स्नेह बाँटती है, पत्नी बनकर जीवनसाथी का साथ निभाती है और माँ बनकर अगली पीढ़ी का निर्माण करती है। लेकिन नारी की पहचान केवल इन रिश्तों तक सीमित नही है। आज वह शिक्षिका, डॉक्टर, वैज्ञानिक, अधिकारी, सैनिक, कलाकार, उद्यमी और नेतृत्वकर्ता के रूप में भी अपनी प्रतिभा और क्षमता का परिचय दे रही है।

एक महिला के लिए घर और कार्यक्षेत्र के बीच संतुलन बनाना आसान नही होता। फिर भी वह अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए अपने सपनों को भी पंख देती है। कभी बच्चे की देखभाल करती है, कभी परिवार का सहारा बनती है और कभी अपने पेशे में नई ऊँचाइयाँ हासिल करती है। उसकी यह बहुआयामी भूमिका उसकी विशेषता को और अधिक उजागर करती है।

नारी की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी सहनशीलता नही, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को सँवारकर आगे बढ़ने का साहस है। वह कठिनाइयों से टूटने के बजाय उनसे सीखती है और अपने लिए नए रास्ते बनाती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नारी को केवल सम्मान के शब्द न दिए जाएँ, बल्कि उसे शिक्षा, सुरक्षा, समान अवसर, स्वतंत्र निर्णय और अपने सपनों को पूरा करने का अधिकार भी मिले। किसी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब उसकी बेटियाँ और महिलाएँ आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र और समर्थ हों।

नारी को कमजोर समझना उसकी शक्ति को कम आँकना है। वह कोमल भी है और दृढ़ भी ; ममतामयी भी है और साहसी भी। उसके भीतर एक साथ कई संसार बसते है।

नारी है तो जीवन में ममता है,

नारी है तो रिश्तों में संवेदना है,

नारी है तो समाज में सृजन है,

और नारी है तो भविष्य में उम्मीद है।

नारी विशेष होने के साथ-साथ समाज की विकास-यात्रा की एक महत्वपूर्ण सहभागी है।


नारी है विशेष :- नारी प्रकृति की सबसे सुंदर और अद्भुत रचना है। वह केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि समाज और सृष्टि के निर्माण में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। नारी के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है। वह अपने प्रेम, ममता, त्याग, साहस और संवेदनशीलता से संसार को सुंदर बनाती है।


सृजन और पालन :- नारी को सृष्टि की सृजनकर्ता कहा जाता है। माँ के रूप में वह एक नए जीवन को जन्म देती है और उसे प्रेम, संस्कार और सुरक्षा देकर बड़ा करती है। परिवार में भी वही प्रेम और अपनापन बनाए रखने वाली मजबूत कड़ी होती है। उसकी गोद बच्चे की पहली पाठशाला होती है और उसके संस्कार जीवनभर उसका मार्गदर्शन करते हैं।


त्याग और सहनशीलता :- नारी के जीवन में त्याग और सहनशीलता का विशेष स्थान है। वह अपने परिवार की खुशियों के लिए अनेक बार अपनी इच्छाओं को पीछे रख देती है। सच ही कहा गया है कि वह स्वयं दीपक की तरह जलकर अपने परिवार के जीवन में उजाला भरती है। उसकी सहनशीलता परिवार को कठिन परिस्थितियों में भी संभालने की शक्ति देती है।


अनेक रूपों में नारी :- नारी का व्यक्तित्व अनेक रिश्तों से सजा है। वह माँ बनकर ममता देती है, बेटी बनकर घर में खुशियाँ लाती है, बहन बनकर स्नेह और अपनापन देती है तथा पत्नी बनकर जीवन की सहयात्री बनती है। हर रूप में उसका प्रेम अलग रंग लिए हुए होता है, लेकिन उसकी संवेदनाएँ हमेशा परिवार को जोड़ने का काम करती हैं।


अबला नही सबला :- आज की नारी केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नही है। वह शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, प्रशासन, सेना, राजनीति, कला, खेल और व्यवसाय जैसे हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही है। वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है। आधुनिक नारी अपने परिवार और करियर के बीच संतुलन बनाते हुए समाज को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।


निष्कर्ष :- नारी केवल किसी रिश्ते का नाम नही, बल्कि प्रेम, शक्ति, त्याग, साहस और सृजन का सुंदर संगम है। जिस समाज में नारी का सम्मान होता है, वह समाज अधिक संवेदनशील और प्रगतिशील बनता है। इसलिए नारी को केवल सम्मान के शब्दों में नही, बल्कि उसके अधिकारों, स्वतंत्रता और समान अवसरों के माध्यम से भी सम्मान देना चाहिए।

नारी सचमुच विशेष है—क्योंकि वह जीवन को जन्म देने के साथ-साथ उसे प्रेम, संस्कार और संवेदना से सँवारने की शक्ति रखती है।


✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

🍁 हर बेटी को जन्म का हक दिलाना है 🍁








माँ के आंचल में आने से पहले ही,

जो कली कुचल दी जाती है।

उस नन्ही अजन्मी चीख से मानवता भी थर्राती है।

क्यों जन्म से पहले बेटी को अभिशाप समझ लिया जाता है ?

सृष्टि के पावन नियम का क्यों गला घोट दिया जाता है ?


वो कहती है "ओ माँ मुझे भी इस दुनिया में आना है"

तेरे आंचल की छांव में मुझे भी मुस्कुराना है। 

भाई जैसा ही प्यार मुझे दो मैं बोझ नही बनूंगी,

तेरे हर सुख-दुख में मैं ढाल बनकर खड़ी रहूंगी।


बेटे की चाहत में क्यों तुम लक्ष्मी का अपमान करते हो,

सृजन की उस कोमल कली का बेरहमी से संहार करते हो,

यदि बेटी ही नही बचेगी जग में तो बहू कहां से लाओगे ?

इस सूनी पड़ती धरती पर फिर वंश कैसे बढ़ाओगे ?


बंद करो यह क्रूर पाप अब रूढ़ियों को तोड़ना होगा,

बेटियों के जीवन का हक अब उनसे नही छीनना होगा।

भ्रूण हत्या को रोक कर हमें नया सवेरा लाना है,

हर बेटी को जन्म का हक और ऊंचा मुकाम दिलाना है।


✍️ श्रीजी जैन ( शाहदरा, दिल्ली )

🪅 लघुकथा - लाल स्याही का डर 🪅

परीक्षा हॉल में पसरे सन्नाटे के बीच अर्चना की कलम कागज़ पर तेज़ी से दौड़ रही थी। 12वीं की यह गणित की परीक्षा उसके भविष्य की इबारत लिखने वाली थी, अचानक, एक ठंडी सिहरन उसके रीढ़ की हड्डी से होकर गुजरी। उसे कुछ अहसास हुआ—एक अनचाहा सा गीलापन। उस अनचाही नमी ने उसकी एकाग्रता को झकझोर कर रख दिया। उसे महसूस हुआ कि उसकी सफ़ेद कुर्ती पर एक लाल रंग धीरे-धीरे फैल रहा है। पल भर में ही वह मेधावी छात्रा एक डरी हुई बच्ची में बदल गई। उसने पीछे मुड़कर नही देखा, पर उसे यकीन था कि पीछे वाली बेंच पर बैठे लड़के ने वह दाग देख लिया होगा। शर्म और घबराहट के एक अजीब से मिश्रण ने उसकी आँखों में आँसू भर दिए। अब उसकी उत्तर-पुस्तिका पर गणित के समीकरणों के बजाय आँसू गिर रहे थे, जिससे नीली स्याही धुंधली होने लगी थी। उसे लग रहा था कि अगर वह अपनी जगह से उठी, तो पूरा हॉल उस पर हँसेगा। वह सुबक रही थी, पर उसकी आवाज़ हलक में ही दबी थी। तभी, शिक्षिका मिसेज रजक की नज़र उस पर पड़ी। उन्होंने देखा कि अर्चना का पेन रुक चुका है और उसका शरीर कांप रहा है। वे शांति से उसके पास आईं और झुककर उसकी बेंच की ओर देखा। स्थिति भांपते ही उनके चेहरे पर न तो कोई झिझक आई और न ही कोई बनावटी गंभीरता। उन्होंने बहुत ही सहजता से अर्चना के कांपते हाथ को थामा और उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा, "बेटा, डरते नही। यह एक बहुत ही सामान्य प्रक्रिया है, कोई अपराध नही। अपनी कॉपी बंद करो और मेरे साथ बाहर आओ।" अर्चना ने हिचकिचाते हुए अपना चेहरा उठाया, उसकी आँखों में ढेर सारी मिन्नतें थीं। मिसेज रजक उसे लेकर पास के वॉशरूम तक गईं और अपने बैग से एक सैनिटरी पैड निकाल कर उसे दिया। उन्होंने अर्चना को पानी पिलाया और बड़े प्यार से उसके बाल संवारते हुए कहा, "अर्चना, यह लाल रंग कोई डरने वाली चीज़ नही है। यह जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। इसे अपनी मेहनत पर हावी मत होने देना।" मिसेज रजक ने अपनी शॉल उतारकर अर्चना की कमर पर बांध दी और उसे दोबारा परीक्षा हॉल में ले आईं। जब अर्चना वापस अपनी बेंच पर बैठी, तो उसे लगा कि उसके भीतर का सारा डर उड़ गया है। वह शॉल अब उसके लिए सिर्फ एक कपड़ा नही, बल्कि एक महिला द्वारा दूसरी महिला को दिया गया सम्मान और सुरक्षा का कवच था। अर्चना ने दोबारा पेन उठाया और दोगुने आत्मविश्वास के साथ लिखना शुरू किया। अब उसे अपनी सफ़ेद कुर्ती के दाग की फिक्र नही थी, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि समाज की संकुचित सोच से कहीं ऊपर एक शिक्षक की ममता और सहानुभूति होती है। परीक्षा की आखिरी घंटी बजने तक अर्चना ने अपना पेपर पूरा कर लिया था। हॉल से बाहर निकलते वक्त जब उसने मिसेज रजक की ओर देखा, तो उसकी आँखों में अब आँसू नही, बल्कि एक मूक कृतज्ञता और जीत की चमक थी। उसे अहसास हुआ कि दाग कपड़ों पर लगते हैं, हौसलों पर नही।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

🪷 कन्या भ्रूण की पुकार 🪷








माँ, मुझको दुनिया में आने दो

अंधकार में पड़ी हुई हूँ

दुनिया से मैं डरी हुई हूँ

आशाओं से भरी हुई हूँ

मुझपर प्रकाश भी छाने दो

मुझको दुनिया में आने दो


जी चाहे तुझको छूँ ऊँ मैं

तेरी गोदी में खेलूँ मैं

तेरी बाहों के झूले में

भाई की तरह ही झूलूँ मैं

मुझको गोदी में लेकर तुम

खुद को लोरी गाने दो

मुझको दुनिया में आने दो


क्यों भाई को सौभाग्य मिला

मेरे हिस्से क्यों "त्याज्य" मिला

जितना वह अंश तुम्हारा है

मैं भी उतनी ही तुम्हारी हूँ

यदि वह आँखों का तारा है

मैं भी गोदी की दुलारी हूँ

दुनिया समझे या ना समझे

हर माँ को यह समझाने दो

मुझको दुनिया में आने दो


बेटे ने भी पीड़ा दी है

फिर भी उसने ममता ली है

माँ मैंने क्या अपराध किया

फिर सारा हक़ क्यों उसे दिया

अपने आंचल की छाया में

माँ मुझको भी सो जाने दो

मुझको दुनिया में आने दो


आँखों पर बंधी पट्टी खोलो

मेरी पुकार सुन कुछ बोलो

तुमसे मैं वादा करती हूँ

सच मानो जो मैं कहती हूँ

जीवन भर साथ निभाऊंगी

तेरे दूध का कर्ज चुकाउंगी

इतना तो यकीन दिलाने दो

मुझको दुनिया में आने दो


मैं तो धरती का बीज हूँ माँ

फिर क्यों तुम सब की खीझ हूँ माँ

तुम भी तो किसी की बेटी थी

माँ की बाहों में लेटी थी

यदि बेटी नही बचेगी माँ

तो सृष्टि कौन रचेगी माँ

यह दुनिया को समझाने दो

माँ, मुझको दुनिया में आने दो


✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )

गुरुवार, सितंबर 24, 2026

👩‍🎓 ईश्वर की अनमोल रचना नारी 👩‍🎓








त्याग की मूर्ति है नारी 

दया की खान है नारी 

शक्ति का वरदान है नारी 

तपती धूप में छांव है नारी 

जीवन का आधार है नारी

धैर्य का प्रतीक है नारी

निःस्वार्थ स्नेह देती नारी

संस्कृति की नींव रखती नारी

 

घर की चारदीवारी को स्वर्ग बना देती है नारी 

चूल्हे से चांद तक की यात्रा करती है नारी 

दुर्गा बन राक्षसों का संहार करती है नारी 

आंसू को हंसी में बदल देती है नारी 

कर्तव्य को प्रतिज्ञा बना लेती है नारी 

घर-आंगन की मुस्कान है नारी

अबला नही सबला है नारी


ईश्वर की अनमोल रचना नारी

हर उलझन सुलझा देती नारी 

अंधेरे में उजाला बन जाती नारी 

अपनी खुशियां भुला देती नारी 

विघ्नों की ढाल बन जाती नारी

नारी में है विशेषता ही विशेषता 

इसलिए सम्मान की अधिकारी है नारी 


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

👩‍💼 तुम लड़की हो……👩‍💼








तुम लड़की हो -

यह कहते ही, 

कितनी निगाहें तौलने लगती हैं तुम्हें, 

रंग से, रूप से, चाल से, कभी हँसी से, 

कभी खामोशी के सवाल से।


कहा जाता है - 

ज़रा धीरे हँसो, ज़रा कम बोलो, 

साँवली हो तो धूप में कम डोलो। 

वज़न थोड़ा कम कर लो,

सपनों को भी थोड़ा थाम कर चलो।


कभी कहते हैं -

इतनी आज़ादी भी अच्छी नही,

इतनी उड़ान भी सच्ची नही।

घर संभालो, करियर भी बनाओ, 

पर अपनी उड़ान को सीमा में ही सजाओ।


तुम लड़की हो -

तो तुम्हारी हर आदत पर चर्चा होगी, 

कभी प्रशंसा, कभी आलोचना की वर्षा होगी।

कपड़ों से चरित्र का अनुमान लगेगा,

ख़ामोशी में भी तुम्हारा बयान गढ़ेगा।


पर कौन समझेगा -

कि तुम केवल चेहरा नही, 

विचार भी हो, तुम केवल देह नही, विस्तार भी हो।

तुम वह स्वप्न हो, जो आकाश को छूता है, 

तुम वह दीप हो, जो अंधकार को रूप देता है।


तुम लड़की हो -

तो तुममें दुर्गा की शक्ति भी है,

सरस्वती की भक्ति भी है।

तुममें लक्ष्मी की समृद्धि की रेखा है,

तुममें सृष्टि रचने वाली हर एक रेखा है।


तुम ही धरती की ममता हो, 

तुम ही जीवन की गरिमा हो।

माँ बनकर तुम संसार सँवारती हो,

अपने आँचल में आकाश उतारती हो।

तुम लड़की हो तुम जीवन बनाती हो।।


✍️ प्रियंका पुष्करणा ( चित्तौड़गढ़, राजस्थान )

🏘️ बेटी ! ये घर अब भी तेरा है 🏘️








कोई तृषा, तो कोई स्नेहा,  

कोई मीना, तो कोई गीता।

कितनी रूपकँवर, 

सूली चढ़ जाती है।

इस दहेज के आड़ में,  

न जाने कितनी गुड़ियाँ, 

झुलस जाती है आग में।

क्यो हर बाप विदा कर देता ?

उसे भेड़ियों के संसार में।  


क्यों पीड़ा न दिखती हर माँ को, 

उस मासूम बच्ची की आवाज में। 

अरे ! मत कहो उससे,

एडजेस्ट कर लो।  

क्यों सिखाते हो सहना हर बार ?

क्यों बुझाते हो चूल्हे पर उसका संसार ?  

क्यों तोलते हो बेटी को रुपयों में ?

क्यों बेच देते हो सपनों को रस्मों में ?  


पर सुन बेटी, एक बात याद रखना,  

ये घर अब भी तुम्हारा है, न हो परेशान।

अगर न रहा जाए तो वापस आ जाना, 

तेरा घर अब भी तेरा है, 

तेरे माँ-बाबा अब भी तेरे हैं।

क्योंकि तू कोई पराई नही,

तू इस घर की जान है, शान है। 

तेरी हँसी से ही ये आँगन महकता है,  

तेरे आँसू से तो ये छत भी दरकता है।


वो भी तो चाहती है खुल के जीना,  

चाँद-सितारों से बातें करना,  

किताबों में अपना नाम लिखना,  

न कि अर्थी पर बस एक नाम मिटना।  

अब बहुत हुआ, अब बस करो,  

दहेज नही, दुआ दो।  

बेटी कोई बोझ नही,  

वो तो घर की रोशनी है,  

उसे जलाओ मत,  

उसे जलने दो, मगर शमाँ बनकर।


✍️ मीनू शर्मा ( सोहन गंज, दिल्ली )

बुधवार, सितंबर 23, 2026

🌻 औरत की महिमा 🌻








किसी के लिए पत्नी, बहन, माई है औरत 

किसी के लिए मौसी, चाची, ताई है औरत।


गैरों के लिए भी मांगती रहती दुआएं,

अपनो की ख़ातिर हुई पराई है औरत।


कंजकों देवियों के रूप में पूजी है जाती,

किसी ने बहकावे में आकर ठुकराई है औरत।


अजनबी से शायरों की ख्वाबों की दुनियां 

पर जालिमों के लिए चंडी कहलाई है औरत।


औरत ही बनती सदा औरत की दुश्मन,

बेशक औरत ही दुनिया में लाई है औरत।


✍️ सुरिंदर अजनबी ( धुरी, पंजाब )

मंगलवार, सितंबर 22, 2026

🌼 भ्रूण हत्या 🌼








मैं अभी इस दुनिया में आई नही हूँ,

फिर मुझसे कैसी नाराज़गी है ?

मैं तो बस एक नन्ही-सी जान हूँ,

फिर मेरी साँसों से कैसी दुश्मनी है ?


माँ, तेरी कोख में पल रही हूँ,

तेरे आँचल का सपना देख रही हूँ,

बाबुल की उँगली थामकर चलने का,

मैं भी तो एक सपना देख रही हूँ।


क्यों कहते हो बेटी बोझ होती है ?

क्यों उसकी किस्मत पहले लिख देते हो ?

जिस बेटी को जन्म से पहले मिटा देते हो,

उसी बेटी के लिए बाद में देवी के दीप जलाते हो।


बेटी ही तो घर में खुशियाँ लाती है,

बेटी ही रिश्तों को प्यार सिखाती है,

बेटी ही एक दिन माँ बनकर,

नई पीढ़ी को जन्म देती है।


मुझे जन्म लेने दो,

मुझे साँस लेने दो,

मैं बोझ नही, एक अवसर हूँ,

मुझे अपने सपनों के साथ जीने दो।


किसी की कोख फिर सूनी न हो,

किसी माँ की आँख नम न हो,

बेटी को जन्म से पहले मारने की

यह क्रूर सोच अब खत्म हो।


बेटी को बचाइए,

उसे पढ़ाइए, आगे बढ़ाइए,

क्योंकि बेटी केवल घर की नही,

पूरे समाज की ताकत है।


✍️ शिखा चंदेल ( देहरादून, उत्तराखंड )

👩‍🎓 औरत 👩‍🎓









मैं कौन हूँ ?

मेरी पहचान क्या है ?

मेरे अस्तित्व का मान क्या है ?

इन प्रश्नों का उत्तर हूँ मैं—

हाँ, मैं औरत हूँ,

मुझे गर्व है कि मैं औरत हूँ।


ईश्वर ने कितने रूपों में,

मुझको नवाज़ा है।

माँ बनाकर ममता का,

सागर मुझमें उतारा है।


बेटी बनकर घर-आँगन की,

खुशियों का वरदान हूँ।

बहन बनकर स्नेह-सुधा,

प्रेम और अनुराग हूँ।


पत्नी बनकर त्याग-समर्पण,

जीवन की सहभागी हूँ।

अर्धांगिनी बनकर हर सुख-दुःख में,

साथ निभाने वाली हूँ।


दुर्गा हूँ तो शक्ति मेरी,

सरस्वती तो ज्ञान,

लक्ष्मी बनकर समृद्धि लाऊँ,

अन्नपूर्णा मेरा मान।


मौन हूँ तो यह मत समझो,

मुझमें कोई आवाज़ नही।

शांत हूँ तो यह मत समझो,

मुझमें कोई आग नही।


अबला समझने की भूल न करना,

मैं शक्ति का विस्तार हूँ,

अन्याय के आगे झुक जाऊँ,

इतनी भी लाचार नही हूँ।


कुत्सित सोच को मैं अब,

साहस से ललकारूँगी।

अपने अधिकार और सम्मान की

हर लड़ाई मैं लड़ूँगी।


न कोई बेटी भय में जीए,

न कोई निर्भया फिर हो।

हर नारी सुरक्षित होकर,

अपने सपनों की अधिकारी हो।


कदम से कदम मिलाकर,

आसमान छू जाऊँगी।

चूल्हे-चौके के संग-संग,

नभ की सैर कर आऊँगी।


प्यार मिले, सम्मान मिले तो,

घर-आँगन महकाऊँगी।

स्नेह मिले तो रिश्तों में,

खुशियों के दीप जलाऊँगी।


पर सम्मान जहाँ नही होगा,

वहाँ मौन नही रहूँगी।

अपने स्वाभिमान की खातिर,

हर बंधन से लड़ जाऊँगी।


मैं केवल किसी की बेटी,

बहन, पत्नी या माँ नही—

इन रिश्तों से आगे भी,

मेरी अपनी पहचान सही।


मैं सृजन हूँ, मैं शक्ति हूँ,

मैं साहस की उड़ान हूँ,

मैं आधी आबादी ही नही,

पूरे समाज की पहचान हूँ।


हाँ, मैं औरत हूँ—

मुझे गर्व है कि मैं औरत हूँ।


✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

💔 मौन विदा की टीस 💔




​




मैं विस्मृत न कर सकी उस आदि-अनंत अनुराग को,

भले ही तुमने मेरी खामोशी को 'बेवफाई' का नाम दे दिया।


मेरा तुम्हें छोड़ जाना, हृदय का विद्रोह नही, काल का प्रतिशोध था,

तुझसे विमुख होना मेरी इच्छा नही, मेरी कुल-मर्यादा का अवरोध था।


​आज भी जब उन स्मृतियों की पगडंडियों पर पाँव रखती हूँ,

तो अतीत की राख से यादों की चिंगारियां रूह को झुलसा देती हैं।


चेतना के पन्नों पर आज भी अंकित है वह चंचल सा परिहास,

जब तुम मेरा परिचय 'भाभी' कहकर, रिश्तों की सीमाओं से खेलते थे—


वही शब्द आज एक अमिट नियति बनकर मेरे वजूद को डस रहा है।

​यकीन मानो, मैं खंडित थी पर पाखंडी नही थी,


मैं वक्त के क्रूर चक्र में फंसी एक ठहरी हुई लाचारी थी।

तुम्हें मझधार में छोड़ना, मेरे प्रेम की पराजय नही,

बल्कि कर्तव्यों की वेदी पर मेरी आत्मा की सबसे बड़ी बलिहारी थी।


​तुमने तो केवल मेरा प्रस्थान देखा है प्रिय,

मेरी रूह का वहीं तुम्हारे पास ठहर जाना नही देखा।।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

🎋 पेड़ है वरदान 🎋









पेड़ हैं धरती की शान 

इनके बिना अधूरा है जहान 

पेड़ के रूप में धरती को मिला है वरदान 

आओ पेड़ लगाकर कार्य करें महान 

स्वच्छ हवा का देते हैं हमे दान 

पेड़ लगा कर करें धरती माँ का सम्मान 


यह है बहुत ही जरूरी काम 

पेड़ों से हमे मिलते फल तमाम 

कड़वी नीम है गुणों की खान 

पेड़ प्रदूषण को करते कम 

धरती के ताप पर करते नियंत्रण 


आओ धरती माँ को ओढ़ा दे 

हरियाली की चादर 

अब हम कर ले ध्यान 

हमे धरती माँ को खुश रखना है 

पेड़ लगाने के लिए सब को प्रेरित करना है 

जल, जंगल, जमीन की रक्षा हो हमारा अभियान 


आओ बचाए प्राकृतिक संसाधन 

ये है कुदरत के वरदान 

बढता लालच कर देगा धरती को सुनसान 

पर्यावरण संरक्षण का करो आह्वान 

पेड़ वायु को शुद्ध करते हैं 

हरियाली हो हमारी पहचान 

पेड़ लगा कर धरती को दे दो मुस्कान 


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश ) 

सोमवार, सितंबर 21, 2026

💠 मेरी प्रेरणा मेरी माँ 💠








जब भी जीवन की राहों में,

कदम मेरे डगमगाते हैं,

माँ के शब्दों के दीपक,

अँधियारे में राह दिखाते हैं।


थककर जब मैं बैठ जाती हूँ,

माँ कहती है—“चलती रह,

मंज़िल भले ही दूर हो बेटी,

तू बस अपना हौसला रख।


उसने खुद धूप सही लेकिन,

मुझ पर छाँव बनाए रखी,

अपने हिस्से के सपने देकर,

मेरी दुनिया सजाए रखी।


मेरी हर छोटी-सी जीत में,

उसकी आँखें चमकती हैं,

मेरी हर एक ठोकर पर,

उसकी दुआएँ ढाल बनती हैं।


मैंने उससे सीखा है जीवन —

बिना शिकायत जीना है,

मुश्किल चाहे कितनी आए,

फिर भी हँसते रहना है।


वह केवल मेरी माँ नहीं,

मेरी पहली गुरु, पहली दोस्त,

मेरे हर सपने की ताकत,

मेरे जीवन की सबसे सुंदर सोच।


जब दुनिया कहती है—“नही,”

माँ कहती है—“तू कर सकती है।”

और उसके इन चार शब्दों से

मेरी हिम्मत फिर खिलती है।


न कोई पुरस्कार चाहिए,

न दुनिया की बड़ी पहचान,

मेरी माँ की आँखों में

दिख जाए बस मेरा सम्मान।


मेरे सपनों की उड़ान वही,

मेरी हिम्मत की जान वही,

मेरी हर जीत का मान वही—

मेरी प्रेरणा,मेरी शक्ति,

मेरी दुनिया, मेरी माँ।


✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

✨ हिंदी संस्कारों की जननी ✨








हिंदी केवल भाषा नही,

यह संस्कारों की जननी है।

माँ की लोरी में गूँजती,

बचपन की मीठी धुन है।।


जब माँ प्यार से समझाती है,

हिंदी मन में उतर जाती है।

दादी-नानी की कहानियों में,

जीवन की सीख दे जाती है।।


‘माँ’ कहने में जो अपनापन है,

‘पिता’ कहने में जो सम्मान है,

‘गुरु’ शब्द में जो श्रद्धा है,

हिंदी में वही तो संस्कारों की पहचान है।।


हिंदी हमें जोड़ना सिखाती है,

बड़ों का आदर करना सिखाती है।

छोटों को स्नेह देना सिखाती,

रिश्तों की गरिमा समझाती है।।


रामायण की मर्यादा इसमें,

गीता का ज्ञान समाया है।

कबीर की वाणी, मीरा का प्रेम,

शब्दों में दीप जलाया है।।


यह भाषा खेतों की मिट्टी में है,

यह गाँव की पगडंडी में है।

यह चौपाल की बातों में है,

यह शहरों की हलचल में है।।


हिंदी में दर्द कहें तो आँखें नम हो जाती हैं,

हिंदी में प्रेम लिखें तो भावनाएँ मुस्काती हैं।।

हिंदी में माँ को पुकारें तो मन भर आता है,

हिंदी में देश कहें तो सीना गर्व से उठ जाता है।।


बदलते समय के साथ हम आगे बढ़ें,

नई भाषाएँ सीखें, नए सपने गढ़ें।

लेकिन अपनी जड़ों को न भूलें कभी,

हिंदी को अपने हृदय से निकालें नहीं।।


आओ आज यह संकल्प उठाएँ,

हिंदी को जीवन में सम्मान दिलाएँ।

बोलें हिंदी, लिखें हिंदी,

हिंदी को हर मन तक पहुँचाएँ।।


हिंदी हमारी आत्मा है,

हिंदी हमारी आवाज़ है।

हिंदी से ही संस्कृति जीवित,

हिंदी पर हमें नाज़ है।।


✍️ अंजू मल्लिक ( पटना, बिहार )

🌺 नारी 🌺









पुरुषों के समाज में अबला कहलाने वाली बेचारी हूँ, 

सब कुछ सहकर चुपचाप आंसू बहाने वाली मैं नारी हूँ।


पुरुष को जन्म देने से मरण तक देती हूँ साथ पुरुष का,

उस वक्त भी होती जरूरी प्रदर्शन होता जब पौरुष का।


समाज में व्याप्त भेदभाव अनीति को सहना भी है,

न कोई आवाज उठाना और न कुछ कहना भी है।


समय बदलता युग बदलते पर न बदलता हाल, 

त्रेता, द्वापर से कलियुग आया हाल हुआ बेहाल।


सीता हो या द्रौपदी सब हालातों के आगे थी हारी,

पुरुष प्रधान इस समाज में फिरती हैं मारी-मारी।


हमारे त्याग और समर्पण का नही है जग में कोई मोल, 

अत्याचार अन्याय होता हम पर और मिलते कड़वे बोल।


मां बेटी और बहु के रूप में आज भी संघर्ष करती नारियां,

पुरुष प्रधान समाज में कोई नही सुनता हमारी सिसकारियां।


अब वक्त आ गया हमारे लिए आवाज उठानी होगी,

सामाजिक समानता की लड़ाई में जीत दिलानी होगी।


✍️ मुकेश कुमार सोनकर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

शुक्रवार, सितंबर 18, 2026

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय ऑनलाइन ‘हिंदी विशेष सृजन महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर हिंदी भाषा के महत्व तथा विशेषता को दर्शाने व समझाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन ‘हिंदी विशेष सृजन महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को 'हिंदी है विशेष' विषय सहित दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किन्हीं दो विषयों का चयन करके चयनित विषयों पर आधारित रचनाएं लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर हिंदी भाषा के महत्व तथा विशेषता को बहुत ही बेहतरीन ढंग से दर्शाया व समझाया और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। महोत्सव में सम्मिलित सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन 'पुनीत हिंदी गौरव' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने हिंदी भाषा को नमन करते हुए महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया और सम्मान पाने वाली सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने लोगों को ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम रत्ना वाधवानी, पूनम लता, मुकेश कुमार सोनकर, सुमित्रा कुमारी रजक, अंजू मल्लिक, रागिनी ठाकुर रचनाकारों के रहे।

सोमवार, सितंबर 14, 2026

💠 हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी 💠



   






चाहे हों हम हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई।

भारत माता की संतानें, हम सब हैं भाई-भाई। 


एक हमारी रगों में बहता खून, और एक हैं हमारे रंग रूप।

चांद देता बराबर चांदनी, सूरज भी देता सबको समान धूप। 


सब कुछ देने वाले ईश्वर, जब वो हममें अंतर नहीं करते हैं।

जाति-धर्म भाषा-बोली के भेदभाव रख, फिर हम क्यों जलते हैं। 


अलगाववादी सोचों को त्यागकर, एकता की मिसाल धरो। 

भारत के विकास के लिए, मिल जुलकर निरंतर प्रयास करो।


होंगे भले हम कहीं के भी वासी, सबसे पहले हैं भारत वासी। 

इसलिए हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा, और हम सब हैं हिन्दी भाषी। 


सीखो सीखने को सारी भाषाएं, पर राष्ट्रभाषा का सम्मान करो। 

घर में बोलो अपनी भाषा, पर समूहों में हिन्दी वार्तालाप करो। 


जाति धर्म और समुदायों की, सांप्रदायिक सोच को भुला दो। 

देश के नागरिक ही नही, पूरी दुनिया को हिन्दी में बुलवा दो।। 


✍️ मुकेश कुमार सोनकर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

💠 हिंदी भाषा — हमारी पहचान, हमारी आत्मा 💠

भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती। भाषा वह पुल है, जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। यह हमारे विचारों को आवाज़ देती है, हमारी भावनाओं को अभिव्यक्ति देती है और हमारी संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती है। भारत की अनेक भाषाओं के सुंदर गुलदस्ते में हिंदी एक ऐसा फूल है, जिसकी सुगंध देश की सीमाओं से बहुत दूर तक फैली हुई है।

हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं, स्मृतियों और जीवन-शैली से जुड़ी हुई अभिव्यक्ति है।


हिंदी का उद्भव :-

हिंदी का विकास भारतीय उपमहाद्वीप की समृद्ध भाषायी परंपरा से हुआ है। संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और फिर विभिन्न लोकभाषाओं तथा बोलियों के विकास के क्रम में आधुनिक हिंदी का स्वरूप सामने आया।

हिंदी की यात्रा बहुत लंबी और विविधतापूर्ण रही है। ब्रज, अवधी, बुंदेली, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी और अनेक अन्य बोलियों ने हिंदी के साहित्य और संस्कृति को समृद्ध किया है।

मध्यकाल में कबीर, तुलसीदास, सूरदास और रहीम जैसे कवियों ने लोकभाषा में ऐसी रचनाएँ कीं, जो आज भी लोगों के हृदय में जीवित हैं।

तुलसीदास की रामचरितमानस ने रामकथा को घर-घर पहुँचाया, तो सूरदास के पदों ने कृष्ण-भक्ति को मधुर स्वर दिया। कबीर ने अपनी साखियों और दोहों के माध्यम से समाज को सत्य, प्रेम और आत्मचिंतन का संदेश दिया।

इस प्रकार हिंदी साहित्य की जड़ें केवल पुस्तकों में नही, बल्कि भारत के जनजीवन में गहराई से जुड़ी हुई हैं।


हिंदी और स्वतंत्रता आंदोलन :-

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी हिंदी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जब देश अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा था, तब भाषा लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का माध्यम बनी। समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, कविताओं और लेखों ने स्वतंत्रता की चेतना जगाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी को आधुनिक साहित्यिक अभिव्यक्ति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर और महादेवी वर्मा जैसे साहित्यकारों ने हिंदी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।

प्रेमचंद ने गाँव, किसान, गरीबी, सामाजिक असमानता और मानवीय संवेदनाओं को अपनी कहानियों और उपन्यासों में स्थान दिया। उनकी भाषा इतनी सहज थी कि साहित्य सीधे आम आदमी के जीवन से जुड़ गया।


हिंदी — भावनाओं की भाषा :-

हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति इसकी सहजता और भावप्रवणता है।

हम जब कहते हैं —“माँ”,

तो यह केवल दो अक्षरों का शब्द नहीं रहता। इसमें ममता, सुरक्षा, त्याग और प्रेम की पूरी दुनिया समा जाती है।

जब हम कहते हैं—“अपना घर”,

तो केवल दीवारों और छत की बात नहीं होती। उसमें बचपन की स्मृतियाँ, परिवार की हँसी और अनगिनत भावनाएँ जुड़ी होती हैं।

यही हिंदी की खूबसूरती है। यह कठिन भावनाओं को भी सरल शब्दों में कह देती है।


हिंदी और भारतीय संस्कृति :-

भारत की संस्कृति को समझने के लिए हिंदी साहित्य का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

लोकगीतों से लेकर दोहों तक, रामायण की कथाओं से लेकर आधुनिक उपन्यासों तक—हिंदी ने भारतीय समाज के बदलते स्वरूप को अपने भीतर संजोया है।

त्योहारों, लोककथाओं, मुहावरों और कहावतों में भी हिंदी और उसकी बोलियों की गहरी छाप दिखाई देती है।

“जैसी करनी वैसी भरनी”,

“जहाँ चाह, वहाँ राह”,

“एकता में बल है”

जैसी कहावतें केवल भाषा नहीं, बल्कि पीढ़ियों का अनुभव हैं।


हिंदी और सिनेमा :-

हिंदी के प्रसार में भारतीय सिनेमा और टेलीविजन का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

हिंदी फिल्मों ने भाषा को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचाया। गीतों ने हिंदी के शब्दों को लोगों की स्मृति में बसाया और फिल्मों के संवाद आम बोलचाल का हिस्सा बन गए।

रेडियो, दूरदर्शन और बाद में इंटरनेट तथा सोशल मीडिया ने हिंदी को एक नया मंच दिया।

आज हिंदी में ब्लॉग, वेबसाइट, डिजिटल समाचार, पॉडकास्ट, वीडियो और सोशल मीडिया सामग्री बड़ी संख्या में उपलब्ध है।


बदलते समय में हिंदी :-

आज का युग तकनीक का युग है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भाषा के प्रयोग के तरीके को बदल दिया है।

आज हिंदी केवल किताबों के पन्नों पर नही है। वह मोबाइल स्क्रीन पर है, सोशल मीडिया पर है, फिल्मों और वेब सीरीज़ में है, ऑनलाइन शिक्षा में है और डिजिटल दुनिया में लगातार अपना विस्तार कर रही है।

हिंदी में तकनीकी शब्दावली भी तेजी से विकसित हो रही है। अब हिंदी में विज्ञान, चिकित्सा, अंतरिक्ष, कंप्यूटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर भी व्यापक सामग्री उपलब्ध है।

फिर भी हिंदी के सामने एक चुनौती है—आधुनिक बनने की दौड़ में अपनी सरलता और मौलिकता को बनाए रखना।

अंग्रेजी सीखना गलत नही है। दूसरी भाषाओं का ज्ञान हमारे ज्ञान का विस्तार करता है। लेकिन दूसरी भाषाएँ सीखते हुए अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान कम नही होना चाहिए।


हिंदी दिवस और राजभाषा :-

भारत में 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था।

यह दिन केवल हिंदी बोलने या लिखने का दिन नही है। यह हमें अपनी भाषा और साहित्य के प्रति अपने संबंध को याद करने का अवसर देता है।

हिंदी को आगे बढ़ाने का अर्थ दूसरी भारतीय भाषाओं को पीछे करना नही है। भारत की वास्तविक सुंदरता उसकी भाषाई विविधता में है।

तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, असमिया और अन्य भारतीय भाषाएँ हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत हैं।

हर भारतीय भाषा सम्मान की अधिकारी है और हिंदी उन सभी के साथ मिलकर भारत की भाषायी पहचान को समृद्ध करती है।


सरकारी कार्यालयों में हिंदी की भूमिका :-

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सरकारी कार्यालयों का आम जनता से सीधा संबंध होता है। इसलिए ऐसी भाषा का प्रयोग आवश्यक है जिसे अधिक से अधिक लोग आसानी से समझ सकें। हिंदी का प्रयोग केंद्र सरकार के अनेक कार्यालयों में राजभाषा के रूप में किया जाता है।

सरकारी पत्राचार, कार्यालयी आदेश, अधिसूचनाएँ, रिपोर्ट, प्रपत्र, बैठकों के कार्यवृत्त और विभिन्न प्रशासनिक कार्यों में हिंदी का महत्वपूर्ण स्थान है। केंद्र सरकार के कार्यालयों में हिंदी और अंग्रेजी दोनों का प्रयोग संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों के अनुसार किया जाता है।

सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग केवल भाषा संबंधी आवश्यकता नही, बल्कि प्रशासन को जनता के अधिक निकट लाने का माध्यम भी है। जब किसी नागरिक को सरकारी सूचना उसकी समझ की भाषा में मिलती है, तो उसके लिए अपने अधिकारों, योजनाओं और सरकारी प्रक्रियाओं को समझना आसान हो जाता है।

रेलवे, डाक, बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े कार्यालयों में भी हिंदी का व्यापक उपयोग दिखाई देता है। कार्यालयों में हिंदी के बढ़ते प्रयोग से यह भावना मजबूत होती है कि सरकारी व्यवस्था केवल कागज़ों और नियमों की दुनिया नही, बल्कि आम नागरिक से संवाद करने वाली व्यवस्था है।

आज डिजिटल प्रशासन के दौर में भी हिंदी की भूमिका लगातार बढ़ रही है। सरकारी वेबसाइटों, ऑनलाइन सेवाओं, मोबाइल एप्लिकेशन और डिजिटल दस्तावेजों में हिंदी की उपलब्धता प्रशासन को अधिक सुलभ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

इस प्रकार हिंदी सरकारी कार्यालयों में केवल कामकाज की भाषा नहीं, बल्कि सरकार और जनता के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण सेतु भी है।


हिंदी का भविष्य :-

हिंदी का भविष्य केवल सरकार या विद्यालयों के हाथ में नही है। इसका भविष्य उन लोगों के हाथ में भी है जो हिंदी में लिखते हैं, पढ़ते हैं और अपने विचार व्यक्त करते हैं।

एक लेखक जब हिंदी में कहानी लिखता है, एक कवि कविता रचता है, एक बच्चा अपनी पहली कविता लिखता है, कोई दादी अपनी पोती को लोककथा सुनाती है या कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर अपने मन की बात हिंदी में लिखता है—तब हिंदी आगे बढ़ती है।

भाषा तभी जीवित रहती है जब उसका प्रयोग जीवन में होता है।

हमें हिंदी को केवल “राष्ट्रभाषा” कहकर गर्व करने के बजाय उसे पढ़ने, लिखने और सृजन की भाषा बनाना चाहिए। साथ ही यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि भारतीय संविधान की व्यवस्था में हिंदी संघ की राजभाषा है; संविधान ने किसी एक भाषा को भारत की “राष्ट्रभाषा” घोषित नहीं किया है।


उपसंहार :-

हिंदी हमारी स्मृतियों की भाषा है।

यह माँ की लोरी में है, दादी की कहानी में है, प्रेम-पत्र के शब्दों में है, कवि की कविता में है और उस अनकही भावना में भी है जिसे व्यक्त करने के लिए कभी-कभी केवल एक शब्द पर्याप्त होता है।

समय बदल रहा है और भाषा भी बदल रही है। नए शब्द आएँगे, नए माध्यम आएँगे और अभिव्यक्ति के नए तरीके विकसित होंगे। लेकिन यदि हम अपनी भाषा से प्रेम करते रहें, उसमें नया साहित्य रचते रहें और उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाते रहें, तो हिंदी की यात्रा कभी समाप्त नहीं होगी।

हिंदी केवल बोलने की भाषा नही—यह महसूस करने की भाषा है।

और जब किसी भाषा में किसी समाज की स्मृतियाँ, सपने, आँसू, हँसी और प्रेम सुरक्षित हों, तो वह भाषा केवल भाषा नहीं रहती—

वह उस समाज की आत्मा बन जाती है।…..



✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

💠 हिंदी मेरी पहचान 💠








हिंदी मेरी आन है, हिंदी मेरा मान है।

हिंदी से ही जुड़ी हुई मेरी पहचान है।।

माँ की ममता, पिता का आशीष है इसमें।

भारत की मिट्टी की सोंधी सी महक है इसमें।।


हिंदी में बचपन की वो मीठी सी बोली।

हिंदी में माँ की सुनाई हर एक कहानी।।

हिंदी में रिश्तों का अपनापन मिलता है।

हिंदी में मन का हर भाव सरलता से खिलता है।।


तुलसी की चौपाई, कबीर के दोहे हैं।

हिंदी में कितने अनमोल शब्द संजोए हैं।।

प्रेमचंद की कलम ने समाज को आईना दिखाया।

महादेवी के शब्दों ने संवेदनाओं को स्वर दिया।।


यह भाषा केवल शब्दों का संसार नही।

यह हमारी संस्कृति और संस्कार है।।

पीढ़ियों से जो हमें जोड़ती आई ।

वह हमारी विरासत, हमारा अधिकार है।।


दुनिया की भाषाएँ सीखना भी जरूरी है।

ज्ञान के हर द्वार को खोलना जरूरी है।।

पर अपनी भाषा को कभी भूल न जाना ।

अपनी जड़ों से रिश्ता कभी मत मिटाना।।


आओ हिंदी को दिल से सम्मान दें।

इसके अस्तित्व को नई पहचान दें।।

अपने व्यवहार और विचारों में इसे अपनाएँ।

हर दिन हिंदी का उत्सव मनाएँ।।


हिंदी हमारी शान रहे ।

हिंदी का सदा सम्मान रहे।।

जब तक साँस रहे इस जीवन में।

हिंदी से अपना प्रेम अमर रहे।।


✍️ अंजू मल्लिक ( पटना, बिहार )

शुक्रवार, सितंबर 11, 2026

💠 कविता - अधूरापन 💠








विस्मृति के आगोश में, खुद को छोड़ आई थी मैं,

तुमसे मिलकर, अपनी हस्ती मोड़ आई थी मैं।


वो निस्तब्ध रातों का, फोन पर चुपके से बतियाना,

स्मरण है क्या तुम्हें ? या धुंधला गया है वो अफ़साना ?


वो पल, वो क्षण, जैसे स्वप्निल कोई मंज़र था,

मैं और तुम थे बस, बाकी सब मंज़र से बाहर था।


अजीब था हमारे मिलन का वो मौन व्याकरण,

मिले नही कभी, पर बातों में बिताया हर क्षण।


देह की दूरियाँ थी, पर रूहें साथ रहती थी,

धड़कनें शहरों के पार भी, एक-दूजे से बहती थी।


तुमने कहा था— "बिछड़कर मैं भी मरुस्थल हो जाऊँगा,"

"उस नायक की तरह, अपनी हस्ती खो जाऊँगा।"


आज युग बीत गए, नियति की दीवारें खड़ी हैं,

पर न जाने तुम्हारी स्मृतियाँ, किस कोने में पड़ी हैं।


वो अफ़साना ज़माने की नज़रों में, तब भी दफ़न था,

आज भी वह राज, खामोशियों का कफ़न था।


मगर सीने में वो आग, वो तपिश आज भी शेष है,

तुम्हारा वो अधिकार, वो मोह, आज भी विशेष है।


मिट जाने की कसमों से, मैं बहुत डरती थी,

तुम्हें खोने के खौफ में, मैं रोज़ मरती थी।


पर विधि का विधान देखो, कैसा ये न्याय हुआ,

बिछड़ना ही अंततः, हमारा अध्याय हुआ।


मैं तुम्हारी न हो सकी, न अपनी रह पाई,

एक अधूरी प्यास थी, जो समंदर तक ले आई।


वह प्रेम आज भी ज़िंदा है, बस मुकम्मल न हो सका,

अधूरापन ही हमारा, सबसे परम पूज्य सच रहा।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

🌟 कविता - हिंदी से गौरवमय भारत का सम्मान 🌟








हिंदी हमारी शान है,

है हिंदी हमारा मान,

हिंदी से गौरवमय हुआ,

भारत का सम्मान।


हिंदी गीतों का मधुर स्वर,

हिंदी रस की धार,

हिंदी बिन यह जीवन जैसे,

सूना हो संसार।


हिंदी ने अपना रूप सँवारा,

फिर भी रही वही,

समय बदलता रहा मगर,

अपनी पहचान न खोई।


हिंदी है वह सरल भाषा,

जो सबको अपनाती,

विविध भाव और बोलियों को,

अपने में समाती।


संस्कृत इसकी जननी है,

तत्सम-तद्भव श्रृंगार,

देशज और विदेशी शब्दों से,

सजता इसका संसार।


मीरा की भक्ति हिंदी में,

तुलसी की अमर वाणी,

रसखान की कृष्ण-प्रेम धारा,

कबीर की सच्ची बानी।


फिल्मों में हिंदी, गीतों में हिंदी,

कविता में इसका मान,

जन-जन के मन को जोड़ रही,

यह अपनी हिंदुस्तानी जान।


मातृभाषा का मान है हिंदी,

हिंदी मेरा अभिमान,

अन्य भाषाओं का भी सम्मान,

पर हिंदी का ऊँचा स्थान।


केवल हिंदी दिवस पर ही,

नही करें इसका सम्मान,

हर दिन हिंदी को अपनाएं,

यही हो अपना प्रण महान।


हिंदी भाषा के हर शब्द पर,

ज्ञान-दीप हम जलाएँ,

नई पीढ़ी के मन में फिर,

हिंदी का गौरव जगाएं।


✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

🌟 प्यारी हिन्दी 🌟








हिन्दी से हिन्दुस्तान है

हिन्दी हिन्दुस्तान की आत्मा है

तुलसी, कबीर, बिहारी, केशव, भूषण सबने

हिन्दी का मान बढ़ाया है 

हिन्दी का महत्व सबको समझाया है।


जनता की यह भाषा है 

गौतम बुद्ध की रचना का भी

इसी भाषा में ज्ञान है 

हिन्दी भाषा में ही गाया जाता राष्ट्र गान है

देश के संचार माध्यमों की यह जान है

भारत माता का यह गहना है

हिन्दी हमारी शान है 

हम सबकी पहचान है।


यह सहज सरल आसान है 

यह करोड़ों भारतीयों की आवाज है 

यह देश का अभिमान है 

यह गुणों की खान है

इसके ‘अ से ज्ञ’ तक के सफर में

बड़ा ही गूढ़ ज्ञान है।


सुन्दर भाषा लिपि सुघड़ है

इसमें हमारी संस्कृति झलकती है 

यह मिश्री सी मीठी है

माँ की ममता इसमें है 

हिन्दी हमारी प्रेरणा है 

आओ ! हम हिन्दी का सम्मान करें।


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

शनिवार, सितंबर 05, 2026

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित ऑनलाइन ‘सावन सृजन महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा सावन आगमन के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन ‘सावन सृजन महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को सावन सहित दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किन्हीं दो विषयों का चयन करके चयनित विषयों पर आधारित रचनाएं लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस महोत्सव में एक ओर जहां वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी विशिष्ट साहित्यिक शैली का प्रदर्शन किया तो दूसरी ओर ग्रुप से जुड़े नवीन रचनाकारों ने भी अपनी अनूठी भावनाओं और विचारों से ग्रुप का ध्यान आकर्षित किया। महोत्सव में सम्मिलित सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन “पुनीत साहित्य रत्न” सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया और सम्मान पाने वाली सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने लोगों को ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम डॉ० सुनीता डंडरियाल, रागिनी ठाकुर, पूनम लता, संध्या शर्मा, पुजा हरिश्चंद्र धनू रचनाकारों के रहे।

शुक्रवार, सितंबर 04, 2026

🏡 आशियाना 🏡








लोगों के सपनों का महल हमने तैयार किया,

किन्तु जुटा न पाये अपने लिये एक आशियां।


उन्होंने कुंज, घरोंदा और आशियाने से,

उस घर का नामकरण किया।


हमने अपने घर को,

नीली छतरी नाम दिया।


नींव पर पड़े हर नये पत्थर के साथ,

उनकी आशाओं को अपनी मेहनत से खड़ा किया।


जब तक घर पत्थरों का खण्डहर था,

तब तक ही उस पर हमारा आधिपत्य था।


किन्तु सपनों का महल पूरा होते ही,

उसके कर्णधार को उससे बाहर जाना पड़ा।


माना घर, जमीन और भी सब कुछ उन्हीं का था,

किन्तु मत भूलो उनके सपनों को,

हकीकत में हमने ही तासीर किया।


गुजरता हूँ जब कभी अपने ही बनाये दुर्ग से,

सौ बार सोचता हूँ—क्या मैं ही इसका कर्णधार हूँ ?


क्योंकि हर वर्ष की बरसात की तरह,

इस वर्ष भी टपकती रही हमारी छत।


और इतने लोगों के घरों को छत देने वाला,

बदल न सका अपने घर का टूटा छप्पर।


✍️ डॉ० सुनीता डंडरियाल (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड)

❤️ प्रेम और विश्वास ❤️








प्रेम कोई शब्द नहीं,

जो होंठों से कहा जाए,

प्रेम तो वह एहसास है,

जो ख़ामोशी में भी समझा जाए।


प्रेम है किसी की मुस्कान में

अपनी खुशी तलाश लेना,

उसकी आँखों में छिपे आँसू,

बिन कहे पढ़ लेना।


प्रेम है दूर रहकर भी,

दिल के पास बने रहना,

रिश्तों की भीड़ में,

किसी एक का ख़ास बने रहना।


न वादों की ज़रूरत,

न कसमें, न कोई शर्त,

जहाँ मन निःस्वार्थ हो जाए,

वहीं जन्म लेता है प्रेम।


प्रेम तो वह दीप है

जो आँधियों में भी जलता है,

और सच्चा हो अगर,

तो उम्र भर साथ चलता है।


✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय ऑनलाइन ‘सिनेमा साहित्यिक महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा सिनेमा के भिन्न-भिन्न पहलुओं को दर्शाने तथा सिनेमा के महत्व का अहसास लोगों को करवाने के उद्देश्य से ऑनलाइन ‘सिनेमा ...