
एक नारी के अनेक रूप होते हैं,
हर रूप में वह विशेष होती है,
पर गृहिणी के रूप में,
वह सबसे अव्वल होती है।
सुबह की पहली किरण से पहले उठती,
सबकी जरूरतों का ध्यान रखती,
किसी की माँ, किसी की पत्नी,
किसी की बेटी बनकर रहती।
सबके साथ होते हुए भी,
कभी-कभी स्वयं में अकेली होती है,
सबके चेहरे पर मुस्कान देखकर,
मन ही मन मुस्कुराती है।
कभी गुनगुनाती, कभी चहकती,
घर को अपना संसार समझती,
पर किसी कोने में उसके मन के कुछ
अधूरे सपने भी पलते हैं।
कभी थी अपनी एक पहचान,
अपने सपनों की उड़ान,
अपने स्वाभिमान का अभिमान,
अपने अस्तित्व की अलग पहचान।
फिर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता गया,
समय धीरे-धीरे हाथ से फिसलता गया,
सबको सँवारते-सँवारते वह,
खुद को ही भूलती चली गई।
माँ बनकर ममता लुटाई,
पत्नी बनकर साथ निभाया,
बहू बनकर घर को अपनाया,
हर रिश्ते को दिल से निभाया।
जो देखा, जो सीखा,
उसे अपने जीवन में उतारा,
अपनों की खुशियों के लिए
हर पल खुद को ही सँवारा।
पर कभी किसी ने पूछा —
“तुम्हारी भी कोई चाहत है ?”
कभी किसी ने जानना चाहा —
“तुम्हारे मन की भी कोई आहट है ?”
सबको खुश करने की चाह में,
वह खुद से दूर होती गई,
अपने सपनों की डोर थामे,
चुपचाप कहीं खोती गई।
पर गृहिणी केवल घर की चारदीवारी नही,
वह घर की नींव होती है।
उसके त्याग से घर सँवरता है,
उसकी ममता से हर धड़कन जुड़ी होती है।
अब समय है कि वह अपने सपनों को
फिर से पहचाने,
अपने अस्तित्व को सम्मान दे,
अपनी पहचान फिर से बनाए।
घर भी उसका, सपने भी उसके,
उड़ान भी उसकी, आसमान भी उसका,
वह केवल किसी की माँ या पत्नी नही,
वह स्वयं भी एक संपूर्ण व्यक्तित्व है।
गृहिणी होना उसकी सीमा नही,
यह तो उसके सामर्थ्य की पहचान है,
जो घर को स्वर्ग बना दे,
वह नारी सच में महान है।
✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )