रेशमा एक बहुत ही सीधी-सादी लड़की थी। जहां उसके साथ की लड़कियां फ़ैशन, टीवी और मोबाइल में लगी रहती थी वहीं वह उम्र से पहले ही बड़ी हो चुकी थी। रेशमा का पिता शराबी था। वह दर्जी का काम किया करता था परन्तु अपनी सारी की सारी कमाई अय्याशी और शराब पर लुटा दिया करता था। यह शराब अच्छे से अच्छे घरों को बर्बाद कर देती है, निम्नमध्यम वर्ग या निम्न वर्ग की बात ही क्या है। रेशमा की माँ फैक्ट्री में धागा काटने का काम करती थी और उन्हीं रुपयों से चार बच्चों समेत परिवार का खर्च चल रहा था। कई बार तो उसका शराबी पति उससे उन पैसों में से भी शराब पीने के लिए और पैसों की मांग करता। जिस दिन भी ऐसा होता घर में घमासान युद्ध सा छिड़ जाता था। घर में कलह बढ़ने पर खाना पीना सब हराम हो जाता था। पैसों के न मिलने पर वह पत्नी पर हाथ चलाने से भी बाज नहीं आता था और नहीं तो कोई सामान
ही उठा ले जाता और बाजार में बेचकर शराब पी जाता था।
रेशमा बहुत ही सीधी सादी सी लड़की थी उसकी आँखें चमकती हुई और कुछ बोलती सी लगती थी, उसका शरीर दुबला-पतला था लेकिन चेहरे पर एक अजीब सी गम्भीरता थी। उसको देखकर लगता कि कितना बड़प्पन है इसके मासूम से चेहरे पर। इसे हम परिस्थितिजन्य भी कह सकते हैं परिस्थितियां इंसान में बदलाव लाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं। अच्छे माता-पिता का संरक्षण मिल जाय तो बच्चा आकाश की ऊँचाइयों को छू सकता है वहीं दोनों में से अगर एक भी गलत हो तो बच्चे का जीवन
कौन सा मोड़ लेगा कुछ भी कहना सहज नही है।
घरेलू कलह में जीते हुए पढ़ाई करना इतना आसान नहीं होता है। रेशमा का नवीं की परीक्षा में गणित विषय में कम्पार्टमेंट आ गया था। गणित में कम्पार्टमेंट के नाम से ही वह डर गयी थी। उसकी मैडम ने उसे अपने पास बुलाया ," बेटा कोई बात नहीं परेशान मत हो, गणित विषय के लिए कोई ट्यूशन लगा लो और घर भी मेहनत करो तुम पास हो जाओगी।"
"जी मैम" कहकर रेशमा अपने घर चली गयी।
इसके बाद कुछ दिन तक वह विद्यालय ही नहीं आयी। फिर एक दिन आकर सीधे टीसी के लिए प्रार्थना पत्र लिखकर मैडम के सामने रख दिया।
"मैम अब मैं नहीं पढ़ूंगी, मम्मी के पास ट्यूशन पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं, वे मुझे अब नहीं पढ़ा पायेंगी।" कहते-कहते उसकी सूखी-सी आंखों से आंसू की दो बूंदें ढुलक गयीं।
मम्मी कहां हैं ? निशि मैम ने प्रार्थनापत्र हाथ में लिए लिए पूछा।
"मम्मी तो कम्पनी में काम करती हैं, वे वहीं गयीं हैं।"
"और पापा ,पापा कहां हैं ?"
" मैम पापा नहीं आयेंगे ।"
"क्यों, क्यों नहीं आयेंगे ?"
"मैम बस ऐसे ही । वे शराब पीकर इधर-उधर घूमते रहते हैं।" उसने कांपते हुए होंठों को साफ देखा जा सकता था। उसकी आँखों में आक्रोश झलक रहा था।
"कुछ काम नहीं करते हैं क्या ?
"करते हैं मैम, सिलाई का काम करते हैं परन्तु केवल अपने शराब भर के लिए। मम्मी से भी लड़कर पैसे छीन लेते हैं ।"
"क्योंं देती है मम्मी पैसे, नहीं दे।"
"मैडम फिर वह मारपीट करता है। मम्मी के शरीर पर इधर-उधर नीले निशान पड़ गये हैं। हम लोग बचाने जाते हैं तो वह हम लोगों को भी मारता है।" रेशमा की आंखों से आंसू बह रहे थे और होंठ कांप रहे थे। वह अब फफककर रो
पड़ी।
मैडम की आंखें भर आईं आखिर इस पुरुष प्रधान समाज में औरतों को कितना अत्याचार सहन करना पड़ता है। केवल पुरुष होने के कारण
वह खुद को खुदा ही मान बैठता है। उसके अन्दर की संवेदनशीलता कहां गायब हो जाती है।
"अच्छा तो मम्मी कितने बजे फैक्ट्री जाती है ?"
"आठ बजे सुबह।"
"ठीक है तुम उन्हें साढ़े सात बजे ही ले आना पर लाना जरूर। बहुत जरूरी बात करनी है।"
"जी मैम।" कहकर रेशमा चली गयी।
रेशमा का रोजमर्रा का काम था स्कूल में पढ़ाई करना, घर जाकर घर का सारा काम निपटाना, रात का खाना पकाना तब जाकर उसे दो रोटी नसीब होती थी। एक ही कमरा होने के कारण वह चादर के अन्दर टेबल लैम्प जलाकर पढ़ाई करती थी। उसका दिमाग बहुत अच्छा था अगर परिस्थितियां उसके अनुकूल होतीं तो वह नाम कर सकती थी।
दूसरे दिन सुबह साढ़े सात बजे रेशमा की मां बेटी के साथ मैडम के सामने थी।
नमस्ते मैम आपने बुलाया है मैम, मैम यह एक विषय में फेल हो गई है और मेरे पास ट्यूशन लगाने के लिए पैसे नहीं हैं। घर की स्थिति भी इस समय थोड़ा खराब चल रही है मैम।
"बस इतनी सी बात है न।"
"जी मैम ,क्या करूं मेरी भी मजबूरी है। "
"ठीक है तुम मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं रहती हो। इसको मैं ट्यूशन पढ़ाऊंगी बिल्कुल मुफ्त कुछ नहीं देना है। अब बताओ ?"
"मैडम आप बहुत महान हैं, मैं आपका यह उपकार जीवन में कभी नहीं भूलूंगी।""कोई बात नहीं, बस आप इसे घर पर भी थोड़ा सा पढ़ने का मौका देना।"
"जरूर मैडम रात का खाना यहीं बनाती है अब मैं बना लिया करूंगी।"
आपके घर में और कौन-कौन हैं ?
मैम चार बच्चे हैं। बड़े बेटे की शादी कर दी है उसके एक बच्चा भी है पर वह अपने ससुराल में ही रहता है। वह बदल गया मैम उसके ससुराल
वालों ने उस पर जादू कर दिया है।
"अरे यह तो बहुत गलत हुआ।"
"हां मैम पहले तो लव मैरिज कर ली और अब बीबी के साथ ससुराल में पड़ा रहता है। उसके ससुराल वाले और बीबी दोनों ही बहुत ख़राब हैं।" थोड़ा रुक कर फिर बोली,
"उसके एक बेटी यही रेशमा है दूसरी भी यहीं पढ़ती है सबसे छोटा बेटा है चौथी में पढ़ता है। इनका खर्चा मेरे ही ऊपर है। इनका बाप पांच पैसा भी नहीं देता उल्टा मारपीट करके मुझसे ही मांगता हैं।" रेशमा की मां रोते हुए बोली।
सब समय का खेल है, क्या करोगी ? सब ठीक हो जाएगा। रेशमा को कल से मेरे घर पढ़ने के लिए भेज देना।"
कुछ समय बाद जब कम्पार्टमेंट का रिजल्ट घोषित हुआ तो रेशमा पास हो गई थी। उसकी खुशी की कोई सीमा ही नहीं थी। वह मैम के पास जाकर खड़ी हो गई। वह मैडम के पैर छूकर बोली,
"मैम आपके कारण ही यह सब हुआ है। नही तो आज मैं घर में बैठी होती।" उसकी आंखों में एहसान झलक रहा था। उसका रोम-रोम से कृतज्ञता व्यक्त कर रहा था।
"ठीक है, ठीक है, अब आगे इतनी मेहनत करो की दसवीं भी पास हो जाओ। "निशी मैम बोली।
"जी मैम मैं बहुत मेहनत करूंगी।" रेशमा बोली।
"और हां साइंस का ट्यूशन भी लगा लो, उसकी फीस हर महीने मैं दूंगी। तुम हर महीने मुझसे आकर ले लिया करना। "साइंस की अध्यापिका नीना मैम बीच में बोल पड़ी।
रेशमा कुछ देर तक उन दोनों की ओर ही देखती रही मानों साक्षात ईश्वर सामने खड़े हों। जो उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे। रेशमा अपनी उड़ान भरने के लिए तैयार हो रही थी।
✍️ डॉ. सरला सिंह 'स्निग्धा' ( मयूर विहार, दिल्ली )