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सोमवार, अक्टूबर 09, 2023

🍁 मर्यादा की परिभाषा 🍁

"सारी मर्यादा छोड़ दी है तुमने, कोई शर्म लिहाज नही रहा बड़ों का। इस घर में रहना है तो हमारे तरीके से रहना पड़ेगा तुम्हें। "यह बातें आरती के दिमाग में घूम रही थी कि कैसे उसके ससुर ने उस से कहा था। आरती एक पढ़ी-लिखी लड़की थी और आगे भी कुछ करके अपने पैरो पर खड़ा होना चाहती थी पर मां बाप ने समर का रिश्ता आने पर यह कहकर शादी कर दी कि इतना बड़ा घर है राज करोगी, ऐसे रिश्ते नही मिलते। शादी के कुछ समय बाद ही आरती समझ गई कि उसके ससुराल में बहू को बोलने का हक नही है उनकी जबान बंद रखी जाती है मर्यादा का नाम देकर। अंदर ही अंदर घुट रही थी वो। आरती के जेठ का चरित्र सही नही था उसने एक दिन आरती के साथ गलत हरकत करनी चाही तो आरती ने उनके खिलाफ आवाज उठाई। इस बार पर ससुराल में सब उसके विरुद्ध हो गए और पति भी साथ नही थे। ससुर के द्वारा मर्यादा का पाठ पढ़ाने पर आरती का सब्र का बांध टूट गया वो बोली, "बस करिए यह मर्यादा की परिभाषा जो केवल स्त्री के लिए बनाई गई है। काश ! यह मर्यादा आपने अपने घर के पुरुषों को सिखाई होती तो आज यह दिन ही नही आता।" हमारे समाज की विडंबना यही है कि यहां मर्यादा सिर्फ स्त्री के लिए है जिसमें उसको यह सिखाया जाता है कि हमेशा चुप रहो अन्याय के खिलाफ ना बोलो और अगर आप ने बोला तो आपको चरित्रहीन की उपाधि मिल जायेगी। पर पुरुष के लिए कोई परिभाषा नही है, वो महान है।" पर बस, अब नही। अब यह परिभाषा बदलनी पड़ेगी और मैं इसकी शुरूआत आज यही से करती हूँ। यह घर छोड़ के जा रही हूँ और अब कानूनी कार्रवाई करुंगी।


✍️ स्मिता चौहान ( गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश )

गुरुवार, फ़रवरी 02, 2023

🦚 समय का मरहम 🦚

समय हर घाव भर देता है और हिम्मत भी देता है समय के साथ यह घाव भी भर जाएगा मैं जानती हूँ कि, तुम पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है क्योंकि तुम एक माँ हो। जिसकी बेटी के हाथों की मेहंदी न छूटी हो और वह विधवा हो जाए तो उस माँ का क्या हाल होगा माधवी मैं समझ सकती हूँ। मानसी ने अपनी सहेली माधवी को समझाते हुए कहा।


मैं अपने मन को समझाने की बहुत कोशिश करती हूँ मानवी पर जब पलक का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है तो मेरा दिल रो पड़ता है। मैं क्या करूं मैं कैसे अपने आपको समझाऊं मानवी परसो तीज का व्रत था। हर बार मैं कितने उत्साह से मेहंदी लगवाती थी। साज सिंगार करती थी। पर इस बार कुछ करने का मन नही हुआ। पलक की बातें याद कर कलेजा छ्लनी हुआ जा रहा था। वह अपनी शादी से पहले कहती थी मम्मी जब मेरी शादी होगी तो मैं भी आपकी तरह तीज का व्रत रखूंगी, श्रृंगार करूंगी और पूरे हाथों में मेहंदी लगाऊंगी। मानवी मैं यही सोच रही थी कि, तीज के दिन वह क्या सोच रही होगी" माधवी ने रोते हुए कहा माधवी की बात सुनकर मानवी की आंखों से भी आंसू बहने लगे बाहर तो आज वैसे भी बारिश बंद होने का नाम नही ले रही थी।


तभी बिजली कड़की कड़कने की आवाज सुनकर लगा कि, कहीं बिजली गिरी है। बिजली कड़कने की आवाज सुनकर माधवी ने दर्द भरी आवाज में कहा, "आज पता नही इस बिजली ने किस पलक के मांग का सिंदूर मिटा दिया होगा"


मानवी मुझे बारिश का मौसम बहुत अच्छा लगता था। यह तो तुम्हें पता है पर अब मैं जीवनभर बारिश के मौसम में खुश नही रह सकती। क्योंकि इसी बरसात के मौसम ने मेरी बेटी के जीवन से उसकी सभी खुशियों को छीन लिया है। माधवी ने उदास लहजे में कहा।


माधवी अभी तुम्हारा घाव हरा है। इसलिए तुम उसके दर्द को भूल नही पा रही हो। धीरे-धीरे समय का मरहम गहरे से गहरे घाव भर देता है। पलक भी धीरे-धीरे सामान्य हो जाएगी। क्योंकि ईश्वर स्वयं भूलने की शक्ति मनुष्य को देता है। अगर ऐसा न हो तो मरने वालों के साथ उनके परिजनों की भी मौत हो जाए पर ऐसा नही होता क्योंकि यह ईश्वरीय वरदान है, कि समय सभी घावों को भर देता है और मनुष्य में पुनः शक्ति का संचार होता है और व्यक्ति अपने जीवन की कटु यादों को भूलाकर जीवन पथ पर आगे बढ़ जाता है। मानवी ने बहुत प्यार से माधवी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा।


बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी तभी माधवी के फोन की घंटी बज उठी माधवी ने फोन उठाया। फोन उनकी समधन का था।


माधवी उनसे बात करने लगी "हैलो मैं ठीक हूँ" ? "आप कैसी हैं ?


उधर से क्या कहा गया वह तो मानवी नही सुन सकी लेकिन माधवी ने जो कहा वह उसने सुना माधवी फोन पर कह रही थी "आप सच कह रही हैं आप ऐसा करेंगी मैं आपका अहसान जीवन भर नही भूलूंगी। आप औरत के रूप में एक देवी हैं। आपने मेरी बेटी के दर्द को अपना समझा। आप जैसी सास पाकर मेरी बेटी धन्य हो गई और मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगी। कि हर बेटी की माँ को आप जैसी समधन मिले" माधवी ने खुश होकर कहा और फोन रख दिया।


मानवी कुछ पूछती उससे पहले ही माधवी ने खुश होते हुए कहा "मानवी पलक की सास कह रही थी कि कुछ समय बाद जब पलक की स्थिति सामान्य हो जाएगी तो वह उसका विवाह अपने छोटे बेटे के साथ कर देंगी। वह भी यही कह रहीं थी कि, समय सब घाव भर देता है। मैंने भी अपना बेटा खोया है पर उसके साथ मर तो नही सकते। उसकी यादों को दिल में समेटकर आगे बढ़ना ही होगा, और हम लोग भी यही करने की कोशिश कर रहे हैं" माधवी ने खुश होकर अपनी समधन की कही बात मानवी को बताई।


मानवी ने देखा कि, अपनी समधन की बात सुनकर माधवी के चेहरे पर दर्द की लकीरें कम हो गई थी। बाहर बादल अभी भी झूमकर बरस रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि,‌ वह भी माधवी की खुशी में शामिल हो गए हैं।


✍️ डॉ० कंचन शुक्ला ( अयोध्या, उत्तर प्रदेश )

मंगलवार, जनवरी 31, 2023

🏅 उसके बाद....! 🏅

जिंदगी कब क्या मोड़ दिखा दे कोई नही जानता। नही जानते थे दीनानाथ जी कि जिस बेटे को न देखने की कसम खाई है, उसे एक दिन खुद ही फोन कर अपनी लाचारगी दिखाते हुए बुलाना पड़ेगा। बहुत अहंकारी थे। बेटे की परवरिश में कोई कसर नही छोड़ी। अविनाश भी महत्त्वाकांक्षी था। जैसा-जैसा पिता चाहते गए अरमान पूरे करता गया और जब पिता का नाम रोशन कर विदेश गया गांँव का कौन सा घर होगा जहाँ उस दिन चूल्हा जला होगा अरे भई पूरे गांँव वालों के साथ खुशी मनाई गई थी। शुरू के कुछ साल उत्साह में बीते लेकिन एक दिन अचानक एक फोन ने रिश्ते बदल डाले।


"पापा, आपसे कुछ कहना चाहता हूँ !"


"अब ये मत कहना छुट्टी नही मिल रही। दो साल हुए तेरी शक्ल देखे। अब आ जा मेरे बच्चे ! तेरी माँ की तबियत भी ढीली है अपनी बहू को लाने का अरमान रख, खुद को संँभाले हुए है।"


"पापा... कुछ कहना है आपसे ? "मैं आ तो रहा हूँ लेकिन अकेला नही !"


"मतलब !"


"मैने शादी कर ली है।"


एक वज्रपात सा उनके दिल के टुकड़े कर गया।


"शादी कर ली बिना हमें बताए ? वो औरत जिसकी उँगली पकड़े बिना तू एक कदम भी नही बढ़ा पता था, वो पिता जिसकी हाँ सुने बिना, तू गर्दन नही उठाता था। तू इतना बड़ा हो गया...! हमने इतने विश्वास से तुझे भेजा और तूने हमारे ख्वाबों के साथ.... विश्वासघात किया है। आज से तेरा और हमारा कोई संबंध नही। मेरे जीते जी इस घर की तरफ रुख मत करना।"


"पापा.....!"


कहाँ जानते थे दीनानाथ जी कि एक दिन अपना स्वाभिमान दांँव पर रख बेटे को फोन कर बुलाना पड़ेगा।

धर्मपत्नी ने बिस्तर क्या पकड़ा, मोहित को बुलाने की जिद्द पकड़ बैठी।


"माफ कर दीजिए ना उसे। जाने से पहले एक बार उसे देख लूँ तो चैन से जा पाऊंँगी।"


कहते हैं ना किस्मत में लिखा कोई नही टाल सकता। ये ज़िन्दगी कब क्या खेल खिला दे कोई नही जानता। आज अपना अहम किनारे रख बेटे को फोन कर आने को कह दिया।


"पापा आपका कहना ही काफी है। मैं तो तरस गया था आप लोगों को देखने के लिए ।"


बेटा तुरंत पहली फ्लाइट पकड़ परिवार सहित पहुँच गया लेकिन फिर वही बात ज़िंदगी इतनी आसान कहाँ होती है ! उसके पहुँचने से पहले माँ चल बसी।

भारतीय मूल की विदेश में जन्मी लड़की दीनानाथ जी की बहू बन पहली बार इंडिया आई थी। बिल्कुल देशी रंग में रंगी, जिम्मेदारियों को निभाती रही। यही नही उसकी सौम्यता, व्यक्तित्व हर एक के लिए उदाहरण का पात्र बन चुके थे। दीनानाथ जी बारह दिन में पुराने गिले-शिकवे सब भूल गए।


बेटा-बहू कुछ दिन यहाँ रहकर, पापा का मन बदलने के लिए उन्हें अपने साथ ले गए लेकिन दीनानाथ जी ठहरे गाँव के आदमी कुछ दिन रह वापिस आ गए।


अब बच्चों से संबंध अच्छे बन चुके थे। वो अक्सर फोन पर बात करते। आज बेटे से फोन पर बात के बाद दीनानाथ जी कुछ विचलित दिखाई दिए।


धर्मपत्नी की फोटो के आगे लाचारगी से खड़े होकर बोले,"आखिर दिखा ही दी उसने अपनी औकात ! जो बेटा समय रहते धोखा दे गया था वो अचानक से मेरा कैसे हो सकता था। न जाने क्यों मैं उसके भोलेपन में फंस गया। जानता था तुम्हारी जिद्द, तुम्हें मेरी चिंता थी कि तुम्हारे जाने के बाद मेरा क्या होगा। क्यों मैंने तुम्हारी बात के आगे घुटने टेक दिए। चालाकी देखो माँ की मौत पर आकर सबकी नजरों में अच्छा बन गया। कौन जानता था नजर कहीं और थी!"


लगा धर्मपत्नी मुस्कुरा कर कह रही हो, "देखो जी कई बार स्थिति जैसा हम सोचते हैं उसके विपरीत होती है। एक बार खुलकर बात करो। पता नही क्यों अविनाश गलत होगा ऐसा मुझे नही लगता।"


कल आ रहा है लगता है ये आखिरी मुलाकात होगी।‌ स्पष्ट कह दूँगा तुम्हारी मांँ की वजह से मैंने तुम्हें आने की इजाजत दी थी।


अगले दिन बहू और अविनाश पहुँच गए। बहू को घर संभालते बिल्कुल समय नही लगा। पापा का ख्याल रखना, समय पर दवाई देना से लेकर आए-गए का करना। सर्वगुण सम्पन्न कहें तो गलत नही होगा। उसका व्यवहार देख दीनानाथ जी चाहते हुए भी कुछ कहने की हिम्मत नही कर पा रहे थे। अगले दिन तीनों बैठे बातें कर रहे थे।


खट-खट 


"जी कहिए ?"


"अविनाश जी है। मैं फाइनैंस कंपनी से आया हूँ। मीटिंग करने को कहा था।"


अविनाश ने पिता को उनसे मिलवाया," पापा ये इंजीनियर हैं और साथ में फाइनैंस कंपनी वाले। अपनी जमीन का ब्यौरा देना होगा हम उस पर लोन उठाकर काम शुरू करवाना चाहते हैं।"


मन से टूटे दीनानाथ जी, तबियत खराब का बहाना बनाकर अंदर चले गए। अविनाश ने उन्हें फिर बुलाने का कह रुखसत ली। शाम को पिता के साथ वार्तालाप में अविनाश ने फिर बात छेड़ दी,"पापा, अपने पास कितने एकड़ जमीन होगी ? उस पर काम शुरू करवाएँगे तो लोन मेरे नाम से या सुजाता के नाम से लेना होगा।"


अब दीनानाथ जी के सब्र का बांँध टूट चुका था।


"तुमने मुझे इतना कमजोर समझ लिया। पाई-पाई जोड़कर मैंने ये जमीन खड़ी की है। तुम्हारी माँ के जाने से मैं अकेला जरूर हो गया हूँ असहाय नही। अपनी ज़िंदगी से जुड़ी एक मनमानी तुम कर चुके हो जिसके लिए तुम्हारी माँ की वजह से मैंने तुम्हें माफ कर दिया। तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मेरे जीते जी, तुम मेरी जीवन भर की कमाई पर लोन उठा रहे हो !"


"पापा क्या गलती हुई मुझसे ? अंत-पंत जमीन की देखभाल तो मुझे ही करनी है और यदि समय रहते हमने कदम उठा लिया तो क्या गलत किया ?"


"मैं तुमसे किसी बात पर सवाल-जवाब नही करना चाहता। वो जमीन मेरी है और सिर्फ मेरी।"


बहू दूर खड़ी दोनों की बातें सुन रही थी।


"पापा हम किसके है ? क्या आपने अभी भी हमें माफ नही किया। अविनाश आप लोगों के बिना अधूरे थे। मेरे पापा डेथ बेड पर थें उनकी जिद्द थी। भारतीय मूल के लड़के से मेरी शादी करने की। अविनाश के हाथ में मेरा हाथ दे उन्होंने चैन की सांस ली लेकिन इन्होंने मुझसे शादी नही की और तब तक नही करना चाहते थे जब तक आप लोगों का आशीर्वाद नही मिल जाता।


यकीन मानिए आप लोगों को हमारा बिना शादी के इस तरह साथ रहना भी पसंद नही आता इन्होंने अभी यहाँ से जाने के बाद मुझे पत्नी रूप में स्वीकार किया है। आपके संस्कार बहुत मजबूत है पापा, आपने कैसे सोच लिया कि हम जमीन आपसे लेकर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करेंगे। जब आपका हमारे साथ मन नही लगा तो अविनाश का मन भी वहाँ से उखड़ चुका था। वो आपको किसी कीमत पर अकेला नही छोड़ना चाहते थे इसलिए हमने निश्चय किया कि यहाँ से सब छोड़-छाड़ कर गाँव की जमीन पर मशरूम की खेती करेंगे। मैंने भी हॉर्टिकल्चर में एम.एस.सी की है सोचा था अपनी पढ़ाई और आपके अनुभव का फायदा उठाकर आपके साथ यहीं रहेंगे लेकिन यदि आपको ये प्रस्ताव नही पसंद.....तो...!"


दीनानाथ जी बहू की बातें सुन आत्मग्लानि से भर उठे। वो क्या समझ रहे थे और ये क्या हुआ !


धीरे से वहांँ से उठ धर्मपत्नी की फ़ोटो के पास जा खड़े हुए...,"तू सही कहती थी मैं बहुत जल्दी में निर्णय ले लेता हूँ। बच्चे हमेशा गलत ही हो ऐसा नही है। आजकल के बच्चे बहुत व्यवहारिक हो गए हैं। तुम्हारे और मेरे दिए संस्कार कभी गलत नही हो सकते। हमारा अविनाश लौट आया है बहू को लेकर।


अगले दिन फाइनेंस के कागजात साइन कर दीनानाथ जी ने अविनाश के आगे कर दिए, "बस एक इच्छा है उसके जाने के बाद भी उसका वजूद हम सबके बीच जिंदा रहे इसलिए अपनी फर्म का नाम अपनी माँ के नाम पर रखना।"


✍️ मीता जोशी ( जयपुर, राजस्थान )

रविवार, जनवरी 29, 2023

🏅कर्तव्य🏅

लाल जोडे़ में लिपटी बड़ी सी बिंदी लगाए मांँ, ऐसी लग रही थी जैसे शैया पर नही, आराम करने लेटी हैं बस आँख खुली और तुरंत बोल पड़ेंगी, "बहुरिया ये क्या हल्के रंग की साड़ी पहन रखी है। जरा चटक रंग पहनियो, लगे हमारी बहू है। मैं तो जब अंतिम विदाई लूँगी तब भी मेरा इतना ही श्रृंगार करना इतना कि तुम्हारे बाऊजी को अफसोस हो कि उन्होंने जीवन में कितना खूबसूरत समय खोया है।"


स्निग्धा अम्मा की बातें सोच ही रही थी कि शैया के पास बैठे बाऊजी की सिसकने की आवाज़ सुनाई दी।


"बहुत जिद्दी हो माया ! आखिर अपना कहा पूरा कर ही लिया। ये ना सोचा तुम्हारे बिना मैं कितना अधूरा हो जाऊँगा।"


बाऊजी की बातें स्निग्धा की सोच के बाहर थी। उसने जब से देखा, अम्मा को बाऊजी पर भुनभुनाते ही देखा और बाऊजी को देख लगता वो उनकी बातों को नजरअंदाज कर रहे हैं।दोनों में शायद कभी पटी ही नही।


कहते है बाऊजी भरी जवानी अम्मा को अपने माता-पिता की सेवा के लिए छोड़ शहर चले गए थे और पूरी ज़िंदगी उन्हें ले जाने का झांँसा देते रहे। अपनी जवानी से लेकर बुढ़ापे तक अम्मा ने बस उनका इंतजार ही किया और जब माता-पिता चल बसे तो उन्होंने अपनी इच्छा अम्मा के आगे रख दी, "अब साल दो-साल में रिटायर हो, मैं खुद शहर की चकाचौंध से दूर गाँव आना चाहता हूँ।"


अम्मा जब गुस्सा होती अक्सर यही कहती, "देखना जब मैं चली जाऊंँगी ना तब बुढ़ऊ को पता चलेगा अकेलेपन की पीड़ा क्या होती है।" और सच...अम्मा ने अपनी बात सच साबित कर दी पिता जी को आए साल भर ही बीता था कि अम्मा उन्हें अकेला छोड़, सदा के लिए चली गईं।


देखते ही देखते दस बारह दिन बीत गए। आज बेटा-बहू वापिस जाने वाले है। अपने पिता के अकेलेपन को देखकर मुकुल ने भी वही निर्णय लेने का सोचा जो कभी बाऊजी ने लिया था, "बाऊजी मुझे जाना पड़ेगा। स्निग्धा यहीं आपके साथ रहेगी। साल भर निकालना है उसके बाद देख लेंगे जैसा भी होगा।"


स्निग्धा मन ही मन सोचने लगी कितनी उलझी हुई होती है। एक स्त्री की ज़िंदगी। यदि वो विद्रोह करे तो संस्कारहीन होने का ठप्पा लग जाता है और सब जिम्मेदारी छोड़ चली जाए तो बेशरमी का। उसका अपना कोई वजूद नही, कोई मन नही। धन्य थी माँ जो पूरी ज़िंदगी बाऊजी के इंतजार में बिता दी। मुकुल ने एक बार भी यह नही सोचा मेरा भी कुछ मन होगा। मेरी ज़िंदगी का फैसला लेने का अधिकार मुझे भी है। कैसे कहूँ मैं औरत किसी के हाथ की कठपुतली नही और ये अम्मा का जमाना भी नही जहाँ जो निर्णय ले लिया उसी पर हाँ कर दी।


बाऊजी चुप थे। कौन समझ सकता है ये वही बाऊजी हैं जिनकी अम्मा से एक मिनट नही पटती थी। अम्मा के जाने के बाद वो बिल्कुल टूट गए थे। हमेशा माँ की फ़ोटो के पास गुम-सुम बैठे रहते। हर समय उन्हीं की बातें और उन्हीं की पसंद का देना-लेना।


स्निग्धा सोचती काश ! बाऊजी ने समय रहते अम्मा की कद्र की होती बिचारी ने कितना अकेलापन झेला। क्यों आदमी अपनी जिम्मेदारियों को एक स्त्री के कंधे में डाल बेफिक्र हो जाता है।


बाऊजी इतने टूटे हुए थे कि स्निग्धा ने मन ही मन कुछ समय उनके साथ रहने की ठान ली। अगले दिन मुकुल ने खुद के जाने का एलान कर दिया।


"कुछ दिन और रुक जाते मुकुल। जानता हूँ बेटा, तुम सबका दोषी हूँ। तुम्हारा किसी का दर्द नही समझा और आज फिर खुद का सोच तुम्हें रोक रहा हूँ।


"नही बाऊजी आप अपने बेटे से ही तो कह रहे है। स्निग्धा यहीं रहेगी ..आपके साथ।"


"क्यों ?"


जब तक माँ की बरसी नही हो जाती आपको अकेले छोड़ कहीं नही जाएंँगे और फिर मैं आता-जाता रहूंँगा।


"जी बाऊजी, सही कह रहे हैं ये। "स्निग्धा ने हामी भरते हुए कहा।


"नही मुकुल नही...। बहू की जगह यहाँ नही, तुम्हारे साथ है इतना बड़ा त्याग किसलिए ?"


"त्याग...कैसा त्याग बाऊजी ? आपने भी तो....!"


मुकुल वो त्याग ही था उस समय अपने कर्त्तव्य के चक्कर में मैंने अपने बीवी-बच्चों के साथ नाइंसाफी की। ये तो उसकी सजा वो मुझे देकर गई है। अकेली वो थोड़ी थी मैं था। परिवार से, बच्चों, पत्नी से दूर। आज यदि बहू को रख लिया तो वो मुझे कभी माफ नही करेगी।


"बाऊजी यदि आप ऐसा समझते है तो माँ को कभी क्यों नहीं समझे ?"


"वो मेरी ताकत थी। मैंने उसी के सहारे निश्चित होकर नौकरी की है। उसकी बातें, बच्चों की याद सबके सहारे जीवन बिताया। हमने अपने-अपने हिस्से का कर्तव्य पूरा किया लेकिन न जाने क्यों कभी-कभी माता-पिता भी इतने स्वार्थी हो जाते है। कभी उन्होंने उसे मेरे साथ भेजना ही न चाहा और मैं तुम्हारी माँ की हिम्मत देख समय बिताता रहा। सच एक स्त्री यदि अपने जीवन साथी का भरपूर साथ दे तो जीवन की हर मुश्किल आसानी से हल हो जाती है।


बेटा मैं अकेला नहीं हूँ। तुम्हारी माँ की यादें मेरे साथ है उसके रहते मैं अकेला कैसे हो सकता हूँ। अब कुछ पल तुम्हारी अम्मा के साथ अकेले बिताना चाहता हूँ। उसके गिले-शिकवे भी तो दूर करने हैं। मुझे इसी में संतुष्टि है कि उसने तुम्हें इतने अच्छे संस्कार दिए। कह बाऊजी अम्मा की फ़ोटो को सीने से लगाए दूसरे कमरे में चले गए।


      ✍️ मीता जोशी ( जयपुर, राजस्थान )

मंगलवार, दिसंबर 20, 2022

🏅बेटी🏅

रमेश अपनी पाँच वर्षीय बेटी के साथ खेल रहा था। कभी बच्‍ची छिपती। रमेश ढूंढ़ता। कभी रमेश छिपता। बेटी ढूंढ़ती। जब पिता नही मिलते तो बच्‍ची रोने लगती। रमेश दौड़कर उसे गले लगा लेता। रमेश अपनी बेटी को और पिताओं से कुछ ज्‍यादा ही प्‍यार करते थे। पत्नी कहती भी कि ज्‍यादा लाड में मत बिगाड़ो। लेकिन रमेश पत्‍नी से कहते, अपनी बेटी को लाड नहीं करूंगा तो किससे करूंगा। जबसे मेरे जीवन में आई है, मुझे जीने का सहारा मिल गया। बेटी पैदा होने के बाद रमेश ने फिल्‍म जाना, दोस्तों के साथ उठना-‍बैठना सब बन्‍द कर दिया था। अब बेटी के साथ खेलते। बेटी को घुमाने ले जाते। बेटी ही उनका जीवन बनकर रह गई थी। बेटी के साथ आज फिर छुपम-छिपाई का खेल चल रहा था। बेटी छिपती तो देख लेने के बाद भी रमेश इस कमरे से उस कमरे में जाते और कहते –‘’अरे मेरी बेटी कहां गई----मेरी बेटी कहां गई—फिर कुछ देर बाद पकड़ लेते। फिर रमेश छिपते तो बेटी इधर-उधर ढूंढ़ने के बाद रोने लगी। रमेश फौरन दौड़कर आये और बेटी को गले से लगा लिया। बेटी ने रोते हुए धीरे से पिता के गाल पर चपत लगाई। प्‍यार से रमेश ने भी बेटी के गाल पर हल्‍की सी चपत लगा दी। फिर रोते हुए बेटी ने पिता के गाल पर जोर से चपत लगा दी। फिर पिता रमेश ने हंसते हुए हल्‍के से बेटी को चपत लगा दी। फिर बेटी ने थप्‍पड़ मारा प्‍यार भरा। इस बार पिता रमेश ने थोड़े जोर से प्‍यार भरी चपत लगा दी। बेटी को गाल पर चोट सी लगी। उसने गुस्‍से में पिता को अपने नन्‍हें कोमल हाथ से थप्‍पड़ मारा। रमेश ने पिछली बार से ज्‍यादा जोर से मारा। बेटी को जोर से लगा। वह रोकर लिपट गई और पिता की पीठ, गाल पर नन्‍हें हाथों से चोट करने लगी। रमेश को पता नही क्‍या हुआ, वह बच्‍ची को जोर से थप्‍पड़ मारने लगा। बेटी को समझ नही आया कि उसके प्‍यारे पापा उसे क्‍यों मार रहे हैं। बेटी रोते हुए अपने मुलायम, कोमल हाथों से मारने लगी तो पिता रमेश को न जाने अचानक कैसा और किस बात पर गुस्‍सा आ गया कि वे जोर-जोर से अपनी जान से ज्‍यादा प्‍यारी बेटी को मारने लगे। थप्‍पड़ अब चपत या थपकी नही थे। थप्‍पड़ ही थे। बेटी जोर-जोर से रोने लगी और रमेश को पता नही क्‍या पागलपन सवार हुआ‍ कि वे अपनी जान से प्‍यारी बेटी को जोर-जोर से पीटने लगे।  

        रमेश के मस्तिष्‍क में अचानक बचपन का दृश्‍य घूमने लगा। जब वे पांच वर्ष के थे और उसके पिता रमेश की मां को शराब के नशें में पीटते हुए गंदी-गंदी गालियां देते हुए उसे बदचलन कह रहे थे। रमेश की मां पिट रही थी और पिता उसे पीट रहे थे। रमेश सहमा हुआ एक तरफ खड़ा हुआ था। 

        पिता जयसिंह जोर-जोर से चीख रहे थे -‘’तुम औरते होती ही बेवफा हो। मेरी गैरहाजिरी में अपने यार को बुलाकर गुलछर्रे उड़ाती हो। चरित्रहीन औरत तू मर क्‍यों नहीं जाती। इतना प्‍यार है तो अपने यार के साथ मुंह काला करके भाग जाती उसी के साथ -‘’ और ये सिलसिला जब तब चलता रहता। 

        रमेश की मां ने जब एक बेटी को जन्‍म दिया तो जयसिंह ने चीखकर कहा -‘’बेटी कैसे हो गई। ये मेरी नही हो सकती। बेटी पैदा करके तूने मेरा सिर शर्म से झुका दिया। अब कहां से आयेगा इसकी शादी के लिए लाखों रूपये। पूरे जीवन इसके ससुरालवालों के सामने झुकना पड़ेगा। पालेंगे हम और आबाद करेगी दूसरे का घर और यदि जवानी में इसके कदम बहके तो पूरे खानदान के मुंह पर कालिख पोत कर रख देगी।‘’ 

        रमेश की मां जया ने कहा -‘’बेटी लक्ष्‍मी होती है। दुधमुंही बच्‍ची के बारे में इतना क्‍यों सोचते हैं। अपना भाग्‍य लेकर आती हैं लड़कियां। अपने घर के साथ दूसरे का घर भी रोशन करती हैं। आप पढ़े-लिखे हो। सरकारी अफसर हो। बेटी के लिए दहेज जुटाना कौन सी बड़ी बात है आपके लिए’’ 

‘’तो क्‍या मैं इसपर खर्च करने के लिए कमा रहा हूं।‘’ 

‘’बेटियों से घृणा करने वाले यदि अपने लिए बेटियां नही चाहते तो अपने बेटों के लिए बहू कहां से लाओगे’’ 

‘’मुझे उपदेश देने की जरूरत नही है। मुझे लड़की नही चाहिए। चाहे किसी को दे दो या बहा दो नदी में।‘’ 

‘’मैं माँ हूँ। मेरा अंश है ये। मैं इस पर आंच नही आने दूँगी। मैं भी किसी की बेटी हूँ। आपसे प्‍यार किया। आपके साथ घर छोड़कर भागी। आपसे विवाह किया। आपका घर बसाया।‘’ 

‘’इसलिए तो कहता हूँ कल तेरे नक्‍शेकदम पर चलेगी तो क्‍या मुंह दिखाऊगा समाज को। तुम मेरे साथ भागी अपने माँ-बाप को छोड़कर। जब तुम बाप की नही हुई तो मेरी कैसे हो सकती हो और ये लड़की भी यही करेगी तो‍ ----‘’

‘’जया गुस्‍से में आ गई। उसने क्रोध से कहा – ‘’ मैंने तुम्‍हारे प्‍यार के लिए अपना घर-परिवार छोड़ा। उसका ये सिला दे रहे। तुम्‍हें किसी की लड़की भगाते शर्म नही आई। इज्‍जतदार होते प्रेम की कदर करते तो मुझे भगाकर न ले जाते। मेरे माता-पिता से मेरा हाथ मांगते।‘’ 

जयसिंह क्रोध में आ गये। शराब का नशा भी था और घर के बड़े-बुजुर्ग के चेहरे भी घर में बेटी के पैदा होने से मुरझा गये थे। उन्‍होंने गुस्‍से में कहा –‘’ ये कन्‍या मेरे घर नही आयेगी। इसका गला घोंट दो। चाहे कहीं फेंक दो। सारा घर मुझ पर लाहनत बरसा रहा है।‘’ कहते हुए क्रोध में जयसिंह बाहर निकल गया। रमेश सब कुछ सुन रहा था। देख रहा था। माँ के आँसू, अपनी छोटी नन्हीं बहन की किलकारी। उसका मन हुआ कि गोद में ले ले अपनी नवजात बहन को लेकिन पिता और दादा-दादी के डर से खमोश रहा और दादा के चीखकर बुलाने पर बाहर आ गया। 

पता नही बाद में क्‍या हुआ कि माँ रोती चीखती रही। अपने पति जयसिंह को हत्‍यारा कहती रही। लेकिन उस नन्‍ही बहिन का कुछ भी पता नही चला। बस माँ के शब्‍द याद थे। जो उन्‍होंने अपने पति से अपने सास ससुर से कहे थे। ‘’रात में सोते समय तुम लोग मेरी बेटी को उठाकर ले गये और उसकी हत्‍या कर दी। नन्‍हीं बालिका की हत्‍या ईश्‍वर कभी माफ नहीं करेगा।‘’  माँ जितना चीखती-चिल्‍लाती उसे उतना ही पीटा जाता। और मार-पिटाई के इसी क्रम में एक दिन माँ मर गई। या कहें कि उसकी हत्‍या कर दी गई। न पुलिस आई न रिपोर्ट हुई। नाना-नानी, मामा लोग अंत्‍येष्टि में आए और चुपचाप चले गये। पिता जयसिंह पुलिस इन्‍सपेक्‍टर थे जो कह दिया उन्‍होंने वही कानून हो गया।

पिता को शराब की लत पहले से थी। पत्‍नी के न रहने पर कभी बाजारू औरतों के साथ बाहर रात गुजारते। कभी घर में लाते। रमेश के दादा-दादी ने बहुत कोशिश की बेटे के दूसरे विवाह की। लेकिन समाज उन्‍हें पत्‍नी एवं कन्‍या हत्‍या का दोषी मानने के साथ-साथ शराबी और अय्याश भी मानता था। 

उनकी हरकतों के कारण किसी ने अपनी लड़की नही दी ओर वे इसी तरह जीते हुए बर्बाद भी हुए और किसी अदृश्‍य बीमारी से उनकी मौत हो गई। दादी-दादा ने जयसिंह की मौत का जिम्‍मेदार उन बाजारू औरतों को माना।

घर की आर्थिक स्‍थिति बद से बदतर हो गई। दादा-दादी बूढ़े थे। वे क्‍या काम करते। रमेश को दस वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़कर दूसरों की दुकान पर, घरों में छोटे-छोटे काम करके अपना और दादी-दादा का पेट पालना पड़ा। दादा-दादी के न रहने पर रमेश ने कड़ी मेहनत करके पाई-पाई बचाकर परचून की दुकान खोल ली। उसकी दुकान पर आने वाले ग्राहक जो उससे घुले-मिले थे। अपने घर की व्‍यथा – कथा कहते। जिसमें बहन की शादी का रोना। बेटियों को वर न मिलना। दहेज की मांग करना। बेटियों का घर से भागकर शादी रचाना और परिवार के मुंह पर कालिख पोतने जैसे विषय मुख्‍य रहते।

एक ग्राहक ने तो यहां तक कह दिया कि इसलिए पहले के जमाने में लोग पैदा होते ही बेटियों का गला घोंट देते थे। रमेश को लगता कि उसके पिता सही थे।‌ उसकी मां गलत थी। घर में बेटियों को होना ही अभिशाप है बहन-बेटियों से छेड़छाड़ के चलते लोगों ने बेटियों को पढ़ाना बन्‍द कर दिया। कई भाइयों ने छेड़छाड़ करने वालों के साथ मारपीट की और जेल चले गये। कई ग्राहक तो ऐसे भी थे जो उससे हंसी मजाक करते थे। दूसरों की बुराई उससे करते थे। गोविन्‍द ने एक दिन मजाक में कहा -‘’कमल की शादी हुए कई साल बीत गये लेकिन वर्षो बाद हुई भी तो लड़की। नामर्द होगा। मर्द होता तो एक मर्द को पैदा करता। अब मरने के बाद मुखाग्नि कौन देगा ? मोक्ष कैसे मिलेगा ? जायदाद का क्‍या होगा। कोई लड़का आयेगा और लड़की को फंसाकर जीवन भर की कमाई ले उड़ेगा। समाज में मुंह काला होगा सो अलग।‘’ समाज की सोच पहले भी वही थी आज भी वही है। रमेश के दिमाग में इन सब बातों का थोड़ा बहुत असर तो होना ही था। कुछ समय बाद एक भले परिवार ने अपनी लड़की की शादी रमेश से कर दी। जब पत्‍नी ने गर्भधारण किया तो वह यही मांगता रहा भगवान से कि हे ईश्‍वर बेटा ही देना। लेकिन बेटी ही हुई। कुछ समय तो रमेश उदास रहा। फिर बेटी ने अपनी हंसी और भोलेपन की ऐसी माया फैलाई कि रमेश का पूरा जीवन बेटी के इर्द-गिर्द घूमने लगा। जिनके यहां बेटे थे बेटी नही थी। उनके बारे में रमेश यही सोचता कि कितना नीरस जीवन होगा इनका बिना बेटी के। बेटी के होने से परिवार में सभ्‍यता का संचार होता है। शर्म, लिहाज सब सीख जाता है व्‍यक्ति।

रमेश पांच वर्षीय बेटी को पीट रहा था। बेटी जोर-जोर से रो रही थी। पत्‍नी घर का सामान लेने बाजार गई थी। बेटी के करूण रूदन से मां की कही बात याद आ गई। बेटी लक्ष्‍मी का रूप होती है। कन्‍या के हत्‍यारों को भगवान कभी माफ नही करता। उसे अपनी नन्‍हीं बहन की याद आ गई। किस बेदर्दी से पिता ने उसकी हत्‍या कर दी। मां कैसे बेटी की याद में तड़फती रही। उसे लगा जैसे वह अपनी नन्‍हीं बहन की मां की हत्‍या कर रहा हो। और जैसे अचानक उसे होश आया। ये क्‍या कर रहा हूं मैं। बेटी के रोने से उसके अन्‍दर करूणा फूट पड़ी। उसने बेटी को गोद में उठाकर सीने से लगा लिया। और भगवान से कहा-‘’मार दे मुझे भगवान। ये क्‍या हो गया था मुझे’’ बेटी कुछ देर रोती रही। अपने नन्‍हें हाथों से पिता को गुस्‍से में पीटती रही। पिता बेटी से पिटने का आनन्‍द लेते रहे। फिर पिता के सीने में सिर रखकर बेटी सो गई।  

रमेश ने तय किया कि मैं अपनी बेटी को खूब पढ़ाऊंगा। उसे आत्‍मनिर्भर बनाऊंगा। जीवन भर हर सुख-दुख में उसका साथ दूंगा। बड़ी से बड़ी‍ गलती बेटी की माफ करूंगा जैसे लोग बेटो की करते हैं। भविष्‍य में अपना मनपसंद वर चुनती है तो उसकी पसन्‍द का सम्‍मान करूंगा। मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा समाज मेरी दुनियां मेरी बेटी है। बिटिया को बिस्‍तर पर लिटाकर पिता रमेश ने उसका माथा चूमा। कई महीने तक रमेश अपनी बेटी पर हाथ उठाने के लिए अन्‍दर से दुखी रहे और खुद को अपराधी मानकर मन ही मन बेटी से क्षमा मांगते रहे।


✍️ देवेन्द्र कुमार मिश्रा ( जबलपुर, मध्य प्रदेश )

मंगलवार, मई 10, 2022

🦚 भाग्य की लीला 🦚

भाग्य किसी के भी जीवन को, उसके मायने को, उसकी व्याख्याओं को पूरी तरह बदल सकता है। सुना है भाग्य और कर्म एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं, जो एक दूसरे को परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं। किसी के अच्छे या बुरे कर्म उसके भाग्य को बदलते हैं, तो किसी का भाग्य उसके कर्मो को परिभाषित करता है। नीता और आशीष की कहानी इस बात को प्रमाणित करती है। नीता एक संभ्रांत परिवार की पढ़ी लिखी सुंदर, सुघड़ और सुशील कन्या थी। उसका विवाह मांग कर किया गया था। किसी समारोह में बड़ी ठकुराइन ने उसको देखा और उसे अपने इकलौते की वधु बनाने की ठान ली। जब नीता के घर वालो को इसका पता चला तो सभी को रिश्ता बहुत भाया। रोहन और नीता की जोड़ी की सब तारीफ करते थे। कुछ तो रंज भी खाते थे। बड़े ही धूमधाम से उसका विवाह हुआ। नीता को जितना लाड-प्यार और स्नेह मायके में मिला, उससे बढ़कर ही ससुराल में मिला। उसकी खिलखिलाहटों से ससुराल भर गया और वह वहां भी सबकी चहेती बन गई। कुछ सालों के बाद नीता के पांव भारी हुए तो घर में हर तरफ खुशियों का माहौल बन गया। लेकिन पांचवां महीना आते-आते उसका गर्भपात हो गया। वह टूट सी गई। किंतु उसने हिम्मत नही हारी। साल भर बाद उसकी गोद फिर हरी हुई, लेकिन इस बार भी प्रभु को उसकी परीक्षा लेनी थी। इस बार उसे बड़े शहर में ले जाकर डॉक्टर को दिखाया गया तो पता चला कि उसके गर्भाशय की दीवार पतली है, और भ्रूण एक समय के बाद उसमे रह नही सकता। उसका इलाज भी करवाया गया लेकिन ज्यादा सफलता नहीं मिली। जो घर नीता की खिलखिलाहटों से गूंजता रहता था, वहां एक अमिट सन्नाटा पसर गया। नीता अपनी सास के कहने पर पास की बस्ती के गरीब बच्चों को पढ़ाने लगी। नीता का अधिकांश समय अब वहीं गुजरता था। उसके पास हर उम्र के बच्चे आते थे। उसी बस्ती में एक सत्रह वर्ष की कन्या थी जो नीता के पास अंग्रेजी पढ़ने आती थी। वह मेडिकल की तैयारी कर रही थी। वह पढ़ने में बहुत होशियार थी। लेकिन एक लड़के ने उसे मुफ्त में मेडिकल की कोचिंग का लालच दे कर उसका फायदा उठाया था। एक दिन वह नीता के पास रोती हुई आई और कहने लगी दीदी, मुझे किसी डॉक्टर के पास लेते चलो। अगर मेरे बाबूजी को पता चला तो वो मुझे काट देंगे। अगर मेरे इस पाप का किसी और को पता चला तो मेरी छोटी बहनों का जीवन भी नर्क हो जायेगा। नीता उसे डाक्टर के पास ले गई तो पता चला कि उसका गर्भ 18 हफ्ते का हो चुका है, और गर्भपात कराने से जच्चा और बच्चा दोनो के लिए खतरा है। नीता ने यह बात अपनी सास को बताई, तो सास ने कहा कि कोई बात नही बेटा। भगवान ने तुम्हारी गोद हरी करने के लिए दूसरा रास्ता खोज निकाला है। इस बच्चे को हम अपनाएंगे। नीता और उस लड़की को लेके उसकी सास बड़े शहर चली गई। कुछ महीनो बाद नीता एक सुंदर से बेटे को लेके गांव वापस आई। वो बहुत ही प्यारा बच्चा था। किसी को भी ये नही बताया गया की वो नीता का बच्चा नहीं है, उसकी सास ने सभी नातेदारों और रिश्तेदारों को ये ही कहा कि डॉक्टर नीता को पूर्ण आराम कहे थे और हर हफ्ते चेकअप के लिए बुलाते थे इसलिए गांव में रहना उचित नही था। नीता का घर फिर से खुशियों से भर गया। नीता ने उस बच्चे का नाम आशीष रखा। उसकी सास के आशीष से सिर्फ नीता की ही नही बल्कि उस बेघर बच्चे की जिंदगी और किस्मत बदल गई। इस बात को कोई कई साल हो गए हैं। आशीष एक बड़ा अफसर बन गया है। उसे पता है कि नीता उसकी जननी नही है लेकिन उसे ये भी पता है की कृष्ण के जीवन में यशोदा का ज्यादा मान है।
                     
                      ✍️ प्राप्ति सिंह ( हैदराबाद, तेलंगाना )




मंगलवार, मार्च 15, 2022

💒 रेडियो 💒

"अरी ओ रचना..!

ये लड़की एक बार में सुन ले तो दुनिया का एक और अजूबा हो जाए उस दिन"

" लगी होगी उस मुई रेडियो के संग ...."

रचना की मां हमेशा की तरह बड़बड़ाती हुई  रचना के कमरे में गईं तो वही हमेशा की तरह रचना अपने रेडियो के गाने के साथ दूसरी ही दुनिया में थी। गाना चल रहा था .... "आज मदहोश हुआ जाए रे .. मेरा मन ... मेरा मन।

मां ने फिर रचना को आवाज़ दी लेकिन वो कहां सुनने वाली थी। मां ने रेडियो बंद कर दिया तब अचानक से रचना इस दुनिया मे आई ।

" अरे !! ये क्या मां.... जब देखो तब आप रेडियो ही बंद कर देती है। ऐसे ही आवाज़ लगा दो ना... कौन सी बहरी हूं मैं।"

" अरे तू तो कानों वाली बहरी है। इस रेडियो में जाने कौन सा चुम्बक लगा है कि जब देखो तब इससे ही चिपकी रहती है। ससुराल जाएगी तब देखती हूं क्या करती है।"

"अरे मां वहां भी वही होगा जो यहां होता है।
दिन निकलते गए और रचना की शादी की बात चलने लगी। रचना को किसी बात की परवाह नही थी। शादी तो वहीं होनी है जहां पिता जी चाहेंगे बाकी  वो तो खुश है अपने रेडियो के साथ।

रचना को बस एक ही शौक था गाने सुनना वो भी रेडियो पर। दिन भर कितने भी काम करवा लो बस रेडियों बंद नहीं होना चाहिए। उसकी मां भी भले चिड़-चिड़ करती रहती लेकिन वो भी जानती थीं कि रचना की कमजोरी है ये रेडियो।

एक दिन शादी तय भी हो गई और वो दिन आया जब रचना शादी होकर विदा होने लगी। जाते - जाते मां ने एक नया रेडियो रचना को थमा दिया तो रचना रोते - रोते  आश्चर्य से मां को देखने लगी। मां का दर्द उनके चेहरे पर साफ़ दिख रहा था। पुराना रेडियो मां ने अपने पास रख लिया ... क्यों रख लिया ये सिर्फ मां ही जानती थी। उनकी बेटी की यादें बसी थीं उस रेडियो में।

रचना अपने ससुराल पहुंच गई। वहां आकर उसको समझ आया कि उसकी दुनिया ही बदल गई है। पति प्यार करने वाले। परिवार था लेकिन अब रचना को वो आज़ादी नहीं थी जो मायके में थी। अब वो सुबह उठ जाती, घर के सारे काम करती लेकिन अब वो रेडियो नहीं सुन पाती थी। कभी रेडियो चालू भी करती तो इतनी धीमी आवाज़ कि खुद वो ठीक से नहीं सुन पाती थी उसमें भी सास बोलती रहतीं।

उनको रचना का रेडियो लगाकर गाना सुनना बिल्कुल पसंद नहीं था। वो हमेशा ताना देती रहती रचना को
"जाने ये कैसा शौक है आज-कल की लड़कियों का गाने सुनने का कि और किसी काम में मन ही नहीं लगता। ससुराल में कोई लाज-लिहाज है कि नहीं।"

रचना के पति भी कुछ नहीं कहते। रचना को प्यार तो बहुत करते थे लेकिन मां के खिलाफ नहीं बोलते थे। बोलते की रात को सोने के पहले सुन लिया करो। लेकिन रात होती तो कहते " एक यही समय मिलता है हमें साथ रहने को वो भी तुम गाने सुनने में लगा देती हो।"
रचना मन मारकर रहने लगी। अब वो रेडियो नहीं ही सुनती।
एक बार उसके सास-ससुर को 3 दिनों के लिए कहीं बाहर जाना था। रिश्तेदार के यहां शादी में। रचना ने सारी तैयारियां कर दीं लेकिन वो दिल से खुश भी बहुत थी कि चलो तीन दिन ही सही पर ये तीन दिन अब उसके है।
रचना ने उनके जाते ही रेडियो बजा दिया। पति भी खुश थे रचना को खुश देखकर।
रचना सुबह उठती और रेडियो चला देती, गाने सुनते हुए सारे काम करती और पूरा दिन चहकती रहती।

यूं हीं 3 दिन गुज़र गए। सुबह से वो सास - ससुर के आने कि तैयारियों में व्यस्त थी। थोड़ी दुखी भी थी कि कल से फिर रेडियो को तरस जाएगी वो लेकिन क्या करे यही जीवन है मान चुकी थी रचना।
लेकिन आज का दिन दोपहर तक जी भरकर जीना चाहती थी वो।
पतिदेव दोपहर को ऑफिस से ही निकल गए मां-पिताजी को लेने। इधर रचना सुबह से ही व्यस्त थी तो रेडियो सुनते-सुनते ही हल्की झपकी सी आ गई और थोड़ी देर में वो गंभीर सो गई। इधर रेडियो की आवाज़ अपनी ही धुन बजा रही थी जिसे फिलहाल कोई नहीं सुन रहा था....
" कांटों से खींच के ये आंचल ....."

थोड़ी देर में रचना हड़ बड़ा कर उठी तो दरवाज़े पर लगातार ठक - ठक की आवाज़ से वो घबरा गई।
जल्दी - जल्दी में वो रेडियो बंद करना भूल गई। सिर पर आंचल लिया और जैसे ही दरवाज़ा खोला तो सामने में मां-पिताजी और पति खड़े थे।
रचना पांव छूने के लिए झुकी तो मां ने जहरीले शब्दों की बौछार शुरू कर दी।

" अरे बताओ भला। मोहल्ले वाले भी क्या सोचते होंगे। कैसी बहू है जो भरी दोपहरी में घोड़े बेचकर सो रही है। एक घंटे से सास-ससुर बाहर खड़े हैं दरवाज़े पर और बहुरानी आराम फरमा रही हैं। "

" नहीं मां मैं तो बस थोड़ी देर के लिए लेटने गई थी ,मां आप ......" रचना के शब्द गले में ही अटक गए।

तभी कानों में गाने की आवाज़ पड़ी और मां का गुस्सा अपनी चरम सीमा पर था।

"अच्छा तो ये बात है। तभी बोलूं कि ये हुआ क्यों। घर के सारे काम छोड़कर महारानी रेडियो जो सुन रही थी। अरे पहली बार देखी ऐसी लड़की जो रेडियो में ऐसी पागल हो जाती है कि किसी का ध्यान नहीं रहता।"
और नजाने इसकी मां कैसी है जिसने दहेज भले पूरे दिल से ना दिया हो लेकिन ये मुई रेडियो देकर हमें जी का जंजाल दे दिया है।"

" इस बार माफ कर दीजिए मां अब नहीं होगी ऐसी गलती।"
रचना के पति ने कोशिश की बात संभालने की लेकिन मां सुनें तब तो। पिता जी भी कुछ ना बोलकर मां का ही साथ दे रहे थे।

तभी मां ने रेडियो उठाया और दरवाज़े के बाहर दे पटका। रचना को लगा जैसे किसी ने जान निकाल कर फेंक दी हो बाहर। तड़प कर रह गई रचना।
गाता हुआ रेडियो अब एक कर्कश आवाज़ के साथ कुछ देर ज़िंदा रहा और फिर वो आवाज़ भी आनी बंद हो गई।

सब अंदर चले गए। रचना ने रेडियो के साथ भेजे गए अपनी मां के प्रेम को सीने से लगाया और टूटे हुए रेडियो को लाकर अपने अलमारी में रख दिया।

रचना के पति को भी दुख हुआ लेकिन बोलना बेकार था सो चुप ही रहे। रचना अब सारे काम चुप चाप करती। ना कोई उत्साह, ना कोई शिकायत
सास को भी अपनी ग़लती समझ तो आ गई थी लेकिन सास का अहम था तो गलती मानना असंभव था।

लगभग 10 दिन बाद रचना का जन्मदिन आया। सब कुछ सामान्य ही रहा। घर से मां का फोन आया लेकिन यहां कोई खास चहल-पहल ना थी और ना रचना को उम्मीद थी।
सास ने इतना कहकर ही अपना दायित्व निर्वाह कर लिया कि आज कुछ मीठा बनाकर भगवान को भोग लगा देना।
रचना तो इतने में भी खुश थी।

रात को सोते समय पतिदेव ने जन्मदिन कि मुबारक बाद प्यार भरे अंदाज़ में दी और दिया एक तोहफ़ा।

तोहफा खोलते ही रचना अवाक रह गई।
एक एंड्रॉयड मोबाइल। लेकिन पतिदेव ने उसको ये बताकर रचना को आसमान पर बिठा दिया कि
इस फोन में रेडियो भी है और इयर फोन भी। रचना इयर फोन लगाकर अपने पसंद के गाने उस रेडियो पर सुन सकती है। और ये इयर फोन वायर लेस है तो मां को पता भी नहीं चलेगा।
रचना खुशी से झूम उठी और प्यार से पति के गले लग गई।
ये उसका पहला उपहार था जो उसके पति के प्रेम को साक्षात कर रहा था। रचना साफ देख सकती थी अपने पति की आंखों में अपने लिए प्यार और अपने लिए परवाह। यही तो होता है प्रेम।
तभी पतिदेव ने शरारत भरे अंदाज़ से कहा

" आवाज़ उतनी ही रखना गाने की कि मां की आवाज़ तुम्हारे कानों तक पहुंच जाए.... वरना मां कहीं इसको भी ना बाहर का दरवाज़ा दिखा दें।"

रचना हसने लगीं। दोनों ही हसने लगे।
अब वो रोज़ सुबह से रात रेडियो सुनती। अब रचना खुश है.... बहुत खुश।

                                 ✍️अनिता पाठक ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

सोमवार, मार्च 07, 2022

🌻रेशमा🌻

रेशमा एक बहुत ही सीधी-सादी लड़की थी। जहां उसके साथ की लड़कियां फ़ैशन, टीवी और मोबाइल में लगी रहती थी वहीं वह उम्र से पहले ही बड़ी हो चुकी थी। रेशमा का पिता शराबी था। वह दर्जी का काम किया करता था परन्तु अपनी सारी की सारी कमाई अय्याशी और शराब पर लुटा दिया करता था। यह शराब अच्छे से अच्छे घरों को बर्बाद कर देती है, निम्नमध्यम वर्ग या निम्न वर्ग की बात ही क्या है। रेशमा की माँ फैक्ट्री में धागा काटने का काम करती थी और उन्हीं रुपयों से चार बच्चों समेत परिवार का खर्च चल रहा था। कई बार तो उसका शराबी पति उससे उन पैसों में से भी शराब पीने के लिए और पैसों की मांग करता। जिस दिन भी ऐसा होता घर में घमासान युद्ध सा छिड़ जाता था। घर में कलह बढ़ने पर खाना पीना सब हराम हो जाता था। पैसों के न मिलने पर वह पत्नी पर हाथ चलाने से भी बाज नहीं आता था और नहीं तो कोई सामान
ही उठा ले जाता और बाजार में बेचकर शराब पी जाता था।
      रेशमा बहुत ही सीधी सादी सी लड़की थी उसकी आँखें चमकती हुई और कुछ बोलती सी लगती थी, उसका शरीर दुबला-पतला था लेकिन चेहरे पर एक अजीब सी गम्भीरता थी। उसको देखकर लगता कि कितना बड़प्पन है इसके मासूम से चेहरे पर। इसे हम परिस्थितिजन्य भी कह सकते हैं परिस्थितियां इंसान में बदलाव लाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं। अच्छे माता-पिता का संरक्षण मिल जाय तो बच्चा आकाश की ऊँचाइयों को छू सकता है वहीं दोनों में से अगर एक भी गलत हो तो बच्चे का जीवन 
कौन सा मोड़ लेगा कुछ भी कहना सहज नही है।
       घरेलू कलह में जीते हुए पढ़ाई करना इतना आसान नहीं होता है। रेशमा का नवीं की परीक्षा में गणित विषय में कम्पार्टमेंट आ गया था। गणित में कम्पार्टमेंट के नाम से ही वह डर गयी थी। उसकी मैडम ने उसे अपने पास  बुलाया ," बेटा कोई बात नहीं परेशान मत हो, गणित विषय के लिए कोई ट्यूशन लगा लो और घर भी मेहनत करो तुम पास हो जाओगी।"
  "जी मैम" कहकर रेशमा अपने घर चली गयी।
          इसके बाद कुछ दिन तक वह विद्यालय ही नहीं आयी। फिर एक दिन आकर सीधे टीसी के लिए प्रार्थना पत्र लिखकर मैडम के सामने रख दिया।
   "मैम अब मैं नहीं पढ़ूंगी, मम्मी के पास ट्यूशन पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं, वे मुझे अब नहीं पढ़ा पायेंगी।" कहते-कहते उसकी सूखी-सी आंखों से आंसू की दो बूंदें ढुलक गयीं।
   मम्मी कहां हैं ? निशि मैम ने प्रार्थनापत्र हाथ में लिए लिए पूछा।
 "मम्मी तो कम्पनी में काम करती हैं, वे वहीं गयीं हैं।"
"और पापा ,पापा कहां हैं ?"
" मैम पापा नहीं आयेंगे ।" 
 "क्यों, क्यों नहीं आयेंगे ?"
 "मैम बस ऐसे ही ।‌ वे शराब पीकर इधर-उधर घूमते रहते हैं।" उसने कांपते हुए होंठों को साफ देखा जा सकता था। उसकी आँखों में आक्रोश झलक रहा था।
 "कुछ काम नहीं करते हैं क्या ?
 "करते हैं मैम, सिलाई का काम करते हैं परन्तु केवल अपने शराब भर के लिए। मम्मी से भी लड़कर पैसे छीन लेते हैं ।"
 "क्योंं देती है मम्मी पैसे, नहीं दे।"
  "मैडम फिर वह मारपीट करता है। मम्मी के शरीर पर इधर-उधर नीले निशान पड़ गये हैं। हम लोग बचाने जाते हैं तो वह हम लोगों को भी मारता है।" रेशमा की आंखों से आंसू बह रहे थे और होंठ कांप रहे थे। वह अब फफककर रो
पड़ी।
   मैडम की आंखें भर आईं आखिर इस पुरुष प्रधान समाज में औरतों को कितना अत्याचार सहन करना पड़ता है। केवल पुरुष होने के कारण
वह खुद को खुदा ही मान बैठता है। उसके अन्दर  की संवेदनशीलता कहां गायब हो जाती है।
  "अच्छा तो मम्मी कितने बजे फैक्ट्री जाती है ?"
 "आठ बजे सुबह।"
   "ठीक है तुम उन्हें साढ़े सात बजे ही ले आना पर लाना जरूर। बहुत जरूरी बात करनी है।"
  "जी मैम।" कहकर रेशमा चली गयी।
         रेशमा का रोजमर्रा का काम था स्कूल में पढ़ाई करना, घर जाकर घर का सारा काम निपटाना, रात का खाना पकाना तब जाकर उसे दो रोटी नसीब होती थी। एक ही कमरा होने के कारण वह चादर के अन्दर टेबल लैम्प जलाकर पढ़ाई करती थी। उसका दिमाग बहुत अच्छा था अगर परिस्थितियां उसके अनुकूल होतीं तो वह नाम कर सकती थी।
      दूसरे दिन सुबह साढ़े सात बजे रेशमा की मां बेटी के साथ मैडम के सामने थी।
      नमस्ते मैम आपने बुलाया है मैम, मैम यह एक विषय में फेल हो गई है और मेरे पास ट्यूशन लगाने के लिए पैसे नहीं हैं। घर‌ की स्थिति भी इस समय थोड़ा खराब चल रही है मैम। 
   "बस इतनी सी बात है न।"
   "जी मैम ,क्या करूं मेरी भी मजबूरी है। "
    "ठीक है तुम मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं रहती हो। इसको मैं ट्यूशन पढ़ाऊंगी बिल्कुल मुफ्त कुछ नहीं देना है। अब बताओ ?"
   "मैडम आप बहुत महान हैं, मैं आपका यह उपकार जीवन में कभी नहीं भूलूंगी।""कोई बात नहीं, बस आप इसे घर पर भी थोड़ा सा पढ़ने का मौका देना।"
    "जरूर मैडम रात का खाना यहीं बनाती है अब मैं बना लिया करूंगी।"
    आपके घर में और कौन-कौन हैं ?
       मैम चार बच्चे हैं। बड़े बेटे की शादी कर दी है उसके एक बच्चा भी है पर वह अपने ससुराल में ही रहता है। वह  बदल गया मैम उसके ससुराल 
वालों ने उस पर जादू कर दिया है।
  "अरे यह तो बहुत गलत हुआ।"
   "हां मैम पहले तो लव मैरिज कर ली और अब बीबी के साथ ससुराल में पड़ा रहता है। उसके ससुराल वाले और बीबी दोनों ही बहुत ख़राब हैं।" थोड़ा रुक कर फिर बोली,
   "उसके एक बेटी यही रेशमा है दूसरी भी यहीं पढ़ती है सबसे छोटा बेटा है चौथी में पढ़ता है। इनका खर्चा मेरे ही ऊपर है। इनका बाप पांच पैसा भी नहीं देता उल्टा मारपीट करके मुझसे ही मांगता हैं।" रेशमा की मां रोते हुए बोली।
   सब समय का खेल है, क्या करोगी ? सब ठीक हो जाएगा। रेशमा को कल से मेरे घर पढ़ने के लिए भेज देना।"
        कुछ समय बाद जब कम्पार्टमेंट का रिजल्ट घोषित हुआ ‌तो रेशमा पास हो गई थी। उसकी खुशी की कोई सीमा ही नहीं थी। वह मैम के पास जाकर खड़ी हो गई। वह मैडम के पैर छूकर बोली,
   "मैम आपके कारण ही यह सब हुआ है। नही तो आज मैं घर में बैठी होती।" उसकी आंखों में एहसान झलक रहा था। उसका रोम-रोम से कृतज्ञता व्यक्त कर रहा था।
    "ठीक है, ठीक है, अब आगे इतनी मेहनत करो की दसवीं भी पास हो जाओ। "निशी मैम बोली।
"जी मैम मैं बहुत मेहनत करूंगी।" रेशमा बोली।
"और हां साइंस का ट्यूशन भी लगा लो, उसकी फीस हर महीने मैं दूंगी। तुम हर महीने मुझसे आकर ले लिया करना। "साइंस की अध्यापिका नीना मैम बीच में बोल पड़ी।
        रेशमा कुछ देर तक उन दोनों की ओर ही देखती रही मानों साक्षात ईश्वर सामने खड़े हों। जो उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे। रेशमा अपनी उड़ान भरने के लिए तैयार हो रही थी।
                        
                         ✍️ डॉ. सरला सिंह 'स्निग्धा' ( मयूर विहार, दिल्ली )


                    
                




गुरुवार, जनवरी 06, 2022

👩‍🌾 नारी की शख्सियत👩‍🌾

बहुत प्यारी थी, वह सब की दुलारी थी। वह ससुराल आई और शुरू हुई उसकी जिम्मेदारी। रिश्तों की पाबंदियां। सब कुछ धैर्य और संयम से सब की सुनती। अगर नहीं सुनती थी तो सिर्फ अपने मन की, अपने दिल की, सभी की पसंद में अपनी पसंद ढूंढ लेती थी। और उसी में खुश हो जाती थी। पति बेरोजगार था फिर भी बहुत प्यारा था उससे बहुत प्यार करता था। लेकिन घर में लड़की ना कमाए तो बर्दाश्त हो जाता है और अगर लड़का ना कमाए तो वह बर्दाश्त से बाहर हो जाता था। ऐसा ही कुछ दुलारी के पति के साथ था। दुलारी भी हकीकत से वाकिफ होती गई। कि हर दिन उसे बहुत सुनना और बर्दाश्त करना पड़ता था लेकिन चूँकि वह लड़की थी, इसलिए उस के खून में भी सब-कुछ था, जो लड़कियों के खून में होता है। वो करती भी क्या ? अपने जीवन में आए उतार-चढ़ाव को नदियों की तरह खिलखिलाते हुए आगे बढ़ रही थी। समय के साथ दुलारी की जीवन भी आगे बढ़ रहा था। उसे प्रतिष्ठित नौकरी मिल गई, जिससे उसने अपनी परिस्थितियों को देखते हुए स्वीकार की और करने लगी। एक दिन उसकी सास की सहेली आई और बैठकर गपशप कर रही थी कि अचानक जाने लगती हैं ! दुलारी चाय के लिए कहती है--जवाब में सासु माँ की सहेली कहती हैं ---- कि क्या चाय बनाओगी तुम्हारा ध्यान तो नौकरी के कामों में लगा हुआ है ?दुलारी कुछ नहीं बोली। दुलारी के आंखों में आँसू आ गए थे। लेकिन वो चुपचाप चली गई। उसके मन में अनेकों प्रश्न, उत्तर ढूंढ रहे थे। लेकिन मिल नहीं पा रहे थे ? वह रोकर चुप हो गई। सोच रही थी माँ समान स्त्री से क्या बोले और क्या प्रतिकार करे। कोई माँ होकर दूसरों कि बेटी को इस तरह ताना कैसे दे सकती है ? उसे खुशी से मना कर सकती थी लेकिन उस तरह का जवाब का उसने सोचा भी न था। दुलारी धैर्यशील, सहनशील और लगनशील थी। अपने कामों में व्यस्त हो जाती कि उसे किसी की बातों का कोई मतलब ही नहीं रहता था। बात आई गई हो गई दुलारी अपने काम में आगे ही बढ़ती जा रही थी। एक दिन खबर मिली कि उसकी सास की सहेली के दामाद इस दुनिया में नहीं रहे। सुनकर सभी स्तब्ध रह गए । सभी ने कहा ---- कैसे हो गया ? कैसे होगा बच्चों का पालन पोषण ? अब क्या होगा। बहुत सारे सवाल ? कुछ दिनों के बाद पता चला कि दामाद की जगह की बेटी को नौकरी मिल गई है और नहीं कर पा रही है वो नौकरी के लिए तैयार नहीं है फिर भी करना पड़ रहा है। दुलारी सोच रही थी कि नौकरी से कितना एतराज था और बेटी को कैसे करने देंगी अब ? लेकिन यही समानता दिखाई देती है समाज है या हमारे यहाँ के लोग दूसरों को जहां प्रोत्साहित करना चाहिए वहां कुछ न कुछ नकारात्मक टिप्पणी कर के जीवन में कठिनाइयाँ ही खड़ी कर देंगे। बेचारी बना देंगे, कभी साहसी नहीं कहेंगे बल्कि कुछ करने पर दुस्साहसी कहेंगे। दुलारी जैसी अनेकों लड़कियाँ है जो शादी के बाद सिर्फ ससुराल की ही नहीं, पास पड़ोस को भी झेलती है और अपनी इच्छाओं को कहीं ना कहीं दबा देती है। जो बाद में बहुत सी बीमारी को जन्म देती है। दुलारी में संघर्ष करने की अपार शक्ति थी। वह परिस्थिति को संभालते हुए आगे बढ़ रही थी। आज दुलारी मजबूत है और उसकी आँखों में कई सपने है, वह आज की मजबूत नारी है। सजग, परिपूर्ण और संपूर्ण नारी।‌ अपने अस्तित्व का सम्मान नारी को खुद करना होगा। हर कार्य में नारी पुरुषों  से बेहतर साबित हो रही है अपने हौंसलों की उड़ान भर रही है।दुलारी आज भी उनकी बेटी से मिलकर उनका हौसला अफजाई करती है और अपने हौसलों की उड़ान भर रही है।

नारी नमन तुमको है,

तुम ही तो जन-जन में हो,

 जब तुम्हें कोई परेशान करता,

 तुम नारी शक्ति रूप धरती हो।

 तुम्हारी "हाँ" में है,

जितनी "मिठास"

"ना" फिर उतनी ही कड़वी,

धैर्य में जहां तुम पर्वत हो,

प्यार में उतनी ही पावन हो।

होकर ,,"नारी"

तुम खुद महान शख्सियत हो,

पुरुष के लिए,

प्रेरणास्रोत भी हो।

नारी तुमको नमन है,

तुम ही जीवन हो,

तुम विह्वल हो,

नारी तुम ममता का सागर हो,

नारी तुम गौरव हो,

नारी तुमको शत-शत नमन।

                            ✍️ लीना प्रिया ( पटना, बिहार )



शनिवार, दिसंबर 11, 2021

💢 मानव धर्म 💢

 

महिमा के ऊपर आजकल काम का बोझ बढ़ गया था। क्योंकि कामवाली बाई को भी कोरोना के बढ़ते प्रकोप के कारण उसने छुट्टी दे रखी थी। वह तो काम करने आ ही रही थी। मास्क लगा कर ही आती थी। आते ही सबसे पहले अपने दोनों हाथों को साबुन से धोती काम प्रारंभ करती। उसके घर में भी कोई कोरोना से प्रभावित नहीं था। फिर भी महिमा ने सुरक्षा के दृष्टिकोण से उसे अभी काम पर आने से मना कर दिया, और उसका पिछला हिसाब करके उसे पैसे दे दिए। अब उसे घर की सफाई, बर्तन धोना, कपड़े धोना सारा काम स्वयं करना होता था। खाना नाश्ता तो पकाती ही थी। उस पर स्वयं भी कार्यालय के कार्य घर से करती और अपने बच्चे की पढ़ाई का ध्यान भी रखती। परिवार छोटा था परन्तु  काम तो पूरा ही था। तब भी छत पर दाना और पानी डालना नहीं भूलती थी। गमलों में भी पानी डालती। प्रति दिन पंछियों के लिए छत पर दाना और सकोरों में पानी डालती। उसके पति ने एक दिन कहा भी - " पौधों में पानी डालना तो ठीक है, परन्तु छत पर रोज पानी रखने की क्या आवश्यकता है। पंछी तो किसी भी तालाब से पानी पी लेंगे। वैसे भी प्रत्येक घर के छत पर दाना पानी रखे रहते हैं, तो तुम एक-दो दिन नहीं भी डालोगी तो चल जाएगा"।महिमा ने कहा - "कैसे न डालूं । यह मूक प्राणी हैं। अपनी आवश्यकता नहीं बताते तो, क्या इन्हें दाना पानी नहीं देंगे। इनका जीवन भी तो हम पर निर्भर है"। और पतिदेव मुस्कुरा कर चुप रह जाते। आज भी छत पर दाना-पानी डालकर महिमा नीचे आकर चाय बनाने ही जा रही थी तभी फोन घंटी बजी महिमा ने फोन उठाया उसके पति सुनते रहे। वह बोल रही थी - "हां सोमा, बोलो ......नही नही अभी तो कोरोना पूरे उफान पर है। अभी घर में ही रहो। कुछ कम होगा मैं तुम्हें बुला लूंगी ....... क्या कहा पैसे चाहिए परन्तु तुम्हें पैसे तो दे दिए थे ना...... तुम्हारा तो कुछ भी बाकी नही है...... वाह क्या बात करती हो मैं काम भी स्वयँ करूं और तुम्हें पैसे भी दूँ ........  आकस्मिक आवश्यकता के लिए तुम्हें बचा कर रखना चाहिए था ना ......... इतने पैसे दे दूँ तो तुम कब चुका पाओगी। ......उसके पति विस्फारित नेत्रों से उसकी ओर देख रहे थे । आश्चर्य हो रहा था उन्हें कि पंछियों की भूख और प्यास का ध्यान रखने वाली उनकी पत्नी जीवित मानव की आवश्यकयों का ध्यान नहीं रख पा रही। कुछ सोच कर उन्होंने महिमा के हाथ से फोन लिया और फोन में कहा -   "हाँ सोमा तुम हमारे पड़ोस वाले किराने की दुकान से आवश्यकता की सभी वस्तुएं ले जाओ, मैं उसे बोल दे रहा हूं और जितने पैसे की आवश्यकता हो अन्य कामों के लिए, तो आकर भाभी से ले जाना"। कह कर उन्होंने फोन काट दिया। अब महिमा अपने पति की ओर क्रोधित हो कर देख रही थी। फिर उसने कहा - "आपने दानी कर्ण बन कर बोल तो दिया परंतु पता है किराने का सामान कितने का आएगा। ऊपर से आपने पैसे लेने के लिए भी बोल दिए। कब चुका पाएगी वह इतने पैसे"। पति ने बहुत शांति से उत्तर दिया - तुम जो पंछियों को रोज दाना और पानी देती हो क्या वे तुम्हें उसकी कीमत चुका पाते हैं। नहीं ना, तुम अपना मानव धर्म निभा रही थी। तो यहां क्यों भूल जाती हो अपना मानव धर्म। अब तुम सोचो, सोमा हमारे यहां काम करती थी तो उसे दो समय खाना भी मिलता था पैसे भी मिलते थे; जिससे उसके परिवार का खर्च चलता था। तुमने उसे आने से मना किया है। वह तो आ ही रही थी। उसने तो मना नहीं किया। उसके प्रति तुम अपना मानव धर्म नहीं निभाओगी ? तुम सिर्फ यही सोचो यदि हम कार्यालय जाते तो आने जाने में जो खर्च होता, बस उसी से हम उसकी सहायता कर देंगे"। महिमा की समझ में बात आ गई । अब उसने भी धीरे से हामी भर दी। मन ही मन वह सोच रही थी कि पंछियों का ध्यान रखने वाली वह मानव को कैसे भूल गई थी।

    
                                          ✍️ निर्मला कर्ण ( राँची, झारखण्ड )


बुधवार, नवंबर 24, 2021

💢 दिखावटी दुनिया 💢

सुमन ने अपनी छोटी आंखों को मिचमिचाते हुए, खोलने का प्रयत्न किया। धूप सीधे उसके चेहरे पर थी। उसने मजबूरन एक हाथ का पकड़ा थैला, दूसरे हाथ के थैले के साथ पकड़ते हुए, आंखों के ऊपर छज्जा सा बनाकर सड़क की तरफ देखा। कार से उतर कर आती हुई माया मैडम की गरिमामय आकृति वह पहचान गई। उसने अपने चेहरे पर पहना हुआ मास्क ठीक किया।

माया उसे ध्यान से देखती हुई एक निश्चित दूरी पर आ कर रुक गई।

सुमन ? सुमन नाम है ना तुम्हारा ? माया ने पूछा। जी, सुमन ने झेंपते हुए हामी भरी, जैसे कि उसका नाम सुमन होना कोई शर्म की बात है। माया ने मास्क के भीतर से ही कुछ ऊंची आवाज़ में कहा, यहां खाना रख रही हूं। जब इशारा करें तभी बैग उठाना। ठीक है ?

सुमन ने स्वीकृति में सर हिला दिया।

माया ने एक कपड़े का थैला जमीन पर रख दिया। सुमन उसे देखकर मन ही मन खुश हुई, अंदाजन पांच किलो वजन होगा,, उसने सोचा,और वह धीरे धीरे थैले तक पहुंच गई। उसने माया की तरफ देखा ,सुमन की आंखों की मुस्कुराहट को नजरंदाज करते हुए ,माया ने पीछे खड़े फोटोग्राफर को इशारा किया।

सुमन ने धीरे से झुक कर थैला उठा लिया।

फोटो में माया पैकट देते हुए,और सुमन पैकेट लेते हुए, खूबसूरती से कैद हो गए। फोटोग्राफर अपना काम खतम करके सड़क किनारे खड़ी कार की तरफ माया मैडम के साथ विचार विमर्श करते हुए,चल पड़ा।

 उनकी आज की पोस्ट का फोटो तैयार था।

 रोज कोरोना पीड़ितों को मुफ्त खाना बांटने की मुहिम। अखबार में प्रकाशित होती माया की लोकप्रियता की मुहिम।

  इधर सुमन ने अपने थैलों को संभाला और तेज कदमों से बस्ती की तरफ चल दी।

  वहां उसे घरों में बंद बीमार लोगों को खाना देना था। बीमार, बेरोजगार, गरीब दिहाड़ी मजदूर, जो लॉकडाउन में अपने घरों के भीतर भूखे और बेबस हैं, उन्हे खाना, राशन बांटती सुमन लोगों से आवाज़ लगाती, पूछती जाती थी, क्या लाऊं कल क्या चाहिए ? यहां खाना बांट कर सुमन को अस्पताल अपनी ड्यूटी पर भी जाना है।

    दान मिला खाना बांटती सुमन का फोटो खींचने वाला कोई न था।

            उसके मन की सुंदरता का प्रचार करने वाला कोई न था।

                                     

                                ✍️ दिव्या सिंह ( द्वारका, नई दिल्ली )

बुधवार, नवंबर 03, 2021

☀️ दीपावली और मानवता ☀️

 

दीपावली की रंगीन शाम थी। सुजाता अपने घर के एक-एक कोने को पहले ही रंगीन झालरों से सजा चुकी थी और अब पूजा के बाद दीये जला रही थी। अचानक उसकी दृष्टि घर के पीछे रहने वाली रमा के छोटे से घर पर गई। उसके घर में अंधेरा था। रमा से उसका परिचय यूँ ही चलते फिरते हो गया था। उसने बताया था कि वह साड़ी में फॉल लगाती है यदि कभी आवश्यकता हो तो जरूर बताएं। सुजाता ने भी हाँ कह दिया था। फिर एक दिन रमा उसके घर आ गई थी - "भाभी जी साड़ी में फॉल लगाने के लिए नहीं है क्या ? दीजिये ना मैं लगाकर ला दूंगी"। सुजाता - "अरे रमा फॉल के साथ पिको भी करना होता है। तुम पिको कैसे करोगी मशीन रखी हो क्या"?
रमा - "नहीं भाभी जी पिको मशीन तो नहीं है परंतु मैंने एक जगह से बात की हुई है। उनके पास पिको वाली मशीन है। वहां जाकर मैं साड़ी में पिको कर लेती हूं। इसलिए मैं आपकी साड़ी में भी पिको कर दूंगी"।
सुजाता - "वो तुम्हें अपनी मशीन देते हैं पिको करने के लिए" ? 
रमा - "जी भाभी जी मैं कभी-कभी उनके यहां जाकर सिलाई भी करती हूं। उनके कपड़े सिलने में उनकी सहायता करती हूं, इसलिए मुझे अपनी मशीन चलाने देते हैं वह"
और उसने रमा को साड़ी दे दी थी। दूसरे दिन ही उसकी साड़ी में फॉल और पिको करके ले आई थी रमा। उसने देखा काम बहुत अच्छे किये थे उसने। सफाई थी उसके काम में। उसके बाद से फॉल पिको के लिए सुजाता उसे ही अपनी साड़ियां देने लगी। एक बार जिद करके रमा उसका ब्लाउज सिलने के लिये ले गई थी और सिल कर ला दिया था। सुजाता को ब्लाउज की फिटिंग बहुत अच्छी लगी। अब उसे पता चला रमा हुनरमंद है। उसका पति एक निजी संस्थान में काम करता था। उससे परिवार का गुजारा होना मुश्किल था, इसलिए रमा घर में यही छोटे-छोटे काम करके अपने परिवार की आवश्यक जरूरतों को पूरा करती थी। रमा के घर को अंधेरा देख कर सुजाता से रहा नहीं गया उसने कुछ दिए उठाए और रमा के घर जाने लगी।
 उसके पति ने उसे टोका - "तुम अभी दीये लेकर कहाँ जा रही हो" ?
 सुजाता - "वो पीछे वाले घर में अंधेरा है, कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। मैं जा रही हूं वहीं "दीप-दान" करने।
 उसके पति हंस पड़े - "तुम्हारी यह समाज सेवा भी ना। कितने घरों में जलाओगी दीये" ?
सुजाता - "मैं पूरी दुनिया में ना कर सकूं उजाला। परन्तु एक घर में तो दीये जला ही सकती हूं"। कहकर चली गई सुजाता । रमा के घर के पास जाकर रमा को आवाज दिया और दीये उसके घर के सामने रख दिया। आवाज सुनकर रमा बाहर आई।
  - "अरे भाभी जी आप"।
 सुजाता - "क्या बात है रमा तुम्हारा घर अंधेरा क्यों है। दिवाली का दिन है, और तुम्हारे घर में एक भी दीया नहीं जल रहा है"।
 रमा  - "क्या बताऊं भाभी जी इनकी नौकरी छूट गई है। कोरोना काल में  कंपनी बंद हो गया है । नया काम मिलता नहीं है। ऑटो रिक्शा चलाने लगे उसमें भी सवारी मिलना मुश्किल होता है। दिन भर में इतनी आमदनी नहीं हो पाती की ऑटो भाड़ा देकर परिवार को दो समय सही से भोजन मिल पाये। सिलाई सेंटर भी बंद है। वो लोग घर चले गये। सिलाई सेंटर से कुछ थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती थी तो किसी तरह घर का खर्चा चल जाता था। एक दर्जी से बात किया है। वहां जाकर मैं दिन भर बैठ नहीं पाती, इसलिए कुछ तुरपाई और बटन टाँकने का काम लाती हूँ। ऐसे में कैसे दीवाली मनाऊँ"।
सुजाता ने देखा उसके बच्चों का मुंह सूखा हुआ था। लग रहा था दिन भर उन्होंने खाना भी नहीं खाया। रमा को लेकर अपने घर आई और उसे बच्चों के लिए फल, मिठाइयां, खाना, और दिवाली के पकवान दिये।
 रमा - "यह मत दीजिए भाभी जी यह मैं नहीं ले सकती। हो सके तो आप मुझे अपने घर में काम पर रख लीजिए ताकि कुछ आमदनी हो जाए मैं आपके घर के सारे काम करुँगी"।
सुजाता  -  "हां मैं तुम्हें काम भी दूंगी पर अभी तो तुम यह लेकर जाओ। कल तुम आना, मैं तुम्हें काम भी दूंगी"।
रमा के जाने के बाद सुजाता से उसके पति ने कहा - "तुम उसे क्या काम दोगी कल। हमारे घर में तो ऐसे ही माली भी है, खाना बनाने के लिए भी बाई आती है, और घर की सफाई करने के लिए भी बाई है। क्या इनमे से किसी को हटा कर उसे काम दोगी, यह उचित होगा क्या ? और कौन से काम दोगी अगले दिन"।
 सुजाता - "कल बताऊँगी"।
अगले दिन रमा के आने के बाद वह उसे लेकर बाजार गई और एक सिलाई मशीन खरीद दिया और साथ में उसे अपने ब्लाउज भी दिए सिलने के लिए।
और कहा - " तुम घर बैठकर सिलाई करो। तुम सिर्फ तुरपाई और बटन लगाने के लिए लाती हो, अब सिलने के लिये भी लाना। देखना तुम्हारी दुकान बहुत जल्द जम जाएगी, तुम इतनी अच्छी सिलाई करती हो।
रमा के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी। रमा ने काम शुरु किया। धीरे-धीरे उसकी स्थिति सुधरने लगी l
आज रमा सुजाता के घर आई मिठाई लेकर और कहा - "भाभी जी इसे लेने से इंकार मत करना। यह मैंने अपने हाथों से बनाया है आपके लिए। आप खाकर जरूर बताना कैसे बने। आपकी मानवता ने मुझे अपने पैरों पर खड़ा कर दिया। आज सम्मान से जी रही हूं और चार और लोगों को भी मैं रोजगार दे रही हूं l सिलाई सेंटर से बटन टाँकने के लिए और तुरपाई के लिए कपड़े लाती थी। आज मेरे पास से मेरे जैसी जरूरतमंद बहने काम ले जाती हैं । मैं अभी तक मशीन की कीमत आपको नहीं चुका पाइ क्योंकि मैंने दो और मशीन खरीदी है, और अपने जैसी ही दो बहनों से सिलाई करवाऊँगी। आप कल दिन के 11:00 बजे मेरे घर जरूर आइये भाभी जी। मैं सिलाई सेंटर खोल रही हूँ, और उसका नाम मैंने मानवता सिलाई सेंटर रखा है। मैं उसका उद्घाटन आपसे करवाना चाहती हूं। क्योंकि इसकी नींव आपके द्वारा ही पड़ी है। आपसे मैंने सीखा है भाभी जी कि "मानवता क्या है"। आपने मुझ गरीब को बिन माँगे पूरा भविष्य दे दिया। वह भविष्य मैं अपने साथ-साथ दूसरी बहनों को भी देना चाहती हूँ। आप से ही सीखा मैंने मानवता की सीख, इसलिए भाभी जी आपको जरूर आना है कल"।
 सुजाता - "मैं कल जरूर आऊंगी"।

                                     ✍️ निर्मला कर्ण ( राँची, झारखण्ड )


पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित ऑनलाइन स्नेह ध्येय सृजन महोत्सव के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा लोगों को स्नेह के महत्व और विशेषता का अहसास करवाने के उद्देश्य से ऑनलाइन स्नेह ध्येय सृजन महोत्सव का आयोजन किया गया...