सोमवार, नवंबर 02, 2026

🙇 मोबाइल की चमक में खो रहा बच्चों का बचपना 🙇

हम लोगों के बचपन के दौर में बच्चों के हाथों में कॉमिक्स, बाल पत्रिकाएं और उपन्यास दिखाई दिया करते थे। गर्मियों की छुट्टियों में कहानी की किताबें पढ़ना, पंचतंत्र की कथाओं से सीख लेना और चाचा चौधरी, नंदन, चंपक जैसी बाल पत्रिकाओं के किरदारों के साथ कल्पना की दुनिया में खो जाना बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा हुआ करता था किन्तु डिजिटल दौर में तस्वीर बिल्कुल बदल गई है। अब किताबों की जगह स्मार्टफोन ने ले ली है और पढ़ने की आदत पर शॉर्ट वीडियो का आकर्षण युवा पीढ़ी पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। "मोबाइल और इंटरनेट ने जहां ज्ञान की दुनिया को बच्चों की उंगलियों तक पहुंचा दिया है, वहीं बिना निगरानी के अत्यधिक स्क्रीन समय और लगातार शॉर्ट वीडियो देखने की आदत अभिभावकों और शिक्षकों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।"

कुछ ही सेकंड में बदलते वीडियो बच्चों का ध्यान तेजी से आकर्षित करते हैं। इसके कारण लंबे समय तक किताब पढ़ने, किसी विषय पर एकाग्र होकर सोचने और धैर्यपूर्वक सीखने की आदत निरन्तर प्रभावित होती जा रही है। किताबों से मिलता है गहराई वाला ज्ञान बाल साहित्य केवल एक मनोरंजन का साधन नही था, बल्कि बच्चों में भाषा, कल्पना, तर्क, संवेदनशीलता और सामाजिक मूल्यों को विकसित करने का माध्यम भी रहा है। कहानी और उपन्यास पढ़ते समय बच्चा पात्रों के व्यवहार, परिस्थितियों और उनके निर्णयों को समझता है। 

इससे उसकी कल्पनाशक्ति विकसित होती है और वह किसी विषय को विस्तार से समझने का प्रयास करता है जबकि इसके विपरीत लगातार छोटे-छोटे वीडियो देखने की आदत में सामग्री तेजी से बदलती रहती है। स्मार्टफोन अथवा सोशल मीडिया वाले शॉर्ट वीडियो में उपलब्ध प्रत्येक सामग्री बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं होती। मनोरंजन के नाम पर ऐसे वीडियो भी कभी-कभी सामने आ सकते हैं जिनमें अभद्र भाषा, अनुचित व्यवहार, हिंसक दृश्य या दिखावे को बढ़ावा देने वाली सामग्री रहती हो। 

कम उम्र के बच्चे कई बार सही और गलत सामग्री के बीच अंतर नही कर पाते जिसके दुष्परिणाम अक्सर हमें देखने को मिलते हैं। "ऐसे में शिक्षकों के साथ ही अभिभावकों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।" बच्चों को पूरी तरह मोबाइल से दूर करने के बजाय उनके स्क्रीन समय, देखी जाने वाली सामग्री और ऑनलाइन गतिविधियों पर उम्र के अनुसार निगरानी रखना बहुत जरूरी है ताकि उनमें मोबाइल नही बल्कि पढ़ने की आदत बने। शिक्षकों और अभिभावकों का मानना है कि बच्चों के दैनिक जीवन में किताबों के लिए निश्चित समय होना चाहिए। घर में माता-पिता स्वयं किताब पढ़ेंगे तो बच्चों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। स्कूलों में बाल पुस्तकालय, कहानी पाठ, पुस्तक चर्चा और रचनात्मक लेखन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा देकर बच्चों को फिर से किताबों से जोड़ा जा सकता है।

बच्चों को मोबाइल से पूरी तरह काटना आज के डिजिटल युग में व्यावहारिक समाधान नही है। "जरूरत इस बात की है कि मोबाइल ज्ञान का साधन बने, आदत का मालिक नही।"

डिजिटल शिक्षा के साथ पुस्तकों का संतुलन बनाकर ही बच्चों के ज्ञान, व्यवहार और व्यक्तित्व का बेहतर विकास किया जाना सम्भव हो सकता है।

विशेषज्ञों की सलाह-डिजिटल अनुशासन जरूरी बाल मनोविज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों की उम्र और जरूरत के अनुसार स्क्रीन टाइम निर्धारित करना, सोने से पहले मोबाइल से दूरी रखना, भोजन के समय फोन न देना तथा प्रतिदिन पढ़ने और खेलकूद के लिए समय तय करना इस दिशा में एक उपयोगी कदम साबित हो सकता हैं। 

                सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि बच्चों को केवल मोबाइल मत चलाओ कहने के बजाय उन्हें पढ़ने, खेलने, बातचीत करने और रचनात्मक गतिविधियों के बेहतर विकल्प दिए जाएं। "आज जरूरत मोबाइल छीनने की नही, बल्कि बच्चों को मोबाइल और किताब के बीच सही संतुलन सिखाने की है।" क्योंकि किताबें उनके भीतर सोच पैदा करती हैं और सही डिजिटल मार्गदर्शन उन्हें आधुनिक दुनिया के लिए तैयार करता है।


✍️ पंकज कुमार सिंह चौहान ( इटावा, उत्तर प्रदेश )

🌟 इको फ्रेंडली दीपावली 🌟











पटाखों से वायु होती है प्रदूषित 

यह सन्देश जन-जन तक पहुँचाए 

मानव होने का दायित्व निभाएं

वायु को प्रदूषण से मुक्त कराएं

आओ ! इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं 


जग-मग करते मिट्टी के दिये जलाये 

रंग-बिरंगी रंगोली से द्वार सजाये

एक दूसरे को मिठाई खिलाएं

स्वस्थ अच्छी आदतों को अपनाएं 

आओ ! इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं


जूठे खाने को फेंके नही

उससे कम्पोस्ट खाद बनाएं 

प्रकृति के चेहरे पर मुस्कान लाएं 

पर्यावरण संरक्षण का धर्म निभाएं 

आओ ! इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं


पेड़-पौधे लगाकर धरती को

हरियाली की चादर ओढ़ाएं 

वातावरण की मुस्कान लौटाएं 

धरती को रहने लायक बनाएं 

आओ ! इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं


मिट्टी से बनी मूर्तियां घर लाएं 

कपड़े के थैलो का इस्तेमाल बढ़ाये

डिस्पोजेबल बंद करने का अभियान चलाए 

पर्यावरण अनुकूल जीवन शैली अपनाएँ 

आओ ! इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

👨‍🏫 शिक्षक का मन 👨‍🏫









शिक्षक का मन भी कितना भोला,

ज्ञान बाँटता, कभी न डोला।

अपने सपनों को पीछे रखकर,

बच्चों के सपनों को है तोला।


खुद धूप सहकर छाँव है देता,

हर बच्चे को भाव है देता।

बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के खातिर,

अपना सुख भी त्याग है देता।


कभी डाँटता, कभी समझाता,

गलती पर सही राह दिखाता।

जब शिष्य सफलता को छूता,

शिक्षक का मन गर्व से भर जाता।


लेकिन मन में दर्द भी होता,

जब मेहनत का मान न होता।

दिनभर बच्चों को पढ़ाने वाला,

खुद ही कभी परेशान है होता।


न वेतन से सब तौला जाए,

न सेवा का मोल लगाया जाए।

जिस शिक्षक ने राष्ट्र सँवारा,

उसका भी सम्मान बढ़ाया जाए।


शिक्षक केवल नाम नही है,

ज्ञान का कोई दाम नही है।

जिसने अज्ञान मिटाकर जग में,

दीप जलाया—वह आम नही है।


आओ मिलकर मान बढ़ाएँ,

शिक्षक के सपनों को सजाएँ।

शिक्षक के मन की पीड़ा समझें,

और शिक्षा का मान बढ़ाएँ।


क्योंकि शिक्षक खुशहाल रहेगा,

तभी देश खुशहाल बनेगा।

शिक्षक के मन में आशा होगी,

तभी सशक्त राष्ट्र की अभिलाषा होगी।


✍️ डॉ० ललित कुमार चौधरी ( उदयपुर, राजस्थान )

रविवार, नवंबर 01, 2026

💞 करवा चौथ का पर्व 💞









चाँद की चाहत में सजती है हर सुहागन आज,

हाथों की मेहंदी बताती पत्नी को पति पर कितना नाज़।


माथे पर बिंदिया चमके, माँग में सिंदूर सुहाता है,

यह सिर्फ व्रत नही, जन्मों का पवित्र नाता है।


सुबह सरगी की थाली से जो आशीर्वाद शुरू होता है,

मन में पिया की लंबी उम्र का अटूट विश्वास होता है।


निर्जला रहकर दिनभर जो व्रत नारी निभाती है,

सच्ची श्रद्धा से वो यमराज से भी जीत जाती है।


छलनी की ओट से जब वो पिया का दीदार करती है,

अमृत से मीठे उस पल का वो बेसब्री से इंतज़ार करती है।


दीपक की मद्धम लौ में पिया का चेहरा मुस्काता है,

चाँद को अर्घ्य देकर दिल खुशियों से भर जाता है।


पति के हाथों से पानी पीकर जब व्रत पूरा होता है,

सच्ची मोहब्बत का वो लम्हा कितना प्यारा होता है।


रहे सलामत जोड़ी सबकी, रब से बस यही दुआ है,

करवा चौथ का यह पर्व, प्यार से ही विशेष हुआ है।


✍️ श्रीजी जैन ( शाहदरा, दिल्ली )

शनिवार, अक्टूबर 31, 2026

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय ऑनलाइन ‘शब्द मंथन साहित्यिक महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा शब्दों के महत्व तथा विशेषता को दर्शाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन ‘शब्द मंथन साहित्यिक महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को दस अलग-अलग शब्दों को विषयों के विकल्प के तौर पर देकर उनमें से किसी भी एक विषय का चयन करके चयनित विषय पर आधारित रचना लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। महोत्सव में सम्मिलित प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन 'पुनीत शब्द शिल्पी' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने शब्दों के महत्व तथा विशेषता के बारे में बताते हुए लोगों को शब्दों का संभलकर व उचित प्रयोग करने ‌की सलाह दी और महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया तथा सम्मान पाने वाली सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन‌ साहित्यिक कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए प्रतिभाशाली रचनाकारों को सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम रत्ना वाधवानी, भारती राय, अमोल बारई 'कविमोल’, शशि गौतम, महेंद्र महावर रचनाकारों के रहे।

बुधवार, अक्टूबर 28, 2026

🌿 कुदरत का इशारा 🌿









पल भर में कुदरत ने

अपनी ताकत का एहसास करा डाला

इंसान को उसकी औकात का

आईना दिखा डाला


बड़े-बड़े महलों और इमारतों को

मिट्टी में मिला डाला

दौलत, शोहरत और ताकत का

सारा गुरूर मिटा डाला


नेपाल की धरती हो

हिमाचल की वादियाँ हों

या जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियाँ

कहीं बादल फटे

कहीं सैलाब आया

कहीं पहाड़ दरके

कहीं अपनों ने अपनों को खोया


किसी का घर उजड़ गया

किसी का संसार बह गया

कोई अपने सपनों को ढूँढ़ रहा है

कोई अपनों को ढूँढ़ रहा है

कोई ज़िंदगी बचाने के लिए

मौत से लड़ रहा है


जिस दौलत और शोहरत पर

इंसान को था गुरूर

कुदरत की एक करवट ने

कर दिया उसे चूर-चूर


फिरते थे जो ताकत के नशे में

उन्हें पल भर में बेबस बना डाला

जो खुद को समझते थे मालिक

उन्हें कुदरत ने अपनी

 ताकत का एहसास करा डाला


फिर भी अफसोस

सब कुछ अपनी आँखों से देखकर

कोई आपदा में भी अवसर ढूँढ़ रहा है

और अपनी गलतियों का दोष

अब भी दूसरों को दे रहा है


कुदरत ने बार-बार चेताया था

मुझसे यूँ खिलवाड़ मत कर

तरक़्की की अंधी दौड़ में

अपनी ज़िंदगी को

कमज़ोर मत कर


कभी पहाड़ों को काटा

कभी जंगलों को उजाड़ा

कभी नदियों का रास्ता रोका

अपने स्वार्थ के लिए

कुदरत का संतुलन बिगाड़ा


तरक़्की के नशे में

इंसान इतना आगे बढ़ गया

कि जिस धरती ने जीवन दिया

उसी को घायल कर गया


ज़रा ठहरो

सोचो तो सही

किसके लिए ये महल हैं

अगर सुरक्षित ज़मीन ही न रहे

किसके लिए ये दौलत है

अगर साँस लेने को

साफ हवा ही न रहे


नदियाँ सिर्फ पानी नही

पहाड़ सिर्फ़ पत्थर नही

जंगल सिर्फ पेड़ नही

ये हमारी ज़िंदगी की

बुनियाद हैं


कुदरत हमारी जागीर नही

हमारी ज़िम्मेदारी है 

धरती हमारी संपत्ति नही

आने वाली पीढ़ियों की अमानत है


अब भी वक़्त है

सुधर जा ऐ इंसान

कुदरत के निज़ाम का सम्मान कर


तरक़्की कर

मगर कुदरत को साथ लेकर

शहर बसा

मगर नदियों का रास्ता बचाकर

सड़कें बना

मगर पहाड़ों का दर्द समझकर


पेड़ों को मत काट

नदियों को मत बाँध

धरती को मत लूट

क्योंकि जिस दिन

कुदरत ने हिसाब माँग लिया

तब इंसान के पास

कोई जवाब नहीं होगा


कुदरत से जंग मत कर

उसके साथ जीना सीख


नेपाल से लेकर

हिमाचल तक

जम्मू-कश्मीर से लेकर

दुनिया के हर कोने तक 

कुदरत का हर इशारा

हमें एक ही बात समझाता है


तरक़्की की अंधी दौड़ में

उसे पीछे मत छोड़

अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए

एक सुरक्षित धरती छोड़


महल फिर बनाए जा सकते हैं

लेकिन जो जीवन चला गया

वह लौटकर नही आता


इसलिए अभी भी समय है

नदियों को साँस लेने दो

पहाड़ों को खड़ा रहने दो

जंगलों को फिर से उगने दो

धरती को थोड़ा आराम करने दो


अब भी वक़्त है

सुधर जा ऐ इंसान

कुदरत के निज़ाम का सम्मान कर

उससे खिलवाड़ नही

उसके साथ चलना सीख


क्योंकि कुदरत जब देती है

तो जीवन देती है

और जब अपना संतुलन खोती है

तो इंसान को उसकी सीमाएँ

याद दिला देती है


आओ, मिलकर प्रण करें

कुदरत का मान करेंगे

धरती की शान करेंगे

इंसानियत को पहचानेंगे

और एक बेहतर दुनिया

का निर्माण करेंगे


यही है कुदरत का इशारा

यही है ज़िंदगी का सहारा।


✍️ शशि गौतम ( सांबा, जम्मू-कश्मीर )

मंगलवार, अक्टूबर 27, 2026

🍁 मेरी खामोशी 🍁









मेरी खामोशी में आवाज हैं, 

सुर, लय और साज है।

मेरी खामोशी उदास है, 

उसमें दर्द, चुभन से एहसास है।


मेरी खामोशी में कई, 

छुपे हुए राज हैं। 

बदलते जमाने संग बदले, 

मेरे कईं अंदाज हैं।


खामोशी के पीछे जज्बात हैं,

कोई कबाड़ का समान नही।

जुबां रहते हुए खामोश हो जाना,

सबके लिए आसान नही।


मैं नादान हूँ, नादानी कर जाती हूँ,

अक्सर रातों को अपने साये से डर जाती हूँ।

है कोई ऐसा, जो मुझे समझ सके,

जो इस खामोशी के कोलाहल को परख सके।


वैसे खामोश रहकर अब मैंने,

अपना अलग संसार बसा लिया है।

शोर-शराबे, भीड़ के झमेलों से तंग आकर के,

खामोशी और अकेलेपन को अपना लिया है।


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

🙇 मोबाइल की चमक में खो रहा बच्चों का बचपना 🙇

हम लोगों के बचपन के दौर में बच्चों के हाथों में कॉमिक्स, बाल पत्रिकाएं और उपन्यास दिखाई दिया करते थे। गर्मियों की छुट्टियों में कहानी की कित...