शुक्रवार, सितंबर 11, 2026

💠 कविता - अधूरापन 💠








विस्मृति के आगोश में, खुद को छोड़ आई थी मैं,

तुमसे मिलकर, अपनी हस्ती मोड़ आई थी मैं।


वो निस्तब्ध रातों का, फोन पर चुपके से बतियाना,

स्मरण है क्या तुम्हें ? या धुंधला गया है वो अफ़साना ?


वो पल, वो क्षण, जैसे स्वप्निल कोई मंज़र था,

मैं और तुम थे बस, बाकी सब मंज़र से बाहर था।


अजीब था हमारे मिलन का वो मौन व्याकरण,

मिले नही कभी, पर बातों में बिताया हर क्षण।


देह की दूरियाँ थी, पर रूहें साथ रहती थी,

धड़कनें शहरों के पार भी, एक-दूजे से बहती थी।


तुमने कहा था— "बिछड़कर मैं भी मरुस्थल हो जाऊँगा,"

"उस नायक की तरह, अपनी हस्ती खो जाऊँगा।"


आज युग बीत गए, नियति की दीवारें खड़ी हैं,

पर न जाने तुम्हारी स्मृतियाँ, किस कोने में पड़ी हैं।


वो अफ़साना ज़माने की नज़रों में, तब भी दफ़न था,

आज भी वह राज, खामोशियों का कफ़न था।


मगर सीने में वो आग, वो तपिश आज भी शेष है,

तुम्हारा वो अधिकार, वो मोह, आज भी विशेष है।


मिट जाने की कसमों से, मैं बहुत डरती थी,

तुम्हें खोने के खौफ में, मैं रोज़ मरती थी।


पर विधि का विधान देखो, कैसा ये न्याय हुआ,

बिछड़ना ही अंततः, हमारा अध्याय हुआ।


मैं तुम्हारी न हो सकी, न अपनी रह पाई,

एक अधूरी प्यास थी, जो समंदर तक ले आई।


वह प्रेम आज भी ज़िंदा है, बस मुकम्मल न हो सका,

अधूरापन ही हमारा, सबसे परम पूज्य सच रहा।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

🌟 कविता - हिंदी से गौरवमय भारत का सम्मान 🌟








हिंदी हमारी शान है,

है हिंदी हमारा मान,

हिंदी से गौरवमय हुआ,

भारत का सम्मान।


हिंदी गीतों का मधुर स्वर,

हिंदी रस की धार,

हिंदी बिन यह जीवन जैसे,

सूना हो संसार।


हिंदी ने अपना रूप सँवारा,

फिर भी रही वही,

समय बदलता रहा मगर,

अपनी पहचान न खोई।


हिंदी है वह सरल भाषा,

जो सबको अपनाती,

विविध भाव और बोलियों को,

अपने में समाती।


संस्कृत इसकी जननी है,

तत्सम-तद्भव श्रृंगार,

देशज और विदेशी शब्दों से,

सजता इसका संसार।


मीरा की भक्ति हिंदी में,

तुलसी की अमर वाणी,

रसखान की कृष्ण-प्रेम धारा,

कबीर की सच्ची बानी।


फिल्मों में हिंदी, गीतों में हिंदी,

कविता में इसका मान,

जन-जन के मन को जोड़ रही,

यह अपनी हिंदुस्तानी जान।


मातृभाषा का मान है हिंदी,

हिंदी मेरा अभिमान,

अन्य भाषाओं का भी सम्मान,

पर हिंदी का ऊँचा स्थान।


केवल हिंदी दिवस पर ही,

नही करें इसका सम्मान,

हर दिन हिंदी को अपनाएं,

यही हो अपना प्रण महान।


हिंदी भाषा के हर शब्द पर,

ज्ञान-दीप हम जलाएँ,

नई पीढ़ी के मन में फिर,

हिंदी का गौरव जगाएं।


✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

🌟 प्यारी हिन्दी 🌟








हिन्दी से हिन्दुस्तान है

हिन्दी हिन्दुस्तान की आत्मा है

तुलसी, कबीर, बिहारी, केशव, भूषण सबने

हिन्दी का मान बढ़ाया है 

हिन्दी का महत्व सबको समझाया है।


जनता की यह भाषा है 

गौतम बुद्ध की रचना का भी

इसी भाषा में ज्ञान है 

हिन्दी भाषा में ही गाया जाता राष्ट्र गान है

देश के संचार माध्यमों की यह जान है

भारत माता का यह गहना है

हिन्दी हमारी शान है 

हम सबकी पहचान है।


यह सहज सरल आसान है 

यह करोड़ों भारतीयों की आवाज है 

यह देश का अभिमान है 

यह गुणों की खान है

इसके ‘अ से ज्ञ’ तक के सफर में

बड़ा ही गूढ़ ज्ञान है।


सुन्दर भाषा लिपि सुघड़ है

इसमें हमारी संस्कृति झलकती है 

यह मिश्री सी मीठी है

माँ की ममता इसमें है 

हिन्दी हमारी प्रेरणा है 

आओ ! हम हिन्दी का सम्मान करें।


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

शनिवार, सितंबर 05, 2026

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित ऑनलाइन ‘सावन सृजन महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा सावन आगमन के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन ‘सावन सृजन महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को सावन सहित दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किन्हीं दो विषयों का चयन करके चयनित विषयों पर आधारित रचनाएं लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस महोत्सव में एक ओर जहां वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी विशिष्ट साहित्यिक शैली का प्रदर्शन किया तो दूसरी ओर ग्रुप से जुड़े नवीन रचनाकारों ने भी अपनी अनूठी भावनाओं और विचारों से ग्रुप का ध्यान आकर्षित किया। महोत्सव में सम्मिलित सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन “पुनीत साहित्य रत्न” सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया और सम्मान पाने वाली सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने लोगों को ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम डॉ० सुनीता डंडरियाल, रागिनी ठाकुर, पूनम लता, संध्या शर्मा, पुजा हरिश्चंद्र धनू रचनाकारों के रहे।

शुक्रवार, सितंबर 04, 2026

🏡 आशियाना 🏡








लोगों के सपनों का महल हमने तैयार किया,

किन्तु जुटा न पाये अपने लिये एक आशियां।


उन्होंने कुंज, घरोंदा और आशियाने से,

उस घर का नामकरण किया।


हमने अपने घर को,

नीली छतरी नाम दिया।


नींव पर पड़े हर नये पत्थर के साथ,

उनकी आशाओं को अपनी मेहनत से खड़ा किया।


जब तक घर पत्थरों का खण्डहर था,

तब तक ही उस पर हमारा आधिपत्य था।


किन्तु सपनों का महल पूरा होते ही,

उसके कर्णधार को उससे बाहर जाना पड़ा।


माना घर, जमीन और भी सब कुछ उन्हीं का था,

किन्तु मत भूलो उनके सपनों को,

हकीकत में हमने ही तासीर किया।


गुजरता हूँ जब कभी अपने ही बनाये दुर्ग से,

सौ बार सोचता हूँ—क्या मैं ही इसका कर्णधार हूँ ?


क्योंकि हर वर्ष की बरसात की तरह,

इस वर्ष भी टपकती रही हमारी छत।


और इतने लोगों के घरों को छत देने वाला,

बदल न सका अपने घर का टूटा छप्पर।


✍️ डॉ० सुनीता डंडरियाल (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड)

❤️ प्रेम और विश्वास ❤️








प्रेम कोई शब्द नहीं,

जो होंठों से कहा जाए,

प्रेम तो वह एहसास है,

जो ख़ामोशी में भी समझा जाए।


प्रेम है किसी की मुस्कान में

अपनी खुशी तलाश लेना,

उसकी आँखों में छिपे आँसू,

बिन कहे पढ़ लेना।


प्रेम है दूर रहकर भी,

दिल के पास बने रहना,

रिश्तों की भीड़ में,

किसी एक का ख़ास बने रहना।


न वादों की ज़रूरत,

न कसमें, न कोई शर्त,

जहाँ मन निःस्वार्थ हो जाए,

वहीं जन्म लेता है प्रेम।


प्रेम तो वह दीप है

जो आँधियों में भी जलता है,

और सच्चा हो अगर,

तो उम्र भर साथ चलता है।


✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

गुरुवार, सितंबर 03, 2026

🧩 भाग्य और संघर्ष 🧩







भाग्य प्रत्येक का,

यहाँ भिन्न-भिन्न है। 

जिसने जन्म लिया,

इस पृथ्वी पर, 

उसे स्वयं ही ज्ञात नही,

उसके भाग्य में क्या है ? 

परंतु प्रत्येक जीव-प्राणी,

यहाँ जीवन जीता है।


भाग्य में आने वाली विपत्तियों पर,

कोई शीघ्र ही विजय प्राप्त करता है। 

तो कोई नियति से युद्ध करते-करते,

जीवन की कालरात्रि में जीता है।

नियति का यह खेल,

किसी को भी समझ नही आया। 

परंतु फिर भी जुझारू,

साहसी व्यक्ति ने,

'भाग्य' को कभी कोसा नही।


✍️ पुजा हरिश्चंद्र धनू ( पालघर, महाराष्ट्र )

💠 कविता - अधूरापन 💠

विस्मृति के आगोश में, खुद को छोड़ आई थी मैं, तुमसे मिलकर, अपनी हस्ती मोड़ आई थी मैं। वो निस्तब्ध रातों का, फोन पर चुपके से बतियाना, स्मरण है क...