मंगलवार, सितंबर 22, 2026

🌼 भ्रूण हत्या 🌼








मैं अभी इस दुनिया में आई नही हूँ,

फिर मुझसे कैसी नाराज़गी है ?

मैं तो बस एक नन्ही-सी जान हूँ,

फिर मेरी साँसों से कैसी दुश्मनी है ?


माँ, तेरी कोख में पल रही हूँ,

तेरे आँचल का सपना देख रही हूँ,

बाबुल की उँगली थामकर चलने का,

मैं भी तो एक सपना देख रही हूँ।


क्यों कहते हो बेटी बोझ होती है ?

क्यों उसकी किस्मत पहले लिख देते हो ?

जिस बेटी को जन्म से पहले मिटा देते हो,

उसी बेटी के लिए बाद में देवी के दीप जलाते हो।


बेटी ही तो घर में खुशियाँ लाती है,

बेटी ही रिश्तों को प्यार सिखाती है,

बेटी ही एक दिन माँ बनकर,

नई पीढ़ी को जन्म देती है।


मुझे जन्म लेने दो,

मुझे साँस लेने दो,

मैं बोझ नही, एक अवसर हूँ,

मुझे अपने सपनों के साथ जीने दो।


किसी की कोख फिर सूनी न हो,

किसी माँ की आँख नम न हो,

बेटी को जन्म से पहले मारने की

यह क्रूर सोच अब खत्म हो।


बेटी को बचाइए,

उसे पढ़ाइए, आगे बढ़ाइए,

क्योंकि बेटी केवल घर की नही,

पूरे समाज की ताकत है।


✍️ शिखा चंदेल ( देहरादून, उत्तराखंड )

👩‍🎓 औरत 👩‍🎓









मैं कौन हूँ ?

मेरी पहचान क्या है ?

मेरे अस्तित्व का मान क्या है ?

इन प्रश्नों का उत्तर हूँ मैं—

हाँ, मैं औरत हूँ,

मुझे गर्व है कि मैं औरत हूँ।


ईश्वर ने कितने रूपों में,

मुझको नवाज़ा है।

माँ बनाकर ममता का,

सागर मुझमें उतारा है।


बेटी बनकर घर-आँगन की,

खुशियों का वरदान हूँ।

बहन बनकर स्नेह-सुधा,

प्रेम और अनुराग हूँ।


पत्नी बनकर त्याग-समर्पण,

जीवन की सहभागी हूँ।

अर्धांगिनी बनकर हर सुख-दुःख में,

साथ निभाने वाली हूँ।


दुर्गा हूँ तो शक्ति मेरी,

सरस्वती तो ज्ञान,

लक्ष्मी बनकर समृद्धि लाऊँ,

अन्नपूर्णा मेरा मान।


मौन हूँ तो यह मत समझो,

मुझमें कोई आवाज़ नही।

शांत हूँ तो यह मत समझो,

मुझमें कोई आग नही।


अबला समझने की भूल न करना,

मैं शक्ति का विस्तार हूँ,

अन्याय के आगे झुक जाऊँ,

इतनी भी लाचार नही हूँ।


कुत्सित सोच को मैं अब,

साहस से ललकारूँगी।

अपने अधिकार और सम्मान की

हर लड़ाई मैं लड़ूँगी।


न कोई बेटी भय में जीए,

न कोई निर्भया फिर हो।

हर नारी सुरक्षित होकर,

अपने सपनों की अधिकारी हो।


कदम से कदम मिलाकर,

आसमान छू जाऊँगी।

चूल्हे-चौके के संग-संग,

नभ की सैर कर आऊँगी।


प्यार मिले, सम्मान मिले तो,

घर-आँगन महकाऊँगी।

स्नेह मिले तो रिश्तों में,

खुशियों के दीप जलाऊँगी।


पर सम्मान जहाँ नही होगा,

वहाँ मौन नही रहूँगी।

अपने स्वाभिमान की खातिर,

हर बंधन से लड़ जाऊँगी।


मैं केवल किसी की बेटी,

बहन, पत्नी या माँ नही—

इन रिश्तों से आगे भी,

मेरी अपनी पहचान सही।


मैं सृजन हूँ, मैं शक्ति हूँ,

मैं साहस की उड़ान हूँ,

मैं आधी आबादी ही नही,

पूरे समाज की पहचान हूँ।


हाँ, मैं औरत हूँ—

मुझे गर्व है कि मैं औरत हूँ।


✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

💔 मौन विदा की टीस 💔







मैं विस्मृत न कर सकी उस आदि-अनंत अनुराग को,

भले ही तुमने मेरी खामोशी को 'बेवफाई' का नाम दे दिया।


मेरा तुम्हें छोड़ जाना, हृदय का विद्रोह नही, काल का प्रतिशोध था,

तुझसे विमुख होना मेरी इच्छा नही, मेरी कुल-मर्यादा का अवरोध था।


​आज भी जब उन स्मृतियों की पगडंडियों पर पाँव रखती हूँ,

तो अतीत की राख से यादों की चिंगारियां रूह को झुलसा देती हैं।


चेतना के पन्नों पर आज भी अंकित है वह चंचल सा परिहास,

जब तुम मेरा परिचय 'भाभी' कहकर, रिश्तों की सीमाओं से खेलते थे—


वही शब्द आज एक अमिट नियति बनकर मेरे वजूद को डस रहा है।

​यकीन मानो, मैं खंडित थी पर पाखंडी नही थी,


मैं वक्त के क्रूर चक्र में फंसी एक ठहरी हुई लाचारी थी।

तुम्हें मझधार में छोड़ना, मेरे प्रेम की पराजय नही,

बल्कि कर्तव्यों की वेदी पर मेरी आत्मा की सबसे बड़ी बलिहारी थी।


​तुमने तो केवल मेरा प्रस्थान देखा है प्रिय,

मेरी रूह का वहीं तुम्हारे पास ठहर जाना नही देखा।।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

🎋 पेड़ है वरदान 🎋









पेड़ हैं धरती की शान 

इनके बिना अधूरा है जहान 

पेड़ के रूप में धरती को मिला है वरदान 

आओ पेड़ लगाकर कार्य करें महान 

स्वच्छ हवा का देते हैं हमे दान 

पेड़ लगा कर करें धरती माँ का सम्मान 


यह है बहुत ही जरूरी काम 

पेड़ों से हमे मिलते फल तमाम 

कड़वी नीम है गुणों की खान 

पेड़ प्रदूषण को करते कम 

धरती के ताप पर करते नियंत्रण 


आओ धरती माँ को ओढ़ा दे 

हरियाली की चादर 

अब हम कर ले ध्यान 

हमे धरती माँ को खुश रखना है 

पेड़ लगाने के लिए सब को प्रेरित करना है 

जल, जंगल, जमीन की रक्षा हो हमारा अभियान 


आओ बचाए प्राकृतिक संसाधन 

ये है कुदरत के वरदान 

बढता लालच कर देगा धरती को सुनसान 

पर्यावरण संरक्षण का करो आह्वान 

पेड़ वायु को शुद्ध करते हैं 

हरियाली हो हमारी पहचान 

पेड़ लगा कर धरती को दे दो मुस्कान 


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश ) 

सोमवार, सितंबर 21, 2026

💠 मेरी प्रेरणा मेरी माँ 💠








जब भी जीवन की राहों में,

कदम मेरे डगमगाते हैं,

माँ के शब्दों के दीपक,

अँधियारे में राह दिखाते हैं।


थककर जब मैं बैठ जाती हूँ,

माँ कहती है—“चलती रह,

मंज़िल भले ही दूर हो बेटी,

तू बस अपना हौसला रख।


उसने खुद धूप सही लेकिन,

मुझ पर छाँव बनाए रखी,

अपने हिस्से के सपने देकर,

मेरी दुनिया सजाए रखी।


मेरी हर छोटी-सी जीत में,

उसकी आँखें चमकती हैं,

मेरी हर एक ठोकर पर,

उसकी दुआएँ ढाल बनती हैं।


मैंने उससे सीखा है जीवन —

बिना शिकायत जीना है,

मुश्किल चाहे कितनी आए,

फिर भी हँसते रहना है।


वह केवल मेरी माँ नहीं,

मेरी पहली गुरु, पहली दोस्त,

मेरे हर सपने की ताकत,

मेरे जीवन की सबसे सुंदर सोच।


जब दुनिया कहती है—“नही,”

माँ कहती है—“तू कर सकती है।”

और उसके इन चार शब्दों से

मेरी हिम्मत फिर खिलती है।


न कोई पुरस्कार चाहिए,

न दुनिया की बड़ी पहचान,

मेरी माँ की आँखों में

दिख जाए बस मेरा सम्मान।


मेरे सपनों की उड़ान वही,

मेरी हिम्मत की जान वही,

मेरी हर जीत का मान वही—

मेरी प्रेरणा,मेरी शक्ति,

मेरी दुनिया, मेरी माँ।


✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

✨ हिंदी संस्कारों की जननी ✨








हिंदी केवल भाषा नही,

यह संस्कारों की जननी है।

माँ की लोरी में गूँजती,

बचपन की मीठी धुन है।।


जब माँ प्यार से समझाती है,

हिंदी मन में उतर जाती है।

दादी-नानी की कहानियों में,

जीवन की सीख दे जाती है।।


‘माँ’ कहने में जो अपनापन है,

‘पिता’ कहने में जो सम्मान है,

‘गुरु’ शब्द में जो श्रद्धा है,

हिंदी में वही तो संस्कारों की पहचान है।।


हिंदी हमें जोड़ना सिखाती है,

बड़ों का आदर करना सिखाती है।

छोटों को स्नेह देना सिखाती,

रिश्तों की गरिमा समझाती है।।


रामायण की मर्यादा इसमें,

गीता का ज्ञान समाया है।

कबीर की वाणी, मीरा का प्रेम,

शब्दों में दीप जलाया है।।


यह भाषा खेतों की मिट्टी में है,

यह गाँव की पगडंडी में है।

यह चौपाल की बातों में है,

यह शहरों की हलचल में है।।


हिंदी में दर्द कहें तो आँखें नम हो जाती हैं,

हिंदी में प्रेम लिखें तो भावनाएँ मुस्काती हैं।।

हिंदी में माँ को पुकारें तो मन भर आता है,

हिंदी में देश कहें तो सीना गर्व से उठ जाता है।।


बदलते समय के साथ हम आगे बढ़ें,

नई भाषाएँ सीखें, नए सपने गढ़ें।

लेकिन अपनी जड़ों को न भूलें कभी,

हिंदी को अपने हृदय से निकालें नहीं।।


आओ आज यह संकल्प उठाएँ,

हिंदी को जीवन में सम्मान दिलाएँ।

बोलें हिंदी, लिखें हिंदी,

हिंदी को हर मन तक पहुँचाएँ।।


हिंदी हमारी आत्मा है,

हिंदी हमारी आवाज़ है।

हिंदी से ही संस्कृति जीवित,

हिंदी पर हमें नाज़ है।।


✍️ अंजू मल्लिक ( पटना, बिहार )

🌺 नारी 🌺









पुरुषों के समाज में अबला कहलाने वाली बेचारी हूँ, 

सब कुछ सहकर चुपचाप आंसू बहाने वाली मैं नारी हूँ।


पुरुष को जन्म देने से मरण तक देती हूँ साथ पुरुष का,

उस वक्त भी होती जरूरी प्रदर्शन होता जब पौरुष का।


समाज में व्याप्त भेदभाव अनीति को सहना भी है,

न कोई आवाज उठाना और न कुछ कहना भी है।


समय बदलता युग बदलते पर न बदलता हाल, 

त्रेता, द्वापर से कलियुग आया हाल हुआ बेहाल।


सीता हो या द्रौपदी सब हालातों के आगे थी हारी,

पुरुष प्रधान इस समाज में फिरती हैं मारी-मारी।


हमारे त्याग और समर्पण का नही है जग में कोई मोल, 

अत्याचार अन्याय होता हम पर और मिलते कड़वे बोल।


मां बेटी और बहु के रूप में आज भी संघर्ष करती नारियां,

पुरुष प्रधान समाज में कोई नही सुनता हमारी सिसकारियां।


अब वक्त आ गया हमारे लिए आवाज उठानी होगी,

सामाजिक समानता की लड़ाई में जीत दिलानी होगी।


✍️ मुकेश कुमार सोनकर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

🌼 भ्रूण हत्या 🌼

मैं अभी इस दुनिया में आई नही हूँ, फिर मुझसे कैसी नाराज़गी है ? मैं तो बस एक नन्ही-सी जान हूँ, फिर मेरी साँसों से कैसी दुश्मनी है ? माँ, तेरी...