मंगलवार, सितंबर 01, 2026

🎋 जख्म फिर हरा हुआ है 🎋


 


दिल को जाने आज क्या हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है,

किसी के हाथ पर तुम्हारा,

नाम लिखा हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है।


दर्द में दर्द का एहसास कब हुआ है,

तुम्हारे दिए हुए दर्द से. 

दिल भरा हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है।


मत पूछ उदासी का सबब हमसे,

दबी चिंगारी के भड़कने से,

दिल जला हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है,


बीते हुए लम्हों को हम भुला न पाए,

यादों का बड़ा वह गट्ठर,

दिल में पड़ा हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है,


भींगती नही है अब कभी भी आंखें,

यूँ आंखों का सारा पानी,

अंदर भरा हुआ है,

जख्म फिर हरा हुआ है।


✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )

👸 गृहिणी की कहानी 👸

एक नारी के अनेक रूप होते हैं,
हर रूप में वह विशेष होती है,
पर गृहिणी के रूप में,
वह सबसे अव्वल होती है।

सुबह की पहली किरण से पहले उठती,
सबकी जरूरतों का ध्यान रखती,
किसी की माँ, किसी की पत्नी,
किसी की बेटी बनकर रहती।

सबके साथ होते हुए भी,
कभी-कभी स्वयं में अकेली होती है,
सबके चेहरे पर मुस्कान देखकर,
मन ही मन मुस्कुराती है।

कभी गुनगुनाती, कभी चहकती,
घर को अपना संसार समझती,
पर किसी कोने में उसके मन के कुछ 
अधूरे सपने भी पलते हैं।

कभी थी अपनी एक पहचान,
अपने सपनों की उड़ान,
अपने स्वाभिमान का अभिमान,
अपने अस्तित्व की अलग पहचान।

फिर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता गया,
समय धीरे-धीरे हाथ से फिसलता गया,
सबको सँवारते-सँवारते वह,
खुद को ही भूलती चली गई।

माँ बनकर ममता लुटाई,
पत्नी बनकर साथ निभाया,
बहू बनकर घर को अपनाया,
हर रिश्ते को दिल से निभाया।

जो देखा, जो सीखा,
उसे अपने जीवन में उतारा,
अपनों की खुशियों के लिए
हर पल खुद को ही सँवारा।

पर कभी किसी ने पूछा —
“तुम्हारी भी कोई चाहत है ?”
कभी किसी ने जानना चाहा —
“तुम्हारे मन की भी कोई आहट है ?”

सबको खुश करने की चाह में,
वह खुद से दूर होती गई,
अपने सपनों की डोर थामे,
चुपचाप कहीं खोती गई।

पर गृहिणी केवल घर की चारदीवारी नही,
वह घर की नींव होती है।
उसके त्याग से घर सँवरता है,
उसकी ममता से हर धड़कन जुड़ी होती है।

अब समय है कि वह अपने सपनों को 
फिर से पहचाने,
अपने अस्तित्व को सम्मान दे,
अपनी पहचान फिर से बनाए।

घर भी उसका, सपने भी उसके,
उड़ान भी उसकी, आसमान भी उसका,
वह केवल किसी की माँ या पत्नी नही,
वह स्वयं भी एक संपूर्ण व्यक्तित्व है।

गृहिणी होना उसकी सीमा नही,
यह तो उसके सामर्थ्य की पहचान है,
जो घर को स्वर्ग बना दे,
वह नारी सच में महान है।

✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

रविवार, अगस्त 30, 2026

💠 तीज आधारित लघुकथाएं 💠

 1. ( माँ की हरी साड़ी )

शादी के बाद पहली तीज पर बेटी मायके नही जा पाती। माँ अपनी पुरानी हरी साड़ी काटकर उसके लिए एक छोटा-सा पोटली बैग सिलकर भेजती है, जिसमें चूड़ियाँ, मेहंदी और बचपन की एक तस्वीर होती है। बेटी समझती है कि माँ ने केवल सामान नही, अपना बचपन उसके पास भेजा है।

 2. ( भाई का इंतज़ार )

तीज के दिन बहन सुबह से दरवाज़े पर भाई की राह देखती है। शाम तक वह नही आता। रात को दरवाज़ा खुलता है—भाई बारिश में भीगा हुआ खड़ा है। नौकरी के कारण दूर था, लेकिन उसने कहा,
“तेरी तीज की पींघ बिना झुलाए मुझे नींद कैसे आती ?”

3. ( पहली तीज )

नई दुल्हन को ससुराल में तीज की परंपराएँ मालूम नहीं होती। सास उसे बेटी की तरह तैयार करती है और कहती है—
“बहू बनकर आई हो, लेकिन तीज के दिन तुम पहले मेरी बेटी हो।”
दो पीढ़ियों की स्त्रियों के बीच एक नया रिश्ता जन्म लेता है.... जो सास बहू के रिश्ते के परे होता है।

4. ( बंद संदूकची )

माँ के निधन के वर्षों बाद बेटी को तीज पर उनकी संदूकची मिलती है। उसमें हर साल की तीज के लिए रखी गई छोटी-छोटी चीज़ें—हरी चूड़ियाँ, मेहंदी के सूखे पत्ते और बेटी के नाम लिखे अधूरे पत्र।
अंतिम पत्र में केवल एक पंक्ति होती है—
“अगली तीज पर मुझे याद करके झूला ज़रूर झूलना।” उसने डबडबाई आंखों से सोचा कि सच है मां ने हमेशा उसे तीज मनाने को प्रोत्साहित किया है।

5. ( नीम का झूला )

गाँव का पुराना नीम का पेड़ कटने वाला है। उसी पेड़ पर हर साल तीज का झूला पड़ता था। गाँव की बेटियाँ मिलकर पेड़ बचाने की मुहिम शुरू करती हैं। अंततः पेड़ बच जाता है और उस वर्ष पहली पींघ सबसे बुज़ुर्ग दादी लगाती हैं।

6. ( वह तीज जो अधूरी रह गई )

एक महिला हर साल पति की लंबी उम्र के लिए तीज का व्रत रखती है। एक साल पति गंभीर रूप से बीमार पड़ जाता है। वह पहली बार महसूस करती है कि प्रेम केवल किसी की लंबी उम्र माँगना नही, बल्कि बीमारी और कठिनाई में उसके साथ खड़े रहना भी है।

 7. ( परदेस वाली बेटी )

बेटी विदेश में है और पहली बार तीज पर घर नही आ सकती। माँ वीडियो कॉल पर उसके लिए झूला सजाती है। अचानक भाई कैमरा घुमाता है—उसने घर की छत पर छोटा-सा झूला लगा रखा है। दोनों अलग-अलग देशों में होते हुए भी एक साथ तीज पर्व मनाते हैं।

 8. ( आखिरी पींघ )

अस्सी साल की दादी अपनी पोती से कहती हैं, “इस बार मुझे झूले पर बैठा दे।” पोती हँसते हुए उन्हें झूला झुलाती है। दादी कहती हैं,“अब मेरी पींघ छोटी हो गई है, पर मेरी यादें बहुत लंबी हैं।” कहानी उनके बचपन की तीज की स्मृतियों के साथ समाप्त होती है।

✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )
 



शनिवार, अगस्त 29, 2026

🧩 गृहिणी की भावनाएँ 🧩

दिनभर घर में रहती हो, भला तुम्हें क्या काम है ? 
सतत सुनाते रहते मुझको, तुम ऐसा पैगाम है।             
तथापि इस गृह की खातिर और हर सदस्य के निमित्त,
प्राण दांव पर रख करती हूँ, कर्तव्यों को अमित ॥१॥

मुझे नहीं चाहिए कोई, मास का पारिश्रमिक-वेतन, 
पर वर्षभर के गृह-कर्मों का, कर लेना तुम संचेतन।
बदले में बस सादर मुझ पर, शब्द-प्रशंसा के सुमन बिखेरना,
मेरी निश्चल सेवा को तुम, अपनी कृतज्ञता से घेरना ॥२॥ 

मैं न मांगती बहुमूल्य साड़ी, और न कोई रत्नहार,
किंतु कदापि समाज सम्मुख, करना न मेरा तिरस्कार।
चार जनों के बीच न करना, कभी मेरा मानमर्दन,
पराजित न करना मुझको, न दुखाना मेरा मन ॥३॥

मुझे गृहस्वामिनी कहलाने में, आता परम आनंद है,
क्योंकि मुझे स्व-अस्तित्व पर, अभिमान अमंद है।
स्व-सामर्थ्य से चौबीसों घंटे, इस संसार को पुष्पित करती हूँ,
बिना किसी प्रतिफल के मैं, यह घर-आँगन खुशियों से भरती हूँ ॥४॥

✍️ पुजा हरिश्चंद्र धनू ( पालघर, महाराष्ट्र )




शुक्रवार, अगस्त 28, 2026

🪅 ख़्वाहिशें 🪅

ख़्वाहिश की क्या बात कहूँ,
पूरी कब होती मन की ख़्वाहिश ?
कभी बन जाती है सपना कोई,
कभी आँखों में पलती ख़्वाहिश।

ख़्वाहिश हो या हो अभिलाषा,
चाहत हो या फिर हो कामना,
सब एक ही डोर से बँधे हैं,
मन की सुंदर भावनाओं से।

मन में छोटी-छोटी ख़्वाहिशें ही तो,
जीवन को देती हैं नई दिशा,
इन्ही के सहारे इंसान,
पहुँचता है अपनी मंज़िल तक।

हर इंसान के मन में होती,
कुछ अनकही-सी ख़्वाहिशें,
कुछ पूरी होकर मुस्काती हैं,
कुछ बन जाती हैं यादें।

मैं ख़ुद की ख़्वाहिश जता न पाई,
मन की बातें कह न पाई,
कुछ सपने आँखों में रखकर,
जीवन-पथ पर चलती ही रही।

ख़्वाहिशें मेरी अधूरी सही,
पर कोशिशें अधूरी न रही,
हर ठोकर से सीख लिया मैंने,
हर मुश्किल में राह नई।

कभी कामना का आँचल छोटा न रखना,
सपनों को सीमाओं में मत बाँधना,
जितना बड़ा होगा ख़्वाहिशों का आँचल,
उड़ान उतनी ही ऊँची होगी।

ख़्वाहिशों को पंख लगाकर,
आसमान छूने की चाह रखो,
राह कठिन हो, चाहे जितनी,
दिल में आगे बढ़ने की राह रखो।

कुछ ख़्वाहिशें पूरी होंगी,
कुछ शायद अधूरी रह जाएँगी,
पर कोशिशों की राह पर चलकर,
ज़िंदगी फिर भी मुस्कुराएगी।

क्योंकि ख़्वाहिश केवल पाने का नाम नही,
यह तो जीने का एक बहाना है,
जो सपनों को सच करने निकले,
वही जीवन का सच्चा दीवाना है।

मेरी ख़्वाहिशें मेरी अपनी हैं,
कुछ अनकही, कुछ अनजानी,
पूरी हों या अधूरी रहें,
इनसे ही तो है मेरी कहानी।

✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

🦚 तुम्हारे बिना 🦚

दर्द की चादर,

सुबह रो-रो के आसमां ने,

आंखें लाल कर ली थी,

समंदर भी रात भर रोया था,

सुबह जो उसकी रेत गीली थी,

सच है रात ने भी आंसू बहाए थे,

सुबह फूलों पर ओस की बूंदे पड़ी थी,

चांद तारे भी रोए थे,

धरती जो गीली थी,

सुबह पेड़ों के झुरमुट से सूरज ने झांक कर देखा,

पूछा क्या बात है खामोश क्यों हो ?

क्यों सूनी है आंखे मायूस क्यों हो ?

मैंने कहा पूछो इन पेड़ों से जो रात भर आंसू बहाते रहे,

पूछो इन पहाड़ों से जो रात भर मेरे आंसू पोछते रहे,

इन नजारों से भी पूछ लेना जो मुझसे नजरें न मिला पाए,

इन बहारों से भी पूछ लेना क्यूं ये इतना मुझको रुलाए,

दिनकर बोला नजर को बदलो फिर नजारे भी बदल जाएंगे,

सोच को बदलो समंदर जमीन,

चांद तारे खूबसूरत नजर आएंगे,

तुमने दर्द की चादर लपेट रखी है,

जरा उसे उतारकर तुम फेको, 

मुझे रोज डूबना पड़ता है-क्या मैं रोता हूँ मुझे देखो,

मैंने गौर से देखा सूरज भू पर सिंदूरी रंग बिखेर रहा था,

लाल रंग और कूची से मानो,

चित्र उकेर रहा था,

मैं क्षणभर सब कुछ भूल कर,

उन सिंदूरी चित्रों को निहारने लगी,

सचमुच ही धरती अब मुझे सुंदर नजर आने लगी,

मुझे सुंदर नजर आने लगी।


  ✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )



रविवार, मार्च 24, 2024

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित ऑनलाइन स्नेह ध्येय सृजन महोत्सव के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा लोगों को स्नेह के महत्व और विशेषता का अहसास करवाने के उद्देश्य से ऑनलाइन स्नेह ध्येय सृजन महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किन्हीं दो विषयों का चयन करके चयनित विषयों पर आधारित रचनाएं लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। महोत्सव में सम्मिलित सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन 'पुनीत साहित्य रत्न' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने मनुष्य के जीवन में स्नेह का विशेष महत्व बताते हुए लोगों से प्रकृति के कण-कण के प्रति स्नेह भाव रखने की प्रार्थना की और महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया और सम्मान पाने वाले सभी प्रतिभागी रचनाकारों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने लोगों को ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम रूचि पारीक, करिश्मा नरेंद्र मल रचनाकारों के रहे।

🎋 जख्म फिर हरा हुआ है 🎋

  दिल को जाने आज क्या हुआ है, जख्म फिर हरा हुआ है, किसी के हाथ पर तुम्हारा, नाम लिखा हुआ है, जख्म फिर हरा हुआ है। दर्द में दर्द का एहसास कब ...