1. ( माँ की हरी साड़ी )
शादी के बाद पहली तीज पर बेटी मायके नही जा पाती। माँ अपनी पुरानी हरी साड़ी काटकर उसके लिए एक छोटा-सा पोटली बैग सिलकर भेजती है, जिसमें चूड़ियाँ, मेहंदी और बचपन की एक तस्वीर होती है। बेटी समझती है कि माँ ने केवल सामान नही, अपना बचपन उसके पास भेजा है।
2. ( भाई का इंतज़ार )
तीज के दिन बहन सुबह से दरवाज़े पर भाई की राह देखती है। शाम तक वह नही आता। रात को दरवाज़ा खुलता है—भाई बारिश में भीगा हुआ खड़ा है। नौकरी के कारण दूर था, लेकिन उसने कहा,
“तेरी तीज की पींघ बिना झुलाए मुझे नींद कैसे आती ?”
3. ( पहली तीज )
नई दुल्हन को ससुराल में तीज की परंपराएँ मालूम नहीं होती। सास उसे बेटी की तरह तैयार करती है और कहती है—
“बहू बनकर आई हो, लेकिन तीज के दिन तुम पहले मेरी बेटी हो।”
दो पीढ़ियों की स्त्रियों के बीच एक नया रिश्ता जन्म लेता है.... जो सास बहू के रिश्ते के परे होता है।
4. ( बंद संदूकची )
माँ के निधन के वर्षों बाद बेटी को तीज पर उनकी संदूकची मिलती है। उसमें हर साल की तीज के लिए रखी गई छोटी-छोटी चीज़ें—हरी चूड़ियाँ, मेहंदी के सूखे पत्ते और बेटी के नाम लिखे अधूरे पत्र।
अंतिम पत्र में केवल एक पंक्ति होती है—
“अगली तीज पर मुझे याद करके झूला ज़रूर झूलना।” उसने डबडबाई आंखों से सोचा कि सच है मां ने हमेशा उसे तीज मनाने को प्रोत्साहित किया है।
5. ( नीम का झूला )
गाँव का पुराना नीम का पेड़ कटने वाला है। उसी पेड़ पर हर साल तीज का झूला पड़ता था। गाँव की बेटियाँ मिलकर पेड़ बचाने की मुहिम शुरू करती हैं। अंततः पेड़ बच जाता है और उस वर्ष पहली पींघ सबसे बुज़ुर्ग दादी लगाती हैं।
6. ( वह तीज जो अधूरी रह गई )
एक महिला हर साल पति की लंबी उम्र के लिए तीज का व्रत रखती है। एक साल पति गंभीर रूप से बीमार पड़ जाता है। वह पहली बार महसूस करती है कि प्रेम केवल किसी की लंबी उम्र माँगना नही, बल्कि बीमारी और कठिनाई में उसके साथ खड़े रहना भी है।
7. ( परदेस वाली बेटी )
बेटी विदेश में है और पहली बार तीज पर घर नही आ सकती। माँ वीडियो कॉल पर उसके लिए झूला सजाती है। अचानक भाई कैमरा घुमाता है—उसने घर की छत पर छोटा-सा झूला लगा रखा है। दोनों अलग-अलग देशों में होते हुए भी एक साथ तीज पर्व मनाते हैं।
8. ( आखिरी पींघ )
अस्सी साल की दादी अपनी पोती से कहती हैं, “इस बार मुझे झूले पर बैठा दे।” पोती हँसते हुए उन्हें झूला झुलाती है। दादी कहती हैं,“अब मेरी पींघ छोटी हो गई है, पर मेरी यादें बहुत लंबी हैं।” कहानी उनके बचपन की तीज की स्मृतियों के साथ समाप्त होती है।
✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )