ख़्वाहिश की क्या बात कहूँ,
पूरी कब होती मन की ख़्वाहिश ?
कभी बन जाती है सपना कोई,
कभी आँखों में पलती ख़्वाहिश।
ख़्वाहिश हो या हो अभिलाषा,
चाहत हो या फिर हो कामना,
सब एक ही डोर से बँधे हैं,
मन की सुंदर भावनाओं से।
मन में छोटी-छोटी ख़्वाहिशें ही तो,
जीवन को देती हैं नई दिशा,
इन्ही के सहारे इंसान,
पहुँचता है अपनी मंज़िल तक।
हर इंसान के मन में होती,
कुछ अनकही-सी ख़्वाहिशें,
कुछ पूरी होकर मुस्काती हैं,
कुछ बन जाती हैं यादें।
मैं ख़ुद की ख़्वाहिश जता न पाई,
मन की बातें कह न पाई,
कुछ सपने आँखों में रखकर,
जीवन-पथ पर चलती ही रही।
ख़्वाहिशें मेरी अधूरी सही,
पर कोशिशें अधूरी न रही,
हर ठोकर से सीख लिया मैंने,
हर मुश्किल में राह नई।
कभी कामना का आँचल छोटा न रखना,
सपनों को सीमाओं में मत बाँधना,
जितना बड़ा होगा ख़्वाहिशों का आँचल,
उड़ान उतनी ही ऊँची होगी।
ख़्वाहिशों को पंख लगाकर,
आसमान छूने की चाह रखो,
राह कठिन हो, चाहे जितनी,
दिल में आगे बढ़ने की राह रखो।
कुछ ख़्वाहिशें पूरी होंगी,
कुछ शायद अधूरी रह जाएँगी,
पर कोशिशों की राह पर चलकर,
ज़िंदगी फिर भी मुस्कुराएगी।
क्योंकि ख़्वाहिश केवल पाने का नाम नही,
यह तो जीने का एक बहाना है,
जो सपनों को सच करने निकले,
वही जीवन का सच्चा दीवाना है।
मेरी ख़्वाहिशें मेरी अपनी हैं,
कुछ अनकही, कुछ अनजानी,
पूरी हों या अधूरी रहें,
इनसे ही तो है मेरी कहानी।
✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )