रविवार, अक्टूबर 18, 2026

🌟 भाग्य और कर्म 🌟









भाग्य और कर्म दोनों हैं जीवन के दो महत्वपूर्ण छोर, 

एक है बंद खिड़की जैसी, दूजा खींचे उजाले की ओर। 

कहते हैं जो लिखा भाग्य में, वो तो आगे आएगा, 

पर बिना कर्म के मानव बोलो, कैसे उसे सजाएगा ? 


भाग्य अगर एक बीज सरीखा, मिट्टी में सो जाता है, 

कर्म निरंतर खाद-पानी बन, उसमें प्राण जगाता है। 

हथेली की ये रेखाएं भी, श्रम करने से मुड़ती हैं, 

कर्म की सच्ची उड़ानों से ही, किस्मत ऊंचे उड़ती हैं। 


बैठ भरोसे भाग्य के जो, बस वक्त गंवाया करते हैं, 

मंजिल की राहों में वे तो, पीछे ही रह जाते हैं। 

जो पुरुषार्थ की छेनी लेकर, पत्थर को भी ढालते हैं, 

वे अपने हाथों से अपनी, नई तकदीर बना लेते हैं। 


भाग्य केवल अवसर देता है, कर्म उसे भुनाता है, 

कर्मठ इंसान ही जग में, असली आदर पाता है। 

दोनों का यह अटूट रिश्ता, जीवन को गति देता है, 

कर्म करे जो निष्ठा से, भाग्य उसी का साथ देता है।


✍️ श्रीजी जैन ( शाहदरा, दिल्ली )

👩‍💼 लाडली बेटी 👩‍💼








जैसे बंजर हो चुकी भूमि में 

फसलों की हरियाली छाई 

घर की रौनक लाडली बेटी 

जब गोद में मेरी तुम आई 


 देखा जब पहली बार तुझे 

 चूमा जब पहली बार तुझे

 तेरी नन्ही-नन्ही अंखियों में 

 दिखा सारा संसार मुझे

 खुशियां आंखों में भर आई

 जब गोद में मेरी तुम आई 


तेरा वह ठुमक ठुमक चलना 

कभी गिरना और फिसल पड़ना 

मेरी बाहों में तू झूल गई 

मैं सारी दुनिया भूल गई 

ममता आंखों में सिमट आई 

जब गोद में मेरी तुम आई 


 कंधे पर पापा के खड़ी हुई 

 बोली पापा मैं बड़ी हुई

 कब मेरा ब्याह रचाओगे 

 कब मेरा गुड्डा लाओगे 

 तेरी इन भोली बातों पर 

 पापा की अखियां मुस्काई 

 जब गोद में मेरी तुम आई 


 जाने कब वक्त निकल गया 

 मानो मुट्ठी से फिसल गया

 हो गई सयानी तू गुड़िया 

 जाएगी अपने घर बिटिया

 यह सोच के ऑंखें भर आई 

 जब गोद में मेरी तुम आई 


 पापा की परी ससुराल चली

 मां के सपनों को संभाल चली

 ममता का आंचल छोड़ चली 

 सूनी कर गई अम्मा की गली

 ससुराल में तू ही तू छाई 

 जब गोद में मेरी तुम आई 


 मेरा मान है तू सम्मान है तू 

 मेरे जीवन का अभिमान है तू 

 मेरी सांसें है मेरे प्राण है तू 

 मेरी खुशियां है मेरी जान है तू

 मेरे होठों की मुस्कान है तू

 ईश्वर का दिया वरदान है तू 

 इस दिल को तू ही तू भाई

 जब गोद में मेरी तुम आई


✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )

🌿 भाग्य और कर्म का रिश्ता 🌿

भाग्य और कर्म के रिश्ते पर बात करनी है तो मुझे अपने साथ घटी एक घटना याद आती है। पर उस घटना से पहले, इस रिश्ते पर मेरे विचार क्या हैं, यह बताना जरूरी है।

मेरे मतानुसार भाग्य और कर्म के बीच बहुत गहरा नाता है। यदि ये दोनों साथ हों, तभी आपका कोई काम पूरा होता है।

शायद यह बात इतने छोटे वाक्य में समझ न आए, तो विस्तार से कहती हूँ। आप किसी चीज़ को पाने के इच्छुक हैं और आप अपनी ओर से पूरा कर्म कर रहे हैं, पर वह चीज़ आपके भाग्य में नही है, तो वह आपको नहीं मिलेगी। वहीं कोई चीज़ अगर आपके भाग्य में है और आपने उसके लिए थोड़ी सी मेहनत कर दी, तो वह आपको जरूर मिलेगी। पर ऐसा भी नही है कि आप इच्छा रखकर केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहें और वह चीज़ आपको मिल जाए। यही कर्म और भाग्य के रिश्ते का सच है।

अब उस घटना की बात करती हूँ, जिसमें भाग्य और कर्म का यह रिश्ता साफ-साफ दिखता है।

बात सन 2013 की है। ITI पूरा करने के बाद मैंने Polytechnic का फॉर्म भरा। प्रवेश परीक्षा प्रदेश में 17वें स्थान के साथ पास की। पर काउंसलिंग में कुछ ऐसा हुआ कि प्रक्रिया पूरी नही हो सकी। भाग्य ने जैसे संकेत दे दिया था कि यह मेरे लिए नही है। उस साल मैंने कुछ नही किया, पर अगले साल फिर फॉर्म भर दिया।

इस बार काउंसलिंग भी हो गई, पर जो कॉलेज मिला उसकी दशा देखकर पिताजी वहाँ भेजने के लिए तैयार नही थे। फिर मैंने एक निजी कॉलेज में प्रवेश ले लिया। जैसा मैंने पहले कहा, पॉलिटेक्निक शायद मेरे भाग्य में नही था। ITI होने के कारण द्वितीय वर्ष में सीधा प्रवेश मिला और द्वितीय वर्ष अच्छे अंकों से पूरा भी हो गया।

पर अंतिम वर्ष में पूरी मेहनत से पढ़ाई की और प्रदेश में टॉप करने की आशा थी। तभी परीक्षा से चार दिन पहले मेरा स्वास्थ्य खराब हो गया और मैं परीक्षा नही दे सकी, जिसके कारण पॉलिटेक्निक अधूरा रह गया और एक प्रतिष्ठित कंपनी में मिलती हुई नौकरी हाथ से रेत की तरह फिसल गई।

तब समझ आया - मैंने कर्म में कोई कमी नही छोड़ी थी, पर भाग्य साथ नही था। और बिना भाग्य के कर्म भी अधूरा रह जाता है। इसीलिए भाग्य-कर्म का रिश्ता अटूट और अनोखा माना जाता है।


✍️ श्रेया जोशी 'कल्याणी' ( वाराणसी, उत्तर प्रदेश )

📜 कागज-कलम का रिश्ता 🖋️









कोरे कागज पर चलकर,

कलम रचना बनाती है।

इस तरह साथी बनकर कलम,

कागज के साथ रिश्ता निभाती है। 


एक दूसरे में ही है इनका वज़ूद

हर रचना में दोनों का संग रहता मौजूद 

दोनों मिलकर कल्पना को शब्दों में सजा देते हैं

और रचनाकार के विचारों को अमर बना देते हैं


अगर कलम, कागज पर न चले तो,

कागज पर उदासी छाने लगती है। 

कलम को भी कागज का साथ ना मिले तो,

कलम को भी दुनिया अधूरी लगने लगती है।


ऐसे में दोनों एक-दूसरे को,

समझकर आगे बढ़ते जाते हैं।

और रचनाकार के बिखरे ख़्वाबों को,

अपने प्रयासों से समेटते चले जाते है।


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

शनिवार, अक्टूबर 17, 2026

📜 कागज़-कलम वार्ता 🖋️












कागज़ ने कलम से कहा, “तुम मन की आवाज़,
मैं मौन साधना में लिपटा, तुम शब्दों का साज़।

तुम बूँद विचारों की हो, मैं धरती का वक्ष,
मिलकर हम रचते यहाँ, नवयुग का प्रत्यक्ष।

तुम लिखती हो क्रांति तो, मैं सहता हूँ घाव,
तुम लिखती हो प्रेम तो, महक उठे हर गाँव।

तुम बन जाती न्याय जब, मैं बनता अभिलेख,
झूठ खड़ा थरथर करे, पढ़कर सत्य-विवेक।

पर सुनना मेरी कलम, मत बिकना दरबार,
सत्ता के सम्मोहन में मत करना व्यापार।

स्याही केवल रंग नही, अंतरात्मा का नीर,
शब्द वही जो बाँट दें, पीड़ित जन को धीर।

 ✍️ अनीता मिश्रा सिद्धि ( पटना, बिहार )

🌼 अक्षर-अक्षर दीप जलाए 🌼









तिमिर-चीर जो राह दिखाए,

अक्षर-अक्षर दीप जलाए।

तम के घनघोर प्रपात बीच,

नव-चेतना का मन्त्र सुनाए॥


अज्ञानता की इस रजनी में,

ज्ञान-मूर्च्छित थी हर वाणी।

चरणों में बैठ समर्पण के,

सीखी हमने पावन बानी॥

स्नेह-सलिल सा वह बहता है,

पथिक को जो मंजिल बतलाए।

अक्षर-अक्षर दीप जलाए॥


घट-घट के भीतर अविद्या का,

जो आवरण घना छाया था।

करुणा-कर से प्रज्ञा का उसने,

अमित उजास दिखाया था॥

वह कुम्हार सा गढ़ता मिट्टी,

जीवन को अनुपम रूप बनाए।

अक्षर-अक्षर दीप जलाए॥


वह पारस है, जो लोहे को,

कंचन सा पावन करता है।

हर शिष्य के उर के तम को,

वह सहज भाव से हरता है॥

नित प्रेरणा की पावन धारा,

मन-मन्दिर में जो महकाए।

अक्षर-अक्षर दीप जलाए॥


ब्रज की पावन रज से सजकर,

झारखण्ड की इस वसुधा पर।

संस्कृत की अलख जगाई है,

ज्ञान-दीप जलाया घर-घर॥

ऋषि-मुनियों की इस विरासत को,

हर मानस तक पहुँचाई है।

देववाणी की इस पावन धारा से,

नया भविष्य सँवर जाए।

अक्षर-अक्षर दीप जलाए॥


तपस्या की उस मूरत से,

हमने जीने का ढंग सीखा।

कठिन राहों के हर संकट को,

हँसकर आगे बढ़ना सीखा॥

वह साधना का सम्बल बनकर,

जीवन को सार्थक कर जाए।

अक्षर-अक्षर दीप जलाए॥


नित साधना और निष्ठा की,

ऐसी वह अमर कहानी है।

गुरु चरणों की धूलि जग में,

गंगा-जल सी कल्याणी है॥

कहते 'भूपेन्द्र' यही जीवन का,

ऋण कोई कैसे चुका पाए ?

अक्षर-अक्षर दीप जलाए॥ 


✍️ डॉ० भूपेन्द्र कुमार गौतम

      ( रामगढ़, झारखण्ड )

💠 सच्ची दोस्ती 💠

दोस्ती मानव जीवन के सबसे महत्वपूर्ण रिश्तों में  से एक है जो विश्वास और आपसी समझ पर आधारित है दोस्ती का रिश्ता हम खुद चुनते हैं। सच्ची दोस्ती हमें जीवन के कठिन रास्तों को पार करवाने में सक्षम बनाती है। सच्चा दोस्त हमारे मुश्किल समय में हमारा सहारा बनता है।

सच्ची दोस्ती में स्वार्थ नही होता। सच्चा दोस्त हमे गलत रास्ते पर चलने से रोकता है। उसके साथ हम अपने मन की उलझन साझा कर सकते हैं। वह हमारे जीवन में रंग भर देता है सच्चा दोस्त हमारी अनमोल पूंजी है। हमें हमेशा आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहता है। हमारे जीवन के सफर को आसान बना देता है। सच्ची दोस्ती सकारात्मक ऊर्जा देती है। भावनात्मक सुरक्षा देती है। दोस्ती एक विश्वसनीय पौधे की तरह है जिसे ईमानदारी और आदर से सींचना पड़ता है। सच्ची दोस्ती का रिश्ता जीवन पर्यंत रहता है। इस रिश्ते की कदर करनी चाहिए। सच्चे दोस्त हमारे व्यक्तित्व को निखारने में लगे रहते हैं।

जीवन की हर परिस्तिथियों में हमारे साथ रहते हैं। इस रिश्ते में संतुलन बनाए रखना चाहिए। सच्ची दोस्ती को आपसी समझ संतोष और विश्वास की आवश्यकता होती है। यह रिश्ता किसी भी बंधन से पूरी तरह से मुक्त होता है। सच्चा दोस्त मजबूत सहारा होता है। सच्ची दोस्ती समय के साथ और अधिक घनिष्ठ होती जाती है। सच्ची दोस्ती एक अनमोल उपहार है। इसे सहेज कर रखना चाहिए।

✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

🌟 भाग्य और कर्म 🌟

भाग्य और कर्म दोनों हैं जीवन के दो महत्वपूर्ण छोर,  एक है बंद खिड़की जैसी, दूजा खींचे उजाले की ओर।  कहते हैं जो लिखा भाग्य में, वो तो आगे आए...