मैं अभी इस दुनिया में आई नही हूँ,
फिर मुझसे कैसी नाराज़गी है ?
मैं तो बस एक नन्ही-सी जान हूँ,
फिर मेरी साँसों से कैसी दुश्मनी है ?
माँ, तेरी कोख में पल रही हूँ,
तेरे आँचल का सपना देख रही हूँ,
बाबुल की उँगली थामकर चलने का,
मैं भी तो एक सपना देख रही हूँ।
क्यों कहते हो बेटी बोझ होती है ?
क्यों उसकी किस्मत पहले लिख देते हो ?
जिस बेटी को जन्म से पहले मिटा देते हो,
उसी बेटी के लिए बाद में देवी के दीप जलाते हो।
बेटी ही तो घर में खुशियाँ लाती है,
बेटी ही रिश्तों को प्यार सिखाती है,
बेटी ही एक दिन माँ बनकर,
नई पीढ़ी को जन्म देती है।
मुझे जन्म लेने दो,
मुझे साँस लेने दो,
मैं बोझ नही, एक अवसर हूँ,
मुझे अपने सपनों के साथ जीने दो।
किसी की कोख फिर सूनी न हो,
किसी माँ की आँख नम न हो,
बेटी को जन्म से पहले मारने की
यह क्रूर सोच अब खत्म हो।
बेटी को बचाइए,
उसे पढ़ाइए, आगे बढ़ाइए,
क्योंकि बेटी केवल घर की नही,
पूरे समाज की ताकत है।
✍️ शिखा चंदेल ( देहरादून, उत्तराखंड )






