सोमवार, अक्टूबर 12, 2026

💞 तेरा-मेरा अनमोल …रिश्ता 💞








तेरा-मेरा रिश्ता बड़ा अनमोल मैंने पाया है,

आज बरसों के बाद फिर ख्याल आया है,

मेरी जिंदगी में बहुत से दुखों का साया है,

इस दिल ने सनम फिर तुझे पुकारा है।


है माना मैंने तुझ पर सितम किए हैं कई,

मेरी जान तेरा-मेरा रिश्ता बड़ा अनमोल मैंने पाया है।

आज बरसों के बाद फिर ख्याल आया है,

इस दिल ने सनम फिर तुझे पुकारा है।


जिम्मेदारी का फर्ज ऐसा मैंने कुछ निभाया है,

ना वक्त दिया तुझको ना बच्चों से लाड-लडाया है।

दूर रहकर भी तेरा-मेरा रिश्ता देख कितना प्यारा है,

इस दिल ने सनम फिर तुझे पुकारा है।


मेरे घर में न होने पर भी तूने मेरा घर संभाला है,

मेरे मां-बाप भाई-बहन का तू ही तो अब वहां सहारा है।

सच्चे बंधन में बंधा तेरा-मेरा रिश्ता सबसे न्यारा है,

आज बरसों के बाद फिर ख्याल आया है,

इस दिल ने सनम फिर तुझे पुकारा है।


अर्धांगिनी के रूप में मैंने तो कोहिनूर पाया है,

इस दिल ने सनम तुझको हर पल पुकारा है।

जब साथी-संगी कोई ना काम आया है,

जब-जब गिरा ज़मीं पर तूने ही दिया सहारा है।


सात जन्मों की डोर से जुड़ा तेरा-मेरा रिश्ता सबसे न्यारा है,

तुझको देखूं मैं जब-जब ये दिल तड़पता बेचारा है।

आज बरसों के बाद फिर ख्याल आया है,

इस दिल ने सनम तुझको प्रतिपल पुकारा है।


✍️ अभिषेक सिंह कुशवाहा "अनभिज्ञ" ( पीलीभीत, उत्तर प्रदेश )

🙍‍♀️ डर पर विजय 🙍‍♀️

लाल जोड़े और सोलह श्रृंगार में सुसज्जित कुमुद किसी परी की भांति लग रही थी।

अभी-अभी ननदों ने उसे कमरे में लाकर बिठाया था।

और कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर के चली गई थी... 

उन्नीस वर्ष की कुमुद का‌ ब्याह अपने से दस वर्षीय बड़े लड़के रवि के साथ हुआ था।

ब्याह के रस्मों और रिवाजों के दरम्यान कुमुद ने एक बार भी रवि का चेहरा नही देखा था।

शर्म और लिहाज से पलकें झुकाए कुमुद ने ब्याह के सारे रस्म पूरे किए थे... 

एक अजनबी के साथ अकेले कमरे में... 

ये सोचकर ही कुमुद के हृदय की धड़कनें बेतहाशा धड़कने लगी.. 

मन में आशंका गहराने लगी थी कि जाने रवि का व्यवहार कैसा होगा.. 

कुमुद के मन में अनेकों विचार उमड़ रहे थे... 

वैवाहिक कार्यक्रमों के बीच एक पल को भी आराम नही करने के कारण कुमुद का पूरा शरीर थकान से टूट रहा था।

विचारों के अंधड़ में डूबते-उभरते जाने कब वो गहरी नींद में चली गई।

रात के कोई साढ़े बारह बजे उसे अपनी गर्दन के पास किसी के सांसों की आहट महसूस हुई... 

वो सांसें इतनी सर्द थी कि, उसके पूरे शरीर में सिरहन सी दौड़ गई.. 

कुमुद आंखें खोलना चाहती थी मगर खोल नही पाई... 

नींद में पूरा शरीर शिथिल पड़ रहा था.. 

तभी उस साए ने अपने तपते हुए होंठ कुमुद के कोमल कपोलों पर रख दिये और अपने सख्त हाथों को उसके नरम पीठ पर घुमाने लगा... 

डर और आशंका से भयभीत किसी हिरणी की भांति कुमुद कसमसा उठी... 

वो उठना तो चाह रही थी मगर उठ नही पा रही थी.. 

निद्रा और जागरण के बीच के अचेतावस्था में कुमुद बेबस लाचार सी कराह उठी.. 

उसने पूरी शक्ति से चीखना चाहा मगर आवाज गले में घुट कर रह गई... 

तभी दरवाजे की कुंडी बजी और रवि ने कमरे में प्रवेश किया... 

वो अनजाना साया कुमुद को छोड़ कर अंधेरे में गायब हो गया... 

डर और आत्मग्लानि से कुमुद का चेहरा काला पड़ा हुआ था.. 

वो दौड़ कर रवि से लिपट गई।

आप अभी आ रहे हैं तो फिर वो कौन था ??? 

रवि आश्चर्य से कुमुद को देखता रह गया.. 

कौन ?? तुम किसकी बात कर रही हो ?? मैं तो अभी आ रहा हूँ ... 

तुम्हें पता था ना कि मैं आज दोस्त के विवाह में चला गया था... 

डर से कांपती हुई कुमुद को संभालते हुए रवि ने कहा - मुझे पूरी बात बताओ.. 

कुमुद ने कांपती आवाज में सारा सच बता दिया... 

कैसे एक अनजाने साए ने उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की.... 

रवि के चेहरे पर चिंता की रेखाएं परिलक्षित होने लगीं... 

उसने कुमुद को कसकर अपनी बाहों में भर लिया... 

भोर के धुंधलके के साथ कुमुद नहा धोकर नये कपड़े पहन कर तैयार हो गई... 

आज उसकी पहली रसोई थी इसलिए घर में खूब सारी तैयारियां भी हो रही थीं... 

रात में हुए हादसे से वो अभी भी डरी हुई थी... 

ऊपर से रवि का रवैया.. 

उसने इस विषय में कुछ कहा भी नही... 

कहीं उसे उस साए के बारे में पहले से पता तो नही... 

कुमुद सोच में डूबी हुई थी कि ये बात घरवालों को बताए कि नही... 

तभी उसके कानों में किसी की सर्द मगर भयावह आवाज आई.. 

अगर तूने घरवालों से कुछ भी कहा तो मैं तुझे और तेरे परिवार को बरबाद कर दूंगा.. 

कुमुद के पूरे शरीर में झुरझुरी सी होने लगी.. 

डर से थरथराती हुई वो हर ओर उस साए को तलाशने लगी मगर उसे वो कहीं भी नही दिखा... 

रात की बात को लेकर रवि भी काफी चिंतित लग रहा था... 

आखिर वो साया है कौन ?? 

और नयी दुल्हन के साथ ऐसा क्यों किया उसने ?? 

रवि ने पहले भी सुन रखा था कि उसके घर में जो भी नयी दुल्हन आती है तो कोई साया उनकी इज्जत लूटने की कोशिश करता है।

कुमुद के लिए ससुराल में एक एक क्षण नरकीय हो चुका था... 

रवि जब तक उसके साथ रहता तब तक तो‌ वो साया उससे दूर रहता परंतु जैसे ही कुमुद को अकेला पाता वो उसके साथ दरिंदगी की सारी सीमाएं पार कर जाता... 

अभी-अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाली एक मासुम सी लड़की पर भी उसे थोड़ी सी भी रहम नही आती थी... 

कुमुद की हालत दिनों-दिन बिगड़ती जा रही थी... 

रवि और उसके परिवार वाले बहू की इस स्थिति से बेहद चिंतित और दुःखी थे।

बड़ी मुश्किल से वो एक तंत्र मंत्र के विख्यात साधक,

पंच महाविद्यायों के ज्ञाता स्वामी देवीदयाल जी के पास पहुंचे...

चेहरे पर अद्भुत तेज... 

बड़ी-बड़ी आंखें... 

लंबी और काली जटाएं... 

उस दिव्य स्वरूप वाले साधक को और भी दिव्यता प्रदान कर रहे थे।

कुमुद जब उनके सामने पहुंची तो उनके चरणों में गिर कर रोते हुए बोल पड़ी - स्वामी जी !! मुझे बचा लिजीए... 

अब इस बेटी की लाज आपके हाथों में है।

स्वामी जी ने उसे सांत्वना देते हुए कहा - बेटी !! उठो हम स्त्रियों से पांव नही छुआते हैं।

धीरज रखो सब ठीक हो‌ जाएगा।

उस आत्मा ने तुम्हें बहुत रूला लिया अब उसके रोने का समय आ चुका है।

कुमुद आश्चर्यचकित हो कर स्वामी जी का चेहरा देखने लगी।

स्वामी जी उसके मन की आशंका को भांप गये और बोले- मुझे सब पता है।

तुम्हारे साथ क्या-क्या हो रहा है और कौन कर रहा है... 

बस थोड़ी हिम्मत और थोड़ा धीरज रखो बेटी।

सब ठीक हो जाएगा।

उस आत्मा को हम तुम्हारी जिंदगी से सदा-सदा के लिए दूर कर देंगे।

स्वामी जी ने उसके पूरे शरीर को अपनी दिव्य शक्ति से बांध दिया और बोले - अब वो आत्मा चाह कर भी तुम्हारे पास नही आ पाएगी।

कुमुद सपरिवार घर लौट आई... 

और कुछ महीनों तक चैन और सुकून से रही... 

मगर वो साया इतनी सरलता से उसका पीछा छोड़ने को तैयार नही था... 

एक दिन फिर से कुमुद को अकेला पाकर वो उस पर हावी हो गया।

कुमुद के गले को अपने हाथों से दबाते हुए भयानक रूप ले कर बोला - मुझे दूर करेगी तू.. 

नही छोड़ूंगा मैं तुझे... 

मुझे तेरा ये शरीर बहुत भाता है। मेरी प्यासी आत्मा का ये बसेरा है तू इसे छीनेगी मुझसे.... 

मैं बहुत दिनों से प्यासा हूँ तेरी इस देह का.. 

आज मैं अपनी प्यास बुझाऊंगा.. 

कुमुद ने अपनी पूरी शक्ति के साथ अपने गले को छुड़ाने का प्रयास किया... 

पूरी शक्ति से उससे दूर छिटक कर जा खड़ी हुई और टेबल पर रखा चाकू उठाते हुए बोली - तुझे मेरा शरीर चाहिए ना ?? आज मैं इस शरीर को ही खत्म कर दूंगी। उस वजह को ही मिटा डालूंगी जिसके कारण मुझे इस डर और आत्मग्लानि के साए में जीना पड़ रहा है।

इस कलंक को सदा-सदा के लिए मिटा डालूंगी... अगर तू सच में मर्द का बच्चा है तो चला जा मुझे छोड़ कर या मैं स्वयं चली जाऊंगी... 

कुमुद की चीख-पुकार सुनकर घरवाले दौड़े-दौड़े आए.. 

आज उसका रौद्र रूप देख कर किसी की हिम्मत ना हुई कि उसे रोक सके।

आनन-फानन में स्वामी जी को बुलाया गया और उन्होंने कुमुद को एक दिव्य भभूत दिया जो अदृश्य आत्माओं को मारने में सक्षम था... 

चूंकि वो कामुक आत्मा कुमुद को स्पष्ट रूप से दिख रही थी इसलिए उसने डर के बीच भी पूरी हिम्मत जुटाकर उस पर वो भभूत फेंक दिया... 

अब देखते ही देखते वो कामुक आत्मा बेबस और लाचार हो कर कुमुद को छोड़ कर जाने लगी.. 

स्वामी जी ने तत्काल उसे अपने नियंत्रण में ले लिया... 

इस तरह एक कोमल सी दिखने वाली कुमुद ने अपने डर पर विजय प्राप्त करते हुए एक बहुत बड़ी और बुरी शक्ति को सदा के लिए हरा दिया।


✍️ डोली पाठक ( पटना, बिहार )

🍁 नसीब भी खुद बनाया जा सकता है 🍁








मेहनत को आदत बनाकर,

नसीब खुद लिखा जा सकता है।

बदलते युग में थोड़ी हिम्मत से,

यह करिश्मा कोई भी दिखा सकता है।


सबका नसीब अपना-अपना होता है,

किसी के नसीब में खोना होता है।

किसी के नसीब में पाना होता है,

किसी को नसीब खुद बनाना होता है।


याद रखना ! रास्तों की मुश्किलों से घबराकर,

लक्ष्य को कभी नही पाया जा सकता है।

जो-हो कर्मों से मंजिल पाने को आतुर,

तो नसीब को भी झुकाया जा सकता है।


बुलंद हौंसलो से मंजिल को पाया जाता है,

नसीब के इम्तेहां को आजमाया जाता है।

घोड़े बेचकर सोये नसीब को अक्सर,

कर्म की लाठी मार-मार जगाया जाता है।


कर्मठता, जूनून, दृढ़ निश्चय,

सकारात्मक सोच के साथ,

इरादे अगर नेक हो तो,

कुछ भी पाया जा सकता है।

कोशिश पे कोशिश करके,

नसीब भी खुद बनाया जा सकता है।


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

✨ नसीब ✨








जिसके नसीब में जो होता,

वही उसके हिस्से आता,

किसी के हिस्से में रोशनी,

तो किसी के हिस्से अँधियारा छाता।


कौन बड़ा, कौन छोटा है,

कहना इतना आसान नही,

नसीब की अपनी राह सही,

पर कर्मों से बढ़कर कुछ नही।


मेरे नसीब में क्या लिखा है,

यह तो खुदा ही जानता है,

जिसने मेरा भाग्य लिखा,

वही उसका राज़ जानता है।


अच्छी बनने की कोशिश की,

फिर भी नसीब बुरा रहा,

दिल से जिंदादिली अपनाई,

पर वक्त मेरे खिलाफ रहा।


मेरा हर सपना अधूरा रहा,

शायद यही मेरा नसीब था,

आँखों में पलते अरमानों का

जैसे टूटना ही नसीब था।


इस जन्म में मिले जो दर्द,

शायद कर्मों का हिसाब हैं,

मन में उठते कई सवालों के

कहाँ कोई सीधे जवाब हैं ?


कभी-कभी मन कहता है —

कर्मों से नसीब बदल दूँगी,

ठोकर चाहे जितनी मिले,

फिर भी राह नई चुन लूँगी।


सतत प्रयत्नशील रहकर मैं,

उद्यमी बनती चली गई,

पूरा न सही, थोड़ा-सा ही,

तकदीर बदलती चली गई।


शायद वह छोटा-सा बदलाव भी,

मेरे नसीब में लिखा था,

मेरी मेहनत, मेरा हौसला —

शायद यही मेरा नसीब था।


सत्य यही है— जिसके हिस्से,

जो लिखा, वही सामने आया,

किसी के आँगन बहार उतरी,

किसी के हिस्से जाम आया।


पर नसीब की राहों में भी,

कर्मों का दीप जलाना है,

जो लिखा है, उसे स्वीकार कर,

जो बदला जा सके, वह बदलते जाना है।


✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

शनिवार, अक्टूबर 10, 2026

🙍‍♀️ नारी की आवाज 🙍‍♀️








दृढ़ प्रतिज्ञा और परिश्रम से विश्व में नाम कमाया है 

स्वर्ण पदक लाकर के जीवन सफल बनाया है, 

जो हमसे टकराया है वह आजीवन पछताया है, 

नारी शक्ति को कम मत समझो,

जिसने हर क्षेत्र में आज कदम बढ़ाया है।


रानी लक्ष्मी बनकर हमने रण कौशल दिखलाया था, 

कंधे पर पुत्र को बांध अंग्रेज मार भगाए थे,

सती सावित्री बनकर तीन वरदान मांग लिए, 

यमराज को भी किया विवश सत्यवान के प्राण बचाए थे।


कल्पना चावला बनकर अंतरिक्ष तक अपने कदम बढ़ाया था, 

मीरा चानू बनकर ओलंपिक में पदक दिलाया था,

एशियन गेम्स में सफलता का परचम हमने लहराया है, 

पदक पाकर विजय दिलाई राष्ट्रीय ध्वज लहराया है, 

राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का सम्मान बढ़ाया है।


वैज्ञानिक आविष्कारों को हमने जन-जन तक पहुंचाया है,

मां पत्नी बेटी बहन बनकर सारे रिश्तों को खूब निभाया है,

त्याग और कठिन परिश्रम से प्यारा घर संसार बसाया है।


शिक्षिका बनकर अज्ञान तिमिर को दूर भगाया है, 

चिकित्सिका के रूप में लोगों को कष्टों से मुक्त कराया है, 

विश्व के हर क्षेत्र में हमने आज कदम से कदम मिलाया है,

नारी को अबला मत मानो, 

वायुयान और वंदे भारत पर अपना अधिकार जमाया है।


✍️ वसुधा श्रीवास्तव ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

❤️ जज़्बात ❤️








समेट कर रख दिए 


आज मैंने 


सारे जज़्बात 


कोने में,


इश्क़ था 


तो बता देते 


बहुत देर कर दी 


मेरा होने में,


मसले ही 


कुछ ऐसे रहे हैं 


बैचेनी 


बढ़ती रही ताउम्र,


समय बहुत लगता है 


हर रोज 


नींद को ख़्वाब बोने में।


✍️ डॉ० सोहन पाल 'मज़ार' (मुज़फ़्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश)

🌟 प्यारे बापू 🌟








साबरमती का संत निराला,

चलाई उसने ऐसी आंधी।

चारो ओर था एक ही शोर,

मोहन दास करमचंद गाँधी।


सत्य भरा, सादा जीवन,

भारतीयों को भाया था।

बिन खून खराबे के उसने,

देश आजाद कराया था।


फूँक बिगुल आजादी का,

अहिंसा की राह चला था।

हिन्दू मुस्लिम, सिक्ख ईसाई,

इसके हर कोई संग चला था।


दुबली काया, क्या कर सकती,

उसने दुनिया को दिखा दिया।

एक धोती एक लाठी के बल,

अंग्रेजी शासन को हिला दिया।


राष्ट्र पिता उन्हें नाम मिला था,

हम सब के प्यारे बापू थे।

संत, महात्मा भी कहलाते,

ऐसे हमारे प्यारे बापू थे।


✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )

💞 तेरा-मेरा अनमोल …रिश्ता 💞

तेरा-मेरा रिश्ता बड़ा अनमोल मैंने पाया है, आज बरसों के बाद फिर ख्याल आया है, मेरी जिंदगी में बहुत से दुखों का साया है, इस दिल ने सनम फिर तुझे...