पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा शब्दों के महत्व तथा विशेषता को दर्शाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन ‘शब्द मंथन साहित्यिक महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को दस अलग-अलग शब्दों को विषयों के विकल्प के तौर पर देकर उनमें से किसी भी एक विषय का चयन करके चयनित विषय पर आधारित रचना लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। महोत्सव में सम्मिलित प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन 'पुनीत शब्द शिल्पी' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने शब्दों के महत्व तथा विशेषता के बारे में बताते हुए लोगों को शब्दों का संभलकर व उचित प्रयोग करने की सलाह दी और महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया तथा सम्मान पाने वाली सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन साहित्यिक कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए प्रतिभाशाली रचनाकारों को सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम रत्ना वाधवानी, भारती राय, अमोल बारई 'कविमोल’, शशि गौतम, महेंद्र महावर रचनाकारों के रहे।
Puneet Anupam Group
रचनाकारों, कलाकारों, प्रतिभाशाली लोगों और उत्कृष्ट कार्य करने वाली शख्सियतों को प्रोत्साहित करने का विशेष मंच।
शनिवार, अक्टूबर 31, 2026
बुधवार, अक्टूबर 28, 2026
🌿 कुदरत का इशारा 🌿
पल भर में कुदरत ने
अपनी ताकत का एहसास करा डाला
इंसान को उसकी औकात का
आईना दिखा डाला
बड़े-बड़े महलों और इमारतों को
मिट्टी में मिला डाला
दौलत, शोहरत और ताकत का
सारा गुरूर मिटा डाला
नेपाल की धरती हो
हिमाचल की वादियाँ हों
या जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियाँ
कहीं बादल फटे
कहीं सैलाब आया
कहीं पहाड़ दरके
कहीं अपनों ने अपनों को खोया
किसी का घर उजड़ गया
किसी का संसार बह गया
कोई अपने सपनों को ढूँढ़ रहा है
कोई अपनों को ढूँढ़ रहा है
कोई ज़िंदगी बचाने के लिए
मौत से लड़ रहा है
जिस दौलत और शोहरत पर
इंसान को था गुरूर
कुदरत की एक करवट ने
कर दिया उसे चूर-चूर
फिरते थे जो ताकत के नशे में
उन्हें पल भर में बेबस बना डाला
जो खुद को समझते थे मालिक
उन्हें कुदरत ने अपनी
ताकत का एहसास करा डाला
फिर भी अफसोस
सब कुछ अपनी आँखों से देखकर
कोई आपदा में भी अवसर ढूँढ़ रहा है
और अपनी गलतियों का दोष
अब भी दूसरों को दे रहा है
कुदरत ने बार-बार चेताया था
मुझसे यूँ खिलवाड़ मत कर
तरक़्की की अंधी दौड़ में
अपनी ज़िंदगी को
कमज़ोर मत कर
कभी पहाड़ों को काटा
कभी जंगलों को उजाड़ा
कभी नदियों का रास्ता रोका
अपने स्वार्थ के लिए
कुदरत का संतुलन बिगाड़ा
तरक़्की के नशे में
इंसान इतना आगे बढ़ गया
कि जिस धरती ने जीवन दिया
उसी को घायल कर गया
ज़रा ठहरो
सोचो तो सही
किसके लिए ये महल हैं
अगर सुरक्षित ज़मीन ही न रहे
किसके लिए ये दौलत है
अगर साँस लेने को
साफ हवा ही न रहे
नदियाँ सिर्फ पानी नही
पहाड़ सिर्फ़ पत्थर नही
जंगल सिर्फ पेड़ नही
ये हमारी ज़िंदगी की
बुनियाद हैं
कुदरत हमारी जागीर नही
हमारी ज़िम्मेदारी है
धरती हमारी संपत्ति नही
आने वाली पीढ़ियों की अमानत है
अब भी वक़्त है
सुधर जा ऐ इंसान
कुदरत के निज़ाम का सम्मान कर
तरक़्की कर
मगर कुदरत को साथ लेकर
शहर बसा
मगर नदियों का रास्ता बचाकर
सड़कें बना
मगर पहाड़ों का दर्द समझकर
पेड़ों को मत काट
नदियों को मत बाँध
धरती को मत लूट
क्योंकि जिस दिन
कुदरत ने हिसाब माँग लिया
तब इंसान के पास
कोई जवाब नहीं होगा
कुदरत से जंग मत कर
उसके साथ जीना सीख
नेपाल से लेकर
हिमाचल तक
जम्मू-कश्मीर से लेकर
दुनिया के हर कोने तक
कुदरत का हर इशारा
हमें एक ही बात समझाता है
तरक़्की की अंधी दौड़ में
उसे पीछे मत छोड़
अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए
एक सुरक्षित धरती छोड़
महल फिर बनाए जा सकते हैं
लेकिन जो जीवन चला गया
वह लौटकर नही आता
इसलिए अभी भी समय है
नदियों को साँस लेने दो
पहाड़ों को खड़ा रहने दो
जंगलों को फिर से उगने दो
धरती को थोड़ा आराम करने दो
अब भी वक़्त है
सुधर जा ऐ इंसान
कुदरत के निज़ाम का सम्मान कर
उससे खिलवाड़ नही
उसके साथ चलना सीख
क्योंकि कुदरत जब देती है
तो जीवन देती है
और जब अपना संतुलन खोती है
तो इंसान को उसकी सीमाएँ
याद दिला देती है
आओ, मिलकर प्रण करें
कुदरत का मान करेंगे
धरती की शान करेंगे
इंसानियत को पहचानेंगे
और एक बेहतर दुनिया
का निर्माण करेंगे
यही है कुदरत का इशारा
यही है ज़िंदगी का सहारा।
✍️ शशि गौतम ( सांबा, जम्मू-कश्मीर )
मंगलवार, अक्टूबर 27, 2026
🍁 मेरी खामोशी 🍁
मेरी खामोशी में आवाज हैं,
सुर, लय और साज है।
मेरी खामोशी उदास है,
उसमें दर्द, चुभन से एहसास है।
मेरी खामोशी में कई,
छुपे हुए राज हैं।
बदलते जमाने संग बदले,
मेरे कईं अंदाज हैं।
खामोशी के पीछे जज्बात हैं,
कोई कबाड़ का समान नही।
जुबां रहते हुए खामोश हो जाना,
सबके लिए आसान नही।
मैं नादान हूँ, नादानी कर जाती हूँ,
अक्सर रातों को अपने साये से डर जाती हूँ।
है कोई ऐसा, जो मुझे समझ सके,
जो इस खामोशी के कोलाहल को परख सके।
वैसे खामोश रहकर अब मैंने,
अपना अलग संसार बसा लिया है।
शोर-शराबे, भीड़ के झमेलों से तंग आकर के,
खामोशी और अकेलेपन को अपना लिया है।
✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )
सोमवार, अक्टूबर 26, 2026
🌼 जिंदगी की नई शुरुआत 🌼
😂 हास्य-कविता - कविता पर फिदा एक प्यारी..... 💞
चिपकी रहती इस तरह, जैसे मीठी खाँड,
मेरी कविता सुन रचे, सपनों का ब्रह्मांड।
सपनों का ब्रह्मांड, अरमाँ खूब सुलगाती,
दिल में क्या है बात, मगर ना खुलकर बताती।
उफ्फ समझ न आये, क्या दिल में समाई,
कविता हिट होते ही, आफ़त नई है आई।
आती है वो पास में, जैसे सावन-मेघ,
दिल की बातें रोककर, साधे रहती वेग।
साधे रहती वेग, लजाकर आँख मिलाती,
कभी प्रशंसा की झड़ी, कभी पहेली बुझाती।
कहती, वाह कवि जी वाह ! कमाल लेखनी आपकी,
दिल को मेरे छू गई, ये रचना जनाब की।
पूछूँ, “क्या कुछ बात है ?” कहती, “कुछ भी नही।”
“बस कविता सुनकर उसे, सुध-बुध रहती नही।”
सुध-बुध रहती नही, पर बात समझ ना आए,
कविता का रस चढ़ा या प्रेम-रोग सताए ?
जो कहे, “क्या-बात, क्या-बात, बजता मन में साज़”,
कभी देखकर मुस्काए, लगता कातिलाना अंदाज़।
लगता कातिलाना अंदाज़, जो मोबाइल दिखलाए,
मेरी हर नई पोस्ट पर, कमेंट जरूर चिपकाए।
कहें ‘महेंद्र’ मुस्काए, गज़ब का खेल निराला,
प्रशंसा सुनकर थोड़ी, मैंने व्यर्थ दिल उछाला।
रिश्तों की मर्यादा ने मेरे पैर बाँध रखे हैं ?
बच्चे भी पहरेदार बन, लाठियाँ ताने खड़े हैं ?
लाठियाँ ताने खड़े हैं, इसीलिए मन में डर है,
कवि की लोकप्रियता, यूं होती बेअसर है।
ख़ामोशी के होंठ पर, जैसे अटके हुए पैग़ाम,
लोक-लाज के फेर में वो भी, लेती नही है नाम।
लेती नही है नाम, पर इशारों से समझाती,
दिल की अदालत में, खुद वकील बन जाती।
मैंने पूछा, “साफ कहो, क्या है मन में बात ?”
बोली, “पहले लिखिए, प्रेम-विरह जज्बात।”
प्रेम-विरह जज्बात बाद, फिर लिखवाए दोहे,
कवि-मन सोचें रात भर, बोझिल आँखें रोए।
जो कहे, “वाह कवि जी ! दिल को छू गई बात",
मैं समझूँ कुछ और ही, बिगड़ते फिर हालात।
बिगड़ते फिर हालात, नींद उड़ती जाती,
वो तो सोती चैन से, मेरी ग़ज़ल बन जाती।
उसपर वो कहती, कमाल लेखनी आपकी,
दिल को मेरे छू गई, ये रचना जनाब की।
कभी लगे कि प्रेम है, कभी लगे सम्मान,
कभी लगे साहित्य का बढ़ता हुआ अभियान।
बढ़ता हुआ अभियान, भ्रमों की रेल चलाए,
अपन अर्थ निकालते, वो बस लाइक बढ़ाए।
सारे गड़बड़झाले में हाय ! इतना ही समझ पाया,
कविता की दीवानगी में, खुद को लव-गुरु बनाया।
उसने साफ-साफ कहा, “आपकी लेखनी प्यारी।”
मैंने मन ही मन बना ली प्रेम-कथा हमारी।
कभी फैन बन भारी, कविता बताती प्यारी,
पैसे की तंगी पर छोरी, हिम्मत नही हारी।
कहती खर्च चलाने को, फ्रीलांसिंग से राह बनाऊँ,
जब भी टूटे आस, याद तुम्हारी पाऊँ।
बार-बार मांगू नकद, माफ करो महराज,
संकट में महेंद्र जी, रख्खो मेरी लाज।
रख्खो मेरी लाज, भूल मैं कभी न पाऊं,
जल्दी तुमसे मिलूं, कविता सुनने आऊं।
तो मैंने भी अब ठान ली, पूछूँगा इक बार,
“उधार से है प्यार या कवि से भी सरकार ?”
कवि से भी सरकार, क्या सुनकर वो मुस्काएगी ?
या “कविता अगली मांगकर, कमेंट चिपकाएगी ?”
चिपक-चिपक कर करे, वो मुझको हलकान,
प्रेम समझ बैठूँ मगर, ना निकले साहित्य-ज्ञान।
ना निकले साहित्य-ज्ञान, तो यही निष्कर्ष हमारा,
कविता की प्रशंसा सुन, क्यूँ दांव पर दिल बेचारा ?
कहें ‘महेंद्र’ मुस्काए, तुम मत करना इस पाप को,
वरना आशिकी जेल भिजवाएगी, दो बच्चों के बाप को।
✍️ महेंद्र महावर ( काठमांडू, नेपाल )
🌺 ख्वाब, जिंदगी की जरुरत है 🌺
ख्वाब अक्सर वहाँ से शुरू होते हैं,
जहाँ हकीकत हाथ छुड़ा लेती है,
जहाँ कोई रास्ता नजर नही आता,
वहीं कोई उम्मीद,
चुपचाप आँखों में घर बना लेती है।
कुछ ख्वाब हम अपनी मर्ज़ी से देखते हैं,
कुछ वक्त हमारी आँखों में रख जाता है,
कुछ ख्वाब किसी के साथ के होते हैं,
कुछ में बस अपना ही मन,
अपनी दुनिया सजाता है।
मगर सबसे खूबसूरत ख्वाब वो हैं,
जिन्हें देखते हुए हम,
अपनी उम्र, अपनी परिस्थितियाँ,
यहाँ तक कि अपनी सीमाएँ भी भूल जाते हैं।
जो नही पता सच होगा भी या नही,
फिर भी दिल उन्हें छोड़ने को तैयार नही होता।
शायद ख्वाबों का होना भी,
जिंदगी की एक जरूरत है,
वरना जो है, उसी में गुजर जाने,
और जो नही है,
उसकी कल्पना करने के बीच,
इंसान होने का फर्क ही क्या रह जाएगा।
✍️ भारती राय ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )
शनिवार, अक्टूबर 24, 2026
पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय ऑनलाइन ‘रिश्ते फरिश्ते साहित्यिक महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार 'पुनीत साहित्य गौरव' सम्मान से सम्मानित।
पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा मनुष्य जीवन में रिश्तों के महत्व, विशेषता और उपयोगिता को दर्शाने के लिए ऑनलाइन ‘रिश्ते फरिश्ते साहित्यिक महोत्सव' का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को रिश्तों से संबंधित दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किसी भी एक विषय का चयन करके चयनित विषय पर आधारित रचना लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस महोत्सव में एक ओर जहां वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी विशिष्ट साहित्यिक शैली का प्रदर्शन किया तो दूसरी ओर ग्रुप से जुड़े नवीन रचनाकारों ने भी अपनी अनूठी भावनाओं और विचारों से ग्रुप का ध्यान आकर्षित किया। महोत्सव में सम्मिलित प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन 'पुनीत साहित्य गौरव' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने मनुष्य के जीवन में रिश्तों के महत्व, विशेषता तथा उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए लोगों को प्रत्येक रिश्ते को पूरी ईमानदारी के साथ निभाने के लिए प्रेरित किया और महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया तथा सम्मान पाने वाली सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन साहित्यिक कार्यक्रमों में रचनाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम डॉ० भूपेन्द्र कुमार गौतम, रत्ना वाधवानी, अरुणा चतुर्वेदी, डॉ० अनुराग पाण्डेय, अनीता मिश्रा सिद्धि, संध्या शर्मा, श्रेया जोशी 'कल्याणी', अंजुलिका खोखर, श्रीजी जैन रचनाकारों के रहे।
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स्त्री कौन हो तुम …? पर्याय लगती हो धरा की धीरता से धीर धरती इक - इक कदम गिरती - संभलती हो पल्लू में ब्रम्हाण्ड ...
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बन जाते हैं कुछ रिश्ते ऐसे भी जो बांध देते हैं, हमें किसी से भी कुछ रिश्ते ईश्वर की देन होते हैं कुछ रिश्ते हम स्वयं बनाते हैं। बन जाते हैं ...
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