तुम्हारे शब्द अक्सर मन पर घाव कर जाते है
भर आता है दिल लेकिन हम
बस मुस्कुरा कर रह जाते है
लगाकर फूल भी हम काँटों का बाग पाते हैं
मांगनी पड़ती है हमें, मोहब्बत भी महबूब से
और वो उसमें भी एहसान जताते है
लोग कहते हैं कि
सीरत की बातें हैं
सूरत नही देखी जाती
अंदर की सुंदरता से ही
दिल जीत लिए जाते हैं
सीरत अच्छी या सूरत
अब भला यह कौन जाने
कोई कह दे अगर कि तुम काली हो
तो वह नये-नये तरीकों से रूप-रंग संवारेगी
कोई कह दे अगर कि तुम मोटी हो
तो वह खाना छोड़ देगी
कोई कह दे अगर कि तुम छोटी हो
तो वो हील पहन तुम्हारे कद की बराबरी करेगी
अपने आपको तुम्हारे काबिल बनाने लग जायेगी
तुम्हारी हर कमियों को नज़र अंदाज़ करती
अपनी हर कमी को सुधारती
तुम से इतना ऊपर चली जाती हैं कि
उसमे कोई भी कमी नही रहती
तुम क्यूँ हर बार उसमें नुख़्स निकालते हो
क्यूँ तरह-तरह के साँचे में उसे ढालते हो
क्यूँ नही समझा त्याग जो किया उसने तुम्हारे लिए
क्यूँ उसे उसकी नज़रों मे ही नीचे गिराते हो
तुम समझना ही नही चाहते कि
सुंदरता देह मे नही मन में बसती है
तुम देखना ही नही चाहते कि
प्रेम को उसकी आँखें तरसती है
काश ! तुमने इस चमक-दमक से परे
एक प्रेम की दुनिया देखी होती
काश ! तुम जान पाते कि
हर इक लड़की खूबसूरत होती है
पर तुम तो रह रहे हो अपनी बनाई शर्तों के जाल में
कभी देखो करीब से पहुँच गई है वो किस हाल में
कभी किया है क्या महसूस तुमने एहसास उसके
कभी देखा है क्या खुद को आईने मे साथ उसके
देखना कभी गौर से
तुम्हारी हर शर्तों को पूरा करते-करते
हर बार खुद को बदलते-बदलते
वो स्वयं में सम्पूर्ण नज़र आएगी
और साथ खड़े तुम
हर बार नाक-भौंह सिकोड़े
खुद को अतृप्त ही पाओगे
वो निखर जाएगी
खुद की नज़रों में एक दिन
और तुम आदतन
कमी ही तलाशते रह जाओगे।
✍️ मीनू शर्मा ( सोहन गंज, दिल्ली )