शनिवार, अक्टूबर 17, 2026

✨ डर ✨








जन्म से मृत्यु तक

डर रहता है हावी

हर कदम पर मन कहता

संभलकर चलना

कहीं कोई ठोकर न लगे

कहीं कोई दुख न मिले

कोई तकलीफ़ न आए

यही आशंका मन में रहती है


बीमार पड़ते ही

डॉक्टर, हकीम, दवाओं की

कतार लग जाती है

जिंदगी को बचाए रखने की

हर कोशिश की जाती है

माता-पिता के दिल में भी

एक डर पलता रहता है 

कहीं कुछ हो न जाए

मेरे लाल को

कहीं कोई आँच न आए

मेरे लाल को


माना कि मृत्यु

एक दिन आनी है

फिर क्यों डर के साए में

जिंदगी बितानी है 

कभी-कभी जिंदगी में

ऐसे मोड़ भी आते हैं

जब उजाले में भी

डर के बादल छा जाते हैं


जब किसी अपने से

धोखा मिलता है

तो हर हमदर्दी जताने वाले से भी

दिल घबराने लगता है

फिर मन से पूछती हूँ 

आखिर डर किस बात का 

जिस बात से डरती हूँ

क्या वह सचमुच बाहर है 

या कहीं मेरे ही भीतर

उसका बसेरा है 


हिम्मत करके

एक बार बाहर निकलो

तो डर का अस्तित्व

कहीं दिखाई नहीं देता

जो मन की कैद से निकले

उसके सामने भय

टिक नही पाता

जो जमीन से जुड़े रहकर

आसमान छूने के ख्वाब देखते हैं

वे केवल ख्वाबों में नही

हकीकत की राह पर चलते हैं


वे शेरदिल इंसान हैं

डरकर पीछे नहीं हटते

मुसीबतों से घबराते नही

डटकर उनका सामना करते हैं

क्योंकि डर के उस पार ही

हिम्मत का संसार है

और जिसने डर को जीत लिया

वही जिंदगी का असली हकदार है


✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

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