कागज़ ने कलम से कहा, “तुम मन की आवाज़,
मैं मौन साधना में लिपटा, तुम शब्दों का साज़।
तुम बूँद विचारों की हो, मैं धरती का वक्ष,
मिलकर हम रचते यहाँ, नवयुग का प्रत्यक्ष।
तुम लिखती हो क्रांति तो, मैं सहता हूँ घाव,
तुम लिखती हो प्रेम तो, महक उठे हर गाँव।
तुम बन जाती न्याय जब, मैं बनता अभिलेख,
झूठ खड़ा थरथर करे, पढ़कर सत्य-विवेक।
पर सुनना मेरी कलम, मत बिकना दरबार,
सत्ता के सम्मोहन में मत करना व्यापार।
स्याही केवल रंग नही, अंतरात्मा का नीर,
शब्द वही जो बाँट दें, पीड़ित जन को धीर।
✍️ अनीता मिश्रा सिद्धि ( पटना, बिहार )

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