पल भर में कुदरत ने
अपनी ताकत का एहसास करा डाला
इंसान को उसकी औकात का
आईना दिखा डाला
बड़े-बड़े महलों और इमारतों को
मिट्टी में मिला डाला
दौलत, शोहरत और ताकत का
सारा गुरूर मिटा डाला
नेपाल की धरती हो
हिमाचल की वादियाँ हों
या जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियाँ
कहीं बादल फटे
कहीं सैलाब आया
कहीं पहाड़ दरके
कहीं अपनों ने अपनों को खोया
किसी का घर उजड़ गया
किसी का संसार बह गया
कोई अपने सपनों को ढूँढ़ रहा है
कोई अपनों को ढूँढ़ रहा है
कोई ज़िंदगी बचाने के लिए
मौत से लड़ रहा है
जिस दौलत और शोहरत पर
इंसान को था गुरूर
कुदरत की एक करवट ने
कर दिया उसे चूर-चूर
फिरते थे जो ताकत के नशे में
उन्हें पल भर में बेबस बना डाला
जो खुद को समझते थे मालिक
उन्हें कुदरत ने अपनी
ताकत का एहसास करा डाला
फिर भी अफसोस
सब कुछ अपनी आँखों से देखकर
कोई आपदा में भी अवसर ढूँढ़ रहा है
और अपनी गलतियों का दोष
अब भी दूसरों को दे रहा है
कुदरत ने बार-बार चेताया था
मुझसे यूँ खिलवाड़ मत कर
तरक़्की की अंधी दौड़ में
अपनी ज़िंदगी को
कमज़ोर मत कर
कभी पहाड़ों को काटा
कभी जंगलों को उजाड़ा
कभी नदियों का रास्ता रोका
अपने स्वार्थ के लिए
कुदरत का संतुलन बिगाड़ा
तरक़्की के नशे में
इंसान इतना आगे बढ़ गया
कि जिस धरती ने जीवन दिया
उसी को घायल कर गया
ज़रा ठहरो
सोचो तो सही
किसके लिए ये महल हैं
अगर सुरक्षित ज़मीन ही न रहे
किसके लिए ये दौलत है
अगर साँस लेने को
साफ हवा ही न रहे
नदियाँ सिर्फ पानी नही
पहाड़ सिर्फ़ पत्थर नही
जंगल सिर्फ पेड़ नही
ये हमारी ज़िंदगी की
बुनियाद हैं
कुदरत हमारी जागीर नही
हमारी ज़िम्मेदारी है
धरती हमारी संपत्ति नही
आने वाली पीढ़ियों की अमानत है
अब भी वक़्त है
सुधर जा ऐ इंसान
कुदरत के निज़ाम का सम्मान कर
तरक़्की कर
मगर कुदरत को साथ लेकर
शहर बसा
मगर नदियों का रास्ता बचाकर
सड़कें बना
मगर पहाड़ों का दर्द समझकर
पेड़ों को मत काट
नदियों को मत बाँध
धरती को मत लूट
क्योंकि जिस दिन
कुदरत ने हिसाब माँग लिया
तब इंसान के पास
कोई जवाब नहीं होगा
कुदरत से जंग मत कर
उसके साथ जीना सीख
नेपाल से लेकर
हिमाचल तक
जम्मू-कश्मीर से लेकर
दुनिया के हर कोने तक
कुदरत का हर इशारा
हमें एक ही बात समझाता है
तरक़्की की अंधी दौड़ में
उसे पीछे मत छोड़
अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए
एक सुरक्षित धरती छोड़
महल फिर बनाए जा सकते हैं
लेकिन जो जीवन चला गया
वह लौटकर नही आता
इसलिए अभी भी समय है
नदियों को साँस लेने दो
पहाड़ों को खड़ा रहने दो
जंगलों को फिर से उगने दो
धरती को थोड़ा आराम करने दो
अब भी वक़्त है
सुधर जा ऐ इंसान
कुदरत के निज़ाम का सम्मान कर
उससे खिलवाड़ नही
उसके साथ चलना सीख
क्योंकि कुदरत जब देती है
तो जीवन देती है
और जब अपना संतुलन खोती है
तो इंसान को उसकी सीमाएँ
याद दिला देती है
आओ, मिलकर प्रण करें
कुदरत का मान करेंगे
धरती की शान करेंगे
इंसानियत को पहचानेंगे
और एक बेहतर दुनिया
का निर्माण करेंगे
यही है कुदरत का इशारा
यही है ज़िंदगी का सहारा।
✍️ शशि गौतम ( सांबा, जम्मू-कश्मीर )

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