रविवार, अक्टूबर 18, 2026

📜 कागज-कलम का रिश्ता 🖋️









कोरे कागज पर चलकर,

कलम रचना बनाती है।

इस तरह साथी बनकर कलम,

कागज के साथ रिश्ता निभाती है। 


एक दूसरे में ही है इनका वज़ूद

हर रचना में दोनों का संग रहता मौजूद 

दोनों मिलकर कल्पना को शब्दों में सजा देते हैं

और रचनाकार के विचारों को अमर बना देते हैं


अगर कलम, कागज पर न चले तो,

कागज पर उदासी छाने लगती है। 

कलम को भी कागज का साथ ना मिले तो,

कलम को भी दुनिया अधूरी लगने लगती है।


ऐसे में दोनों एक-दूसरे को,

समझकर आगे बढ़ते जाते हैं।

और रचनाकार के बिखरे ख़्वाबों को,

अपने प्रयासों से समेटते चले जाते है।


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

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