भाग्य और कर्म के रिश्ते पर बात करनी है तो मुझे अपने साथ घटी एक घटना याद आती है। पर उस घटना से पहले, इस रिश्ते पर मेरे विचार क्या हैं, यह बताना जरूरी है।
मेरे मतानुसार भाग्य और कर्म के बीच बहुत गहरा नाता है। यदि ये दोनों साथ हों, तभी आपका कोई काम पूरा होता है।
शायद यह बात इतने छोटे वाक्य में समझ न आए, तो विस्तार से कहती हूँ। आप किसी चीज़ को पाने के इच्छुक हैं और आप अपनी ओर से पूरा कर्म कर रहे हैं, पर वह चीज़ आपके भाग्य में नही है, तो वह आपको नहीं मिलेगी। वहीं कोई चीज़ अगर आपके भाग्य में है और आपने उसके लिए थोड़ी सी मेहनत कर दी, तो वह आपको जरूर मिलेगी। पर ऐसा भी नही है कि आप इच्छा रखकर केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहें और वह चीज़ आपको मिल जाए। यही कर्म और भाग्य के रिश्ते का सच है।
अब उस घटना की बात करती हूँ, जिसमें भाग्य और कर्म का यह रिश्ता साफ-साफ दिखता है।
बात सन 2013 की है। ITI पूरा करने के बाद मैंने Polytechnic का फॉर्म भरा। प्रवेश परीक्षा प्रदेश में 17वें स्थान के साथ पास की। पर काउंसलिंग में कुछ ऐसा हुआ कि प्रक्रिया पूरी नही हो सकी। भाग्य ने जैसे संकेत दे दिया था कि यह मेरे लिए नही है। उस साल मैंने कुछ नही किया, पर अगले साल फिर फॉर्म भर दिया।
इस बार काउंसलिंग भी हो गई, पर जो कॉलेज मिला उसकी दशा देखकर पिताजी वहाँ भेजने के लिए तैयार नही थे। फिर मैंने एक निजी कॉलेज में प्रवेश ले लिया। जैसा मैंने पहले कहा, पॉलिटेक्निक शायद मेरे भाग्य में नही था। ITI होने के कारण द्वितीय वर्ष में सीधा प्रवेश मिला और द्वितीय वर्ष अच्छे अंकों से पूरा भी हो गया।
पर अंतिम वर्ष में पूरी मेहनत से पढ़ाई की और प्रदेश में टॉप करने की आशा थी। तभी परीक्षा से चार दिन पहले मेरा स्वास्थ्य खराब हो गया और मैं परीक्षा नही दे सकी, जिसके कारण पॉलिटेक्निक अधूरा रह गया और एक प्रतिष्ठित कंपनी में मिलती हुई नौकरी हाथ से रेत की तरह फिसल गई।
तब समझ आया - मैंने कर्म में कोई कमी नही छोड़ी थी, पर भाग्य साथ नही था। और बिना भाग्य के कर्म भी अधूरा रह जाता है। इसीलिए भाग्य-कर्म का रिश्ता अटूट और अनोखा माना जाता है।
✍️ श्रेया जोशी 'कल्याणी' ( वाराणसी, उत्तर प्रदेश )

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें