सोमवार, अक्टूबर 26, 2026

😂 हास्य-कविता - कविता पर फिदा एक प्यारी..... 💞









चिपकी रहती इस तरह, जैसे मीठी खाँड,

मेरी कविता सुन रचे, सपनों का ब्रह्मांड।

सपनों का ब्रह्मांड, अरमाँ खूब सुलगाती,

दिल में क्या है बात, मगर ना खुलकर बताती।


उफ्फ समझ न आये, क्या दिल में समाई,

कविता हिट होते ही, आफ़त नई है आई।

आती है वो पास में, जैसे सावन-मेघ,

दिल की बातें रोककर, साधे रहती वेग।


साधे रहती वेग, लजाकर आँख मिलाती,

कभी प्रशंसा की झड़ी, कभी पहेली बुझाती।

कहती, वाह कवि जी वाह ! कमाल लेखनी आपकी,

दिल को मेरे छू गई, ये रचना जनाब की।


पूछूँ, “क्या कुछ बात है ?” कहती, “कुछ भी नही।”

“बस कविता सुनकर उसे, सुध-बुध रहती नही।”

सुध-बुध रहती नही, पर बात समझ ना आए,

कविता का रस चढ़ा या प्रेम-रोग सताए ?


जो कहे, “क्या-बात, क्या-बात, बजता मन में साज़”,

कभी देखकर मुस्काए, लगता कातिलाना अंदाज़।

लगता कातिलाना अंदाज़, जो मोबाइल दिखलाए,

मेरी हर नई पोस्ट पर, कमेंट जरूर चिपकाए।


कहें ‘महेंद्र’ मुस्काए, गज़ब का खेल निराला,

प्रशंसा सुनकर थोड़ी, मैंने व्यर्थ दिल उछाला।

रिश्तों की मर्यादा ने मेरे पैर बाँध रखे हैं ?

बच्चे भी पहरेदार बन, लाठियाँ ताने खड़े हैं ?


लाठियाँ ताने खड़े हैं, इसीलिए मन में डर है,

कवि की लोकप्रियता, यूं होती बेअसर है।

ख़ामोशी के होंठ पर, जैसे अटके हुए पैग़ाम,

लोक-लाज के फेर में वो भी, लेती नही है नाम।


लेती नही है नाम, पर इशारों से समझाती,

दिल की अदालत में, खुद वकील बन जाती।

मैंने पूछा, “साफ कहो, क्या है मन में बात ?”

बोली, “पहले लिखिए, प्रेम-विरह जज्बात।”

प्रेम-विरह जज्बात बाद, फिर लिखवाए दोहे,

कवि-मन सोचें रात भर, बोझिल आँखें रोए।


जो कहे, “वाह कवि जी ! दिल को छू गई बात",

मैं समझूँ कुछ और ही, बिगड़ते फिर हालात।

बिगड़ते फिर हालात, नींद उड़ती जाती,

वो तो सोती चैन से, मेरी ग़ज़ल बन जाती।


उसपर वो कहती, कमाल लेखनी आपकी,

दिल को मेरे छू गई, ये रचना जनाब की।


कभी लगे कि प्रेम है, कभी लगे सम्मान,

कभी लगे साहित्य का बढ़ता हुआ अभियान।

बढ़ता हुआ अभियान, भ्रमों की रेल चलाए,

अपन अर्थ निकालते, वो बस लाइक बढ़ाए।


सारे गड़बड़झाले में हाय ! इतना ही समझ पाया,

कविता की दीवानगी में, खुद को लव-गुरु बनाया।

उसने साफ-साफ कहा, “आपकी लेखनी प्यारी।”

मैंने मन ही मन बना ली प्रेम-कथा हमारी।

कभी फैन बन भारी, कविता बताती प्यारी,

पैसे की तंगी पर छोरी, हिम्मत नही हारी।


कहती खर्च चलाने को, फ्रीलांसिंग से राह बनाऊँ,

जब भी टूटे आस, याद तुम्हारी पाऊँ।


बार-बार मांगू नकद, माफ करो महराज,

संकट में महेंद्र जी, रख्खो मेरी लाज।

रख्खो मेरी लाज, भूल मैं कभी न पाऊं,

जल्दी तुमसे मिलूं, कविता सुनने आऊं।


तो मैंने भी अब ठान ली, पूछूँगा इक बार,

“उधार से है प्यार या कवि से भी सरकार ?”

कवि से भी सरकार, क्या सुनकर वो मुस्काएगी ?

या “कविता अगली मांगकर, कमेंट चिपकाएगी ?”


चिपक-चिपक कर करे, वो मुझको हलकान,

प्रेम समझ बैठूँ मगर, ना निकले साहित्य-ज्ञान।

ना निकले साहित्य-ज्ञान, तो यही निष्कर्ष हमारा,

कविता की प्रशंसा सुन, क्यूँ दांव पर दिल बेचारा ?


कहें ‘महेंद्र’ मुस्काए, तुम मत करना इस पाप को,

वरना आशिकी जेल भिजवाएगी, दो बच्चों के बाप को।


✍️ महेंद्र महावर ( काठमांडू, नेपाल )

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