सोमवार, अक्टूबर 26, 2026

🌼 जिंदगी की नई शुरुआत 🌼

रात के करीब बारह बज रहे थे। कमरे में मद्धम अंधेरा था और खिड़की के बाहर शहर अभी भी जागा हुआ था। सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों की आवाजें, कहीं दूर से गूंजता हॉर्न और मोबाइल स्क्रीन पर टिमटिमाते संदेश... सब कुछ हमेशा की तरह सामान्य था। कुछ असामान्य था, तो सिर्फ आईने के सामने खड़ा वह इंसान, जो आज पहली बार खुद से नजरें नही मिला पा रहा था।
उसका नाम आरव था। चालीस की उम्र पार कर चुका आरव अपने जीवन में लगभग वह सब कुछ हासिल कर चुका था, जिसे लोग सफलता कहते हैं। एक अच्छी नौकरी, अपना घर, परिवार की जिम्मेदारियां और समाज में मान-सम्मान। लोग उससे सलाह लेते, उसकी कामयाबी की तारीफ करते और अक्सर कहते, "तुमने जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया है।" वह बस मुस्कुराकर दाद दे देता।
लेकिन उस रात आईने में खुद को देखते हुए उसके मन में एक सवाल उठा—"क्या सचमुच मैंने वह सब पा लिया है, जो मुझे चाहिए था ?" इस सवाल का जवाब उसके पास नही था।
बचपन में आरव को लिखने का बहुत शौक था। डायरी के पन्नों पर वह अपनी कल्पनाएं उतारा करता, छोटी-छोटी कहानियां लिखता और कभी-कभी कविताओं की रचना करता। वह लेखक बनना चाहता था। उसे लगता था कि एक दिन उसकी लिखी कोई बात किसी अनजान शख्स के दिल को छू जाएगी।
लेकिन फिर जिंदगी ने करवट बदली। पढ़ाई, नौकरी, घर की जिम्मेदारियां और परिवार की उम्मीदें उसके सामने आकर खड़ी हो गईं। उसने खुद से कहा, "अभी हालात थोड़े संभल जाने दो, फिर लिखूंगा।" कुछ साल बाद उसने कहा, "बच्चों की पढ़ाई पूरी हो जाए, फिर खुद के लिए वक्त निकालूंगा।" और आखिरकार एक दिन उसे एहसास हुआ कि उसकी डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखी तारीख को बीते बीस साल हो चुके थे।
उसने दूसरों की खुशी के लिए कई बार अपनी इच्छाओं को टाल दिया था। परिवार की जरूरतों के लिए उसने अपने शौक को एक तरफ रख दिया, अपनों की तकलीफों में वह अपनी चिंता भूल गया और मुश्किलों में हमेशा चट्टान की तरह मजबूत रहने का नाटक करता रहा। सब उसे समझदार कहते थे, जिम्मेदार कहते थे। लेकिन जिम्मेदारियों के इस बोझ के नीचे उसका अपना मन कैसा है, यह कभी किसी ने नही पूछा। शायद इसलिए भी, क्योंकि उसने खुद कभी किसी से कुछ कहा ही नही था।
उस रात अलमारी साफ करते समय उसे अपनी पुरानी डायरी मिल गई। धूल से सने पन्नों के बीच एक छोटी सी कविता लिखी हुई थी। नीचे उसके खुद के हस्ताक्षर में एक वाक्य दर्ज था—"एक दिन मैं ऐसा इंसान बनूंगा, जिस पर मुझे खुद गर्व होगा।"
वह काफी देर तक उन पन्नों को एकटक देखता रहा। उसकी आंखें भर आईं। उसे दुख इस बात का था कि उसने कोशिश करना ही छोड़ दिया था। वह दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरने में इतना मसरूफ रहा कि खुद की ही नजरों में गिरता चला गया।
अगली सुबह उसने कोई बड़ा फैसला नही लिया। उसने नौकरी छोड़ने या दुनिया से दूर चले जाने का विचार नही किया। उसने बस अपने पूरे दिन में से आधा घंटा अपने नाम कर दिया। पहले दिन उसने एक पन्ना लिखा। दूसरे दिन दो। कुछ दिनों तक शब्द सूझ नही रहे थे। कभी थकान ने घेरा, तो कभी पुरानी आदतों ने रोका। लेकिन इस बार उसने अपने मन को 'कभी बाद में लिखूंगा' कहकर दोबारा नही टाला।
धीरे-धीरे उसकी डायरी भरने लगी। उसमें अधूरे सपने थे, दबी हुई भावनाएं थीं और उस इंसान की आवाज थी, जिसे उसने बरसों से खामोश कर रखा था।
एक दिन उसकी पत्नी ने वह डायरी पढ़ ली। वह कुछ बोली नही। बस, उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, "आप इतने सालों से यह सब अपने दिल में समेटे जी रहे थे ?"
आरव का गला भर आया। "शायद मैं सबके लिए ही जीता रहा," उसने कहा, "लेकिन खुद के लिए जीना भूल गया।"
पत्नी मुस्कुराई, "तो अब याद रखिए। अभी भी देर नही हुई है।"
उस रात आरव फिर आईने के सामने खड़ा था। चेहरा वही था, उम्र भी वही। उसकी समस्याएं भी खत्म नहीं हुई थीं। जिम्मेदारियां अभी भी थीं, मुश्किलें भी थीं। लेकिन आज उसकी आंखों में एक अलग ही चमक थी। वह समझ चुका था कि जो इंसान वह बनते-बनते रह गया था, वह कहीं खोया नही था। वह उसके भीतर ही था ; बस उसके लौटने का इंतजार कर रहा था।
उसने डायरी खोली और आखिरी पंक्ति लिखी –
"जिंदगी भर मैं वह बनने की कोशिश करता रहा, जिसकी दुनिया को मुझसे उम्मीद थी। अब मैं वह बनूंगा, जिसकी उम्मीद मेरे भीतर का इंसान आज भी मुझसे लगाए बैठा है।"
उसने पेन एक तरफ रख दिया। बाहर सुबह हो रही थी और बरसों बाद, पहली बार उसे महसूस हुआ कि यह सिर्फ एक नए दिन की सुबह नही है, बल्कि उसके अपनी जिंदगी की एक नई शुरुआत है।

✍️ अमोल बारई ‘कविमोल’ ( ठाणे, महाराष्ट्र )

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