रविवार, अक्टूबर 04, 2026

✨ चंचल मन ✨








अठखेलियों, दुविधाओं में घिरा मेरा चंचल मन,

सारे संसार की खुशियां पाना चाहता है।


कभी सोच के सागर की गहराई में उतरना चाहता है,

कभी अरमानों के पंख लगाकर आसमान में उड़ना चाहता है,

कभी चाकू की धार से तेज होना चाहता है मेरा चंचल मन।


कभी कठिनाइयों से टकराना चाहता है, 

कभी तितली बन बगीचे में जाना चाहता है,

कभी खुशबु बन सबको महकाना चाहता है,

कभी फसल बन खेतों में लहराना चाहता है,

पल-पल मचलता रहता है मेरा चंचल मन।


कभी पुराने विचारों को सजाना चाहता है,

कभी नए विचारों को अपनाना चाहता है,

कभी एकता के गीत गुनगुनाना चाहता है,

रहता भविष्य के सुनहरे सपने बुनता सदा ही,

थोड़ा भी धीरज नही रखता है मेरा चंचल मन।


पर अब चंचल मन को नियंत्रित करके घर से निकलना है,

संभल-संभलकर नेकी, ईमानदारी की राह पर चलना है,

मनाती बहुत हूँ अक्सर पर वो मानता नही नादान,

सांसारिक उलझनों में उलझ जाता है मेरा चंचल मन।


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

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