जो साफ करते हैं दूसरों का कूड़ा,
उनके घरों में अक्सर अंधेरा होता है।
हम तो मना लेते हैं त्योहार रोशनी में,
पर उनकी सुबह का रुख कुछ और होता है।
वो गटर, वो नालियां, वो गंदगी के ढेर,
जिन्हें देखकर हम अपनी आँखें फेर लेते हैं।
सोचो ज़रा, उनके स्वास्थ्य का क्या ?
जो हर रोज़ अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं।
कूड़ेदान का सही इस्तेमाल तो बस एक बात है,
पर असली स्वच्छता वो है जो हर इंसान को सम्मान दे।
जब तक न बदलेगी हमारी यह संकुचित सोच,
तब तक देश कैसे खुद को पूरी तरह महान कहे ?
प्लास्टिक का यह पहाड़, यह ज़हरीला धुआँ,
यह सिर्फ ज़मीन नही, हमारा भविष्य निगल रहा है।
आओ जागें और बदलें अपनी आदतें आज ही,
क्योंकि हमारा ही कल, कचरे के इस ढेर में जल रहा है।
✍️ श्रीजी जैन ( शाहदरा, दिल्ली )

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