मंगलवार, मई 17, 2022

🌻ऊंची राह🌻








हिया जिससे जुड़ाए
झूठा एक दिन 
वो निकल आए 
दिल उससे दूर चला जाए 
दरार जो
हृदय पर पड़ जाए
दुख की सबसे बड़ी 
लकीर बन जाए 

पलकों में जो रहे समाए
भरम एक दिन 
वो समझ आए
नज़रों से नीचे गिर जाए
नमी जो 
आंखो में तीर आए 
गीलापन समंदर का 
वो भी कम पड़ जाए 

दिल जो टूट जाए
हर रस्म छूट जाए
बेमानी सी जो
दुनिया हो जाए
मन मौन में खो जाए
तब रूह से 
वो रौशनी फूट आए
जो दुखियों को जगाए
सांसे प्रार्थना बन जाए
नि:सार जीवन को 
एक सार मिल जाए
ऊंची ऐसी राह मिल जाए 

✍️ ज्योति चौधरी ( लातेहार, झारखंड )

सोमवार, मई 16, 2022

🌻लोगों में आया बदलाव🌻








कभी चांद से ली है शीतलता मैंने,
तो कभी सूरज की धूप को सेका है।

फुर्सत हो तो सुन लो तुम भी कि,
इस दुनिया में क्या-क्या मैंने देखा है।

पहले लोग परिवार से जुड़े मिलते थे,
अब लोगों को बिखरते मैंने देखा है।

पहले टूटे हुए कांच देखने को मिलते थे,
अब लोगों का दिल टूटते मैंने देखा है।

पहले लोग हाथ पकड़कर रिश्ते दिल से निभाते थे,
अब लोगों को जुबां से बहकाते मैंने देखा है।

पहले लोग घाव पे मरहम लगाते दिखते थे,
अब लोगों को नमक छिड़कते मैंने देखा है। 

पहले लोग दर्द में होते हुए भी खुशी से मिलते थे,
अब लोगों को चिड़-चिड़ा मुंह बनाकर मिलते मैंने देखा है।   

पहले लोग सहनशीलता भाव से आपस में मिलते थे,
अब लोगों को छोटी सी बात पे लड़ते हुए मैंने देखा है।

पहले लोग दौलत को छोड़कर अपना बनाते थे,
अब दौलत के लिए अपनों को छोड़ते मैंने देखा है।

       ✍️ पूजा सिंह रघुवंशी ( वाराणसी, उत्तर प्रदेश )

🌻प्यार पर क्या लिखूं🌻








प्यार पर क्या लिखूं
ये समझ नही आता है
जीत लिखूं या हार लिखूं
या अपना प्यारा संसार लिखूं
खिलती हुई धूप लिखूं
या ठंडी-ठंडी बयार लिखूं
बारिश की बूंदो का प्यार लिखूं
या मेघो का गर्जन लिखूं
सावन की हरियाली लिखूं
या धरती-आकाश का मिलन लिखूं
सागर की गहराई लिखूं
या धरती का उपहार लिखूं
माँ बच्चें का प्यार लिखूं
या माँ की डांट का दुलार लिखूं
पापा का प्यार लिखूं
या उनका आशीर्वाद लिखूं
बेटी की विदाई लिखूं
या ससुराल में सास का प्यार लिखूं
भाई-बहन का लाड लिखूं
या उनका तकरार लिखूं
प्यार पर क्या लिखूं
रात की ख़ामोशी में 
सिसकती आवाज़ लिखूं
या रात में चांदनी की 
शीतलता लिखूं
अपने दिल का हाल लिखूं
आखिर क्या लिखूं प्यार पे

✍️ गरिमा ( लखनऊ, उत्तर प्रदेश )

🌻गृहणियां🌻



 




प्रेम भाव में 

जीती रही है गृहणियां 

तज कर अपने स्वप्न 

उठाती रही है जिम्मेदारियां

पति की मुस्कान में 

पा लेती हैं सुकून

मां बाप के आशीष से 

भर लेती हैं झोलियां

ढूंढ लाती है खुशी 

जब गूंजती हैं किलकारियां 

करती है समर्पण 

दिन रात नही देखती

पापा की ये तितलियां 

हंसती हैंमुस्काती हैं

मन को समझाती हैं 

कुछ ऐसी ही होती हैं 

हम सारी गृहणियां

               

 ✍️ रीना अग्रवाल ( बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश )

 

रविवार, मई 15, 2022

🌻मज़दूर का करें सम्मान🌻









करोना काल में हुआ जिनका सबसे बुरा हाल 

वो तो मेहनत कश मज़दूर थे साहब 

जो दिनभर मज़दूरी कर घर चलाया रते

धूप, बरसात या हो सर्दी मेहनत से ना डरते

अपने कंधो पर कितना बोझ उठाया रते

ये कैसी विपदा आन पड़ी थी तब नपर

जो दो रोटी के लिए घर से निकलता था

तब उसके हाथों में पानी भी नही था 

अपनो को भूख से तड़पता कोई देख ना पता 

वो तो एक मज़दूर है साहब जो मजबू था

जो रोटी कमाने अपने घर से बाहर आया 

आज इस तड़पन ने उसे वापस भेज दिया था

उसके घर के दरवाज़े जो कब से इंतज़ार में 

एक कुंडी के सहारे उसकी राह तक रहे थे  

बस वो राहत की साँस लिए दिख रहे थे

अब हमारे घर की रौनक़ लौट आई है 

घर में खाने को कम होगा फिर भी 

वो दहशत और भुखमरी तो नही होगी 

गाँव में उनका अपनी छत के नीचे रहना 

अपने दरवाज़े कुंडी के आग़ोश में रहना 

अब उनको उसमें अपनी खुशी ढूँढनी थी 

उनमें से कई रास्तों में पैरो में छाले लिए 

कई रास्तों में अपने से बिछड़ते गए

कई लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ा था

कोई माँ के लिए बिलख-बिलख के रोया

आज हमारे पास इसका कोई जवाब भी नही

मज़दूर है जिसकी जिंदगी कश्मकश से गुजरी

उनकी तड़पती आँखो में देखा भी ही गया

कई बच्चे ऐसे भी थे जिनके हौसलों ने तब

अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बन कर 

घर तक पहुँचाने की हिम्मत बाँध रखी थी 

मज़दूर है जिनके बिना चले ना को काम 

इसलिए मज़दूर का भी करे प्रत्येक व्यक्ति सम्मान


 ✍️ ज्योति पांडे ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

🌻मज़दूर🌻








पेट की आग के आगे वो,
कितना मज़बूर हो गया ?
छोड़ी पढ़ाई-लिखाई की गलियां, 
थक-हारकर वो मज़दूर हो गया।

कहीं दांव पर लगा है बचपन,
तो कहीं दर-दर भटकती जवानी है।
पसीने से लथपथ, धूप में झुलसती,
मज़दूर चमड़ी की भी अपनी कहानी है।

ना तपन, ना ठंड, ना बरसात की परवाह,
मौसमों से परे उसका अपना मिजाज है।
उसकी मेहनतकश बाजुओं के आगे, 
बड़े-बड़े तूफान के हौसलें भी हताश हैं।

कद-काठी, पैर के छाले देखकर,
कभी उसका अपमान ना करना।
सुकूं भरी ख्वाबगाह का शहंशाह है वो,
उसकी मेहनत का सदा सम्मान तुम करना।

✍️ स्मिता सिंह चौहान ( गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश )

🌻श्रमिक🌻







विडम्बना कितनी अजीब है,
परिश्रम करता वो नित्य है,
तपती दोपहरी काम करे,
कभी ना उसको आराम मिले।

रात-दिन उसके सब एक है,
मन में उसके ना कोई भेद है,
है हक़दार उच्च सम्मान का,
ना निश-दिन के ही अपमान का।

रोटी को रहा जो तरसता,
बेवजह किसी पर ना बरसता,
घर की चिंता सताए उसे,
मुश्किल अपनी बताए किसे ?

श्रमिक, किसान, शिल्पकार है,
वो जगत का तो भरतार है,
बिन उसके ना कोई देश है,
दयनीय सा उसका वेश है।

प्रभु से नित करूं मैं प्रार्थना,
करना ना उस पर दुःख की गर्जना,
उसे जग में उचित सम्मान मिले,
फिर ना कभी जग में अपमान मिलें।।

  ✍️ प्रिया अवस्थी शर्मा 'शब्दिता' ( बालाघाट, मध्य प्रदेश )




पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित ऑनलाइन स्नेह ध्येय सृजन महोत्सव के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा लोगों को स्नेह के महत्व और विशेषता का अहसास करवाने के उद्देश्य से ऑनलाइन स्नेह ध्येय सृजन महोत्सव का आयोजन किया गया...