आप से ही मेरा अस्तित्व
आप ही मेरे जीवन का अवलंब
मेरे अर्श के धूम्रकेतु
आप ही हैं मेरे अनुष
घोर अंधकार में कभी
करते पथ आलोकित
कभी खड़े रहें
बन छाँव कड़ी धूप में
दिया करते रहे अनुदेश
कभी प्रत्यक्ष कभी परोक्ष में
दस्तक दे रही जीवन की शाम
न किया कभी आपने आराम
करते-करते हमारी ख्वाहिशें पूरी
रह गई आपकी सभी इच्छाएं अधूरी
चित्त में चिंता, मुख पर स्मित
ताकि रह सके हम सदा अचिंत
मेरे गौरव, मेरे अभिमान
आपकी जिंदगी बस घूमती रही
हमारी खुशियों की धुरी पर
सचमुच पिता के त्याग का कोई मोल नही
धन्य हुई मैं आप जैसे पिता को पाकर
✍️ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )






