बुधवार, फ़रवरी 22, 2023

🦆पिता के त्याग का कोई मोल नही 🦆










आप से ही मेरा अस्तित्व 

आप ही मेरे जीवन का अवलंब

मेरे अर्श के धूम्रकेतु

आप ही हैं मेरे अनुष

घोर अंधकार में कभी

करते पथ आलोकित

कभी खड़े रहें

बन छाँव कड़ी धूप में

दिया करते रहे अनुदेश 

कभी प्रत्यक्ष कभी परोक्ष में


दस्तक दे रही जीवन की शाम

न किया कभी आपने आराम

करते-करते हमारी ख्वाहिशें पूरी

रह गई आपकी सभी इच्छाएं अधूरी

चित्त में चिंता, मुख पर स्मित

ताकि रह सके हम सदा अचिंत


मेरे गौरव, मेरे अभिमान 

आपकी जिंदगी बस घूमती रही

हमारी खुशियों की धुरी पर

सचमुच पिता के त्याग का कोई मोल नही

धन्य हुई मैं आप जैसे पिता को पाकर


✍️ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )

🦆कहाँ आसान है त्याग करना 🦆










कहाँ है आसान इतना 

कि कोई त्याग कर सके

किसी के लिए

होता है वो ही महान 

जो त्यागता है ख्वाबों को

अपनी तमन्नाओं की 

चढ़ा के बलि

जो लाता है 

किसी और के

चेहरे पर हंसी 

वो साधारण इंसान नही

बल्कि होता है फरिश्ता 


चुकानी पड़ती हैं 

बड़ी ही कीमतें

जब-जब बात 

आती है त्याग की

कहां है आसान इतना 

कि कोई यूं ही 

किसी के लिए 

त्याग कर सके


जब दिल में जगे हो 

जाने कितने ही अरमां

और उन अरमानों की

देनी पड़े कुर्बानी

तो कैसा लगता है 

पूछो ज़रा उस दिल से 

कैसे जी जाती है 

उस वक्त ये जिंदगी 


पल पल तड़पती है रूह 

पर होंठों पर

सजानी पड़ती है हंसी 

कहाँ है आसान इतना 

कि कोई यूं ही 

किसी के लिए 

अपनी खुशियों का 

त्याग कर सके


✍️ पूजा गुप्ता ( सीतापुर, उत्तर प्रदेश )

बुधवार, फ़रवरी 15, 2023

पुनीत अनुपम साहित्यिक समूह द्वारा आयोजित ऑनलाइन स्नेह ध्येय साहित्यिक महोत्सव के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम साहित्यिक समूह द्वारा लोगों को स्नेह के महत्व और विशेषता का अहसास करवाने के उद्देश्य से ऑनलाइन स्नेह ध्येय साहित्यिक महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किन्हीं दो विषयों का चयन करके चयनित विषयों पर आधारित रचनाएं लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस महोत्सव में एक ओर जहां वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी विशिष्ट साहित्यिक शैली का प्रदर्शन किया तो दूसरी ओर समूह से जुड़े नवीन रचनाकारों ने भी अपनी अनूठी भावनाओं और विचारों से समूह का ध्यान आकर्षित किया। महोत्सव में सम्मिलित सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन 'पुनीत स्नेह रत्न' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर समूह के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने मनुष्य के जीवन में स्नेह का विशेष महत्व बताते हुए लोगों से प्रकृति के कण-कण के प्रति स्नेह भाव रखने की प्रार्थना की और महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया और सम्मान पाने वाले सभी प्रतिभागी रचनाकारों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने रचनाकारों को आने वाले ऑनलाइन साहित्यिक महोत्सवों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके समूह की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम संध्या शर्मा, मधु श्रीवास्तव, कविता कोठारी रचनाकारों के रहे।

💞 काजल 💞










बाती बनकर मैं रात भर जली हूँ,

तभी तेरी आंखों में काजल बन सजी हूँ।


तपने के बाद ही सोना भी दमकता है,

रात के बाद ही सूरज भी चमकता है।


मेहंदी भी पिसने के बाद रंग लाती है,

जिंदगी भी ठोकरो के बाद संभल पाती है।


हल चलने के बाद ही धरती भी फसल देती है,

मुश्किलों पर चलकर ही मंजिल भी मिलती है।


मेहंदी अगर पत्थर पर घिसती नही,

दुल्हनों के हाथ में वह सजती नही।


सोना यदि आग में तपता नही,

तो सुंदर आभूषण वह बनता नही।


बाती बन रात भर जली हूँ तो कोई गम नही,

तेरी आंखो का काजल बन सजी तो कुछ कम नही।


✍️ संध्या शर्मा ( पटना, बिहार )

मंगलवार, फ़रवरी 14, 2023

💞 आकर्षण 💞










ना जाने कैसा

आकर्षण था तुझमें

जो मुझे खींच रहा था

अपनी ओर

ये कैसा आकर्षण था

जो मुझे 

कर रहा था पागल

खो जाने को तुझमें….


कुछ धड़कनें सा

लगा था दिल में

एक अनोखा 

अहसास सा

छाने लगा था

मन-मस्तिष्क में…..


जाने कैसा आकर्षण था 

जो मुझे

बांध रहा था तुझसे

सुनों !

कहीं ये 

प्यार तो नही था…..


हाँ, शायद 

प्यार ही था

तभी तो मैं 

बंध गई थी

तुम्हारे आकर्षण में 

तुम्हारी होकर

सदा के लिए.....


✍️ मधु श्रीवास्तव ( प्रयागराज, उत्तर प्रदेश )

💞 अहसास 💞










रैट रेस में शामिल

समय के खिलाफ 

दौड़ी जा रही थी

गंतव्य से अनभिज्ञ 

दिशा विहीन, निरुद्देश्य

आत्मिक चेतना से शून्य 

मृगतृष्णा के सदृश्य

मत भ्रमित

भौतिक वस्तुओं में ढूँढती रही

खुशी, शांति और आनंद।


आंतरिक और बाह्य

जगत का असमन्वय

अभाव की मनोवृत्ति को 

करता रहा दृढ़

नश्वर, स्थूल पदार्थों को 

एकत्रित करने में रही सदा लीन

शाश्वत, सूक्ष्म होता रहा विलीन

समय सीमा में बद्ध 

बस निरंतर दौड़ती रही

बिज़ी सिर्फ स्टेटस ही नही

शब्दकोष बन गया

स्वयं के साथ बैठने 

और चिंतन करने की

कभी फुर्सत कहाँ मिली।


मन अगाह करता रहा

पर मैं उसे अनसुनी करती रही

अपनी स्थगित करने की 

आदत को सुदृढ़ करती हुई

परिणाम से बेखबर

जीवन व्यतीत करती रही

फिर एक दिन हुआ यह अहसास

कहीं ऐसा न हो

समय के खिलाफ दौड़ते-दौड़ते

समय हाथ से फिसल जाए 

और मैं हाथ मलते रह जाऊँ.....


✍️ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )

सोमवार, फ़रवरी 13, 2023

💞 सूखा गुलाब 💞










हमने गुलाब दिया नही हमें गुलाब मिला नही

लेन-देन का था कोई तब ऐसा सिलसिला नही


एक दिन सोचा हमने जब उम्र ढल जाएगी

बसंत आने पर जब मन में बहार ना आएगी


तो हम वह सूखा गुलाब कहां से लाएंगे

बिन गुलाब पुरानी यादें कैसे दोहराएंगे


फिर क्या था हमने बागान से दो गुलाब तोड़े

और एक-एक हम दोनों ने किताबों में रख छोड़े


आज जब भी वह सूखा गुलाब देखती हूँ

सनम की खुशबू तन मन में भर लेती हूँ


  ✍️ संध्या शर्मा ( पटना, बिहार )

🌼 भ्रूण हत्या 🌼

मैं अभी इस दुनिया में आई नही हूँ, फिर मुझसे कैसी नाराज़गी है ? मैं तो बस एक नन्ही-सी जान हूँ, फिर मेरी साँसों से कैसी दुश्मनी है ? माँ, तेरी...