शनिवार, मार्च 18, 2023

🌻 मौन 🌻










मौन मूक नही, मौन रिक्त नही

शब्दहीनता तक न है यह सीमित।


बाह्य मौन और आंतरिक मौन

हैं इसके बहु व्यापक आयाम।


मौन है अंतर्मन का तप

इसे ना समझो तुम अशक्त।


रहस्य अंतर स्थल के करता उद्घाटित 

करता आत्मा को सशक्त।


भावों का होता जब अतिरेक

हम हो जाते जब निर्विवेक।


अंतर्मन के कोलाहल का 

मौन ही तब करता शमन।


मौन समर्थन, मौन प्रतिवाद

मौन की सत्ता है निर्विवाद।


शब्द पड़ जाते जब अक्षम 

मौन अभिव्यक्ति होती सक्षम।


✍️ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )

🌻 औरतें 🌻










औरतें तो गुलाब होती हैं

चांदनी माहताब होती हैं।


घर बनाती भुला सभी मसले

उलझनें बेहिसाब होती हैं।


देखने में भले लगे नाजुक

कम नही वो जनाब होती हैं।


आप फुरसत मिले ज़रा पढ़िये

वो गज़ल की किताब होती हैं।


जान लेती है एक ही पल में

नीयते जब ख़राब होती हैं।


ख़ूबसूरत बला नही कहिए

वो बड़ी लाज़वाब होती हैं।


शख्सियत पर उठे सवालों के

औरतें ख़ुद ज़वाब होती है।


हर जवां दिल सज़ा रहा जिनको

जिंदगी भर का ख़्वाब होती हैं।


रोज़ सपने नयन सजाते हैं

रोज़ वो कामयाब होती हैं।


✍️ सीमा 'नयन' ( देवरिया, उत्तर प्रदेश )

गुरुवार, मार्च 16, 2023

🌻 मौन तोड़ मुस्कराइए 🌻










बैठे चुप मौन साध,भावना छुपा अगाध

तोड़ सारे बांध आप, थोड़ा मुस्कराइए।


गई फागुनी बहार, बही चैत की बयार

मन में खुशी अपार, गीत कोई गाइए।


मन आज डोलता है, सुनो कुछ बोलता है

सुनिये हमारी कुछ, अपनी सुनाइये।


मन में जगी है आस, कहती है हर सांस

जा रहा है मधुमास, आप रुक जाइये।


डाल डाल बौर सजे, पत्तो की पाजेब बजे

कूजती कोयलिया, सुकंत को जगाइए।


कर्णफूल करधनी, चली कहां बनी ठनी

टिकुली किरन सम, चम चमकाइए।


चैत लाया नया साल, सभी जन हों निहाल

सुधरे सभी के हाल, खुशियां मनाइए।


देखो आये नवरात, पुलकित हिय गात

आ रही हैं अंबे मात, शीश तो झुकाइए।


मौन तोड़ हाथ जोड़, आज सारी लाज छोड़

फोड़ नारियल मां से, रिद्धि सिद्धि पाइए।


व्रत दान उपदान, हो बुराई बलिदान

देख देख मां की शान, बलिबलि जाइए।


✍️ सीमा 'नयन' ( देवरिया, उत्तर प्रदेश )

बुधवार, मार्च 15, 2023

🌻 इतनी सी चाह मेरी 🌻










हे ! दया के सिंधु, हे ! नेह के सागर,

भर दीजिए स्नेह से मेरी यह रिक्त गागर।


सब पाप कटे इस कुंठित कलुषित मन के, 

तर जाए यह निर्विघ्न भवसागर से।


ज्ञान का निर्झर बहे अविरत अविरल,

अज्ञान के तम से मुक्त हो यह अकिंचन। 


अभिमान की स्याह से दूषित है अंतरतम, 

भर उठे स्वमान से मेरा यह अंतर्मन।


चंचल, अस्थिर है चित्त जो मेरा पल-पल, 

एकाग्र शांत हो लीन ध्यान में हर पल।


है विनती मेरी परम पिता-परमेश्वर,

हो प्राप्त सद्गति को यह काया नश्वर।


तू निकट हो मेरे उड़े जो प्राण पखेरू,

इतनी सी चाह बस मेरी मेरे स्वयंभू।


✍️ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )

मंगलवार, मार्च 14, 2023

पुनीत अनुपम साहित्यिक समूह द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय ऑनलाइन होली रंगोली साहित्यिक महोत्सव के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम साहित्यिक समूह द्वारा पावन पर्व होली के उपलक्ष्य में ऑनलाइन होली रंगोली साहित्यिक महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसका 'विषय - जीवन‌ के भिन्न-भिन्न रंग' रखा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषय पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस महोत्सव में एक ओर जहां वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी विशिष्ट साहित्यिक शैली का प्रदर्शन किया तो दूसरी ओर समूह से जुड़े नवीन रचनाकारों ने भी अपनी अनूठी भावनाओं और विचारों से समूह का ध्यान आकर्षित किया। इस महोत्सव में सम्मिलित सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन 'पुनीत शब्द रत्न' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर समूह के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने जीवन में रंगों की विशेषता व महत्वता बताते हुए सभी देशवासियों को पावन पर्व होली की शुभकामनाएं दी। उन्होंने महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया और बताया कि समूह आगे भी विभिन्न महत्वपूर्ण दिवसों एवं पर्वों पर इसी तरह से ऑनलाइन साहित्यिक महोत्सव आयोजित करता रहेगा तथा नए रचनाकारों को अपनी साहित्यिक प्रतिभा दिखाने के लिए साहित्यिक मंच उपलब्ध करवाता रहेगा। उन्होंने समूह द्वारा आयोजित होने वाले विभिन्न ऑनलाइन साहित्यिक कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए हिंदी रचनाकारों को सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके समूह की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम कविता कोठारी, शशि सिंह, सीमा मोटवानी, मधु श्रीवास्तव रचनाकारों के रहे।

गुरुवार, मार्च 09, 2023

पुनीत अनुपम साहित्यिक समूह द्वारा आयोजित ऑनलाइन महिला दिवस विशेष साहित्यिक महोत्सव के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम साहित्यिक समूह द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर ऑनलाइन महिला दिवस विशेष साहित्यिक महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसका 'विषय‌ - महिला है विशेष' रखा गया। इस महोत्सव में देशभर की रचनाकार शख्सियतों ने भाग लिया। जिन्होंने एक से बढ़कर एक महिला सशक्तिकरण तथा महिला के भिन्न-भिन्न रूपों पर आधारित अपनी उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस महोत्सव में सीमा मोटवानी ( अयोध्या, उत्तर प्रदेश ) और‌ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल ) द्वारा प्रस्तुत की गई रचनाओं ने समूह का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया। महोत्सव में सम्मिलित सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन 'पुनीत महिला आशीष' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर समूह के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने संसार की समस्त महिलाओं को कोटि-कोटि नमन करते हुए उनकी सांसारिक उपलब्धियों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनके निस्वार्थ सहयोग की सराहना की। उन्होंने महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन भी किया तथा सम्मान पाने वाली सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने हिंदी रचनाकारों को समूह द्वारा आयोजित होने वाले विभिन्न ऑनलाइन साहित्यिक महोत्सवों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके समूह की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम सीमा मोटवानी, कविता कोठारी, मधु श्रीवास्तव, शशि सिंह रचनाकारों के रहे।

बुधवार, मार्च 08, 2023

🐾 जिंदगी अनिश्चित है 🐾










जिंदगी शायद इतनी ही अनिश्चित है

जैसे सुबह घास पर चमकती शबनम

दिखे तो अपने पूरे शबाब के संग

और फिर अचानक भाप हो उड़ जाए।


हाँ, जिंदगी शायद इतनी अनिश्चित है

जैसे एक बुलबुला हो पानी का

सतरंगी सी, सारी कायनात के रंग समेटे

और पलक झपकते एक शून्य हो जाए।


या फिर बहती पुरवाई हो जैसे

सहला जाए, अठखेलियां करे

छू जाए तो तन मन शीतल कर जाए

और पल में जाने किस ओर उड़ जाए।


जिंदगी शायद इतनी ही अनिश्चित है

जैसे ये एक खूबसूरत रंग भरा गुब्बारा 

आसमां को छूने का जुनून लिए उड़ता जाए

पर क्षण में अस्तित्व हवाओं में बिखर जाए।


या फिर एक पहाड़ी दरिया की तरह

तमाम ख्वाहिशें समेटे गिरिफ्त में अपने

बहे तो शिद्दत की रवानी हो, मगरूरियत हो

और अगले ही पल पानी फ़ानी हो जाए।  


जिंदगी शायद इतनी ही अनिश्चित है 

कि आज एक मेला रंगीनियत हो  

हो नाटक या हो कठपुतली का

फिर डोर एक पल में टूट जाए।


✍️ शशि सिंह ( शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश )

🧩 भाग्य और संघर्ष 🧩

भाग्य प्रत्येक का, यहाँ भिन्न-भिन्न है।  जिसने जन्म लिया, इस पृथ्वी पर,  उसे स्वयं ही ज्ञात नही, उसके भाग्य में क्या है ?  परंतु प्रत्येक जी...