मौन मूक नही, मौन रिक्त नही
शब्दहीनता तक न है यह सीमित।
बाह्य मौन और आंतरिक मौन
हैं इसके बहु व्यापक आयाम।
मौन है अंतर्मन का तप
इसे ना समझो तुम अशक्त।
रहस्य अंतर स्थल के करता उद्घाटित
करता आत्मा को सशक्त।
भावों का होता जब अतिरेक
हम हो जाते जब निर्विवेक।
अंतर्मन के कोलाहल का
मौन ही तब करता शमन।
मौन समर्थन, मौन प्रतिवाद
मौन की सत्ता है निर्विवाद।
शब्द पड़ जाते जब अक्षम
मौन अभिव्यक्ति होती सक्षम।
✍️ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )






