रविवार, जुलाई 16, 2023

🤱 यादों की पोटली 🤱









शाम के धुंधलके हैं और

विस्मृत यादों के झोकें है

मन की मृगतृष्णा है या

लहरों में हुई हलचल है

चारों तरफ है ये जो

छायी लालिमा 

आज डूबेगा सूरज 

फिर निकलेगा कल 

बस अम्बर भर ही 

तो थी जो दूरी

रब जाने फिर 

क्यों न हुई पूरी

उस पार परदेस में 

रहता था कोई अपना

रुक गया पलकों पर

बन कर कोई सपना

उठ मन समेट

यादों की पोटली 

छोड़ पलछीन

और यहाँ से चल…


✍️ सीमा मोटवानी ( अयोध्या, उत्तर प्रदेश )

शुक्रवार, जुलाई 14, 2023

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय ऑनलाइन सावन सृजन महोत्सव के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा सावन आगमन के उपलक्ष्य में ऑनलाइन सावन सृजन महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को सावन सहित दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किन्हीं दो विषयों का चयन करके चयनित विषयों पर आधारित रचनाएं लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस महोत्सव में एक ओर जहां वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी विशिष्ट साहित्यिक शैली का प्रदर्शन किया तो दूसरी ओर ग्रुप से जुड़े नवीन रचनाकारों ने भी अपनी अनूठी भावनाओं और विचारों से ग्रुप का ध्यान आकर्षित किया। महोत्सव में सम्मिलित सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन 'पुनीत साहित्य भूषण' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया और सम्मान पाने वाली सभी प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने लोगों को ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम पूनम लता, सीमा मोटवानी, कविता कोठारी, डॉ० कंचन शुक्ला, संध्या शर्मा, भारती राय रचनाकारों के रहे।

गुरुवार, जुलाई 13, 2023

💢 रंग 💢









रंग चेहरे पे कई मेरे आते जाते है

वो ज़रा ज़रा जो करीब आते है

जुस्तुजू की तो थी हमने उनकी

अब क्यों उनसे हम दूर जाते है

रंग चेहरे पे कई मेरे आते जाते है

वो ज़रा ज़रा जो करीब आते है


सुर्ख लाली सा लाल चेहरा है

हया से क्यों ये लाल हुए जाते है

वो ज़रा ज़रा जो करीब आते है

रंग चेहरे पे कई मेरे आते जाते है

वो ज़रा ज़रा जो करीब आते है

उनका आना तो जैसे मन्नत है

रंग होली के साथ लिए आते है

वो ज़रा ज़रा जो करीब आते है

रंग चेहरे पे कई मेरे आते जाते है


वो ज़रा ज़रा जो करीब आते है

वो जो कहते है कहो ग़ज़ल कोई

हम तो खुद ही ग़ज़ल हुए जाते है

वो ज़रा ज़रा जो करीब आते है

रंग चेहरे पे कई मेरे आते जाते है

वो ज़रा ज़रा जो करीब आते है

शुभ खामोश है सफर तो क्या

हर मंज़िल पे उन्हें पाते है

वो ज़रा ज़रा जो करीब आते है


✍️ शुभांजली शर्मा ( यमुना नगर, हरियाणा )

बुधवार, जुलाई 12, 2023

🌧️ घनघोर घटा जब छाए 🌧️









काली बदली क्यों छाए रे

साजन बिन मुझे ना भाए रे

क्यूँ दूजे देश ना जाए रे

यह उमड़-घुमड़ क्यों आए रे


जब तक बूंदें छन-छन करती 

तब तक ही है प्यारी लगती

जब बादल शोर मचाए रे

तब मेरा दिल दहलाए रे


इसलिए मुझे ना भाए रे

क्यों हमसे दूर न जाए रे

बिजली चमक रही नभ में

पीछे घन शोर मचाए रे


बिजुरी तू करना ऐसा री

जा पी को देना संदेसा री

आया सावन पर वह ना आए

घनघोर घटा जब छाए री


✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )

❣️ काश की तुम होते ❣️









काश की तुम होते

तो देखते कि

तुम्हारे होने मात्र से 

कितनी गुलज़ार थी वो गलियाँ 

जो जाती थीं घर की ओर

कितना रौब था

लोहे के उस फाटक में 

जो खुलता था 

घर की मुख्य दहलीज़ पर…


काश की तुम होते

तो देखते कि

कैसे आती थी हवा

महकते फूलों को छूकर

और प्रवेश कर जाती थी 

घर के भीतर

बंद झरोखों और 

किवाड़ों से भी

और मुस्कुरा उठती थी

घर की दीवारें सारी की सारी…


काश की तुम होते

तो देखते कि

जो पीड़ा..जो तकलीफ़ें

झट से ओझल हो जाती थी

तुम्हारी उपस्थिति मात्र से

अब कैसे मुस्कुरा निहारती हैं मुझे

देखती हैं एकटक…

मानो पूछती हों… अब कौन ?


देखो ना कैसी भुलक्कड़ हूँ

भूल गयी बताना

हालाँकि

उन गलियों में 

कुछ हफ़्तों पहले ही बनी है 

नयी चमाचम सड़क

पर हैं कितनी बेजान और अर्थहीन 

क्योंकि अब तुम नही हो…


अभी पिछले ही महीने 

नया रंग रोगन हुआ है

फाटक का भी 

उसके बावजूद वो लगता है 

बेरंग और उदास

क्योंकि अब तुम नही हो…

अब तो खुली रहती है

सारी खिड़कियाँ… सारे झरोखे 

पर अब लौट जाती है हवा

झांक बाहर से ही

क्योंकि तुम नही हो 


और दीवारें मायूस हो

अब भी ताकती हैं तुम्हारा रास्ता

कि तुम आओगे शायद 

और भर दोगे उन्हें जीवंतता से…

तुम्हारे ना होने का अहसास

कितना पीड़ादायक है

और कितना असहनीय

काश की तुम होते

तो देखते कि

कितने मायने थे तुम्हारे होने के…


✍️ भारती राय ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

⛲ फिर आया सावन ⛲


    







फिर आया सावन।

नव किसलयों से करता,

अठखेलियाँ समीर चंचल।

सहलाता उलझी-रूखी अलकें मेरी।

आवारा भ्रमर करते फूलों से गुफ्तगूं,

कानों में मेरे, गुनगुनाते कई बिसरे गीत।


श्यामल घन घटाएँ अंबर का करती आलिंगन, 

यादों की दरख़्तों से झाँकते रोमांचक पलछिन।

बरसने को आतुर एक सावन मन में भी मेरे, 

जी लेने को व्याकुल कितने अनछुए सपने।


बरसती धरा ओ मन पर मृदुल बूँदे,

हर तृषा हमारी कर जाती तृप्त।

हुलसित हो उठते क्षुब्ध मन प्रांगण, 

हो एकरस रचते फिर हम नया सरगम।


✍️ कविता कोठारी (कोलकाता, पश्चिम बंगाल)

रविवार, जुलाई 09, 2023

⛲ भीगी सड़क, भीगी पलकें ⛲









वो बरसात की,

इक काली रात थी,

भीगी सड़क,

सुनसान थी,

दामिनी,

चमक-चमक कर,

रास्ता दिखा रही थी,

बिजली की कड़क,

मन में दहशत,

भर रही थी,

भीगा बदन,

कंपकंपा रहा था,

कदम मंजिल,

की ओर बढ़ रहे थे,

तभी सन्नाटे को चीरती,

एक आवाज आई।


भीगी हुई वह कली,

दहशत से भरी,

दौड़ने लगी,

भीगी सड़क पर,

लड़खड़ाते हुए गिरी,

आंखों से आंसूओं,

का सैलाब फूटा,

मन कृष्णा को,

पुकार उठा,

हे कान्हा मुझे बचाओ,

मेरे वज़ूद को,

बिखरने न दो,

इस अंधेरी रात का,

कलंक मेरे माथे पर न लगे,

मेरी अस्मत,

तार-तार न हो जाए।


तभी एक साया,

वहां आया,

जिसे देखकर,

मन घबराया,

दो हाथ बढ़े,

मन चित्कार उठा,

तभी स्नेह में डूबा,

एक स्वर सुनाई दिया,

बहन घबराओ नहीं,

हाथ थाम लो,

उठ जाओ,

अपने इस अंजान,

भाई के साथ,

भीगी सड़क पर,

चलते हुए अपने घर,

अपनों के बीच पहुंच जाओ।


मैं हर उस लड़की का,

भाई हूँ जो सुनसान,

सड़कों पर निकलती है,

अपने परिवार की खातिर,

उसके वज़ूद का रक्षक बन,

मैं साए की तरह साथ,

चलता हूँ,

हर बहन बेटियों की,

दुआएं बटोरता हूँ,

क्योंकि कभी,

इसी सुनसान भीगी सड़क पर,

कोई रूसवा हुआ,

दरिंदों की दरिंदगी से,

फिर कभी नही लौटा,

वह हम साया,

अपनी चौखट पर।।


✍️ डॉ. कंचन शुक्ला ( अयोध्या, उत्तर प्रदेश )

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित ऑनलाइन ‘सावन सृजन महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा सावन आगमन के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन ‘सावन सृजन महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को सावन ...