शाम के धुंधलके हैं और
विस्मृत यादों के झोकें है
मन की मृगतृष्णा है या
लहरों में हुई हलचल है
चारों तरफ है ये जो
छायी लालिमा
आज डूबेगा सूरज
फिर निकलेगा कल
बस अम्बर भर ही
तो थी जो दूरी
रब जाने फिर
क्यों न हुई पूरी
उस पार परदेस में
रहता था कोई अपना
रुक गया पलकों पर
बन कर कोई सपना
उठ मन समेट
यादों की पोटली
छोड़ पलछीन
और यहाँ से चल…
✍️ सीमा मोटवानी ( अयोध्या, उत्तर प्रदेश )






