जब से हुआ मुझे आत्मज्ञान,
पा ली मैंने अपनी पहचान।
विलीन हुए सब मान-अभिमान,
करती हूँ अनुभव अब मैं स्वमान।
एक अनुपम उपलब्धि का हो रहा बोध,
मन में न है अब कोई विरोध।
विचारों पर ना कोई प्रतिबंध,
उड़ाने भर रहा मन स्वच्छंद।
जीवन में आ गई है नई भोर,
प्रफुल्लता से मन हो रहा विभोर।
नकारात्मक सोच को जब दिया विराम,
सकारात्मक ऊर्जा तब हुई गतिमान।
सृजनात्मकता का हुआ जब प्रादुर्भाव,
नवीनता का रहा न कोई अभाव।
समृद्ध अनुभवों का हुआ जब निवेश,
अव्यक्त भावनाओं को मिला दिशा निर्देश।
परिपक्वता का मानती हूँ आभार,
असंख्य संभावनाओं के खुल गए द्वार।
समग्र क्षमताओं का हुआ विकास,
संतृप्त मन ने किया पूर्णता का एहसास।
अपरिमित आशाओं से भर उठा मन-प्राण,
मानो आत्मा को मिल गया हो त्राण।
बुढ़ापा जीवन का स्वर्णिम पड़ाव,
निरंकुश गति को देता ठहराव।
लगता है ज्यों कोई वरदान,
मानो ईश्वर का हो अवदान।
✍️ कविता कोठारी ( कोलकाता, पश्चिम बंगाल )