घुमड़-घुमड़ कर आये कारे बदरा ,
"रिमझिम बरखा बहार आई",
शीतल बयार लाई,
अंबर गहराया सा दामिनी दमक रही,
जन-जन झूम उठे ,मन मयूर नाच उठे,
कृषक मन प्रफुल्लित, खेत लहलहा रहे,
वन-उपवन खिल उठे ,
नवजीवन संचार हुआ,
शुष्क तरुओ में फिर से हरियाली लायी ,
सरिता भी रिमझिम में मंद मंद मुस्काती
सी,
इठलाती ,बलखाती , कल-कल बहती जाती सी,
मृतप्राय वसुंधरा में चेतना संचार हुआ,
हरियाली का दुशाला ओढ़ उसका श्रंगार हुआ,
तांडव मचाती ग्रीष्मता, शीतल बूंदों में समाई,
" रिमझिम बरखा बहार आई" ,
प्रेमियों के हृदय में बरखा ने आस की ज्योत जलाई,
बचपन में देखो कैसे जल में नाव चलाई,
कुहु भी कूक रही और मयूर भी थिरक रहे ,
नर-नारी,बाल , वृद्ध सबके मन पुलक रहे ,
"रिमझिम बरखा बहार आई" ।
✍️ डॉ. ऋतु नागर ( मुंबई, महाराष्ट्र )
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