हिंदी केवल भाषा नही,
यह संस्कारों की जननी है।
माँ की लोरी में गूँजती,
बचपन की मीठी धुन है।।
जब माँ प्यार से समझाती है,
हिंदी मन में उतर जाती है।
दादी-नानी की कहानियों में,
जीवन की सीख दे जाती है।।
‘माँ’ कहने में जो अपनापन है,
‘पिता’ कहने में जो सम्मान है,
‘गुरु’ शब्द में जो श्रद्धा है,
हिंदी में वही तो संस्कारों की पहचान है।।
हिंदी हमें जोड़ना सिखाती है,
बड़ों का आदर करना सिखाती है।
छोटों को स्नेह देना सिखाती,
रिश्तों की गरिमा समझाती है।।
रामायण की मर्यादा इसमें,
गीता का ज्ञान समाया है।
कबीर की वाणी, मीरा का प्रेम,
शब्दों में दीप जलाया है।।
यह भाषा खेतों की मिट्टी में है,
यह गाँव की पगडंडी में है।
यह चौपाल की बातों में है,
यह शहरों की हलचल में है।।
हिंदी में दर्द कहें तो आँखें नम हो जाती हैं,
हिंदी में प्रेम लिखें तो भावनाएँ मुस्काती हैं।।
हिंदी में माँ को पुकारें तो मन भर आता है,
हिंदी में देश कहें तो सीना गर्व से उठ जाता है।।
बदलते समय के साथ हम आगे बढ़ें,
नई भाषाएँ सीखें, नए सपने गढ़ें।
लेकिन अपनी जड़ों को न भूलें कभी,
हिंदी को अपने हृदय से निकालें नहीं।।
आओ आज यह संकल्प उठाएँ,
हिंदी को जीवन में सम्मान दिलाएँ।
बोलें हिंदी, लिखें हिंदी,
हिंदी को हर मन तक पहुँचाएँ।।
हिंदी हमारी आत्मा है,
हिंदी हमारी आवाज़ है।
हिंदी से ही संस्कृति जीवित,
हिंदी पर हमें नाज़ है।।
✍️ अंजू मल्लिक ( पटना, बिहार )

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