शनिवार, अक्टूबर 03, 2026

🙍‍♀️ विदाई — नई उम्मीदों के संग 🙍‍♀️








आज बाबुल के आँगन में,

क्यों छाई है उदासी,

कल तक थी जो घर की रौनक,

आज वही बेटी है प्रवासी।


माँ की आँखों में हैं आँसू,

पिता के मन में प्यार,

दहलीज़ खड़ी है चुपचाप आज,

देख रही बेटी का संसार।


जिस आँगन में पली-बढ़ी मैं,

जिस आँगन ने दिया दुलार,

उस आँगन की हर इक यादें,

रहेंगी दिल में बारंबार।


माँ की ममता साथ रहेगी,

पिता की दुआएँ साथ,

भाई-बहनों की मीठी बातें,

दिखलाएँगी जीवन की राह।


अब एक नई डगर है आगे,

नया है मेरा गाँव,

नए रिश्ते, नए सपने हैं,

नया सजेगा मेरा ठाँव।


आँखों में कुछ नम-नम सपने,

मन में नई उमंग,

नई सुबह का नया उजाला,

जीवन में भरेगा रंग।


कल तक थी मैं बाबुल की बिटिया,

आज किसी की जीवन संगिनी,

अपने सपनों को साथ लिए मैं,

बनूँगी घर की नई कहानी।


नही विदाई अंत कहानी की,

यह तो नई शुरुआत है,

एक घर छूटा है पीछे,

आगे पूरा जीवन साथ है।


बाबुल, आँसू रोक लेना तुम,

मुझको देना आशीष,

नई डगर पर कदम बढ़ाऊँ,

मन में रखकर नई उम्मीद।


मायके की खुशबू साथ लिए मैं,

चल दूँगी उस पार,

बेटी हूँ—कल भी थी, आज भी हूँ,

बस बदल गया है मेरा संसार।


✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

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