माँ, की साड़ी केवल वस्त्र नही होती, वह बेटी के बचपन, संस्कार और अनंत प्रेम की सबसे सुंदर धरोहर होती है।"
माँ को इस दुनिया से गए पूरे आठ वर्ष हो चुके है, लेकिन कुछ रिश्ते समय के साथ समाप्त नही होते, वे स्मृतियों में और गहरे उतर जाते हैं। आज सुबह से ही मन बहुत व्याकुल था। आज मेरी बेटी की सगाई थी। घर में चारों ओर खुशियों का वातावरण था, पर मेरे भीतर एक अजीब-सी कसक उठ रही थी। आज यदि माँ होतीं तो सबसे अधिक प्रसन्न वही होतीं। माँ, मेरी बेटी को दुलारती, उसकी नजर उतारती, और अपनी साड़ी के पल्लू से उसका माथा सहलाकर आशीर्वाद देती। हर तैयारी में उनकी सलाह होती, हर रस्म में उनका स्नेह और हर मुस्कान में उनका आशीर्वाद। शायद इसी कारण सुबह से मन बहुत भारी था और माँ की याद बार-बार आँसू बनकर आँखों में उतर रही थी।
इन्हीं विचारों में डूबी मैं अलमारी तक पहुँची। धीरे से सूटकेस खोला। सबसे नीचे सहेजकर रखी माँ की प्रिय साड़ी निकाली। वर्षों बाद जब उस साड़ी पर हाथ फेरा, तो लगा जैसे कपड़े को नही, माँ के स्नेहिल स्पर्श को छू रही हूँ। पलभर में स्मृतियों के बंद दरवाज़े खुल गए और आँखों से आँसू बह निकले।
याद आया... बचपन में जब रात को नींद नहीं आती थी, माँ अपनी साड़ी का पल्लू मेरे हाथ में थमा देती थी। पता ही नही चलता था कि कब उसी पल्लू को थामे-थामे गहरी नींद में सो जाती। जैसे उस आँचल में दुनिया भर की शांति समाई हो।
थोड़ी बड़ी हुई तो माँ जहाँ-जहाँ जाती, मैं उनकी साड़ी का पल्लू पकड़े पीछे-पीछे चल देती। वह पल्लू मेरे लिए किसी डोर से कम नही था। विश्वास था कि जब तक यह हाथ में है, दुनिया की कोई भी कठिनाई कोई मुसीबत मेरा कुछ नही बिगाड़ सकती।
पिताजी कभी डाँटते तो मैं भागकर माँ की साड़ी के पीछे छिप जाती। सच ही तो है, बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित स्थान माँ का आँचल ही होता है। माँ यदि पड़ोस तक भी चली जाती, तो मैं दौड़ती हुई उनके पीछे पहुँच जाती। लोग हँसते हुए कहते, "देखो, बछिया आ गई।" माँ को उनका मजाक चुभता और वो मुझे समझाती "बेटा, थोड़ा अकेले रहना भी सीखो।" लेकिन मेरी दुनिया तो बस माँ थी।
आज वही सारी यादें चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूम रही थी। फर्क बस इतना था कि आज माँ का पल्लू था, पर माँ नहीं थी।
"माँ..." बेटी की आवाज़ ने मेरी निंद्रा तोड़ी।
वह मेरे पास आई। मेरी नम आँखें देखकर बोली, "क्या हुआ माँ ? आज तो खुश होने का दिन है।"
मैं चुप रही। तभी उसकी नज़र माँ की साड़ी पर पड़ी। उसने साड़ी उठाई और मुस्कुराकर बोली, "माँ, क्या आज मैं नानी की यही साड़ी पहन लूँ ? मेरी सगाई है... नानी का आशीर्वाद भी तो मेरे साथ रहेगा।"
उसकी बात सुनकर मेरी आँखें भर आईं। मैंने प्यार से कहा, "बेटा, यह सिर्फ साड़ी नही है, तीन पीढ़ियों का प्यार है और साड़ी उसकी ओर बढ़ा दी।
कुछ देर बाद जब वह साड़ी पहनकर मेरे सामने आई, तो लगा जैसे समय आठ वर्ष पीछे लौट आया हो। वही सहज मुस्कान, वही सादगी, वही ममता... एक पल को लगा, माँ स्वयं मेरे सामने खड़ी हैं।
मैंने बेटी को कसकर गले लगा लिया। तभी भीतर से एक आवाज़ आई—"तू माँ को कहाँ ढूँढ़ रही थी ? वह कभी तुझसे दूर गई ही नही। वह तेरे संस्कारों में थी, तेरी स्मृतियों में थी और आज तेरी बेटी के रूप में फिर तेरे सामने खड़ी है।"
उस दिन समझ आया कि माँ की साड़ी कभी पुरानी नही होती। वह पीढ़ियों को जोड़ने वाला वह धागा होती है, जिसमें त्याग, प्रेम, संघर्ष और अनगिनत आशीर्वाद बुने होते हैं। उसमें वर्षों बाद भी ममता की वही खुशबू बसती है। सच ही कहा गया है—माँ चली जाती है, पर उसकी साड़ी में लिपटा स्नेह कभी पुराना नही होता। हर बेटी के लिए माँ का आँचल ही उसका पहला घर, पहली पाठशाला और जीवन का सबसे सुरक्षित संसार होता है।"
✍️ अरुणा चतुर्वेदी ( बूंदी, राजस्थान )

बहुत बहुत धन्यवाद मेरी रचना को प्रकाशित करने के लिए
जवाब देंहटाएंमेरी रचना को प्रकाशित करने के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद
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