मंगलवार, नवंबर 03, 2026

🌸 यदि वह लहू पुरुष का बहता...🌸









यदि विधाता सृष्टि का वह नियम बदल देता,

नारी का वह मासिक क्रंदन, पुरुष की झोली में धर देता,

तो अहंकार की दीवारों में शायद कोई दरार होती,

दर्द जिसे हम कमज़ोरी कहते, उसकी सही पहचान होती।


अगर विधाता पुरुषों को भी यह माहवारी थमा देते,

नारी की वो मासिक उलझन आदमी को समझा देते,

तो सच मानो इस दुनिया का सारा नज़रिया बदल जाता,

आज जो दर्द 'मूडस्विंग' कहलाता, वो राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता।


जो पैड्स आज छुपकर बिकते हैं काली पन्नियों के अंदर,

वो सजते मेडिकल स्टोरों पर, जैसे कोई परचम हो सुंदर।

सड़कों पर बैनर लग जाते, टीवी पर विज्ञापन आते,

"पुरुषों का गौरव है यह" कह, सब सीना तान के बतलाते।


करवट लेने पर जो पेट में उठती एक तीखी सी ऐंठन,

तो समझ आता पुरुष को, क्या होती है तन की टूटन।

नारी के उस मूक सब्र का, तब जाकर सम्मान होता,

यह कुदरती चक्र बिमारी कहकर यूँ ही बदनाम ना होता।


ना कोई अछूता कहता उनको, ना पूजा करने से रोकता,

ना रसोई के बाहर कोई, उनको बैठने को टोकता।

तब समझ में आता, यह दाग नही, एक सृजन है,

बिना किसी हिंसा बहता, यह जीवन का ही स्पंदन है।


तब समझता संसार, वह कमज़ोर नही ; शक्तिरूप है,

जो हर महीने सहती चुपचाप, एक तपती हुई धूप है।

सृष्टि के इस पावन चक्र को तब मस्तक सजाया जाता,

नारी शक्ती समर्थ रहती, यदि वह लहू पुरुष का बहता। 


✍️ अमोल बारई ‘कविमोल’ ( ठाणे, महाराष्ट्र )

1 टिप्पणी:

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