हरे-भरे जो हाथ पसारे,
खड़े रहे जो सदियों से।
आज वही तरु काँप रहे हैं,
मानव की इन कुल्हाड़ियों से।
नदियाँ जो अमृत लाती थी,
अब विष का घूँट बहाती हैं।
मैली चादर ओढ़ के अपनी,
सागर से मिलने जाती हैं।
पक्षी का वह करुण विलाप,
सूखे पेड़ की डाल पे सुनो।
कटते जंगल, छिनते बसेरे,
इस खामोश दर्द को गुनो।
प्रकृति अब भी सह रही है,
पर धीरज का बाँध न टूटे।
चेत जाओ ऐ इंसान अब भी,
कहीं साँसों का साथ न छूटे।
✍️ श्रीजी जैन ( शाहदरा, दिल्ली )

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