शनिवार, अक्टूबर 03, 2026

🙍‍♀️ विदाई — नई उम्मीदों के संग 🙍‍♀️








आज बाबुल के आँगन में,

क्यों छाई है उदासी,

कल तक थी जो घर की रौनक,

आज वही बेटी है प्रवासी।


माँ की आँखों में हैं आँसू,

पिता के मन में प्यार,

दहलीज़ खड़ी है चुपचाप आज,

देख रही बेटी का संसार।


जिस आँगन में पली-बढ़ी मैं,

जिस आँगन ने दिया दुलार,

उस आँगन की हर इक यादें,

रहेंगी दिल में बारंबार।


माँ की ममता साथ रहेगी,

पिता की दुआएँ साथ,

भाई-बहनों की मीठी बातें,

दिखलाएँगी जीवन की राह।


अब एक नई डगर है आगे,

नया है मेरा गाँव,

नए रिश्ते, नए सपने हैं,

नया सजेगा मेरा ठाँव।


आँखों में कुछ नम-नम सपने,

मन में नई उमंग,

नई सुबह का नया उजाला,

जीवन में भरेगा रंग।


कल तक थी मैं बाबुल की बिटिया,

आज किसी की जीवन संगिनी,

अपने सपनों को साथ लिए मैं,

बनूँगी घर की नई कहानी।


नही विदाई अंत कहानी की,

यह तो नई शुरुआत है,

एक घर छूटा है पीछे,

आगे पूरा जीवन साथ है।


बाबुल, आँसू रोक लेना तुम,

मुझको देना आशीष,

नई डगर पर कदम बढ़ाऊँ,

मन में रखकर नई उम्मीद।


मायके की खुशबू साथ लिए मैं,

चल दूँगी उस पार,

बेटी हूँ—कल भी थी, आज भी हूँ,

बस बदल गया है मेरा संसार।


✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

👩‍💼 माहवारी एक सहज और स्वस्थ विमर्श 👩‍💼








यह कोई अभिशाप नही, ना ही शर्म की कोई बात है,

सृजन की पावन प्रक्रिया में प्रकृति की सौगात है,

हर नारी के जीवन का यह सहज और सुंदर चक्र है,

जिससे चलती दुनिया सारी उससे आती क्यों शर्म है ?


महीने के वह चार दिन अशुद्धी या कोई पाप नही, 

रूढ़ियों की बेड़ियों में जकड़ना सही कोई इंसाफ नही,

रसोई से दूरी, मंदिर से दूरी क्यों ऐसे नियम बनाए हैं ?

जिसने जीवन को जन्म दिया उसे क्यों अछूत बताए हैं ?  


अब तोड़ो चुप्पी इस विषय पर खुलकर बात जरूरी है,

माहवारी के उन दिनों में स्वच्छता और देखभाल जरूरी है,

अंधविश्वास के इस अंधेरे को जागरूकता से मिटाना है,

हर बेटी और हर मां को अब खुलकर मुस्कुराना है।


✍️ श्रीजी जैन ( शाहदरा, दिल्ली )

👩‍🎓 जागरुक नारी 👩‍🎓








सवाल पूछती जागरुक नारी 

क्या नारी को बात-बात पर टोकना 

है बस क्या यही दुनियादारी 


तुम नारी हो पल्लू में रहो

ज्यादा तो क्या, कुछ न कहो

अन्याय को चुपचाप सहो

तुम नारी हो पल्लू में रहो


एक बात सुनो लगा के ध्यान 

तानों से झुक जाने वाली 

नही रही नारी की पहचान

चार बात सुना के जाना

तुम्हारे लिए होगा आसान 

पर कड़ी निंदा सुन, चुप रह जाए 

इतनी अब वो नही नादान 


नारी नही किसी की संपत्ति

नारी से ही वंश की उत्पत्ति

नारी ने ही वंश बढ़ाया सबका 

अपना अस्तित्व खोकर घर सजाया सबका


सीधी बात अब नारी नही बेचारी है

वो समाज के लिए कल्याणकारी है 

इसलिए सवाल पूछने की उसकी बारी है


✍️ प्रियंका पुष्करणा ( चित्तौड़गढ़, राजस्थान )

🌸 प्रतिध्वनि 🌸

घर के पिछले कमरे में पसरी दवाइयों की तीखी गंध अब नीलिमा के अस्तित्व का हिस्सा बन चुकी थी। माँ जी पिछले दस दिनों से बिस्तर पर थी। उनके फेफड़ों की जकड़न और हर सांस के साथ उठती घरघराहट कमरे की दीवारों से टकराकर वापस नीलिमा के कानों में गूँजती। नीलिमा रात-भर जागती। वह केवल दवाइयां ही नही देती थी, वह माँ जी के चेहरे पर उभरती शिकन को भी पढ़ती थी। जब माँ जी को खांसी का दौरा पड़ता, नीलिमा का अपना गला खिंचने लगता। वह उनके सीने पर बाम मलती, तो उसे महसूस होता कि जैसे वही जकड़न उसके अपने सीने में भी उतर रही है। "बहू, तू सो जा... पीली पड़ गई है तू," माँ जी कांपती आवाज में कहती। नीलिमा बस मुस्कुरा देती। उसे लगता कि माँ जी की बीमारी एक अदृश्य कोहरे की तरह है, जो धीरे-धीरे पूरे कमरे से होता हुआ उसे अपनी गिरफ्त में ले रहा है। यह संक्रमण की बीमारी नही थी, यह संवेदना का अतिरेक था। ग्यारहवें दिन की भोर हुई। माँ जी का बुखार उतर चुका था, लेकिन वे बेहद कमजोर थी। उन्होंने पानी माँगने के लिए आवाज दी, "नीलिमा..."बाहर बरामदे से कोई उत्तर नही आया। माँ जी सहारा लेकर उठी और लड़खड़ाते कदमों से बाहर आईं। सामने जो देखा, वह स्तब्ध कर देने वाला था। नीलिमा फर्श पर पड़ी थी, उसका शरीर तप रहा था और उसकी सांसों में वही घरघराहट थी जो कल तक माँ जी के सीने में थी। डॉक्टर आए। उन्होंने जांच की और सिर हिलाते हुए बोले, "अजीब बात है, इन्हें संक्रमण तो नही है, पर इनके लक्षण बिल्कुल वही हैं जो कल तक माँ जी के थे। शरीर हार गया है। "पड़ोस वाली ताई ने फुसफुसाकर कहा, "काम के डर से बीमारी का बहाना ढूंढ लिया बहू ने। "माँ जी ने नीलिमा के तपते माथे पर हाथ रखा। उन्होंने देखा कि नीलिमा की बंद आंखों के किनारे से आंसू बह रहे थे। वे ताई की बात सुनकर दुःख से आघात नही हुई, बल्कि एक गहरी करुणा से भर गईं। माँ जी समझ गईं कि यह बहाना नही, बल्कि नीलिमा का वह 'सत्य' था, जहाँ सेवा करते-करते वह अपनी सत्ता खो चुकी थी। नीलिमा ने माँ जी की बीमारी को केवल देखा नही था, उसे ओढ़ लिया था। अब कमरे में एक स्वस्थ हो रही वृद्धा थी और एक वह युवती, जिसका अवचेतन मन हार मान चुका था। दुख का हस्तांतरण पूरा हो चुका था।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

🌺 मर्यादा 🌺








मर्यादा केवल शब्द नही,

यह जीवन का संस्कार है,

जहाँ रिश्तों में सम्मान रहे,

वही सच्चा परिवार है।


बड़ों का आदर करना सीखो,

छोटों को प्यार देना सीखो,

अपने शब्दों पर संयम रखकर,

रिश्तों को सँवारना सीखो।


आज की इस भागती दुनिया में,

सबको आगे बढ़ने की जल्दी है,

पर भूल रहे हैं हम अक्सर,

मर्यादा भी जीवन की सीढ़ी है।


नारी का सम्मान जहाँ होता है,

वहीं संस्कृति जीवित रहती है,

और जहाँ अपमान को चुप्पी मिले,

वहाँ इंसानियत भी सहमी रहती है।


मर्यादा का अर्थ बंधन नही,

यह अपने मूल्यों की पहचान है,

अपने अधिकारों के साथ-साथ

दूसरों का सम्मान भी महान है।


मैं मानती हूँ —

आधुनिक बनना अच्छी बात है,

पर अपनी जड़ों को भूल जाना,

कभी प्रगति की पहचान नही।


हम बदलें, समय के साथ बदलें,

पर संस्कारों को साथ रखें,

अपने आचरण से आने वाली पीढ़ी को,

मर्यादा का अर्थ समझाएँ।


क्योंकि ऊँचा पद नही,

ऊँची सोच इंसान को महान बनाती है,

और मर्यादा में रहकर जीने की कला,

मनुष्य को सच्चा इंसान बनाती है।


मर्यादा रहे तो रिश्ते बचेंगे,

संस्कार रहें तो समाज बचेगा,

और जब इंसानियत जीवित रहेगी,

तभी हमारा भविष्य सजेगा।


✍️ शिखा चंदेल ( देहरादून, उत्तराखंड )

शुक्रवार, अक्टूबर 02, 2026

👩‍💼 ईश्वर का विशेष वरदान है बेटी 👩‍💼








सभ्यता, संस्कृति, संस्कार है बेटी 

जीवन की रौनक, बहार है बेटी

हर मुश्किल का सहारा है बेटी

डूबती किश्ती का किनारा है बेटी

अधिकारों की आवाज़ है बेटी 

मानवता के सिर का ताज है बेटी 


खुशियो की सौगात है बेटी

माँ-बाप की औकात है बेटी

गुरुओं का गुरुर है बेटी 

खुशी का सुरूर है बेटी 

निराशा में आशा है बेटी 

मर्यादा की भाषा है बेटी


कुदरत ने फुर्सत से बनाई है बेटी 

अपने में हर गुण समाई है बेटी 

घर-परिवार की जान है बेटी 

दो कुलों की शान है बेटी

इस युग की नई पहचान है बेटी

ईश्वर का विशेष वरदान है बेटी


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

🌿 नारी, तकदीर बदल सकती है 🌿



 





वो नारी ही है, जो घर-घर की

तकदीर बदल सकती है

उत्तम रचना है कुदरत की

माता कहलाती धरती सी

अबला ना समझो इसको 

यह दुनिया की तस्वीर बदल सकती है

वो नारी ही है, जो घर-घर की

तकदीर बदल सकती है


हाथों में चूड़ियां खनकती है

मेहंदी हाथों की चमकती है

ताकत है उसकी कलाई में

लक्ष्मी बाई बन विपत्ति में

शमशीर पकड़ सकती है

वो नारी ही है, जो घर-घर की

तकदीर बदल सकती है


वे लोग अलग होते होंगे

जो खुद को मजबूत समझते होंगे 

कुछ ऐसे लोग भी होते हैं

जो किस्मत का रोना रोते है 

कभी गृहलक्ष्मी बन, कभी वंश बढ़ाकर 

हाथों की लकीर बदल सकती है

वो नारी ही है, जो घर-घर की

तकदीर बदल सकती है


✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )

🌻 तुम्हारे शब्द अक्सर....🌻









तुम्हारे शब्द अक्सर मन पर घाव कर जाते है

भर आता है दिल लेकिन हम

बस मुस्कुरा कर रह जाते है

लगाकर फूल भी हम काँटों का बाग पाते हैं 

मांगनी पड़ती है हमें, मोहब्बत भी महबूब से

और वो उसमें भी एहसान जताते है


लोग कहते हैं कि 

सीरत की बातें हैं

सूरत नही देखी जाती

अंदर की सुंदरता से ही

दिल जीत लिए जाते हैं

सीरत अच्छी या सूरत

अब भला यह कौन जाने 


कोई कह दे अगर कि तुम काली हो

तो वह नये-नये तरीकों से रूप-रंग संवारेगी 

कोई कह दे अगर कि तुम मोटी हो

तो वह खाना छोड़ देगी

कोई कह दे अगर कि तुम छोटी हो

तो वो हील पहन तुम्हारे कद की बराबरी करेगी

अपने आपको तुम्हारे काबिल बनाने लग जायेगी

तुम्हारी हर कमियों को नज़र अंदाज़ करती 

अपनी हर कमी को सुधारती 

तुम से इतना ऊपर चली जाती हैं कि

उसमे कोई भी कमी नही रहती


तुम क्यूँ हर बार उसमें नुख़्स निकालते हो

क्यूँ तरह-तरह के साँचे में उसे ढालते हो

क्यूँ नही समझा त्याग जो किया उसने तुम्हारे लिए

क्यूँ उसे उसकी नज़रों मे ही नीचे गिराते हो 

तुम समझना ही नही चाहते कि

सुंदरता देह मे नही मन में बसती है

तुम देखना ही नही चाहते कि

प्रेम को उसकी आँखें तरसती है

काश ! तुमने इस चमक-दमक से परे

एक प्रेम की दुनिया देखी होती

काश ! तुम जान पाते कि

हर इक लड़की खूबसूरत होती है


पर तुम तो रह रहे हो अपनी बनाई शर्तों के जाल में

कभी देखो करीब से पहुँच गई है वो किस हाल में

कभी किया है क्या महसूस तुमने एहसास उसके 

कभी देखा है क्या खुद को आईने मे साथ उसके 


देखना कभी गौर से

तुम्हारी हर शर्तों को पूरा करते-करते 

हर बार खुद को बदलते-बदलते

वो स्वयं में सम्पूर्ण नज़र आएगी

और साथ खड़े तुम

हर बार नाक-भौंह सिकोड़े 

खुद को अतृप्त ही पाओगे

वो निखर जाएगी

खुद की नज़रों में एक दिन

और तुम आदतन

कमी ही तलाशते रह जाओगे।


✍️ मीनू शर्मा ( सोहन गंज, दिल्ली )

रविवार, सितंबर 27, 2026

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय ऑनलाइन ‘नारी कल्याणकारी साहित्यिक महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा नारी महत्व को दर्शाने व नारी गुणों को नमन करने के उद्देश्य से ऑनलाइन ‘नारी कल्याणकारी साहित्यिक महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को नारी से संबंधित दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किन्हीं दो विषयों का चयन करके चयनित विषयों पर आधारित रचनाएं लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के रचनाकारों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक उत्कृष्ट रचनाओं के द्वारा नारी गुणों का गुणगान करते हुए महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस महोत्सव में एक ओर जहां वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी विशिष्ट साहित्यिक शैली का प्रदर्शन किया तो दूसरी ओर ग्रुप से जुड़े नवीन रचनाकारों ने भी अपनी अनूठी भावनाओं और विचारों से ग्रुप का ध्यान आकर्षित किया। महोत्सव में सम्मिलित होकर उत्कृष्ट रचनाएं प्रस्तुत करने वाले रचनाकारों को ऑनलाइन 'पुनीत साहित्य श्री' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने संसार की समस्त महिलाओं को कोटि-कोटि नमन करते हुए उनकी सांसारिक उपलब्धियों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनके निस्वार्थ सहयोग की सराहना की। उन्होंने महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया तथा सम्मान पाने वाली सभी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन साहित्यिक कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए रचनाकारों को सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम रागिनी ठाकुर, संध्या शर्मा, सुमित्रा कुमारी रजक, शिखा चंदेल, सुरिंदर अजनबी, रत्ना वाधवानी, मीनू शर्मा, श्रीजी जैन, प्रियंका पुष्करणा रचनाकारों के रहे।

शुक्रवार, सितंबर 25, 2026

🌸 नारी है विशेष 🌸

नारी केवल एक नाम नही, बल्कि ममता, शक्ति, त्याग, साहस और सृजन का अद्भुत संगम है। वह जीवन को जन्म देती है, परिवार को संस्कार देती है और समाज को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए कहा गया है—“नारी है तो सृष्टि है, नारी है तो संसार है।”

नारी के जीवन में अनेक भूमिकाएँ एक साथ जुड़ी होती हैं। वह बेटी बनकर घर में खुशियाँ लाती है, बहन बनकर स्नेह बाँटती है, पत्नी बनकर जीवनसाथी का साथ निभाती है और माँ बनकर अगली पीढ़ी का निर्माण करती है। लेकिन नारी की पहचान केवल इन रिश्तों तक सीमित नही है। आज वह शिक्षिका, डॉक्टर, वैज्ञानिक, अधिकारी, सैनिक, कलाकार, उद्यमी और नेतृत्वकर्ता के रूप में भी अपनी प्रतिभा और क्षमता का परिचय दे रही है।

एक महिला के लिए घर और कार्यक्षेत्र के बीच संतुलन बनाना आसान नही होता। फिर भी वह अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए अपने सपनों को भी पंख देती है। कभी बच्चे की देखभाल करती है, कभी परिवार का सहारा बनती है और कभी अपने पेशे में नई ऊँचाइयाँ हासिल करती है। उसकी यह बहुआयामी भूमिका उसकी विशेषता को और अधिक उजागर करती है।

नारी की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी सहनशीलता नही, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को सँवारकर आगे बढ़ने का साहस है। वह कठिनाइयों से टूटने के बजाय उनसे सीखती है और अपने लिए नए रास्ते बनाती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नारी को केवल सम्मान के शब्द न दिए जाएँ, बल्कि उसे शिक्षा, सुरक्षा, समान अवसर, स्वतंत्र निर्णय और अपने सपनों को पूरा करने का अधिकार भी मिले। किसी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब उसकी बेटियाँ और महिलाएँ आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र और समर्थ हों।

नारी को कमजोर समझना उसकी शक्ति को कम आँकना है। वह कोमल भी है और दृढ़ भी ; ममतामयी भी है और साहसी भी। उसके भीतर एक साथ कई संसार बसते है।

नारी है तो जीवन में ममता है,

नारी है तो रिश्तों में संवेदना है,

नारी है तो समाज में सृजन है,

और नारी है तो भविष्य में उम्मीद है।

नारी विशेष होने के साथ-साथ समाज की विकास-यात्रा की एक महत्वपूर्ण सहभागी है।


नारी है विशेष :- नारी प्रकृति की सबसे सुंदर और अद्भुत रचना है। वह केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि समाज और सृष्टि के निर्माण में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। नारी के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है। वह अपने प्रेम, ममता, त्याग, साहस और संवेदनशीलता से संसार को सुंदर बनाती है।


सृजन और पालन :- नारी को सृष्टि की सृजनकर्ता कहा जाता है। माँ के रूप में वह एक नए जीवन को जन्म देती है और उसे प्रेम, संस्कार और सुरक्षा देकर बड़ा करती है। परिवार में भी वही प्रेम और अपनापन बनाए रखने वाली मजबूत कड़ी होती है। उसकी गोद बच्चे की पहली पाठशाला होती है और उसके संस्कार जीवनभर उसका मार्गदर्शन करते हैं।


त्याग और सहनशीलता :- नारी के जीवन में त्याग और सहनशीलता का विशेष स्थान है। वह अपने परिवार की खुशियों के लिए अनेक बार अपनी इच्छाओं को पीछे रख देती है। सच ही कहा गया है कि वह स्वयं दीपक की तरह जलकर अपने परिवार के जीवन में उजाला भरती है। उसकी सहनशीलता परिवार को कठिन परिस्थितियों में भी संभालने की शक्ति देती है।


अनेक रूपों में नारी :- नारी का व्यक्तित्व अनेक रिश्तों से सजा है। वह माँ बनकर ममता देती है, बेटी बनकर घर में खुशियाँ लाती है, बहन बनकर स्नेह और अपनापन देती है तथा पत्नी बनकर जीवन की सहयात्री बनती है। हर रूप में उसका प्रेम अलग रंग लिए हुए होता है, लेकिन उसकी संवेदनाएँ हमेशा परिवार को जोड़ने का काम करती हैं।


अबला नही सबला :- आज की नारी केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नही है। वह शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, प्रशासन, सेना, राजनीति, कला, खेल और व्यवसाय जैसे हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही है। वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है। आधुनिक नारी अपने परिवार और करियर के बीच संतुलन बनाते हुए समाज को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।


निष्कर्ष :- नारी केवल किसी रिश्ते का नाम नही, बल्कि प्रेम, शक्ति, त्याग, साहस और सृजन का सुंदर संगम है। जिस समाज में नारी का सम्मान होता है, वह समाज अधिक संवेदनशील और प्रगतिशील बनता है। इसलिए नारी को केवल सम्मान के शब्दों में नही, बल्कि उसके अधिकारों, स्वतंत्रता और समान अवसरों के माध्यम से भी सम्मान देना चाहिए।

नारी सचमुच विशेष है—क्योंकि वह जीवन को जन्म देने के साथ-साथ उसे प्रेम, संस्कार और संवेदना से सँवारने की शक्ति रखती है।


✍️ रागिनी ठाकुर ( रायपुर, छत्तीसगढ़ )

🍁 हर बेटी को जन्म का हक दिलाना है 🍁








माँ के आंचल में आने से पहले ही,

जो कली कुचल दी जाती है।

उस नन्ही अजन्मी चीख से मानवता भी थर्राती है।

क्यों जन्म से पहले बेटी को अभिशाप समझ लिया जाता है ?

सृष्टि के पावन नियम का क्यों गला घोट दिया जाता है ?


वो कहती है "ओ माँ मुझे भी इस दुनिया में आना है"

तेरे आंचल की छांव में मुझे भी मुस्कुराना है। 

भाई जैसा ही प्यार मुझे दो मैं बोझ नही बनूंगी,

तेरे हर सुख-दुख में मैं ढाल बनकर खड़ी रहूंगी।


बेटे की चाहत में क्यों तुम लक्ष्मी का अपमान करते हो,

सृजन की उस कोमल कली का बेरहमी से संहार करते हो,

यदि बेटी ही नही बचेगी जग में तो बहू कहां से लाओगे ?

इस सूनी पड़ती धरती पर फिर वंश कैसे बढ़ाओगे ?


बंद करो यह क्रूर पाप अब रूढ़ियों को तोड़ना होगा,

बेटियों के जीवन का हक अब उनसे नही छीनना होगा।

भ्रूण हत्या को रोक कर हमें नया सवेरा लाना है,

हर बेटी को जन्म का हक और ऊंचा मुकाम दिलाना है।


✍️ श्रीजी जैन ( शाहदरा, दिल्ली )

🪅 लघुकथा - लाल स्याही का डर 🪅

परीक्षा हॉल में पसरे सन्नाटे के बीच अर्चना की कलम कागज़ पर तेज़ी से दौड़ रही थी। 12वीं की यह गणित की परीक्षा उसके भविष्य की इबारत लिखने वाली थी, अचानक, एक ठंडी सिहरन उसके रीढ़ की हड्डी से होकर गुजरी। उसे कुछ अहसास हुआ—एक अनचाहा सा गीलापन। उस अनचाही नमी ने उसकी एकाग्रता को झकझोर कर रख दिया। उसे महसूस हुआ कि उसकी सफ़ेद कुर्ती पर एक लाल रंग धीरे-धीरे फैल रहा है। पल भर में ही वह मेधावी छात्रा एक डरी हुई बच्ची में बदल गई। उसने पीछे मुड़कर नही देखा, पर उसे यकीन था कि पीछे वाली बेंच पर बैठे लड़के ने वह दाग देख लिया होगा। शर्म और घबराहट के एक अजीब से मिश्रण ने उसकी आँखों में आँसू भर दिए। अब उसकी उत्तर-पुस्तिका पर गणित के समीकरणों के बजाय आँसू गिर रहे थे, जिससे नीली स्याही धुंधली होने लगी थी। उसे लग रहा था कि अगर वह अपनी जगह से उठी, तो पूरा हॉल उस पर हँसेगा। वह सुबक रही थी, पर उसकी आवाज़ हलक में ही दबी थी। तभी, शिक्षिका मिसेज रजक की नज़र उस पर पड़ी। उन्होंने देखा कि अर्चना का पेन रुक चुका है और उसका शरीर कांप रहा है। वे शांति से उसके पास आईं और झुककर उसकी बेंच की ओर देखा। स्थिति भांपते ही उनके चेहरे पर न तो कोई झिझक आई और न ही कोई बनावटी गंभीरता। उन्होंने बहुत ही सहजता से अर्चना के कांपते हाथ को थामा और उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा, "बेटा, डरते नही। यह एक बहुत ही सामान्य प्रक्रिया है, कोई अपराध नही। अपनी कॉपी बंद करो और मेरे साथ बाहर आओ।" अर्चना ने हिचकिचाते हुए अपना चेहरा उठाया, उसकी आँखों में ढेर सारी मिन्नतें थीं। मिसेज रजक उसे लेकर पास के वॉशरूम तक गईं और अपने बैग से एक सैनिटरी पैड निकाल कर उसे दिया। उन्होंने अर्चना को पानी पिलाया और बड़े प्यार से उसके बाल संवारते हुए कहा, "अर्चना, यह लाल रंग कोई डरने वाली चीज़ नही है। यह जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। इसे अपनी मेहनत पर हावी मत होने देना।" मिसेज रजक ने अपनी शॉल उतारकर अर्चना की कमर पर बांध दी और उसे दोबारा परीक्षा हॉल में ले आईं। जब अर्चना वापस अपनी बेंच पर बैठी, तो उसे लगा कि उसके भीतर का सारा डर उड़ गया है। वह शॉल अब उसके लिए सिर्फ एक कपड़ा नही, बल्कि एक महिला द्वारा दूसरी महिला को दिया गया सम्मान और सुरक्षा का कवच था। अर्चना ने दोबारा पेन उठाया और दोगुने आत्मविश्वास के साथ लिखना शुरू किया। अब उसे अपनी सफ़ेद कुर्ती के दाग की फिक्र नही थी, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि समाज की संकुचित सोच से कहीं ऊपर एक शिक्षक की ममता और सहानुभूति होती है। परीक्षा की आखिरी घंटी बजने तक अर्चना ने अपना पेपर पूरा कर लिया था। हॉल से बाहर निकलते वक्त जब उसने मिसेज रजक की ओर देखा, तो उसकी आँखों में अब आँसू नही, बल्कि एक मूक कृतज्ञता और जीत की चमक थी। उसे अहसास हुआ कि दाग कपड़ों पर लगते हैं, हौसलों पर नही।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

🪷 कन्या भ्रूण की पुकार 🪷








माँ, मुझको दुनिया में आने दो

अंधकार में पड़ी हुई हूँ

दुनिया से मैं डरी हुई हूँ

आशाओं से भरी हुई हूँ

मुझपर प्रकाश भी छाने दो

मुझको दुनिया में आने दो


जी चाहे तुझको छूँ ऊँ मैं

तेरी गोदी में खेलूँ मैं

तेरी बाहों के झूले में

भाई की तरह ही झूलूँ मैं

मुझको गोदी में लेकर तुम

खुद को लोरी गाने दो

मुझको दुनिया में आने दो


क्यों भाई को सौभाग्य मिला

मेरे हिस्से क्यों "त्याज्य" मिला

जितना वह अंश तुम्हारा है

मैं भी उतनी ही तुम्हारी हूँ

यदि वह आँखों का तारा है

मैं भी गोदी की दुलारी हूँ

दुनिया समझे या ना समझे

हर माँ को यह समझाने दो

मुझको दुनिया में आने दो


बेटे ने भी पीड़ा दी है

फिर भी उसने ममता ली है

माँ मैंने क्या अपराध किया

फिर सारा हक़ क्यों उसे दिया

अपने आंचल की छाया में

माँ मुझको भी सो जाने दो

मुझको दुनिया में आने दो


आँखों पर बंधी पट्टी खोलो

मेरी पुकार सुन कुछ बोलो

तुमसे मैं वादा करती हूँ

सच मानो जो मैं कहती हूँ

जीवन भर साथ निभाऊंगी

तेरे दूध का कर्ज चुकाउंगी

इतना तो यकीन दिलाने दो

मुझको दुनिया में आने दो


मैं तो धरती का बीज हूँ माँ

फिर क्यों तुम सब की खीझ हूँ माँ

तुम भी तो किसी की बेटी थी

माँ की बाहों में लेटी थी

यदि बेटी नही बचेगी माँ

तो सृष्टि कौन रचेगी माँ

यह दुनिया को समझाने दो

माँ, मुझको दुनिया में आने दो


✍️ संध्या शर्मा ( मोहाली, पंजाब )

गुरुवार, सितंबर 24, 2026

👩‍🎓 ईश्वर की अनमोल रचना नारी 👩‍🎓








त्याग की मूर्ति है नारी 

दया की खान है नारी 

शक्ति का वरदान है नारी 

तपती धूप में छांव है नारी 

जीवन का आधार है नारी

धैर्य का प्रतीक है नारी

निःस्वार्थ स्नेह देती नारी

संस्कृति की नींव रखती नारी

 

घर की चारदीवारी को स्वर्ग बना देती है नारी 

चूल्हे से चांद तक की यात्रा करती है नारी 

दुर्गा बन राक्षसों का संहार करती है नारी 

आंसू को हंसी में बदल देती है नारी 

कर्तव्य को प्रतिज्ञा बना लेती है नारी 

घर-आंगन की मुस्कान है नारी

अबला नही सबला है नारी


ईश्वर की अनमोल रचना नारी

हर उलझन सुलझा देती नारी 

अंधेरे में उजाला बन जाती नारी 

अपनी खुशियां भुला देती नारी 

विघ्नों की ढाल बन जाती नारी

नारी में है विशेषता ही विशेषता 

इसलिए सम्मान की अधिकारी है नारी 


✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

👩‍💼 तुम लड़की हो……👩‍💼








तुम लड़की हो -

यह कहते ही, 

कितनी निगाहें तौलने लगती हैं तुम्हें, 

रंग से, रूप से, चाल से, कभी हँसी से, 

कभी खामोशी के सवाल से।


कहा जाता है - 

ज़रा धीरे हँसो, ज़रा कम बोलो, 

साँवली हो तो धूप में कम डोलो। 

वज़न थोड़ा कम कर लो,

सपनों को भी थोड़ा थाम कर चलो।


कभी कहते हैं -

इतनी आज़ादी भी अच्छी नही,

इतनी उड़ान भी सच्ची नही।

घर संभालो, करियर भी बनाओ, 

पर अपनी उड़ान को सीमा में ही सजाओ।


तुम लड़की हो -

तो तुम्हारी हर आदत पर चर्चा होगी, 

कभी प्रशंसा, कभी आलोचना की वर्षा होगी।

कपड़ों से चरित्र का अनुमान लगेगा,

ख़ामोशी में भी तुम्हारा बयान गढ़ेगा।


पर कौन समझेगा -

कि तुम केवल चेहरा नही, 

विचार भी हो, तुम केवल देह नही, विस्तार भी हो।

तुम वह स्वप्न हो, जो आकाश को छूता है, 

तुम वह दीप हो, जो अंधकार को रूप देता है।


तुम लड़की हो -

तो तुममें दुर्गा की शक्ति भी है,

सरस्वती की भक्ति भी है।

तुममें लक्ष्मी की समृद्धि की रेखा है,

तुममें सृष्टि रचने वाली हर एक रेखा है।


तुम ही धरती की ममता हो, 

तुम ही जीवन की गरिमा हो।

माँ बनकर तुम संसार सँवारती हो,

अपने आँचल में आकाश उतारती हो।

तुम लड़की हो तुम जीवन बनाती हो।।


✍️ प्रियंका पुष्करणा ( चित्तौड़गढ़, राजस्थान )

🏘️ बेटी ! ये घर अब भी तेरा है 🏘️








कोई तृषा, तो कोई स्नेहा,  

कोई मीना, तो कोई गीता।

कितनी रूपकँवर, 

सूली चढ़ जाती है।

इस दहेज के आड़ में,  

न जाने कितनी गुड़ियाँ, 

झुलस जाती है आग में।

क्यो हर बाप विदा कर देता ?

उसे भेड़ियों के संसार में।  


क्यों पीड़ा न दिखती हर माँ को, 

उस मासूम बच्ची की आवाज में। 

अरे ! मत कहो उससे,

एडजेस्ट कर लो।  

क्यों सिखाते हो सहना हर बार ?

क्यों बुझाते हो चूल्हे पर उसका संसार ?  

क्यों तोलते हो बेटी को रुपयों में ?

क्यों बेच देते हो सपनों को रस्मों में ?  


पर सुन बेटी, एक बात याद रखना,  

ये घर अब भी तुम्हारा है, न हो परेशान।

अगर न रहा जाए तो वापस आ जाना, 

तेरा घर अब भी तेरा है, 

तेरे माँ-बाबा अब भी तेरे हैं।

क्योंकि तू कोई पराई नही,

तू इस घर की जान है, शान है। 

तेरी हँसी से ही ये आँगन महकता है,  

तेरे आँसू से तो ये छत भी दरकता है।


वो भी तो चाहती है खुल के जीना,  

चाँद-सितारों से बातें करना,  

किताबों में अपना नाम लिखना,  

न कि अर्थी पर बस एक नाम मिटना।  

अब बहुत हुआ, अब बस करो,  

दहेज नही, दुआ दो।  

बेटी कोई बोझ नही,  

वो तो घर की रोशनी है,  

उसे जलाओ मत,  

उसे जलने दो, मगर शमाँ बनकर।


✍️ मीनू शर्मा ( सोहन गंज, दिल्ली )

बुधवार, सितंबर 23, 2026

🌻 औरत की महिमा 🌻








किसी के लिए पत्नी, बहन, माई है औरत 

किसी के लिए मौसी, चाची, ताई है औरत।


गैरों के लिए भी मांगती रहती दुआएं,

अपनो की ख़ातिर हुई पराई है औरत।


कंजकों देवियों के रूप में पूजी है जाती,

किसी ने बहकावे में आकर ठुकराई है औरत।


अजनबी से शायरों की ख्वाबों की दुनियां 

पर जालिमों के लिए चंडी कहलाई है औरत।


औरत ही बनती सदा औरत की दुश्मन,

बेशक औरत ही दुनिया में लाई है औरत।


✍️ सुरिंदर अजनबी ( धुरी, पंजाब )

मंगलवार, सितंबर 22, 2026

🌼 भ्रूण हत्या 🌼








मैं अभी इस दुनिया में आई नही हूँ,

फिर मुझसे कैसी नाराज़गी है ?

मैं तो बस एक नन्ही-सी जान हूँ,

फिर मेरी साँसों से कैसी दुश्मनी है ?


माँ, तेरी कोख में पल रही हूँ,

तेरे आँचल का सपना देख रही हूँ,

बाबुल की उँगली थामकर चलने का,

मैं भी तो एक सपना देख रही हूँ।


क्यों कहते हो बेटी बोझ होती है ?

क्यों उसकी किस्मत पहले लिख देते हो ?

जिस बेटी को जन्म से पहले मिटा देते हो,

उसी बेटी के लिए बाद में देवी के दीप जलाते हो।


बेटी ही तो घर में खुशियाँ लाती है,

बेटी ही रिश्तों को प्यार सिखाती है,

बेटी ही एक दिन माँ बनकर,

नई पीढ़ी को जन्म देती है।


मुझे जन्म लेने दो,

मुझे साँस लेने दो,

मैं बोझ नही, एक अवसर हूँ,

मुझे अपने सपनों के साथ जीने दो।


किसी की कोख फिर सूनी न हो,

किसी माँ की आँख नम न हो,

बेटी को जन्म से पहले मारने की

यह क्रूर सोच अब खत्म हो।


बेटी को बचाइए,

उसे पढ़ाइए, आगे बढ़ाइए,

क्योंकि बेटी केवल घर की नही,

पूरे समाज की ताकत है।


✍️ शिखा चंदेल ( देहरादून, उत्तराखंड )

👩‍🎓 औरत 👩‍🎓









मैं कौन हूँ ?

मेरी पहचान क्या है ?

मेरे अस्तित्व का मान क्या है ?

इन प्रश्नों का उत्तर हूँ मैं—

हाँ, मैं औरत हूँ,

मुझे गर्व है कि मैं औरत हूँ।


ईश्वर ने कितने रूपों में,

मुझको नवाज़ा है।

माँ बनाकर ममता का,

सागर मुझमें उतारा है।


बेटी बनकर घर-आँगन की,

खुशियों का वरदान हूँ।

बहन बनकर स्नेह-सुधा,

प्रेम और अनुराग हूँ।


पत्नी बनकर त्याग-समर्पण,

जीवन की सहभागी हूँ।

अर्धांगिनी बनकर हर सुख-दुःख में,

साथ निभाने वाली हूँ।


दुर्गा हूँ तो शक्ति मेरी,

सरस्वती तो ज्ञान,

लक्ष्मी बनकर समृद्धि लाऊँ,

अन्नपूर्णा मेरा मान।


मौन हूँ तो यह मत समझो,

मुझमें कोई आवाज़ नही।

शांत हूँ तो यह मत समझो,

मुझमें कोई आग नही।


अबला समझने की भूल न करना,

मैं शक्ति का विस्तार हूँ,

अन्याय के आगे झुक जाऊँ,

इतनी भी लाचार नही हूँ।


कुत्सित सोच को मैं अब,

साहस से ललकारूँगी।

अपने अधिकार और सम्मान की

हर लड़ाई मैं लड़ूँगी।


न कोई बेटी भय में जीए,

न कोई निर्भया फिर हो।

हर नारी सुरक्षित होकर,

अपने सपनों की अधिकारी हो।


कदम से कदम मिलाकर,

आसमान छू जाऊँगी।

चूल्हे-चौके के संग-संग,

नभ की सैर कर आऊँगी।


प्यार मिले, सम्मान मिले तो,

घर-आँगन महकाऊँगी।

स्नेह मिले तो रिश्तों में,

खुशियों के दीप जलाऊँगी।


पर सम्मान जहाँ नही होगा,

वहाँ मौन नही रहूँगी।

अपने स्वाभिमान की खातिर,

हर बंधन से लड़ जाऊँगी।


मैं केवल किसी की बेटी,

बहन, पत्नी या माँ नही—

इन रिश्तों से आगे भी,

मेरी अपनी पहचान सही।


मैं सृजन हूँ, मैं शक्ति हूँ,

मैं साहस की उड़ान हूँ,

मैं आधी आबादी ही नही,

पूरे समाज की पहचान हूँ।


हाँ, मैं औरत हूँ—

मुझे गर्व है कि मैं औरत हूँ।


✍️ पूनम लता ( नोएडा, उत्तर प्रदेश )

💔 मौन विदा की टीस 💔




​




मैं विस्मृत न कर सकी उस आदि-अनंत अनुराग को,

भले ही तुमने मेरी खामोशी को 'बेवफाई' का नाम दे दिया।


मेरा तुम्हें छोड़ जाना, हृदय का विद्रोह नही, काल का प्रतिशोध था,

तुझसे विमुख होना मेरी इच्छा नही, मेरी कुल-मर्यादा का अवरोध था।


​आज भी जब उन स्मृतियों की पगडंडियों पर पाँव रखती हूँ,

तो अतीत की राख से यादों की चिंगारियां रूह को झुलसा देती हैं।


चेतना के पन्नों पर आज भी अंकित है वह चंचल सा परिहास,

जब तुम मेरा परिचय 'भाभी' कहकर, रिश्तों की सीमाओं से खेलते थे—


वही शब्द आज एक अमिट नियति बनकर मेरे वजूद को डस रहा है।

​यकीन मानो, मैं खंडित थी पर पाखंडी नही थी,


मैं वक्त के क्रूर चक्र में फंसी एक ठहरी हुई लाचारी थी।

तुम्हें मझधार में छोड़ना, मेरे प्रेम की पराजय नही,

बल्कि कर्तव्यों की वेदी पर मेरी आत्मा की सबसे बड़ी बलिहारी थी।


​तुमने तो केवल मेरा प्रस्थान देखा है प्रिय,

मेरी रूह का वहीं तुम्हारे पास ठहर जाना नही देखा।।


✍️ सुमित्रा कुमारी रजक ( औरंगाबाद, बिहार )

🙍‍♀️ विदाई — नई उम्मीदों के संग 🙍‍♀️

आज बाबुल के आँगन में, क्यों छाई है उदासी, कल तक थी जो घर की रौनक, आज वही बेटी है प्रवासी। माँ की आँखों में हैं आँसू, पिता के मन में प्यार, द...