शनिवार, अक्टूबर 10, 2026

🌿 मौन रुदन 🌿








हरे-भरे जो हाथ पसारे,

खड़े रहे जो सदियों से।

आज वही तरु काँप रहे हैं,

मानव की इन कुल्हाड़ियों से।


नदियाँ जो अमृत लाती थी,

अब विष का घूँट बहाती हैं।

मैली चादर ओढ़ के अपनी,

सागर से मिलने जाती हैं।


पक्षी का वह करुण विलाप,

सूखे पेड़ की डाल पे सुनो।

कटते जंगल, छिनते बसेरे,

इस खामोश दर्द को गुनो।


प्रकृति अब भी सह रही है,

पर धीरज का बाँध न टूटे।

चेत जाओ ऐ इंसान अब भी,

कहीं साँसों का साथ न छूटे।


✍️ श्रीजी जैन ( शाहदरा, दिल्ली )

🍁 इंसानियत का धर्म 🍁

इंसानियत मानव का सबसे बड़ा धर्म है यह हमें स्वार्थ से ऊपर उठकर सहानुभूति रखना सिखाता है प्रकृति जीव-जंतुओं और मानव के प्रति दया का भाव ही सच्ची इंसानियत है।

इंसानियत व्यक्ति को सच्चा इंसान बनाती है किसी के कठिन समय में उसकी मदद करना इंसानियत है आज भी कई ऐसे लोग हैं जो बिना किसी स्वार्थ के लोगों के मुश्किल वक्त में उनकी मदद करते हैं। इंसानियत के बिना समाज का अस्तित्व सुरक्षित नही है।

यह आचरण की एक शैली है दूसरों की मदद करने से आत्मिक सुख मिलता है इंसानियत समाज में एक दूसरे को जोड़ने का कार्य करती है। इंसानियत ही इस संसार को सुन्दर और रहने योग्य बनाती है। हमें अपने जीवन को सार्थक करने के लिए स्वार्थ को छोड़कर इंसानियत के दीप को हमेशा प्रज्वलित रखना होगा।

✍️ रत्ना वाधवानी ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

👩‍💼 मेरी माँ—मेरा पहला गुरु 👩‍💼








मेरी सफलता पर वो खूब मुस्कुराए,

मेरी असफलता पर भी मेरी पीठ थपथपाए।

मेरी छोटी-सी खुशी में अपनी खुशियाँ ढूँढे,

मेरे हर आँसू को अपनी पलकों में समाए।


जीवन के हर कठिन मोड़ पर,

वो मेरी सारथी बन मुझसे आगे नज़र आए,

जब रास्ते धुंधले हो जाएँ मेरे,

वो बनकर रोशनी मुझे राह दिखाए।


जीवन की हर परेशानी में,

वो मेरे पास आकर समझाएं,

मेरी खामोशी को भी पढ़ लें वो,

बिन कहे मेरे मन की बात समझ जाएँ।


जब दुनिया मेरी हिम्मत तोड़ने लगे,

वो मेरा हौसला बनकर सामने आए,

मेरी हर हार के बाद,

फिर से जीतने का जज़्बा जगाए।


मेरी हर छोटी कोशिश पर,

वो गर्व से मुस्कुराए,

मेरे सपनों को अपना समझकर,

हर कदम पर मेरा साथ निभाए।


जिसकी दुआओं से मेरी राहें आसान हों,

जिसकी ममता से हर ग़म बेईमान हो जाए,

जिसको देखने मात्र से,

जीवन में एक नई उमंग भर आए।


वो सिर्फ़ मेरी माँ नही,

मेरी ताकत, मेरी दुआ, मेरा विश्वास है,

मेरी हर जीत के पीछे,

उसका ही तो आशीर्वाद खास है।


जो मुझे गिरकर भी संभलना सिखाए,

जो मुझे खुद से पहले दुनिया समझाए,

जो हर हार के बाद भी मेरा हौसला बढ़ाए,

मुझे मेरा पहला गुरु मेरी माँ में ही नज़र आए।


✍️ प्रियंका पुष्करणा ( चित्तौड़गढ़, राजस्थान )

बुधवार, अक्टूबर 07, 2026

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तरीय ऑनलाइन ‘मन सृजन साहित्यिक महोत्सव’ के प्रतिभागी रचनाकार "पुनीत साहित्य भूषण" सम्मान से सम्मानित।

पुनीत अनुपम ग्रुप द्वारा मन‌ की भावनाओं को रचनाओं के माध्यम से प्रकट करने का अवसर देने के उद्देश्य से रचनाकारों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन ‘मन सृजन साहित्यिक महोत्सव’ का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों को दस अलग-अलग विषयों के विकल्प देकर उनमें से किन्हीं दो विषयों का चयन करके चयनित विषयों पर आधारित रचनाएं लिखने के लिए कहा गया। इस महोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों की रचनाकार शख्सियतों ने भाग लिया। जिन्होंने दिए गए विषयों पर आधारित एक से बढ़कर एक बेहतरीन रचनाओं को प्रस्तुत कर महोत्सव की शोभा में चार चाँद लगा दिए और महोत्सव को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। महोत्सव में प्रस्तुत रचनाओं में श्रीजी जैन (शाहदरा, दिल्ली) और संध्या शर्मा (मोहाली, पंजाब) की रचनाओं ने ग्रुप का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया। इस महोत्सव में सम्मिलित प्रतिभागी रचनाकार शख्सियतों को ऑनलाइन 'पुनीत साहित्य भूषण' सम्मान देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ग्रुप के संस्थापक एवं अध्यक्ष पुनीत कुमार जी ने महोत्सव में प्रस्तुत की गई रचनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया देकर रचनाकारों का मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया तथा सम्मान पाने वाली सभी रचनाकार शख्सियतों को उज्ज्वल साहित्यिक जीवन की शुभकामनाएं दी। इसके साथ ही उन्होंने ग्रुप द्वारा आयोजित होने वाले भिन्न-भिन्न ऑनलाइन साहित्यिक कार्यक्रमों में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए रचनाकारों को सादर आमंत्रित भी किया। इस महोत्सव में उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करके ग्रुप की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख नाम वसुधा श्रीवास्तव, प्रियंका पुष्करणा, डॉ० सोहन पाल 'मज़ार’, रत्ना वाधवानी, संध्या शर्मा, श्रीजी जैन रचनाकारों के रहे।

सोमवार, अक्टूबर 05, 2026

🍁 आओ ! बदलें अपनी आदतें 🍁








जो साफ करते हैं दूसरों का कूड़ा,

उनके घरों में अक्सर अंधेरा होता है।

हम तो मना लेते हैं त्योहार रोशनी में,

पर उनकी सुबह का रुख कुछ और होता है।


वो गटर, वो नालियां, वो गंदगी के ढेर,

जिन्हें देखकर हम अपनी आँखें फेर लेते हैं।

सोचो ज़रा, उनके स्वास्थ्य का क्या ?

जो हर रोज़ अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं।


कूड़ेदान का सही इस्तेमाल तो बस एक बात है,

पर असली स्वच्छता वो है जो हर इंसान को सम्मान दे।

जब तक न बदलेगी हमारी यह संकुचित सोच,

तब तक देश कैसे खुद को पूरी तरह महान कहे ?


प्लास्टिक का यह पहाड़, यह ज़हरीला धुआँ,

यह सिर्फ ज़मीन नही, हमारा भविष्य निगल रहा है।

आओ जागें और बदलें अपनी आदतें आज ही,

क्योंकि हमारा ही कल, कचरे के इस ढेर में जल रहा है।


✍️ श्रीजी जैन ( शाहदरा, दिल्ली )

👸 स्त्री का सौंदर्य 👸








स्त्री का सौंदर्य उसकी देह नही है,

एक बहुत सुंदर शजर है,

जिसमें सुन्दरता के सारे आयाम हैं।


यदि आपका नज़रिया समझता है समर्पण,

यदि साँसें समझती हैं सुकूं,

तो स्त्री का सौंदर्य नज़र आएगा..!!


पैरों में पड़ी रिश्ते की अदृश्य बेड़ियां,

ज्यों ही तुम्हें अनुभव होता है कभी दर्द का,

तो ही तुम्हें स्त्री सौंदर्य नज़र आएगा..!!


बाप के घर का हिस्सा उसके लिए किस्सा,

फिर भी उसकी नवाजिश यदि तू देख पाएगा,

तो ही तुम्हें स्त्री सौंदर्य नज़र आएगा..!!


तेरे बीमार होते ही उसका हाथ माँ जैसा बन जाएगा,

तो ही तुम्हें स्त्री सौंदर्य नज़र आएगा..!!


वह स्त्री ही है जो थोड़ा-सा सम्मान मिलने भर से, 

हर रिश्ता बरकरार रखती है,

सिर्फ़ एक दिन निभाओगे उसका किरदार जो तुम,

तो तुम्हें स्त्री का सौंदर्य नज़र आएगा..!!


जिसके आने से घर में दया करुणा और प्रेम आएगा,

तो ही तुम्हें स्त्री का सौंदर्य नज़र आएगा..!!


मजबूत विचारों वाली महिला,

पुरुष प्रधानता से कभी नही हारती,

जिस दिन तू यह बात समझ जाएगा,

उस दिन तुझे स्त्री का सौंदर्य नज़र आएगा।


✍️ डॉ० सोहन पाल 'मज़ार' (मुज़फ़्फ़रनगर, उत्तर प्रदेश)

✨ इंसानियत✨








इंसानियत का भाव मन में जिसके

वही सच्चा इंसान कहलाता है

निस्वार्थ सेवा यदि वह करता

तो नेक इंसान बन जाता है


आज हैवानियत को अपनाकर इंसान 

समाज में अपना मुंह छुपाता है

संस्कारों की कमी सर्वत्र दिखाकर 

माता-पिता के अपमान की वजह बन जाता है 


वृक्षों से हम सीखें कि 

पत्थर खाकर कैसे किया जाता उपकार

खट्टे-मीठे फल हैं देते वे 

जिससे मिलती खुशी अपरंपार


जब इंसान ही इंसान के काम ना आता 

तो पशु समान जीवन उसका बन जाता 

जो इधर-उधर भटकता रहता

समाज में सम्मान कभी ना पाता


कौन किस धर्म जाति का है बस

यही मन में है प्रश्न महान 

असली इंसान होता है वही

चेहरे से जो भाव जो जाता जान 


धर्म की शिक्षा भूल गए सब

इंसानियत का बचा नही निशान

इंसानियत आज मुंह छिपाकर रो रही

कहां विलुप्त हो गए अच्छे इंसान


हैवानियत कर रही नृत्य चारों ओर

और इंसानियत रो रही है जोर-जोर

रिश्तों में ममता और भावनाएं हो गई हैं मौन 

धन वैभव की लालसा में आप कौन और हम कौन


आओ ! समय रहते हम जाग जाएं

इंसानियत को डूबने से बचाएं

बच्चों को नेक इंसान बनाएं

उनका और अपना भविष्य सुरक्षित बनाएं।


✍️ वसुधा श्रीवास्तव ( भोपाल, मध्य प्रदेश )

💞 तेरा-मेरा अनमोल …रिश्ता 💞

तेरा-मेरा रिश्ता बड़ा अनमोल मैंने पाया है, आज बरसों के बाद फिर ख्याल आया है, मेरी जिंदगी में बहुत से दुखों का साया है, इस दिल ने सनम फिर तुझे...